डर की समस्या का आखिरी इलाज || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम।, मैं आपको करीब डेढ़ साल से सुन रहा हूँ। पहले खाली समय में आपको ही सुनता रहता था, आपकी ही संगति करता था, आदतें भी सुधर गईगयी थीं। लेकिन अब मैं पा रहा हूँ कि मैं अपनी पुरानी आदतों (खाने, नशे वगैरह) में वापिस खिसकता चला जा रहा हूँ। तो सुनने के बावजूद भी मैं अपनेआप को अपनी पुरानी आदतों से रोक नहीं पा रहा हूँ?’
आचार्य प्रशांत: हम निचाइयों पर होते हैं। सच्चाई एक ऊँचाई है। हम कहाँ होते हैं?
श्रोता: निचाइयों में।
आचार्य: और सच्चाई क्या है?
श्रोता: ऊँचाई।
आचार्य: ऊँचाई। ठीक। तो हम यहाँ से जब बाहर निकलते हैं, यहाँ जो आवास है हमारा, वहाँ से सड़क तक जाने के लिए हमें ज़रा ऐसी (पंजे की सहायता से समझाते हुए) ढलान का सामना करना पड़ता है। चढ़ाई है। क्या है? चढ़ाई।
उस चढ़ाई पर मैं तुम्हें क्या बोला करता हूँ, गाड़ी कैसे चलानी है? मैं बोलता हूँ , 'पहले गियर पर लो और सीधे ऊपर चढ़ा दो। चलते ही जाना। बीच में क्या नहीं करना है? बीच में रुक मत जाना। रुक गए तो पीछे को ढुलक आओगे, आगे बढ़ना मुश्किल हो जाएगा।' सच्चाई ऊँचाई है। गुरु की तरफ़ जाना चढ़ाई चढ़ने जैसा है। एक बार चढ़ाई शुरू कर दी तो फिर सीधे चढ़ते ही जाना है, बीच में जो रुक गया तो वो वापस गिर जाएगा। उत्तर मिल गया?






