बोधस्थल आपको आप तक लाता है || आचार्य प्रशांत, बोधस्थल के उद्घाटन पर (2017)

आचार्य प्रशांत: आपके और इस आश्रम के बारे में, आपके और संसार के बारे में, आपके और मेरे बारे में, कुछ बातें समझ लेना ज़रूरी है। आप किसी बाहरी जगह पर नहीं आये हैं, लगता ऐसा ही है। पर इंसान की आँखों का कुछ खास भरोसा किया जा नहीं सकता। जो लगता हो वही बहुत गहराई से सच हो, ऐसा अक्सर होता नहीं।
आश्रम को ऐसी जगह मानिए जहाँ विश्राम मिले, जहाँ विश्राम मिले उसे घर कहते हैं। तो घर कोई बाहरी जगह तो हो नहीं सकती, घर की परिभाषा ही है — वो जगह जो आपकी अपनी हो। जहाँ आपको कोई दुराव-छिपाव न करना पड़ता हो। जहाँ आपको चेहरे न पहनने पड़ते हो। जहाँ आपको तनाव, चिन्ता न रखनी पड़ती हो। जहाँ आप सहज हो सकते हो, नग्न हो सकते हो, वो जगह — घर।
तो यूँ तो लगेगा जैसे उठे हैं, चले हैं, और किसी बाहरी, भौतिक, भौगोलिक जगह पर पहुँचे हैं, पर ऐसा मानिएगा नहीं। इसकी स्थापना ही ऐसे की गयी है कि ये जगह वास्तविक अर्थों में घर रहे। ये वो जगह रहे जहाँ आप शान्त हो सकें, जहाँ आप आप हो सकें।
इसी तरीके से, आपकी और मेरी बात — आप प्रेम दे रहे हैं, सम्मान दे रहे हैं, किसी बाहर वाले को नहीं दे रहे हैं। मुझे एक आसन देते हैं, जो ऊँचा है। मेरे सामने आप बड़े प्रेम से बैठे हुए हैं। प्रतीत होता है आपका आसन जो ज़रा नीचा है। मैं बोल रहा हूँ, आप मौन से और स्नेह से सुन रहे हैं। आप किसी बाहर वाले को नहीं सुन रहे हैं। बाहर वाले को सम्मान यदि दिया तो वो डर जैसा है और प्रेम तो बाहर वाले को दिया ही नहीं जा सकता।
मेरे माध्यम से अपने ही आप को सुन रहे हैं; मैं नहीं बोल रहा, आप स्वयं से ही बोल रहे हैं। अगर बाहरी हूँ मैं, दूर का हूँ मैं, तो मेरा बोलना बहुत काम नहीं आएगा। क्षण-दो-क्षण की बात रहेगी, मन का माहौल ज़रा बदलेगा, जैसा मनोरंजन में भी होता है, जैसा आमतौर पर भी स्थितियों के बदलने से होता है। लेकिन बात मोटे तौर पर जस-की-तस रह जाएगी, कोई मौलिक घटना घटेगी नहीं, यदि मैं बाहरी हुआ तो।



