यदि घर में कोई बोध की राह पर चल पड़ा है, तो यह पूरे परिवार के लिए शुभ संकेत है। अध्यात्म परिवार को तोड़ता नहीं, बल्कि उसे सुदृढ़ और समृद्ध बनाता है। यह हर रिश्ते को नई रोशनी में उजागर करता है। जो स्वयं को जानने की दिशा में बढ़ता है, वह पहली बार जीवन में वास्तविक रूप से उपयोगी बनता है। सही संगति में प्रवेश करने से वर्तमान की सभी संगतियाँ भी साफ़ हो जाती हैं। इसलिए साहसपूर्वक अपने बंधनों को जानने की राह चलो, और उनसे मुक्त होते जाओ।
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मैं घर जारा आपना, लिये लुकाठी हाथ। जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।। ~ गुरु कबीर
प्रश्नकर्ता: अभी हम जयपुर से आ रहे हैं। चार दिवसीय शिविर था। उसके बाद दो दिन अजमेर में बिताया। आने वाले कुछ दिनों में आप हैदराबाद जाएँगे, उसके बाद हरिद्वार, ऋषिकेश, निरंतर आप देश भ्रमण करते ही रहते हैं। अभी हमारे बीच एक ऐसे ही अनुयायी साधक मौजूद हैं, जो विदेश से यहाँ यात्रा करके आए हैं, और जैसा कि जयपुर में वो हम सबसे साझा कर ही रहे थे कि उनकी जो यात्रा रही वो उनके लिए बड़ी विचित्र रही।
तो उन्होंने जिज्ञासा करी है, कबीर जी का एक दोहा उद्धृत किया है, और पूछ रहे हैं कि 'जो घर जारे आपना…। क्या बिना घर जलाए स्वतंत्रता संभव नहीं है? जिस सरलता से आज मैं यहाँ पहुँच चुका हूँ, अगर परिवार मेरे साथ होता, मेरे बीबी-बच्चे मेरे साथ होते, तो क्या यह सरलता उतनी न रहती जितनी अब है?'
आचार्य प्रशांत: कबीर साहब 'उस' घर की बात कर रहे हैं। कबीर साहब उस घर को जलाने की बात कर रहे हैं, जो घर मुक्ति के मार्ग में बाधा बनता हो। अधिकांशत: घर ऐसे ही होते हैं, जो मुक्ति के रास्ते में बाधा बनते हैं। तब मुक्ति चाहिए ही किससे? घर से ही चाहिए। तब मुक्ति का अर्थ ही हुआ घर से मुक्ति। क्योंकि घर ही मुक्ति के रास्ते में बाधा है। पर अनिवार्य नहीं है कि घर बाधा ही बने।




