घरवालों की दृष्टि संपत्ति पर हो तो || आचार्य प्रशांत, परमहंस गीता पर (2020)

यस्यामिमे घण्नरदेव दस्यव: सार्थ विलुम्पन्ति कुनायकं बलातू। गोमायवो यत्न हरन्ति सार्थिकं प्रमत्तमाविश्य यथोरणं बवृका:।।
अर्थ: महाराज, उस जंगल में छ: डाकू हैं। इस वणिक समाज का नायक बड़ा दुष्ट है। उसके नेतृत्व में जब यह समाज वहाँ पहुँचता है, तब ये लुटेरे बलात उसे लूट लेते हैं।
~ परमहंस गीता ( अध्याय ४, श्लोक २ )
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। इस श्लोक में जिन परिस्थितियों का वर्णन किया गया है, वे हम रोज़ अपने जीवन में देखते हैं। हमें यह भी समझ में आता है कि जो धन हम इकट्ठा कर रहे हैं, उस पर हमारे करीबी लोगों की नज़र रहती है — चाहे वे माँ-बाप हों, भाई-बहन हों, पत्नी-बच्चे हों।
लेकिन यह भी सच है कि जीते-जी हम उन्हें अपनी सम्पत्ति देना भी नहीं चाहते। फिर भी हमारा दावा यही रहता है कि हम यह सब अपनों के लिए ही कर रहे हैं। और बार-बार यही तर्क देकर हम अपनी स्थिति बनाये रखते हैं। इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का रास्ता सुझाएँ। आभार। आचार्य प्रशांत: तो परमहंस गीता ने एक चित्र खींचा है, एक उदाहरण के तौर पर बताया है कि कैसे व्यापारियों का एक समूह जब संसार वन में भ्रमित होकर प्रवेश कर जाता है तो लुटेरे उसको लूटते हैं। छ: लुटेरों की बात की गयी है, षडरिपु — काम, क्रोध, मद, मोह, मात्सर्य, भय इत्यादि।
तो उस उदाहरण से प्रश्नकर्ता ने ये समझा कि बात ये हो रही है कि ये जो व्यापारियों की सम्पत्ति है, इसको कुछ दूसरे लोग हैं जो लूट ले जा रहे हैं। और कह रहे हैं, ‘ये बात बिलकुल सही है, हम सम्पत्ति कमाते हैं। हमारी पत्नी, बच्चे वगैरह-वगैरह उस पर नज़र रखते हैं। और ये सम्पत्ति हम उनको देना भी नहीं चाहते इत्यादि।’









