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बाप-बेटे का रिश्ता ऐसा भी - एक खास कहानी || आचार्य प्रशांत (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आपसे प्रेरणा मिली है कि अध्यात्म, गीता, उपनिषद् का जीवन में बहुत महत्व है और जितनी जल्दी हो सके ज़िन्दगी में उतनी जल्दी इन ग्रंथों से परिचय हो जाना चाहिए। अब मेरा चौदह साल का बेटा है, उसे बहकते देख रहा हूँ। उपनिषद् इत्यादि उसे बताता हूँ तो उसे कठिन लगते हैं, उबाऊ लगते हैं; समझ में उसे आते नहीं। क्या करूँ?

आचार्य प्रशांत: उपनिषदों से ही उत्तर मिल जाएगा। ऋषि उपनिषदों में लगातार, जो सामने शिष्य बैठा है, उसके मन को भाँपते रहते हैं। वो कोई भी बात बस यूँही नहीं कह देते कि ये सत्य है तो तुम सुन लो, या ये सिद्धांत है तो तुम पकड़ लो। वो बार-बार ये देखते हैं कि ये जो सामने है सुनने वाला, जिसे चीज़ सिखाई जा रही है, उसका मन कैसा है। और उसके मन के अनुसार वो फिर अपना वक्तव्य देते हैं। वही वक्तव्य मंत्र बन जाते हैं, ऋचाएँ बन जाती हैं।

तो अभी इक्कीसवीं शताब्दी में चौदह बरस का आपका बेटा है, आपको उसकी उम्र के अनुसार, उसके समय के अनुसार, उस तक उपनिषदों का संदेश पहुँचाना होगा।

आठ-दस साल पहले जब कॉलेजेस में, यूनिवर्सिटीज (विश्वविद्यालयों) में बहुत मेरे सत्र हुआ करते थे। तब की रिकॉर्डिंग्स मौजूद हैं; आप देखिएगा मैंने कभी किसी छात्र से उपनिषद् शब्द का उल्लेख नहीं किया। मुझे अगर किसी को निष्काम कर्म समझाना है तो मैंने कभी नहीं कहा कि ये बात इस तरीक़े से कृष्ण ने अर्जुन से गीता में कही है।

बात वही समझा दी पूरी जो गीता में मौजूद है, पर उस तरीक़े से जिस तरीक़े से उस लड़के को या लड़की को समझ में आयेगी। बल्कि अगर समझाते-समझाते मैं बीच में बोल दूँ कि उपनिषद् में ऐसा लिखा है या कि ये सिद्धांत वहाँ से आ रहा है, तो सुनने वाले को समस्या हो जाएगी। उसको लगेगा अब पता नहीं कौनसी पुरानी बात बताई जा रही है, कितनी कठिन बात बताई जा रही है। उसका मन उचट जाना है। समझ रहे हैं? तो चीज़ हमेशा सामने वाले को देख करके बोली जाती है।

अध्यात्म का उद्देश्य ये नहीं होता कि कुछ बातें हैं जो दूसरे के दिमाग में डाल दी जाएँ। अध्यात्म का उद्देश्य होता है सामने वाले की भलाई।

सामने वाला कुछ मान्यताएँ बनाकर बैठा होता है। उसके दिमाग में कुछ भ्रम होते हैं, वो उन्हीं के अनुसार अपनी ज़िन्दगी जी रहा होता है। आपको उसके भ्रमों को काटना होता है। वो भ्रम नहीं कटे और आपने उसको श्लोक रटा दिये तो कोई फ़ायदा हुआ नहीं।

छांदोग्य उपनिषद् में आरुणि उद्दालक हैं और बेटा है उनका श्वेतकेतु । और श्वेतकेतु, मुझे लग रहा है, इसी उम्र का होगा जिस उम्र का आपका बेटा है — चौदह बरस का, नहीं तो सोलह बरस का।

तो श्वेतकेतु अपनी शिक्षा वग़ैरह ले करके आता है उद्दालक ऋषि के पास। तो वो पूछते हैं कि अब आगे क्या करना है। अभी और पढ़ोगे या विवाह वग़ैरह करोगे, बताओ भाई? तो श्वेतकेतु बोलता है कि अभी बताऊँगा आपको, पहले जा करके राजा जनक की सभा में सब विद्वानों को हराकर तो आऊँ।

जिसको हम एटिट्यूड (रवैया) बोलते हैं वो ऐसा नहीं है कि आजकल के लड़कों में ही आ गया है। वो तब भी हुआ करता था। आप कल्पना कर पा रहे हैं? चौदह, सोलह या अठारह साल का श्वेतकेतु खड़ा हुआ है और वो कह रहा है कि जस्ट वेट डैड, होल्ड इट ( पिताजी रुको जरा, सब्र करो)। एक बार जाकर के वहाँ जनक के यहाँ पर सबको रोस्ट (भुना के) करके आता हूँ।

अब उद्दालक परेशान हो गये, चुप हो करके अपना चले गये। अब ये नहीं उपनिषद् में लिखा है कि चुप हो करके चले गये, मैं कहानी को आपके लिए थोड़ा सा सुग्राह्य बना रहा हूँ। तो उन्होंने कहा कि इसको लड़के को — आज की भाषा में लौंडे को — थोड़ा कुछ सीख देनी पड़ेगी। इसको इसकी जगह दिखानी पड़ेगी।

तो उसको बुलाते हैं अगले दिन। बोलते हैं कि इतना कुछ तुम सीख करके आ गये, तुम जा रहे हो जनक के यहाँ पर सबको चुनौती देने; क्या तुमको वो पता है जिसको सुना नहीं जा सकता? जिसको देखा नहीं जा सकता? जिसको छुआ नहीं जा सकता? जो सुनाई देकर भी सुनाई नहीं देता? जो दिखाई देकर भी दिखाई नहीं देता?

तो श्वेतकेतु ने कहा — नो पॉप्स (नहीं पिताजी), ये तो नहीं पता !

तो अभी तक कुछ उन्होंने कोई भारी-भरकम बात नहीं करी है, एक बात पूछी है बस। तो बोलते हैं आओ, उसको ले गये। तो एक पात्र में, कंटेनर (पात्र) में पानी था। बोले, ‘जाओ थोड़ा सा नमक ले कर के आओ।‘ नमक लेकर आया। ‘मिला दो नमक।‘ उसमें नमक मिला दिया।

कहते हैं कि इस पात्र में ऊपर से थोड़ा पानी ले करके चखो । तो उसने (श्वेतकेतु ने) पानी चखा। तो पूछते हैं — ‘कैसा स्वाद आया?’

बोला (श्वेतकेतु) — नमकीन है।

‘अच्छा!’ बोले कि ‘अब थोड़ा और अंदर हाथ डालो और पानी निकालो और चखो। कैसा स्वाद आया?’

कहता है कि नमकीन है।

बोले — ‘अब एकदम उसके पेंदे में हाथ डालो और वहाँ से पानी उठाओ और चखो। बोलो कैसा है?’

‘नमकीन है।‘

बोले — ‘अच्छा! अच्छा! नमकीन है। नमक कहाँ है? नमक कहाँ है?’

बोला — ‘नमक तो दिखायी नहीं देता!’

बोले – ‘नमक दिखाई नहीं देता पर ऊपर, नीचे, मध्य में, हर जगह मामला नमकीन है!’

श्वेतकेतु को कुछ बात समझ में आयी।

अभी कोई सिद्धांत नहीं बता दिया है। वो तो उसको नमक चखा रहे हैं। श्वेतकेतु को लेकिन कोई बात समझ में आयी। फिर थोड़ा ले करके गये उधर, वहाँ मिट्टी के कोई बर्तन-वर्तन रखे हुए थे । तो बोलते हैं कि इसमें मिट्टी कहाँ है।

तो अब श्वेतकेतु बोलता है कि सब में मिट्टी ही मिट्टी है। सारे बर्तन ही मिट्टी के हैं।

बोलते हैं — ‘वो पहले बर्तन का क्या है?’

बोलता है — ‘वो घड़ा है।‘

‘दूसरे बर्तन का क्या नाम है?’

बोलता है — ‘वो बरनी है।‘

‘तीसरे बर्तन का क्या नाम है?’

बोला — ‘वो छोटी सी कटोरी है मिट्टी की।‘

बोले — ‘नहीं! तुम मिट्टी क्यों नहीं बोल रहे?’ ऋषि पूछ रहे हैं तुम मिट्टी क्यों नहीं बोल रहे? इनको अलग-अलग नाम क्यों दे रहे हो।

बोला — ‘अरे भाई! मिट्टी होंगे लेकिन सबका अभी आकार अलग-अलग है, रंग अलग-अलग है। सबके गुण अलग हो गये, उपयोगिता अलग हो गयी तो इनको फिर उनका जो अभी रूप है, रंग है उसके अनुसार नाम से पुकारा जाता है, उन्हें फिर मिट्टी कैसे बोलें?’

बोले — ‘अच्छा! अच्छा! लेकिन मृतिकत्त तो सब मैं है न — मिट्टी-पना।‘ मिट्टी को मृतिका भी बोलते हैं। ‘मृतिकत्त तो सब में है, मिट्टी-पना तो सब में है।‘

तो श्वेतकेतु को फिर कुछ बात कौंधी। कुछ समझ में आया।

बोले — ‘अच्छा! चलो आओ, आगे बढ़ते हैं, श्वेतकेतु।

तो आगे लेकर गये। ऐसे करके तीन-चार उदाहरण दिए जिसमें से फिर एक उदाहरण ये था कि अंत में फिर श्वेतकेतु कहता है कि अगर सब कुछ एक ही स्रोत से उद्भूत होता है, तो ये सब अलग-अलग कैसे हो जाता है मामला।

तो बोलते — ‘जाओ, और बरगद का पेड़ होता है, उसका फल लेकर के आओ।‘

वो फल लेकर आया।

‘खोलो इसको।‘

फिर फल खोल दिया।

बोले — ‘बीज है?’

बोला — ‘हाँ है।‘

‘बीज को खोलो’, फिर बीज को खोल दिया।

बोले — ‘बीज के अंदर क्या है?’

बोला — ‘बीज इतना छोटा सा, उसके अंदर और क्या है हमें क्या पता चलेगा?’

बोले — ‘उसी बीज से पूरा बरगद निकल आया न! वो जो दिखाई नहीं देता, वो जो अत्यंत सूक्ष्म है, उसी से ये सब स्थूल चर-अचर, पूरा जो विश्व है प्रकट हो जाता है। और उसमें सारे भेद भी फिर प्रकट हो जाते हैं। जैसे ये बरगद का पेड़ है इतना बड़ा, देखो इसमें कितनी चीज़ें फिर अलग-अलग हैं, सब पत्तियाँ अलग हैं, तना अलग है, जटाएँ अलग हैं, सब अलग है । और ये सब कुछ कहाँ से आया, वो बीज से।‘ ‘अच्छा! अच्छा!’ तो श्वेतकेतु बोलता है, ‘इसका मतलब जो कुछ भी भिन्न दिखाई देता है, वो एक ही है?’

बोले — ‘सब एक ही है।‘

श्वतकेतु — ‘अच्छा! तो मैं भी अभिन्न हूँ उससे? जो स्रोत है, जो बीज ही है, बिलकुल अभिन्न हूँ मैं उससे!’

बोले — ‘अभिन्न हो बिलकुल। एकदम अलग नहीं हो। और तत् त्वमसि श्वेतकेतु! वही तुम हो।‘

अब लोटा दिखाते हुए, मिट्टी दिखाते हुए, बरगद का बीज दिखाते हुए, नमकीन पानी दिखाते हुए ऋषि ने सीधे श्वेतकेतु को पहुँचा दिया महा-वाक्य तक — ‘तत् त्वमसि।’ और वो तत् त्वमसि, आज तक हमको रोशनी दे रहा है। समझ में आ रही है बात?

तो उपनिषद्, उपनिषद् के शब्दों का नाम नहीं है कि आप कहें कि ये जो इसमें श्लोक हैं मैं किसी को बता दूँ तो मैंने उसको उपनिषद् पढ़ा दिया। आपमें उपनिषद्त्व होना चाहिए। उसके बाद हो सकता है कि आप एक भी श्लोक का सहारा न लें और उपनिषद् आप पूरा का पूरा अपने बेटे को बाँच दें, बताया उसको एक भी श्लोक नहीं। आपकी साधारण बातचीत में, आपके साधारण उदाहरणों में उपनिषद् उतारा हुआ होगा। जब आपकी मंशा नहीं भी होगी उपनिषद् बताने की, आप तभी भी उपनिषद् ही बता रहे होंगे। अगर आप में उपनिषद् है तो और अगर आप सुनने वाले को समझते हैं तो।

ये दोनों चीज़ें एक साथ चाहिए होती हैं — सामने जो बैठा है उसके मन की समझ और सत्य को लेकर अपने मन में पूर्ण स्पष्टता।

जब ये दोनों चीज़ें मिल जाती हैं, तो बड़ी आसानी से फिर शिष्य का या बेटे का हाथ थाम करके उसको ऊपर उठाया जा सकता है। और ये दोनों चीज़ें नहीं मिल रही हैं, आप रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से गीता को, और उपनिषदों को, और अध्यात्म को, सच्चाई को जोड़ करके नहीं बता पा रहें हैं, तो फिर तो अभी आपको ही समझ में नहीं आया मामला! आप अपने बेटे को क्या समझाएँगे?

समझ में आ रही है बात?

गुरु के समीप रहने को ही उपनिषद् कहते हैं।

आप क्या सोचते हैं कि उपनिषद् बस उन चंद श्लोकों का नाम है जो आज हमारे हाथ में एक ग्रंथ की तरह आते हैं? नहीं। उपनिषद् का अर्थ है वो समूचा अनुभव जो गुरु के सामने बैठ करके, गुरु के सानिध्य में शिष्य को होता है, उसको उपनिषद् कहते हैं। उसका जो मौखिक अंश है, बहुत छोटा सा — मौखिक समझते हो? जो बात बोली गयी मुख से — उसका जो मौखिक अंश है, उसको संकलित करके हमारे सामने ला दिया जाता है और हम कह देते हैं ये उपनिषद् है — ये छांदोग्य उपनिषद् है, ये सर्वसार उपनिषद् है, ये ईशावास्य उपनिषद्, उसको हम कह देते हैं।

लेकिन वो जो घटना घटती है गुरु और शिष्य के बीच में, श्लोक उसका बहुत छोटा सा हिस्सा है। आप कहें कि ये साहब पचीस श्लोक जो हैं, उन श्लोकों का नाम उपनिषद् है, तो आप चूक रहें हैं। आप बात नहीं समझ रहें हैं।

वो जो पचीस श्लोक हैं, वो उपनिषद् का बस मौखिक हिस्सा भर हैं। उपनिषद् बहुत बड़ी चीज़ है। अगर उन पचीस श्लोकों का ही नाम उपनिषद् होता, तो शिष्य को गुरु के सामने बैठने की क्या ज़रूरत थी? वो पचीस श्लोक लिख दिये जाते और शिष्य को दे दिये जाते कि चले आना वो वहाँ रहता है पांचवे गाँव में, उसको दे आना ये पचीस श्लोक! उपनिषद् हो गया, बात खतम।

नहीं; पर सामने बैठना है । उपनिषद् शब्द में ही ये निहित है — सामने बैठना। और सामने बैठना माने यही नहीं की गुरु बैठे हैं और शिष्य बैठ गया ! सामने बैठना माने निकट जीना। और फिर जब आप गुरु के निकट जी रहे होते हो तो फिर गुरु ने अगर ये भी बोल दिया कि जाओ जाकर ऐसे खाना बनाओ तो उसमें भी उपनिषद् है।

गुरु ने बोल दिया सुबह-सुबह कि जाओ पानी भर के लाओ, जंगल से लकड़ी ले आओ थोड़ी, उसमें भी उपनिषद् है। गुरु ने कुछ नहीं बोला, एक नज़र भर तुम्हारी ओर डाल दी, उस नज़र में भी उपनिषद् है।

समझ रहे हो बात को?

तो श्वेतकेतु बनाना है अगर आपको अपने बेटे को, तो पहले आपको उद्दालक बनना पड़ेगा। क्योंकि बेटा जी तो आपके साथ ही रहा है न! तो वो माहौल तो मौजूद ही है जहाँ पर तात हैं और पुत्र हैं। लेकिन वो घटना नहीं घट रही उपनिषद् वाली। क्यों? क्योंकि तात में ही अभी वो स्पष्टता, वो रोशनी नहीं है जो बच्चे को आलोकित कर सके।

तो वो रोशनी अपने भीतर पैदा करिए, उसके बाद सबकुछ गीतामयी हो जाएगा, सब उपनिषद्मयी हो जाएगा, सब अपनेआप हो जाएगा।

हो सकता है कि बेटा श्लोकों की ओर थोड़ा देर से जाए, दो साल बाद जाए, लेकिन श्लोकों की ओर जाए बिना भी उसे श्लोकों का मर्म पता चलता रहेगा आपके बस निकट रह करके। ऐसे हो जाएँ आप।

समझ में आयी बात?

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