मनुष्य एक सामाजिक प्राणी के साथ ही घरेलू प्राणी भी है। घर तो रहेगा ही — प्रश्न यह है कि उस घर के साथ आप संबंध क्या बना रहे हो? आपके इर्द-गिर्द जो कुछ भी है, उससे सही रिश्ता बनाना सीखो। अध्यात्म का मतलब यह नहीं है कि घर-बार छोड़ देना है। अध्यात्म में कर्म के तौर पर कुछ भी अनिवार्य नहीं, कुछ भी वर्जित नहीं। सब विकल्प खुले हैं — छोड़ने का भी विकल्प है, और रिश्ते को सुधार देने का भी विकल्प है। आपको अपनी चेतना का प्रयोग करके देखना है कि इस क्षण पर क्या करना उचित है।
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प्रश्नकर्ताः आचार्य जी, मेरा प्रश्न यह है कि ये हम चीज़ सब कुछ छोड़कर ही कर पाएँगे या फिर सब में रहते हुए भी कर सकते है? मतलब कि मैं घर-बार छोड़कर या फिर वैराग्य लेकर या संन्यास लेकर ही वो चीज़ कर पाऊँगा, या फिर मैं घर पर रहकर भी वो चीज़ कर सकता हूँ? कि मुझे फ़र्क़ ही नहीं पड़ रहा, वो चीज़ है तो ठीक है, नहीं है तो भी ठीक है।
मेरा वो ही प्रश्न था कि कौन-सा मार्ग सही है। जैसे घर पर भी अभी बहुत सारी ज़िम्मेदारियाँ हैं मेरे ऊपर, अभी अकेला हूँ तो माँ-बाप की बहुत ज़िम्मेदारियाँ हैं। तो मैं पहले कर्तव्य अपना देखूँ या मैं इस तरफ़ मुड़ूँ या दोनों कर सकता हूँ?
आचार्य प्रशांत: जैसे हम कहते हैं न, “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है,” वैसे ही हम यह भी कह सकते हैं, “मनुष्य एक घरेलू प्राणी है।” घर तो हमारा होना ही है, जहाँ भी हों हम, वहाँ घर तो बन जाना ही है। आप एक होटल के कमरे में भी जाते हो दो-चार दिन के लिए, तो उसको भी थोड़ा तो सुव्यवस्थित करके रखते ही हो। बन गया न चार दिन के लिए घर? गाड़ी में भी बैठते हो दो घंटे के लिए तो गाड़ी की भी थोड़ी सफ़ाई करके रखोगे, गाड़ी की भी सीट की सफ़ाई देखोगे, उस पर लिहाफ़ क्या चढ़ा है, उसका रंग क्या है, यह सब देखोगे, हो गई न घर जैसी बात? तो घर तो रहेगा ही, प्रश्न यह है कि उस घर के साथ आप सम्बन्ध क्या बना रहे हो?




