
प्रश्नकर्ता: आपने इस चैप्टर में प्रोग्राम्ड इमोशंस में बताया है, इमोशंस इनेट नहीं होते। मेरा मेन क्वेश्चन इमोशंस से रिलेट होता है कि फ़िज़िकल एंड सोशल पैटर्न से अराइज़ होता है। ये तो समझ में आ गया। फिर उसके बाद क्या? जैसे मेरा सिचुएशन है कि मैं अपनी चीज़ों का, अपनी बातों को स्पष्टता और दृढ़ता से नहीं बोल पाती। ऐसे पास्ट एक्सपीरियंस रहे हैं, ट्रॉमाज़ रहे हैं, जिसकी वजह से नहीं बोल पाती। जब भी अपनी बात बोलती हूँ, कभी रखना होता है तो भावुक हो के, जैसे अभी अपनी बात रख रही हूँ रोते हुए। तो इससे सही तरीके से इंपैक्ट नहीं पड़ता। जब मैं सही चीज़ें बोलना चाहती हूँ, दृढ़ता से बोलना चाहती हूँ, बट नहीं कर पाती। तो इसको मैं कैसे चैनलाइज़ कर सकती हूँ या सही तरीके से बोल सकती हूँ।
आचार्य प्रशांत: और प्रोग्राम्ड इमोशंस... इमोशंस में नहीं प्रॉब्लम है प्रोग्रामर में प्रॉब्लम है। इमोशंस की जो प्रोग्रामिंग होती है न, वो ईगो करती है। अब है, आँसू है तो है। प्योर इमोशन, प्योर इमोशन को हम फ्रेमवर्क में फीलिंग बोलते हैं, ठीक है न? इमोशन विदाउट द ईगो, उसको हम कह देते हैं, "ये फीलिंग है।" या आपको इमोशन भी कहना है तो कह लो।
प्रश्नकर्ता: तो ईगो को भी कैसे पहचानें?
आचार्य प्रशांत: पहचानना क्या है उसको? आप ही तो ईगो हैं। आप कहें, "मैं ख़ुद को कैसे पहचानूँ?" आप ही तो हो। आप ही तो हो, जिसको आँसुओं से समस्या नहीं है, जिसको समस्या ये है कि मेरे आँसुओं का इंपैक्ट क्या पड़ेगा। आपने अपना सवाल सुना था? आँसुओं में कोई समस्या नहीं है, पर अहंकार आँसुओं में भी यह देखता है कि दूसरों पर इन आँसुओं से छवि क्या बनेगी।
इमोशंस में नहीं प्रॉब्लम है। इमोशन तो ठीक है। आप, आँसू आ गए तो आ गए। उसमें क्या करोगे? साँस है, चल रही है; आँसू हैं, आ रहे हैं। दैहिक क्रियाएँ हैं। अहंकार क्या करता है, कि भावनाओं का भी दुरुपयोग करता है। बात समझ रहे हैं? वो आमतौर पर रोता भी मुनाफ़े के लिए है, या फिर जब मुनाफ़ा कट गया होता है। या तो रोने से मुनाफ़ा हो रहा हो, तो वो रोएगा, या मुनाफ़ा कट गया हो, तो वो रोएगा। और कभी अगर विशुद्ध आँसू उसको आ भी गए तो जैसे अभी आपने कहा न, "दूसरों पर प्रभाव क्या पड़ रहा होगा? दूसरों पर इंपैक्ट क्या हो रहा है मेरे आँसुओं का?"
अरे, क्या करना है, क्या इंपैक्ट हो रहा है? मुझे क्या पता, आप पर क्या इंपैक्ट हो रहा है मेरी बात का! बात है, तो है। आपकी आँखें झर रही हैं, मेरे शब्द झर रहे हैं, झरना तो दोनों तरफ़ है। जब मैं नहीं देख रहा कि दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, तो आप क्यों सोच रही हैं कि आँसुओं का दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
आँसू साँस हैं, आँसू शरीर हैं, आँसू उँगली हैं। आप सोच रहे हो, आपकी उँगलियों का क्या असर पड़ रहा है? आँसू बाल हैं, आँसू आपका कद हैं। अब कोई 5 फीट 5 इंच का है, तो वो कहे, "मेरे 5 फीट 5 इंच का सब पर क्या असर पड़ रहा है?" अरे, क्या पड़ेगा, क्या? तुम बदल क्या लोगे? है, तो है। पर अहंकार क्या करेगा, 5’5 के नीचे हील लगा देगा। बात समझ में आ रही है? वह हर चीज़ को विकृत करता है।
आँसुओं में समस्या नहीं है, विकृत इमोशंस में समस्या है। प्रोग्राम्ड इमोशंस।
यहाँ ये नहीं कहा है कि इमोशंस में प्रॉब्लम है। क्या लिखा है?
प्रश्नकर्ता: प्रोग्राम्ड इमोशंस।
आचार्य प्रशांत: क्योंकि प्रोग्रामर का क्या नाम है? अहंकार। आप मुस्कुरा दिए। ये न अच्छा है, न बुरा है। है तो है। आप रो दिए, वैसे ही ये न अच्छा है, न बुरा है; है, तो है। कोई सुबह जग गया। आप बोलो, "अरे, पाप हो गया!" या "पुण्य हो गया!" ये क्या व्यर्थ बात है। न पाप है, न पुण्य है। है, तो है। पहाड़ है, नदी है। पहाड़ से कह रहे हो, "तू बह क्यों नहीं रहा, तूने पाप कर दिया।" नदी से कह रहे हो, "तू जम क्यों नहीं रही, तूने पाप कर दिया।" अरे, जो है, तो है।
पर अहंकार, जो है, उसको जाकर के अपनी धारणा अनुसार, अपनी रक्षा के लिए, वो उसको ऐसे (मोड़ने का अभिनय करते हुए)। फिर कोई अपने आँसू छुपाता है कि "मैं रो कैसे दूँगा, मर्द को दर्द नहीं होता। आँसू कमजोरी के निशान होते हैं, आँसू छुपाओ।” और कोई कहता है, आँसू दिखाओ क्योंकि आँसू दिखाकर मुनाफ़ा होता है। वहाँ से क्या आते हैं? वो क्या होता है, जिसका मुँह ऐसे-ऐसे होता है, नदी में पाया जाता है? क्या बोलते हैं उसको? आपको नहीं बताना है यार, इसको बताना है। वो क्या होता है नदी में, जो ऐसे-ऐसे करता है? नहीं पता? क्या बोलते हैं?
श्रोता: मगरमच्छ।
आचार्य प्रशांत: क्रोकोडाइल। तो फिर हम क्यों बोलते हैं, "मगरमच्छ के आँसू"? मतलब समझ रहे हो न? वो आँसुओं का भी इस्तेमाल कर लेता है। मैं आपसे बोलूँ, "मैं अच्छा आदमी हूँ, मैं आपकी भलाई चाहता हूँ, मुझे आपसे प्यार है।" आप कहोगे, "हाँ, सोचेंगे। बहुत आए थे, आजकल तो सौदेबाज़ी चलती है, होगा कोई लुटेरा, जालसाज़।" और यही मैं (रोते हुए), "पता नहीं, मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ।" खट से मान जाओगे। अहंकार ने कर लिया न आँसुओं का इस्तेमाल, अपना मतलब साधने के लिए। कर लिया कि नहीं कर लिया?
हमें पता होता है कि आँसुओं के फायदे क्या हैं। हमें माने किसको?
श्रोता: अहंकार।
आचार्य प्रशांत: तो आँसुओं से भी फायदा निकाल लेता है। कभी आँसू दिखाकर और कभी आँसू छुपाकर। वो सब दिखाता है, सब छुपाता है, उसके लिए कुछ नहीं है।
पशु नंगे घूमते हैं। आप कभी बोलते हो कि अश्लील हो गए हैं? क्योंकि वो कोई फायदा पाने के लिए शरीर नहीं दिखा रहे। पर हम नंगे भी होते हैं तो फायदे के लिए और हम शरीर छुपाते भी हैं तो फायदे के लिए। इसीलिए जब हम नंगे होते हैं तो वह अश्लीलता कहलाता है, क्योंकि तुम प्राकृतिक रूप से नग्न नहीं हो। तुम्हारा सब कुछ दिखावटी है, तुम्हारे सब कुछ का प्रोग्रामर, कंट्रोलर ईगो है। तुम शरीर भी प्रदर्शित कर रहे हो तो इसलिए कि कुछ लाभ हो जाएगा, और तुम शरीर छुपा भी रहे हो तो इसलिए कि कुछ लाभ हो जाएगा।
तो इसीलिए हमारा नग्न होना भी व्यर्थ है, अश्लील है। और हमारा घूंघट करना, पर्दा करना भी अश्लील है।
जो अश्लीलता हमारी निर्वस्त्रता में होती है न, वही अश्लीलता हमारे घूंघट में भी होती है। क्योंकि वो दोनों ही किसके लिए किए गए हैं? अहंकार के लिए किए गए हैं।
आ रही है बात समझ में?
ये सब आपको किसने सिखा दिया कि इमोशंस गंदे होते हैं? कुछ नहीं गंदा होता है। सही बात बताऊँ? आप न्यूरोसाइंटिस्ट के पास जाएँगे, वो आपसे कहेगा, "आपका एक-एक पल, एक-एक कर्म, आपकी एक-एक गतिविधि में इमोशन पहले ही शामिल है, भले ही आपको पता हो कि नहीं पता हो।"
अब अगर इमोशन ख़राब चीज़ होती, तो आपकी ज़िंदगी ख़राब है। आप ऐसे खड़े होकर सुन रहे हो न, अभी इसमें इमोशन है। बस वो ओवरफ्लो नहीं कर रहा, वो दिखाई नहीं दे रहा। आप ऐसे खड़े हो, इसमें इमोशन है। मैं बोल रहा हूँ, उसमें इमोशन है। इनके कैमरे में भी इमोशन है, ऐसे दिखा रहे हैं। वो ऐसे बैठे हैं, इमोशन है। सब में इमोशन है।
इमोशन क्या है? जब आपके न्यूरल सर्किट्स फायर करते हैं। लेकिन जो चीज़ है, वो भाषागत नहीं होती। जब भाषागत हो जाती है, तो उसको हम बोलते हैं विचार। आपके यहाँ (दिमाग) जो खेल चल रहा है न, जब वो लैंग्वेज में ट्रांसलेट हो जाता है, तो कहलाता है विचार। और जब वो भाषा में अभी अनुवादित नहीं हुआ है, तो बस उसको बोल देते हो भाव। वरना विचार और भाव एक ही बात है। और यहाँ पर जो आपकी सर्किट्री है, ब्रेन तो आपका लगातार काम कर ही रहा है न। तो एक अर्थ में आप लगातार इमोशनल हो। अब बताओ, इमोशन अगर गंदी चीज है, तो फिर तो ज़िंदगी गंदी हो गई।
और अध्यात्म भावना का दुश्मन है, ऐसा समझ मत लेना। अध्यात्म भावना का दुश्मन नहीं है। ये देखो, वो भी इमोशनल है। अध्यात्म अहंकार को आईना दिखाता है, उसे न विचार से शत्रुता है और न ही भावना से। ये बिल्कुल हटा दो कि मैं भावुक हूँ, तो मैं आध्यात्मिक कैसे हो सकता हूँ? या कि ज्ञान तो भावुक लोगों के लिए नहीं है, भावुक लोगों के लिए तो भक्ति होती है। ये बिल्कुल बेकार की बात है। ज्ञानी में भी भाव लगातार बना हुआ है, भाव से कोई कैसे मुक्त हो जाएगा। मस्तिष्क है, तो भाव तो है ही।
प्रश्नकर्ता: तो मैं कैसे पहचानूँ कि मैं कब अपने फायदे के लिए रो रही हूँ, या अब मेरी भावनाएँ आ रही हैं?
आचार्य प्रशांत: देख लो कि रोने से क्या मिल जाएगा, तो रोना बंद हो जाएगा। कह रही हैं, "कैसे पहचानूँ कि मैं मुनाफ़े के लिए तो नहीं रो रही?" मैंने कहा, रोने के फलस्वरूप देख लो, क्या मिल जाएगा, तो आँसू रुक जाएँगे। छोटा बच्चा रो रहा है, उसको जैसे ही लॉलीपॉप दी, उसका रोना?
श्रोता: बंद।
आचार्य प्रशांत: तो उसका रोना सकाम था। आप भी देख लो कि आप किसलिए रो रहे हो। कैसे पहचानोगे? पूछो, "क्या मिल जाएगा, तो रोना बंद कर दूँगी।” वहाँ से समझ में आ जाएगा कि अहंकार किस कामना के कारण रो रहा है। संत ऐसे नहीं रोता, उसको आप लॉलीपॉप दिखाओगे, तो उसके आंसू रुक नहीं जाएँगे और उसको आप डंडा दिखाओगे, तो उसके आँसू झरने लगेंगे। हैं तो हैं; नहीं हैं तो नहीं हैं; लॉलीपॉप और डंडे के ग़ुलाम नहीं हैं हम।
प्रश्नकर्ता: थैंक यू, आचार्य जी।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। सबसे पहले मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहती हूँ, मेरी ज़िंदगी इतनी बदल गई है आपकी वजह से, मैं शब्दों में नहीं बोल सकती ये चीज़। आपके विचार मैंने सुने, जिंदगी में बहुत फ़र्क़ है, बहुत। आपको धन्यवाद इसलिए करना चाहती हूँ, सर, क्योंकि दो बच्चे होने के बाद मैं घर से बाहर नहीं निकल पाती अगर मैं आपको नहीं सुनती तो। अभी डिसीजन लिया है, घर के बाहर निकली हूँ। पर पता नहीं, सर, क्यों एक गिल्ट रहता है दिमाग में कि मैं बाहर हूँ। अभी घर में दो बच्चे हैं, पता नहीं क्या कर रहे होंगे, मोबाइल में क्या देख रहे होंगे, गड़बड़ कर रहे होंगे। डर है, गिल्ट है, वो जा नहीं रहा है।
आचार्य प्रशांत: नहीं, वो गिल्ट नहीं है। वो ये दंभ है कि आप घर में रहकर बच्चों का बड़ा कल्याण कर लेती हैं।
"मैं बाहर निकली हूँ, अब मेरे बच्चों का क्या होगा?" इसमें देख रहे हो न मान्यता क्या है? "जब मैं घर में होती हूँ, तो मैं बच्चों को बिल्कुल कल्याण से रखती हूँ।" वो कर्ता-भाव है। बच्चे आपके कारण थोड़ी कल्याण में हैं, मैं दूधमुँहे बच्चे की बात नहीं कर रहा, जिसको माँ के पास रहना ही पड़ता है। इनसे कभी पूछिए, इनको आपकी कितनी ज़रूरत है। ये कहेंगे, "मम्मी, दिन के कुछ घंटे काफ़ी हैं, उससे ज़्यादा तो ज़्यादा हो जाता है।"
प्रश्नकर्ता: एक और छोटा है, चार साल का है।
आचार्य प्रशांत: चार साल भी कोई बहुत कम नहीं होता। अभी थोड़ा इनको और बड़ा होने दीजिए, उसके बाद आप इनके साथ समय गुजारना चाहेंगी तो इधर-उधर भागेंगे। कहेंगे, "कुछ पर्सनल स्पेस छोड़ोगी, मम्मी, कि नहीं छोड़ोगी? हमारी भी कुछ प्राइवेट लाइफ है, घुसी चली आती हो।" पर अहंकार को लगता है कि मैं न होऊँ, तो आसमान टूट जाएगा। मैं न होऊँ, तो बच्चों का क्या होगा? इस बात में फैक्ट कितना है? तथ्य कितना है? ये थोड़ा परख तो लीजिए। आपको लग रहा है कि आप न होंगी तो बच्चों का बहुत बुरा हो जाएगा। क्या सचमुच?
दूसरी बात, मैं सम्मान करता हूँ कि आप चाहती हैं कि बच्चों की भलाई हो। लेकिन माँ को ही अगर दुनियादारी कुछ पता ही नहीं है, माँ ही अगर कुंठित है और चार दीवारों में कैद है, तो बच्चों को क्या सिखाएगी? जब माँ ने अपना ही विकास नहीं करा, तो बच्चों का कैसे विकास करेगी? समस्या हो जाएगी न?
और माँ अपना विकास क्या बोलकर नहीं करती कई बार? "बच्चों की ख़ातिर मैं कुछ करती नहीं हूँ। बाहर निकलती नहीं हूँ। घर में रहती हूँ। न जानती, न समझती, न अनुभव किया, न प्रयोग किए, न काम किया। कुछ नहीं किया, बच्चों की ख़ातिर।" अच्छा, बच्चों की ख़ातिर नहीं किया; अब बताओ, बच्चों को क्या सिखाओगी? ठीक है, बहुत छोटा बच्चा, उसको दूध पिलाना है, वो काम आप कर सकते हो बिना किसी अपने मानसिक विकास के भी। थोड़ा और बच्चा बड़ा हो गया, उसे कपड़े पहनाने हैं, वह काम भी आप कर सकते हो बिना किसी मानसिक विकास के। पर बच्चा अभी और बड़ा होगा। अब बताओ, उसको क्या सिखाओगे?
एक बार मैंने कहा, लोगों को बड़ा बुरा लग गया कि ज़्यादातर जो माएँ हैं भारत में, वो चौथी या छठी के बाद बच्चों का होमवर्क भी नहीं करा पातीं। क्योंकि उन्होंने ठीक से ख़ुद ही नहीं पढ़ाई करी होती, या पढ़ाई करी होती है तो वो भूल गई होती हैं। तो आप बच्चे को क्या दे पाओगे? बच्चा बड़ा होता जा रहा है। आप उसको अब क्या दे पाओगे? जब आपने अब खुद ही कुछ नहीं सीख रखा तो उसे कैसे सिखाओगे?
तो माँ बच्चों के काम आ सके, इसके लिए भी ज़रूरी है कि माँ पहले अपने विकास पर ध्यान दे। मैं इसको कहा करता हूँ कि बच्चों को जन्म दे दिया न, अब ख़ुद को भी तो जन्म दे दो। माँ हो, भाई। अपने आप को जन्म दे, माँ, पहले।
प्रश्नकर्ता: बिल्कुल, सर। बात मैं तो बहुत अच्छे से समझ गई हूँ। बट अब थोड़ा पति को भी समझाना है, सास को भी समझाना है।
आचार्य प्रशांत: आप उनसे पूछ लीजिएगा कि आप जो मुझे घर में रोकना चाहते हो, वो सचमुच बच्चों की ख़ातिर रोकना चाहते हो या आपकी नियत कुछ और है? ये पूछ लीजिएगा। पति कहाँ हैं? किधर हैं?
प्रश्नकर्ता: चार साल के बच्चे को संभाल रहे हैं।
आचार्य प्रशांत: ये पूछना आवश्यक होता है कि ये जो बोल रहे हो कि घर में रहो बच्चों की ख़ातिर, सचमुच बच्चों की ख़ातिर मुझे घर में रखना चाहते हो या कोई और भी बात है। ये पूछना भी ज़रूरी होता है।