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मैं क्या सलाह दूँ? || आचार्य प्रशांत के नीम लड्डू
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, ज़िम्मेदारी कैसे पूरी करूँ? मम्मी-पापा कुछ और कहते हैं और मैं कुछ और चाहती हूँ। ये भी पता है कि वो ठीक हैं अपनी जगह पर, फिर भी मेरा मन नहीं मान रहा। इसीलिए घरवालों से कुछ समय लिया है, पर अब ऐसा लग रहा है कि समय भाग रहा है और मैं वहीं हूँ, कुछ भी कर नहीं पा रही हूँ। ऐसी स्थिति में क्या करूँ कि कोई रास्ता नज़र आये और सब ठीक हो जाए? क्योंकि मेरे लिए घरवालों की खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है। पर फिर दूसरी तरफ़ ऐसा लग रहा है कि ये रास्ता मेरा नहीं है। कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: मैं क्या मार्गदर्शन करूँ? मार्गदर्शन तो तुम करवा आयी हो। जितनी हिन्दी पिक्चरों के डायरेक्टर (निर्देशक) हैं, सब तुम्हारे मार्गदर्शक हैं। ये सुन रहा हूँ और ‘कभी खुशी कभी गम’ बज रहा है। (व्यंग करते हुए) ‘मेरे लिए मेरे घरवालों की खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है’, ज़रूर! (श्रोताओं की सामूहिक हँसी)

मेरे चेहरे पर क्या लिखा है? नाम है मेरा आचार्य प्रशांत, समझी? इतनी आसानी से बुद्धू बना लोगी? ‘मम्मी-पापा कुछ और कहते हैं और मैं कुछ और चाहती हूँ।’ ये जो ‘कुछ’ है, उसका नाम भी नहीं ले रही। इतनी मीठी चीज़ है? इतना बड़ा खजाना है कि सबसे छुपा रही हो? नाम तो उसी का नहीं लिया जाता जिसको या तो बहुत सम्मान देते हैं या जो नामातीत होता है। परमात्मा का कोई नाम नहीं होता। ये कौन है जिनका तुम नाम भी नहीं लेना चाहतीं? सारा खेल तो सवाल से ही खुल गया न!

प्र: शादी।

आचार्य: शादी! जैसे रसगुल्ला बँट गया हो, बोला ही इतनी मिठास से। तुम्हें क्या लग रहा है, तुम बच जाओगी?

प्र: शादी की बात चल रही है।

आचार्य: क्या कह रहे हैं माताश्री-पिताश्री? कर लो, या ये कह रहे हैं कि न करो?

प्र: कर लो।

आचार्य: कर लो। तुम क्या कह रही हो?

प्र: नहीं करनी।

आचार्य: ये तो हर लड़की कहती है शुरू-शुरू में। तुमने नया क्या बोला? ये तुम अपनी शर्माहट, अपनी ब्लशिंग (शर्माना) देखो। तुम तो अभी से विवाहिता हो। तैयारी, ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) पूरी है बिलकुल। ऐसे ही तो शर्माना होता है। जब इतना कुछ सीख लिया है, तो आगे के कामों से कैसे बच जाओगी? छोटी बच्ची पैदा होती है, उसे पता होता है कैसे शर्माना है? जिन्होंने तुम्हें सिखा दिया यूँ शर्माना, उन्होंने जो बाक़ी बातें सिखायी हैं वो भी तुमने सीख ही ली होंगी, तुम्हें अनुपालन करना पड़ेगा।

ये लज्जा, ये शर्म, तुम्हें क्या लगता है इनमें कोई सौन्दर्य है? यही वो ज़ंजीरें हैं जिससे औरत जकड़ी जाती है। तुममें दुख थोड़े ही उठा? तुम तो भावविभोर हो गयी और तुम ही नहीं, पूरा कक्ष। मैं और कोई बात बोल रहा था तो इतनी मुस्कान बिखरी थी कहीं? अब देखो! कौन बच सकता है!

पहला ही वाक्य कहता है, ‘आचार्य जी, ज़िम्मेदारी कैसे पूरी करूँ?’ ये तो बात अजीब है। किसने कह दिया कि ये ज़िम्मेदारी है? बताओ किस शास्त्र में लिखा है? मैं पढ़ना चाहता हूँ। किसने कह दिया ‘ज़िम्मेदारी है’? किस चीज़ को विवाह कहती हो? मुझे समझाओ, मैं थोड़ा नासमझ आदमी हूँ। मैं नहीं जानता हूँ, मुझे बताओ, किसको विवाह कहते हो?

मैं सत्य जानता हूँ, परमात्मा जानता हूँ, मैं प्रेम जानता हूँ, आनन्द जानता हूँ, मैं मुक्ति जानता हूँ, सरलता जानता हूँ। मुझे विवाह समझाओ क्या होता है। मैंने किसी उपनिषद् में इस नाम का शब्द पढ़ा नहीं। मैं जानना चाहता हूँ कि ये ज़िम्मेदारी कैसे हो गया। मूढ़-मना हूँ, मुझे तो इतना पता है कि जो पैदा हुआ है, उसकी एक ज़िम्मेदारी होती है, मुक्ति। ये पचास ज़िम्मेदारियाँ कहाँ से आयीं? जवाब दो!

ये क्या है, विवाह क्या है? ये प्रश्न ही दिमाग में नहीं आता न? और मैं ख़िलाफ़ नहीं हूँ विवाह के। मैं बेवकूफ़ी के ख़िलाफ़ हूँ, मैं मूढ़ता के ख़िलाफ़ हूँ। विवाह कुछ होता होगा, अच्छा-बुरा, मुझे नहीं पता। मुझे समझाओ, विवाह क्या होता है? ज़िम्मेदारी कैसे हो गया? और ख़ासतौर पर ऐसा विवाह जो मम्मी-पापा के कहने से किया जाए। ये क्या है?

प्र: आचार्य जी, मन नहीं मान रहा है शादी के लिए।

आचार्य: तो ज़िम्मेदारी कैसे हो गयी, तुमने शुरू में ही कैसे कह दिया कि ज़िम्मेदारी है?

प्र: घर में कई चीज़ें कहते हैं कि यदि तुम ऐसा नहीं करोगी तो लोग क्या कहेंगे, हम किसी को क्या जवाब देंगे, ये तो तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।

आचार्य: तुम कुछ हो या जितनी हो बस लोगों के लिए हो? कुछ निजी है तुम्हारा? विवाह का मतलब जानती हो क्या होता है? किसी दूसरे व्यक्ति की निरन्तर संगति को स्वीकार कर लेना। दिन-रात सिखाता रहता हूँ कि एक चीज़ है अगर जो आदमी के पूरे जीवन का फ़ैसला कर देती है, वो है संगति। तुम जिसके साथ रह रहे हो, तुम वही हो जाओगे। तुम किसके साथ रहने जा रही हो ज़िन्दगी भर के लिए, या कम-से-कम कुछ सालों के लिए? और क्यों? कैसे चुना तुमने? जवाब तो दो!

पहली बात तो ये देखो कि संगति आवश्यक है। आदमी के भीतर अधूरेपन का भाव होता है। आदमी को कुछ तो चाहिए जिसके वो साथ हो सके। तो हम मानते हैं कि तुम्हें कोई चाहिए, संगति ज़रूरी है। हमारे भीतर अपूर्णता होती है और हमें हाथ पकड़ना है किसी का। किसका? और किन पैमानों पर तुम चुनते हो कि किससे विवाह करना है? बताओ मुझे।

पहली बात तो ये है कि स्त्री कहती है पुरुष की संगति चाहिए, पुरुष कहता है स्त्री की संगति चाहिए। वो भी स्त्री को जवान पुरुष की और पुरुष को जवान स्त्री की संगति चाहिए। तो सबसे पहले तो यहीं पर दिख गया कि तुमने किस आधार पर संगति चुनी है। तुमने किस आधार पर संगति चुनी है? तुम्हारा आधार है दैहिक सुख। तुम कहते हो, ‘जिसके साथ तुम सम्भोगरत हो सको, उसी की संगति करोगे।‘ है न? पहली बात तो ये है।

और उसमें भी तुम पचास बातों का और ख़याल कर देते हो — ‘समाज ने कितना दबाव बनाया है? जिसके साथ जा रहे हो कमाता कितना है? उसकी जात क्या है? उसका धर्म क्या है?’ इस तरह से संगत चुनी जाती है? ऐसे तुम्हें तृप्ति मिल जाएगी? ऐसे मुक्त हो जाओगे? बोलो! जिसको तुम चुन ही देह देखकर रहे हो, वो दिन भर तुम्हारी देह नहीं नोचेगा? चलो ठीक है, सिर्फ़ देह देखकर नहीं चुन रहे हो, वो तो मैं भी कह रहा हूँ, तुम पैसा भी देखते हो। तो ठीक है, देह नोचेगा पैसा दे देगा। ऐसे जीना है?

मुझे दो लोगों के साथ रहने में क्या आपत्ति हो सकती है, भली बात है। दो लोग साथ हैं और साथ रहने के लिए अगर तुमने कुछ रस्में भी निभा ली तो चलो ठीक है, चलेगा। तुम्हें एक रात का स्वाँग करना तो तुमने कर लिया। आग ली, उसके चक्कर काट लिये इर्द-गिर्द, ये सब भी तुम्हें करना था कर लिया, चलो कोई अपराध नहीं हो गया। कर डालो, ये सब भी कर डालो। तुम्हें सौ लोगों को दावत देनी थी, दो हज़ार लोगों को दावत देनी थी, तुमने दावत भी दे ली, चलो वो भी कोई बात नहीं। वो रात तो बीत जाएगी न, और उसके बाद क्या बचेगी तुम्हारे पास? संगति।

तुम मुझे बताओ तुम किसकी संगति कर रहे हो और क्यों? ऐसा तो है नहीं कि शादी की रात के साथ शादी का खेल भी ख़त्म हो गया, या ख़त्म हो गया? उसके बाद तो खेल शुरू होता है। घर तो ले आये हो, अब उसके साथ जीना भी पड़ेगा। कैसे जियोगे, समझाओ मुझे। समझाओ, कैसे जियोगे? पर बड़े ताज्जुब की बात है कि सब जी लेते हैं, पर मुझे शक है कि वो जी ही नहीं रहे हैं।

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