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इतनी बदतमीज़ क्यों ये नई पीढ़ी? || आचार्य प्रशांत (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरे दो बच्चे हैं आचार्य जी और मेरा प्रश्न उन्हीं से सम्बन्धित है कि आजकल की जो पीढ़ी है, ये अभिभावकों की बात क्यों नहीं सुनती, और इतनी बहस क्यों करती है?

आचार्य प्रशांत: तो सवाल है बच्चों के बारे में कि ये बच्चे ऐसे क्यों हैं। ये पूरी पीढ़ी ऐसी क्यों है? प्रश्न पूछने वाले अक्सर ऐसा ही करते हैं, वो कभी अपने बारे में कुछ नहीं पूछते, वो दूसरों के बारे में पूछते हैं कि दूसरे इतने गलत क्यों हैं।

अब बहस करना अपनेआप में कोई अनिवार्यत: बुरी बात तो होती नहीं। आपका बच्चा है या किशोर या नौजवान, बेटा या बेटी है, वो आपसे कुछ बातें कह रहा है या सवाल उठा रहा है, ये अपनेआप में गलत चीज़ कैसे हो गयी? मैं ये क्यों न पूछूँ कि आप बताइए कि आपके पास उसके सवालों के जवाब क्यों नहीं हैं? आप कह रहे हैं कि आपके बच्चे ज़बान लड़ाते हैं, तो ज़बान तो आपके पास भी है न, और आपके पास ज़्यादा सुलझी हुई, पारिपक्व और अनुभवी ज़बान होनी चाहिए। उसमें ऐसे शब्द क्यों नहीं बह रहे जो इस पीढ़ी को संतुष्ट कर दें?

ले-देकर के जो बहस कर रहा है, भले ही वो अपने अहंकार को क़ायम रखना चाहता हो, अपनी बात मनवाना चाहता हो, लेकिन चाहता तो हर कोई यही है कि वो खड़ा सही बात के समर्थन में हो। हैं तो सब इंसान के ही बच्चे न? और इंसान कैसा भी हो उसे सच्चाई की तलाश रहती ही रहती है।

और बचपन में ही या किशोरावस्था में ही कोई इतना नहीं बिगड़ जाता है कि वो पूरे तरीक़े से झूठ के ही पक्ष में खड़ा हो जाए। सच्चाई चाहिए दुनिया के सब लोगों को और सच्चाई चाहिए आज की पीढ़ी को भी। प्रश्न ये है कि वो बात उनके माँ-बाप उनको बता क्यों नहीं पा रहे हैं।

बल्कि अक्सर होता ये है कि जवान आदमी का जो तर्क होता है वो माँ-बाप के तर्कों की अपेक्षा ज़्यादा सटीक, ज़्यादा गहरा, ज़्यादा सही, ज़्यादा वज़नदार होता है। तो माँ-बाप हो जाते हैं निरुत्तर; देने को कोई जवाब नहीं होता। जब देने को कोई जवाब नहीं होता है तो कहते हैं, ‘बड़ा बदतमीज़ है, मुँहजोरी करता है, ज़बान लड़ाता है।’

देखिए, आप जो कह रहे हैं, मैं उस बात को समझता हूँ। बहुत सारे जवान लड़के-लड़कियाँ हैं जो कुतर्क करते हैं। मैं उनके कुतर्कों की यहाँ पर हिमायत नहीं कर रहा हूँ, लेकिन मैं इस पीढ़ी को इसके कुतर्क से आगे भी जानता-समझता हूँ।

लगभग दसों सालों तक मैंने कॉलेजों (महाविद्यालयों) में और यूनिवर्सिटीज़ (विश्वविद्यालयों) में जाकर के दसियों-हज़ारों युवाओं से बातचीत करी है। और मैं तो हमेशा चाहता था कि वो उठें, कोई बात करें बल्कि तर्क करें, विरोध करें, तभी तो बात में मज़ा आता था। आप अगर पुरानी रिकॉर्डिंग देखेंगे तो उसमें कई ऐसे मिल जाएँगे जिसमें सीधे-सीधे विवाद हो रहा है। मैंने तो कभी ये उम्मीद भी नहीं करी थी कि मैं कुछ बोलूँ और जो सामने बैठे हैं वो चुपचाप उसको सिर झुकाकर स्वीकार कर लें।

लेकिन साथ-ही-साथ मेरा अनुभव ये भी रहा है कि जिसने जितना तर्क किया है वो अक्सर उतनी ही गहराई से बात को समझा भी है। इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि मैं तो उन्हें प्रोत्साहित किया करता था, बल्कि उकसाया करता था कई बार कि कुछ बोलो न; कुछ पूछो न; अरे इतनी आसानी से समझ गये क्या! अच्छा, बात मान ली यूँही! इतनी सस्ती बात है? इस बात के ख़िलाफ़ तो कुछ बोलो, कुछ नारेबाज़ी करो। कुछ ये कहो, कुछ वो करो। जवान हो भाई, कुछ आग दिखाओ!

और अनुभव मेरा ये रहा है कि जहाँ जितना विरोध हुआ वहाँ मेरी बात को उतनी सफलता मिली। क्यों? क्योंकि वो जो कुछ भी कह रहे थे उसके प्रत्युत्तर में बोलने के लिए मेरे पास एक समुचित बात थी।

आप कह रहे हैं कि आजकल के लड़के ज़्यादा मुँह चलाते हैं, मैं कह रहा हूँ आपके मुँह को किसने रोका है! आप मुँह क्यों नहीं चलाते? आपकी पीड़ा ये नहीं है कि आपका बेटा ज़्यादा मुँह चला रहा है या बेटी, आपकी पीड़ा ये है कि उनके तर्कों के आगे आप निरुत्तर हो जाते हैं। आपके पास कुछ है नहीं उन्हें जवाब दे देने को।

जो आपकी पीढ़ी है — जिन्होंने प्रश्न पूछा है उनसे कह रहा हूँ — जो आपकी पीढ़ी है और जो आज की पीढ़ी है, इसमें अंतर ये नहीं है कि आपकी पीढ़ी बड़ी आज्ञाकारी थी, बड़ी विनम्र थी, बड़ी समर्पित थी और आज की पीढ़ी बड़ी बदतमीज़ है, कुछ सीखना नहीं चाहती, बस अवज्ञा करना जानती है, बदतमीज़ी करना जानती है। न! ऐसा नहीं है।

अंतर क्या है मैं बताये देता हूँ। आज से पहले वाली पीढ़ियाँ भी पुरानी बातों को वास्तव में मानती नहीं थी। आज जो लोग पिताजी हैं, वो भी अपने पिताजी की बातों को ऐसा नहीं है कि बहुत मानते थे, महत्व देते थे, इज़्ज़त देते थे; कुछ नहीं है ऐसा। बस एक हिपोक्रिसी (दोगलापन) जैसी रहती थी, एक पाखंड जैसा रहता था कि बात नहीं भी मान रहे हैं तो मुँह से कुछ नहीं बोलेंगे।

अंदर ही अंदर कहते रहेंगे, 'अजी छोड़िए, बात आप बेवकूफ़ी की कर रहे हैं।' पर सामने से जब पिताजी, दादाजी या ताऊजी उपदेश दे रहे हों तो ऐसे हामी भरते चलो, 'हाँ, बिलकुल ठीक बोल रहे हो, बिलकुल ठीक बोल रहे हो।'

ये तब चलता था आज से तीस साल पहले, पचास साल पहले कि सामने पिताजी खड़े हैं और वो ज्ञान दे रहे हैं, 'बेटा ऐसा, बेटा वैसा; ये करा करो, वो मत करो; ये पढ़ो, वो मत पढ़ो; यहाँ जाओ, ये खाओ', और सुपुत्र-सुपुत्री क्या कर रहे हैं? वो चुपचाप हुंकारा दे रहे हैं, 'जी, जी', और इंतज़ार कर रहे हैं कि ये पिताजी कब टरें यहाँ से। और जैसे ही पिताजी थोड़े दायें-बायें हुए, लगे दोनों खी-खी करके हँसने कि देखो आ गये फिर फ़ालतू बात करने। वो तो हम इनकी इज़्ज़त करते हैं, इनको मुँह पर हम जवाब नहीं देते।

तो अंतर बस इतना है कि आपकी पीढ़ी, श्रीमान, मुँह पर जवाब नहीं दिया करती थी; आज की पीढ़ी उस पाखंड से मुक्त है। उसको जो बात ठीक नहीं लगती है, वो मुँह पर बोल देती है। बातें आपको भी आपके पिताजी की अच्छी नहीं लगती थीं, बातें इस पीढ़ी को भी अपने बाप की अच्छी नहीं लगती।

मैं सब की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं एक साधारण, एक जनरल बात कर रहा हूँ। ये मत कह दीजिएगा कि नहीं-नहीं कुछ बच्चे हैं जिन्हें अपने बाप की बात अच्छी लगती है। होंगे, मुझे उनसे कोई बात नहीं। तो बातें आपको भी नहीं पसंद थीं अपने ऊपर वालों की और बातें इस पीढ़ी को भी नहीं पसंद हैं अपने ऊपर वालों की।

वास्तव में कोई पीढ़ी ऐसी नहीं होती जो अपनी पिछली पीढ़ी से पूरे तरीक़े से सहमत होती हो, पूरे तरीक़े से उसकी बातों से इत्तिफ़ाक़ रखती हो। ऐसा कभी भी नहीं होता है।

मैं कह रहा हूँ, इस पीढ़ी में बस जो नयी चीज़ आ गयी है वो ये है कि जब इसे कोई बात ठीक नहीं लगती है या समझ नहीं आती तो ये मुँह पर बोल देती है कि नहीं होता है ऐसा! ये डरे हुए थोड़ा कम हैं। इनके मूल्यों में ये बात डाली नहीं गयी है कि समझ में आये या न आये, होंठ सिले रहना। ऐसे उँगली धरे रहना (होंठ पर उँगली रखकर बताते हुए)। इनके मूल्यों में ये बात शामिल नहीं है।

समझ रहे हो?

इस पीढ़ी में हज़ार दुर्गुण होंगे, बहुत दुर्गुण हैं। और मैं इनको बहुत डाँट लगाता हूँ, इनकी बड़ी निंदा करता हूँ कई बार, लेकिन ये दुर्गुण इनमें नहीं है पाखंड का कि जो बात सही नहीं लग रही है उसे भी कह दिया, 'हाँ, बिलकुल ठीक। आपने कहा, महाराज, तो बिलकुल ठीक ही होगा।' अरे! क्यों कहें ऐसे?

मैं भी जब इनकी उम्र में था पंद्रह-बीस-पच्चीस का, मैंने भी कभी ऐसे नहीं करा कि कोई बात गलत है, ठीक नहीं भी लग रही है, तो भी उसके आगे ऐसे सिर झुकाकर के खड़े हो गये। क्यों करें ऐसे भाई, जवान आदमी हैं, क्यों नहीं पूछें? और चीज़ गलत है तो आवाज़ क्यों नहीं उठायें? आवाज़ उठानी चाहिए, बिलकुल सही बात है।

और अगर आपको लगता है कि आपके सामने जो नौजवान खड़ा है, वो बेकार की बात पर आवाज़ उठा रहा है, कुतर्क कर रहा है, फ़ालतू बहस कर रहा है, तो आप जवाब दीजिए न। बोलने का हक़ अगर उसको है तो बराबर का हक़ आपको भी है। वो अपने हक़ का इस्तेमाल कर रहा है, बोल रहा है, आप भी अपने अधिकार का इस्तेमाल करिए, आप भी बोलिए।

पर आप कैसे बोलेंगे? आपने जीवन को गुज़ार दिया है बिना समझे, बिना किसी गहराई में जाए। आपके पास समझ कितनी है! आपके तर्कों में धार कितनी है! आप कुछ रटी-रटाई बातें बोल देते हैं, कुछ पुराने सिद्धान्त बोल देते हैं। उन बातों पर जब प्रतिप्रश्न उठाये जाते हैं तो आप अवाक रह जाते हैं। क्योंकि आपने कभी तैयारी ही नहीं करी थी कि इन चीज़ों पर कोई सवाल भी उठा सकता है।

आपका तो अनुभव यही रहा था कि ऐसी चीज़ें जब बोली जाती हैं, सामने वाला चुपचाप बस उनको ऐसे ग्रहण कर लेता है। वो ऐसे भी खड़ा हो जाएगा कि नहीं-नहीं, ये बताइए, ऐसे बताइए — इसकी आपकी तैयारी ही नहीं है। तैयारी नहीं है तो तैयारी करिए न।

देखिए, कोई लाभ नहीं होने वाला है, यही लोग भविष्य हैं। इनको आप गरियाते रहेंगे कि ये बदतमीज़ हैं और ऐसे हैं, वैसे हैं, बर्बाद हो गये हैं, उससे आपको क्या मिल जाएगा? अगर आप वास्तव में चाहते हैं कि आपके बेटे या आपकी बेटियाँ आपसे कुछ सीखें तो उनके साथ एक स्वस्थ साफ़ संवाद करिए।

और साफ़ संवाद में बात एक तरफ़ा नहीं होती है। आप ये नहीं कह सकते कि मैं बाप हूँ तो तुझे मेरी बात माननी ही पड़ेगी। अगर आपको ये दिखाई दे कि बेटे की बात सही है तो आपको बेटे की बात भी माननी पड़ेगी। संवाद का तो ये नियम होता है। दोनों ओर से बात कही जाती है, सुनी जाती है, सीखी जाती है।

बात समझ रहे हो?

तो मैं इस बात से बिलकुल इन्कार करता हूँ कि आज के बच्चे, आज के नौजवान कुछ सीखना ही नहीं चाहते। मेरा पंद्रह साल का अनुभव रहा है कि अगर सिखाने वाला सही है तो वो बिलकुल सीखते हैं। पर फ़ालतू की बात वो स्वीकार नहीं करते। आप कोई दमदार बात बोलिए, वो बिलकुल सीखेंगे।

जब संस्था की स्थापना हो रही थी और तब जिन लोगों ने उसमें आकर ज्वाइन किया, और आज भी जो लोग संस्था से जुड़ते हैं उसमें अधिकांश युवा ही हैं। और ख़ूब पढ़े-लिखे युवा हैं। वो कैसे आ गये सुनने मेरी बात?

ज़्यादातर लोग जो आज संस्था के साथ गहराई से जुड़े हुए हैं वो वो लोग हैं जिनकी कोई आध्यात्मिक पृष्ठभूमि है ही नहीं। वो कोई अपना बीटेक कर रहा था कोई अपना एमबीए कर रहा था कोई एमफिल कर रहा था कोई कुछ कर रहा था। ज़्यादातर लोग तो मुझसे बहस ही करने आये थे। और उस बहस का नतीजा फिर ये हुआ कि मुझसे जुड़ गये। एक स्नेह बंध गया, प्यार सा हो गया।

पर आये तो थे बहस ही करने कि ये स्टेज पर चढ़ा हुआ है और ये गलत बोल रहा है, मैं सवाल उठाऊँगा, इसको गलत साबित करूँगा। और चूँकि उसने सवाल उठाया इसीलिए मैं सफ़ाई दे पाया। वो सवाल ही नहीं उठाता तो कोई बात साफ़ भी नहीं होती कभी।

समझ रहे हो कि नहीं समझ रहे हो?

बहुत सम्मान पैदा हो जाता है जब तुम किसी पर अपनी पूरी शक्ति का प्रयोग कर देते हो और उसके बाद भी वो व्यक्ति न सिर्फ़ सलामत रहता है बल्कि और सशक्त हो जाता है। तब जाकर तुम कहते हो कि इस आदमी में कुछ दम है।

‘मेरे तर्कों का जो सबसे धारदार तीर हो सकता था वो तीर मैंने इस पर मारा। व्यंग्य की जो सबसे वज़नी गदा हो सकती थी वो मैंने इस पर मारी। विरोध की जो सबसे ख़तरनाक मिसाइल हो सकती थी वो मैंने इस पर लॉन्च कर दी लेकिन इसके बाद भी ये आदमी खड़ा हुआ है अपनी जगह पर, इसका बाल नहीं बाँका हो रहा।’ तब आपके मन में उस व्यक्ति के प्रति आता है सम्मान और फिर आप उस आदमी की बात सुनना चाहते हैं। वही सम्मान आगे बढ़कर के प्रेम बन जाता है।

जब तक किसी की ताक़त आज़माओगे ही नहीं तब तक तुम्हें कैसे यकीन होगा कि उसमें ताक़त है भी। वो शिष्य कैसा जो गुरु को आज़माये बिना शिष्य बन जाए! किसी को यूँही गुरु मान ले! मैं तो बोला करता हूँ कि गुरु हो कि ग्रंथ हो कि कोई हो, पहले उससे कुश्ती लड़ो। गले बाद में मिलना, पहले कुश्ती लड़ो। पहले तुम्हें यकीन तो हो कि तुम्हारे सामने जो है उसमें दम है। और अगर उसमें दम नहीं है तो काहे को उसके आगे सिर झुका रहे हो भाई! अपने बच्चों से कुश्ती लड़ना सीखिए जनाब।

कुछ समझ में आ रही है बात?

इसी बहाने एक-दूसरे को पकड़ेंगे तो सही, कुश्ती की पकड़ ही बाद में स्नेह भरा आलिंगन बन जाएगी। दो पहलवान होते हैं, लड़ने के लिए ही सही, एक-दूसरे के क़रीब तो आना पड़ता है न। वो क़रीब आना बहुत ज़रूरी है। ये जो सवाल-जवाब की प्रक्रिया है ये दोनों पक्षों को एक-दूसरे के क़रीब ला देती है।

एक पहलवान बोलना शुरू कर दे कि ये क्या बदतमीज़ी है, तुम हमें पकड़ने आ गये! तुम हमारा गला पकड़ोगे अब! तो फिर वो कभी क़रीब ही नहीं आएँगे, दंगल ही नहीं होगा। दंगल नहीं होगा तो प्यार भी नहीं होगा। फिर आप कहेंगे कि अरे! देखो, परिवारों में आज माँ-बाप और बच्चों के बीच ज़रा भी प्यार नहीं है। प्यार इसलिए भी नहीं है क्योंकि दंगल नहीं होता।

प्र२: प्रणाम आचार्य जी। जो घर-परिवार में बड़े लोग हैं, मुझे मिलते हैं फ़ैमिली फ़ंक्शन (पारिवारिक कार्यक्रम) में। तो उन्होंने तो ट्रेडिशनल (पारंपरिक) जीवन जिया, मैं थोड़ा अध्यात्म की तरफ़ हुआ, तो मैं इस तरह की बातें करता हूँ अलग। तो वो सारे इकट्ठे हो जाते हैं और चढ़ जाते हैं और मुझे घबराहट सी हो जाती है।

आचार्य: तुम अभी कच्चे पहलवान हो। तुम्हारे लिए अच्छा है तुम हारो अभी कई बार। तुम अभी फिर निचले दर्जे के लीग में पहलवानी करो। भई, वो तुम्हें पकड़ कर तो मारते नहीं, यहाँ तो जो मुक़ाबला है वो शब्द का शब्द से है। तुम्हारे शब्दों में क्यों नहीं वज़न है? वो सात-आठ मिल जाते हैं, कोई नारेबाज़ी की प्रतियोगिता तो हो नहीं रही कि आठ लोग है तो ज़्यादा ज़ोर से नारे लगा रहे हैं तो तुम हार गये। तुम अकेले थे, बेचारे कमज़ोर पड़ गये। या नारेबाज़ी की प्रतिस्पर्धा चल रही है वहाँ पर? या होता है? ऐसा तो नहीं होता।

इधर से तर्क आता होगा, उधर से बदले में एक आर्ग्यूमेंट (वितर्क) आता होगा। ऐसे ही तो होता होगा कुछ! तो मैं तो पूछ रहा हूँ यही कब से — तुम्हारा तर्क कमज़ोर क्यों है इतना? तुम्हारे तर्क में जान क्यों नहीं है, धार क्यों नहीं है? तुम्हारा तर्क काट क्यों नहीं देता है एकदम? ऐसे उदाहरण क्यों नहीं दे पाते कि सच बिलकुल निखर कर सामने ही आ जाए? कोई उसका फिर विरोध कर ही न पाये। क्यों भई!

प्र२: आचार्य जी, वो आठ-दस होते हैं। उस टाइम नहीं जवाब दे पाता हूँ। बाद में सोच रहा होता हूँ कि यार, ये बोलना चाहिए था।

आचार्य: ये नहीं, ये तो एकदम ही बात बनी नहीं। गौर से समझो बात को, सच्चे आदमी की पहचान ये होती है कि वो भले ही अनायोजित तरीक़े से बोले, एकदम सहज तरीक़े से अभी की बात अभी बोल दी। कोई उसका इरादा नहीं है तर्क जीतने का या कुछ करने का, वो सहजता में बोले, चाहे वो मज़ाक में ही बोल दे, लेकिन फिर भी उसकी बात में सच ही झलकता है। उसको सच बोलने के लिए कोई ख़ास तैयारी नहीं करनी पड़ती। वो विचार करके सच नहीं बोलता, उसके आचार में सच होता है। अंतर समझ रहे हो?

बुद्धिजीवी को सच का क्या करना पड़ता है — विचार। तो वो अगर किसी बहस, डिबेट में जा रहा होगा तो पहले बैठकर तैयारी करेगा। कहेगा, ‘आज मुझे किस-किस तरीक़े के तर्क देने हैं, पहले तैयारी करूँ।’ ये-वो, इस तरीक़े से वो जो अपना पूरा आर्ग्यूमेंट (तर्क) है उसे कंस्ट्रक्ट (निर्माण) करके जाएगा कि ये है।

और जो सच्चा आदमी होता है, वो क्या करता है? वो कुछ नहीं करेगा। ऐसे मुँह धोया, आकर बैठ जाएगा, बोलेगा, 'बोलो।' और फिर कहेगा, ‘उक्ता ते उपनिषद् — जो हम बोल दें वही उपनिषद् है। हमें तैयारी नहीं करनी पड़ती, विचार नहीं करना पड़ता, उपनिषद् हमारी रगों में बहता है। बहस के मंच पर ही नहीं, हम सहज-साधारण अपने सामान्य जीवन में भी कुछ बोल दें तो उसको उपनिषद् ही मानना क्योंकि बोलनेवाले तो हम ही हैं न। हमारा मालिक एक है और हम भी एक हैं, चाहे हम मंच पर बैठे हों और चाहे हम सड़क पर घूम रहे हों।’

समझ में आ रही है बात?

प्र२: आचार्य जी, आज से चार-पाँच साल पहले तो मैं उनके जैसा ही जी रहा था। बाद में आप से जुड़ा, तो वो जो पहले जी रहा था, जो बातें थीं उनके लेवल (स्तर) की थीं। अब जो आगे फॉर्वर्ड करता हूँ, आपकी बातें करता हूँ तो वो भी एक तरह की बॉरोड नॉलेज , उधार की जानकारी ही है।

आचार्य: समय लगेगा, वो अभी धीरे-धीरे उतर रहा है भीतर। अभी भी तुम्हारे लिए मेरी बातें थोड़ी विदेशी जैसी ही हैं। अभी वो तुम्हारी चीज़ नहीं बनी। अभी ऐसा नहीं हुआ है कि एक रोशनी ने तुम्हारे भीतर की अपनी आत्मिक रोशनी प्रज्वलित कर दी हो। कहते हैं न “दीये से दीया जले”, तो अभी जो तुम्हारा दीया है वो दूसरे दीये के प्रकाश में नहाया हुआ है। अभी थोड़ा सा समय और लगेगा, थोड़ी निकटता और चाहिए होगी, फिर रोशनी वो तुम्हारी अपनी हो जाएगी।

उसके बाद सात-आठ हो या सत्तर-अस्सी, कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। उसके बाद तो कहा करोगे, ‘अरे! बहस ही करनी थी तो ये सात-आठ ही क्यों आ गये, जाओ और लेकर आओ!’ कैसे करते हैं? आओ (हाथों से आमंत्रण का इशारा करते हुए)।

जब मैं जाया करूँ कॉलेजों में, इनमें से भी कोई यहाँ बैठा होगा जिसके यहाँ गया होऊँगा। तो कुख्यात तो मैं था ही कि ये आते हैं और एकदम छीलते हैं। तो कई बार ये बच्चे-बच्ची जिनको तुम्हारी भाषा में निब्बे-निब्बियाँ बोलते हैं, ये भाग जाएँ बिलकुल, कि आ गया, भागो-भागो-भागो। ऑडिटोरियम के दो दरवाज़े हैं और एक से मैं घुसूँ और दूसरे से बहुत सारे भागे जा रहे हैं दनदना के। तो बचे कितने? कम ही बचे।

तो मैं कह दूँ, ‘मैं बात ही नहीं करूँगा। सामने कम-से-कम डेढ़-दो सौ तो होने चाहिए न।’ फिर कॉलेज के डायरेक्टर उनको घेर कर, पकड़ कर, वो दरवाज़े फाँद रहे हैं, दीवारों से भाग-भाग कर जा रहे हैं, उनके पीछे गार्ड छोड़े जाएँ, उनको ला-लाकर सामने बैठाया जाए, ‘चलो बैठो!’ और फिर अक्सर ऐसा हो कि जो वहाँ पर तय था समय कि दो ही घंटे बात होगी, बात चल जाए तीन घंटे, चार घंटे। बात शुरू हो फिर आगे बढ़ जाए।

समझ रहे हो आप?

फिर आप ये नहीं चाहते हो कि मेरे लिए चीज़ आसान हो जाए कि सात-आठ लोग ही बैठे हैं, जल्दी से इनसे बात करो, इनको समझाओ और निकल जाओ। फिर आप चाहते हो कि आओ और मेरा विरोध करो। और विरोध करने वाले सात-आठ लोगों से बात नहीं बनेगी, कम-से-कम सौ-डेढ़-सौ होने चाहिए। तब तो मुक़ाबले में कुछ जान आएगी न; माहौल में कुछ गर्मी आएगी, कुछ समाँ बँधेगा। और फिर बनता भी था।

समझ रहे हो?

प्र२: आचार्य जी, जैसे सत्य तो मौन होता है तो उससे फिर तर्क देने की क्षमता कहाँ से आ गयी?

आचार्य: तर्क सत्य को नहीं दिया जाता, सामने वाले के अहंकार को दिया जाता है।

प्र२: जैसे आप मान लो इतने पढ़े-लिखे नहीं होते आईआईटी वग़ैरह से, मान लो किसी गाँव से होते, बिलकुल पढ़ न पाते, सुविधा न होती, तो क्या आप ऐसे तर्क दे सकते थे?

आचार्य: कितने हैं जिन्होंने दिये हैं जो पढ़े-लिखे नहीं थे। कैसी बातें कर रहे हो, सारे संत पढ़े-लिखे ही थे?

प्र२: नहीं, जैसे वो रामकृष्ण जी की कहानी है न कि कोई आया, उनके आगे भगवान के विपक्ष मे तर्क देने लगा तो फिर वो सुनते रहे घंटा-डेढ़ घंटा।

आचार्य: वो उनका उस समय पर तरीक़ा था। मैंने भी हमेशा बोलने का ही तरीक़ा नहीं अपनाया है। कई मौक़ों पर मैं भी चुप बैठा हूँ। उस मौक़े पर चुप बैठना ही उपयुक्त है। लेकिन यही रामकृष्ण न जाने कितने दूसरे मौक़ों पर ऐसी बातें बोल जाते थे, ऐसे महीन तर्क दे जाते थे कि सामने वाला लाजवाब हो जाता था।

ये कोई सिद्धान्त नहीं होता, ये कोई मैथड (विधि), कोई ट्रिक (चाल) नहीं होती है कि देखो, जब सामने वाला बहुत बोल रहा हो न तो एकदम चुप हो जाओ, इससे वो हार जाएगा। और न ही ये कोई विधि होती है कि सामने वाला अगर बोल रहा है तो तुम उससे दूनी आवाज़ में बोलो, बुलंदी में बोलो, चिल्ला कर बोलो तो वो हार जाएगा। ये सब ऐसे नहीं चलता। सच्चाई की यात्रा में ये विधियाँ, ये सब नहीं चलतीं।

लेकिन एक बात और तुमसे कहूँगा — उद्देश्य बहस जीतना नहीं होता है, चाहे चाचा-ताऊ हों, चाहे आपके बेटा-बेटी हों। उद्देश्य ये नहीं होता कि बहस जीत जाऊँ, उद्देश्य ये होता है कि जो बात सही है वो सामने आनी चाहिए; क्योंकि झूठ न मेरे लिए अच्छा न तेरे लिए अच्छा, तो चल अब हम दोनों जब बात कर ही रहे हैं तो चीज़ की सच्चाई क्या है उस तक पहुँचने की कोशिश करते हैं। ये उद्देश्य होता है।

उसमें खेल ये नहीं है कि हावी कौन पड़ा। क्योंकि अभी मैंने जैसे बोला न कि आ जाओ, दंगल करें, कुश्ती करें, इससे तुम्हें ऐसा लग सकता है कि यहाँ बात जीतने की है। आपको नहीं जीतना है, जीतना सत्य को है। और आप कभी पूरे तरीक़े से आश्वस्त नहीं हो सकते हैं कि सत्य आप ही के साथ है। तो सत्य को समर्पित हुआ जाता है, सत्य को जेब में नहीं रखा जाता।

इसका मतलब ये है कि कहते हैं कि आओ तुम अपनी बात कहो, हम अपनी बात कहें, देखते हैं सच्चाई कहाँ पर है, साथ-साथ सच्चाई की खोज करेंगे।

प्र२: आचार्य जी, दो-चार बार ऐसा हुआ है कि वो कहते हैं, ‘तू तो बाल की खाल निकालता है हर बात को आगे-आगे ले जाकर।’ तो फिर वो अब क्या करते हैं कि अब मिलते हैं तो बिलकुल ही हाय-हैलो, राम-राम करके बस चुप, अब कोई शब्द शुरू ही नहीं करते।

आचार्य: नहीं, वो अगर तुम से राम-राम ही करते हैं, आगे की बात नहीं करते तो इससे भी पता चलता है कि तुम्हारी मौजूदगी ही उन्हें कुछ याद दिला रही है। क्या याद दिला रही है? कि यहाँ पर फ़ालतू बातें नहीं करनी हैं। इतना अगर तुम्हारी मौजूदगी ने भी उनको याद दिला दिया तो बहुत है। बात तो बन ही रही है न!

प्र२: ज़बरदस्ती पकड़ कर तो न कोई टॉपिक (विषय) शुरू किया जाए ऐसे?

आचार्य: ज़बरदस्ती तो बेटा किसी के साथ भी नहीं की जा सकती। सामने वाले में कुछ तो तैयारी होनी चाहिए बात सुनने की। कोई बहुत ही विशेष मौक़ा होगा जब... कोई रेल के आगे ही जा करके बैठ गया हो मरने के लिए तो शायद वहाँ ज़बरदस्ती करना उचित है। पर उसके अलावा कितनी बार और कितने लोगों पर ज़बरदस्ती करोगे? तो बहुत ख़ास, बहुत कम, बहुत रेयर (दुर्लभ) मौक़ों पर ही ज़बरदस्ती का प्रयोग ठीक है, वरना नहीं।

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