जानवरों से इतनी उम्मीदें रखोगे, तो दिल तो टूटेगा ही || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता: मैं सूरत से आया हूँ। और मेरा जो प्रश्न है वो रियल लाइफ (वास्तविक जीवन) से है। आचार्य जी, मैं आपको कम-से-कम पाँच-छः महीने से सुनता हूँ। और सुनने के बाद अंदर से बहुत से बदलाव आये हैं।
जो पहले इतना अन्दर से दिख नहीं पाता था। जब आपको सुनता था तो वो चीज़ रियल लाइफ में दिखता था। और अपनेआप से अन्दर से सवाल पूछता था और एकदम गहरा घुसता चला जाता था। और साफ़-साफ़ दिखता था कि जो मैं कर रहा हूँ वो सही नहीं है। चाहे बिजनेस (व्यापार) से रिलेटेड (सम्बन्धित) है या कुछ भी है। जैसे मेरा बिजनेस ही है तो उसमें मेरे जो भी वर्कर्स (कामगार) हैं, जब तक मेरे वर्कर्स उसमें से एक भी नहीं निकलते तब तक तो ठीक है। लेकिन जैसे ही उसमें से एक भी, दो भी निकलते थे तो शारीरिक और मानसिक तौर पर मुझे बहुत ज़्यादा प्रॉब्लम हो जाता था।
तब अन्दर एहसास होता था कि बहुत ग़लत है। तब सवाल उठता था कि ये क्या कर रहे हैं, क्या ये चीज़ सही है और इतना पैसे क्यों कमा रहे हैं। फिर समझ में आता है कि जितनी ज़रूरत है उतना ही दुख है। मतलब नॉर्मली (साधारणतया) इंसान को जो दो वक़्त की रोटी चाहिए वो खाया और नार्मल कपड़ा पहना। तो हम इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं। और हमारे जो आजु-बाजू का माहौल है, मेरी ज्वाइंट फैमिली (संयुक्त परिवार) है, तो सब एक-दूसरे से अपनेआप को बड़ा दिखाना चाहते हैं। कोई डॉक्टर है कोई फार्मा में है। और सामने से जताया जाता है कि मतलब मैं तुझसे बड़ा हूँ। न चाहते हुए भी सामने आते हैं तो बताते हैं कि दो-तीन दुकान इधर डालूँगा, उधर डालूँगा। मैं भी मतलब प्रभावित हो जाता। मुझे तकलीफ़ होती है कि हमको नीचा दिखाया जा रहा है। और उससे बहुत लोग प्रभावित हो जाते हैं, मेरे और घर के सदस्य और आजु-बाजु वाले, सब प्रभावित हो जाते हैं। मतलब कि ये कुछ कर रहा है तो मेरे को भी बढ़ाना चाहिए। और जो मेरा परिवार है, सिर्फ़ मम्मी हैं वो भी कहीं-न-कहीं कहती हैं कि तू भी तो कुछ कर, क्या कर रहा है। मेरे अंदर सवाल आता है मैं क्या करूँ। मुझे दिख रहा साफ़-साफ़ कि मुझे ये चीज़ नहीं चाहिए। कि मैं कर क्या लूँगा, मेरे को वहाँ पर कुछ नही मिलने वाला। क्योंकि मैं बुड्ढा भी हो जाऊँगा तो वो चीज़ मिल नहीं पाएगी। ये चीज़ मुझे दिख रही थी साफ़-साफ़ और सारे परिवार वालों को समझाने का भी









