जब पिता ही अधर्म करें || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2022)

प्रश्नकर्ता: सबसे पहले आपको और इस संस्था से जुड़े सभी वॉलन्टियर्स (स्वयंसेवकों) को कोटि-कोटि नमन, हम सभी के जीवन में एक अलग अलख जगाने के लिए। मैं पिछले दो वर्षों से आपको सुन रहा हूँ, जिसकी वजह से अन्दर से एक अलग आवाज़ आती है।
आचार्य जी, मेरा प्रश्न सम्बन्ध, धर्म, कर्म और सत्य, इन सभी से मिश्रित है। मेरे पिताजी को नशे की आदत है, जिसकी वजह से उन्होंने हमारी सारी पैतृक सम्पत्ति बेच दी है। उनके इर्द-गिर्द जो भी लोग रहते हैं, वो सरासर झूठ बोलते हैं और गलत सुझाव देते रहते हैं, जिसकी वजह से मेरा मन काफ़ी व्यथित रहता है।
इस नशे से मुक्ति के लिए हमने कोशिश भी की। नशा-मुक्ति केन्द्र भेजा। उनको गाँव से अलग अपने भाई के पास भेजा, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ और हमारी सम्पत्ति बिकती गयी।
आचार्य जी, एक बात हमें सिखाया गया है कि ईश्वर के बाद हमारे माता-पिता का स्थान सर्वोपरि होता है। आचार्य जी, चूँकि मेरी नज़र में मेरे पिता झूठ बोलते हैं और अधर्मी हैं, अब मैं उनसे बात भी नहीं करता हूँ। और कोशिश करता हूँ कि अपने काम में व्यस्त रहूँ ताकि मेरी ऊर्जा क्षीण न हो सके।
ये सोचकर कि हमारी सारी ज़मीन-जायदाद बिक चुकी हैं, मन बार-बार व्यथित होता है और मेरी ऊर्जा क्षीण होती रहती है। मेरा मन काफ़ी द्वन्द्व में रहता है। रिश्ते में चूँकि वो मेरे माता-पिता हैं, तो मेरा धर्म, कर्म क्या होना चाहिए, जब मुझे ये पता है कि झूठ क्या है और सच क्या है। कृपया मार्गदर्शन करें। धन्यवाद!
आचार्य प्रशांत: देखो, जिनसे शरीर पाया है और परवरिश पायी है, उनका खयाल तो रखना ही चाहिए। जिनके साथ दशकों तक रहे हो और जब एकदम पराश्रित थे तब जिनसे कई तरह का सहारा मिला, उनके प्रति कर्तव्य तो रखना ही होगा। तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि परिवार के प्रति व्यक्ति का कर्तव्य तो होता ही है। प्रश्न आता है यहाँ पर कि वो कर्तव्य क्या बनकर निभाएँ। किस केन्द्र से निभाएँ?



