क्या परिवार के साथ रहकर सच को नहीं पाया जा सकता? || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2019)

भाग 1
आचार्य प्रशांत: (पत्र पढ़ते हैं) शैलेन्द्र भास्कर हैं, कानपुर से।
मैंनूं कौन पछाणे
हादी मैंनूं सबक पढ़ाया, ओत्थे होर न आया-जाया, मुतलिक ज़ात जमाल विखाया, वहदत पाया ज़ोर नी।
गुरु ने मुझे शिक्षा दी कि यह मार्ग ऐसा है कि वहाँ कोई अन्य आता-जाता नहीं है। गुरु ने मुझे निरपेक्ष सौंदर्य का दर्शन करा दिया है और मैं उसी के रंग में ऐसी रंग गयी हूँ कि अद्वैत ज़ोर दिखाने लगा है।
~ बाबा बुल्लेशाह
नमस्कार, आचार्य जी। बुल्लेशाह जी ने अद्वैत को समझाया है। इस अद्वैत को अपने जीवन में कैसे देखूँ? मेरी समस्या यह है कि मेरी आत्मा तो बहुत तड़पती है अपने को जानने के लिए और मन करता भी है कि सब छोड़कर निकल जाऊँ लेकिन जब से जन्म लिया है तब से माता-पिता ने परवरिश की, पालन-पोषण किया। यदि उन्हें ज़रूरत के समय सहारा न दिया जाए तो यह भी एक प्रकार से प्रभु के प्रति एक अकृतज्ञता होगी। ऐसी स्थिति में क्या कोई ऐसा भी मार्ग हो सकता है कि परिवार के साथ रहते हुए भी परमात्मा का बोध कर पाऊँ? धन्यवाद आचार्य जी।






