अगर नासमझ लोगों की बातें चुभती हों तुम्हें

Acharya Prashant

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अगर नासमझ लोगों की बातें चुभती हों तुम्हें
जिन लोगों की तुम बात कर रहे हो वो वही कर रहे हैं जो अस्तित्व का नियम है। वो देह हैं, वो शरीर हैं। वो उसी की बात करते हैं। तुम्हें तकलीफ़ इसलिए होती है क्योंकि तुम भी बहुत हद तक उनके जैसी हो। तुम्हारी तकलीफ़ की वजह ये नहीं है कि उन्होंने तुमसे कुछ व्यर्थ की बातें कह दी हैं या उनकी कुछ व्यर्थ की धारणाएँ हैं। तुम्हें तकलीफ़ इसलिए है क्योंकि तुम्हारे पास भी ये धारणा है कि वो तुम्हारे हैं और तुम्हारे और उनके रिश्ते में कुछ सच्चाई है, कुछ पवित्रता है, कुछ ताक़त है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। हम शिविर में घर पर थोड़ा-बहुत लड़ाई झगड़ा करके आये हैं। जो ढाँचा उन्होंने सोचकर रखा है, उस ढाँचे में मैं बिलकुल नहीं चल सकती हूँ और ये बात मैंने बतायी उनको साफ़-साफ़। तो इससे वो लोग बहुत आहत होते हैं और फिर रोना-धोना करते हैं।

ये मुझे बहुत तकलीफ़ देता है उन लोगों के लिए कि ऐसे इसी में जीवन को पूरा बिता दे रहे हैं, तो असल जीवन को वो लोग कब जानेंगे?

आचार्य प्रशांत: अभी बारिश हो रही है। एक कितनी आसमान से साफ़ सुंदर बूंद गिरती है वो मिट्टी में मिल जाती है, कीचड़ हो जाती है। तुम्हें तकलीफ़ होती है?

प्रश्नकर्ता: नहीं, ज़्यादा नहीं होती। कभी-कभी हो जाती है।

आचार्य प्रशांत: कुछ भी नहीं होता है। जितनी देर में तुमने ये बोला उतनी देर में सैकड़ों-हज़ारों बूंदें मिट्टी हो गयीं। कोई फ़र्क पड़ा क्या तुमको? कुछ फ़र्क नहीं पड़ा न। छोटे कीड़े, पतंगे, बारिश हो रही है वो जा-जाकर के रोशनी में जले जा रहे हैं, मिटे जा रहे हैं। तुम्हें हो रही है कोई तकलीफ़ क्या?

ये तो प्रकृति है और वो अपने हिसाब-किताब पर चलती है। जितनी देर में बात कर रहे हो उतनी देर में कितने शेरों ने, कितने हिरणों को खा लिया और मगरमच्छ मछली खा गया। तुम्हें तकलीफ़ हो रही है क्या? प्रकृति तो पेट के सिद्धांत पर चलती है। जिन लोगों की तुम बात कर रहे हो वो वही कर रहे हैं जो अस्तित्व का नियम है। वो देह हैं, वो शरीर हैं। वो उसी की बात करते हैं। उन्हें उसके आगे कुछ समझ में आता नहीं।

अब प्रश्न ये है कि तुम्हें तकलीफ़ क्यों होती है?

तुम्हें तकलीफ़ इसलिए होती है क्योंकि तुम भी बहुत हद तक उनके जैसी हो। तुममें आसक्ति है उनसे। तुम्हारी तकलीफ़ की वजह ये नहीं है कि उन्होंने तुमसे कुछ व्यर्थ की बातें कह दी हैं या उनकी कुछ व्यर्थ की धारणाएँ हैं। तुम्हें तकलीफ़ इसलिए है क्योंकि तुम्हारे पास भी ये धारणा है कि वो तुम्हारे हैं और तुम्हारे और उनके रिश्ते में कुछ सच्चाई है, कुछ पवित्रता है, कुछ ताक़त है। तुम्हें साफ़ दिखायी पड़ जाए कि वो रिश्ता ही भ्रम भर है तो उसके बाद तुम्हें तकलीफ़ होनी बंद हो जाएगी।

अभी तो तुम्हारे अहंकार को चोट पड़ती है। तुम कहती हो — मेरी माँ, मेरे पिता। किसकी माँ? ‘मेरी माँ’; किसके पिता? ‘मेरे पिता’, और ये बहकी-बहकी बातें करते हैं। भई! पड़ोस की कोई माँ हो और पड़ोस का कोई बाप हो और वो बहकी हुई बातें करते हों तो क्या तुम्हें दुख होता है? दुनिया में इतनी माँएँ हैं, दुनिया में इतने बाप हैं, इतने भाई हैं, इतने रिश्तेदार हैं। दुनिया में जितने लोग हैं सब किसी न किसी के रिश्तेदार होंगे ही। और दुनिया में जितने लोग हैं उनमें से अधिकांश लोग बहकी हुई ही बातें कर रहे हैं, तुम्हें दुख होता है क्या?

तुम्हें वैसे ही दुख नहीं होता जैसे तुम्हें बूंद के कीचड़ बन जाने पर कोई दुख नहीं होता। क्योंकि तुम उन सब से आसक्त नहीं हो। तुम उन सबसे तादात्म्य नहीं रखतीं, आइडेन्टिफ़ाइ नहीं करतीं।

पर यहाँ तुम कहती हो, हम, हम जो इतनी ऊँची चीज़ हैं, हमारे घरवाले इतनी नीची बात कर रहे हैं और अगर तुम्हारे घरवाले नीची बात कर रहे हैं तो इससे ये साबित हो जाता है कि तुम भी नीचे हो क्योंकि तुम उनसे सम्बन्धित हो, जुड़े हुए हो। ऐसा तुम अपने आप को देखते हो।

ये तुम्हारी धारणा है अपने बारे में कि मैं उन लोगों से सम्बन्धित हूँ। तो जब तुम उनकी गिरी हुई बातें सुनती हो तो तुम्हें ऐसा लगता है कि जैसे तुम ही गिरी हुई हो। अन्यथा दुनिया में, मैं फिर कह रहा हूँ इतने लोग हैं जो इतनी गिरी-गिरी और बहकी-बहकी बातें करते हैं। आपको कोई दुख या अफ़सोस होता है क्या? नहीं होता न?

कुछ लोगों की गिरी और बहकी बातों से क्यों अफ़सोस हो रहा है? अफ़सोस इसलिए नहीं हो रहा है कि उनकी बातें गिरी और बहकी हुई हैं। अफ़सोस इसलिए हो रहा है क्योंकि तुम अभी पूरे तरीक़े से जगे नहीं हो। तुम अभी भी अपने आप को उनसे सम्बन्धित ही मानते हो। तुम अभी भी यही सोचते हो कि देह के रिश्ते में कुछ दम है, कुछ जान, कुछ वज़न है।

तुम्हें ये समझ में क्यों नहीं आता कि होगा कोई किसी का नात-रिश्तेदार, होगा कोई किसी का बाप-भाई, है क्या? हाड़-मांस का पुतला। वो वही तो करेगा जो उसे करना है। तुम्हें कोई मछली बहुत पसंद आ गयी, तुम्हारा प्रेम हो गया उससे, तो क्या वो हवा में उड़ने लगेगी? मछली तो मछली है, मछली वही करेगी जो उसे करना है। क्या करेगी? क्या करेगी? पानी में तैरेगी।

तुम पैदा हुईं तुम्हें बताया गया, तुम्हारी ये ख़ानदानी मछली है और उससे कई पीढ़ियों का नाता है। होगी ख़ानदानी मछली, होगा उससे बहुत पुराना नाता, है तो मछली ही न। तो क्या करेगी? पानी में ही तो रहेगी, पेड़ पर थोड़ी चढ़ जाएगी। इसी तरीक़े से होंगे तुम्हारे नात-रिश्तेदार, होगा तुम्हारा उनसे पीढ़ियों का नाता। है क्या? हाड़-मांस हैं तो हाड़-मांस जैसी ही तो बात करेंगे।

आदमी क्या है? जंगल का जानवर ही तो है। आध्यात्मिक शिक्षा नहीं है तो आदमी क्या है — जंगल का जानवर। जंगल का जानवर कैसी बातें करेगा? जानवर जैसी ही तो बात करेगा। इसमें तुम्हें चोट क्यों लग रही है? तुम्हें ताज्जुब क्यों हो रहा है? बोलो। तुम्हें मछली से प्रेम हो गया तो पहाड़ पर चढ़ जाए क्या!

तुम घर में एक छोटा सा पिल्ला ले आती हो — बड़ा प्यारा, बड़ा सुन्दर — उसका मुँह चूमती हो, उसे अपने ही बिस्तर पर सुलाती हो, नहलाती-धुलाती हो। तो क्या वो गीता के श्लोक सुनाना शुरू कर देता है? बोलो। वो जो है, वो तो वही है। हाँ, अब वो जो भौंके, तुम भगवत भजन कर रही हो और बीच में कुत्ता भौंकना शुरू कर दे और तुम्हारा बिलकुल दिल टूट जाए तो इसमें दोष कुत्ते का है या तुम्हारा है?

तुम कह रही हो, ‘मेरा इतना प्यारा कुत्ता, मैं रोज़ इसको शैंपू लगाती हूँ, बढ़िया वाला ब्रांडेड खाना देती हूँ, कपड़े भी पहनाती हूँ, अपने बिस्तर पर सुलाती हूँ और देखो, अभी मैं भजन कर रही हूँ, इसने भौंकना शुरू कर दिया।’

और कहो, ‘आचार्य जी बड़ा अफ़सोस होता है। मैं भजन करती हूँ, मेरा कुत्ता भौंकता है।’ तो आचार्य जी क्या कहेंगे — कुत्ता है, भौंकेगा नहीं तो और क्या करेगा। ग़लती कुत्ते की है ही नहीं। तुमने ये उम्मीद ही क्यों रखी कि वो कुछ और करेगा?

उम्मीद बताऊँ क्यों रखते हैं? क्योंकि हम कहते हैं, ‘अरे! जब हम इतने ज्ञानी हैं तो हमारे भाई को भी कम से कम हमारे आधे कद का तो होना चाहिए। किसका भाई है आख़िरकार वो — हमारा। और हम कौन हैं — हम हैं रज़िया सुल्ताना, हम हैं अकबर बादशाह, हम।’

‘अरे! हमारी माँ ने इतनी गिरी हुई बात करी है, बिलकुल दिल टूट जाता है हमारा। हमारी माँ होते हुए उसने इतनी नीची बात करी!’ तुम हो कौन?

पहली बात, तुम कौन हो? दूसरी बात, तुम कुछ भी हो जाओ, तुम्हारी प्यारी मछली तो मछली ही है न। याद रखना, तुम कुछ भी हो जाओ, मछली पहाड़ पर थोड़े ही चढ़ जाएगी।

तुम्हारी आध्यात्मिक तरक़्क़ी हो गयी, तुम इसके लिए शुक्रगुज़ार रहो। ये अनूठी घटना घटी है तुम्हारे साथ। पर आध्यात्मिक तरक़्क़ी इतनी सस्ती बात नहीं कि तुम्हारी हो गयी तो तुम कहो, ‘अरे! अरे! अंडू, पंडू और चंडू की भी हो जाना चाहिए। एक चचिया भाई है, एक ममिया भाई है, एक फुफेरा है।’ तुम्हें कोई चीज़ मिल गयी है सस्ती, तुम्हारा सौभाग्य है। सबको नहीं मिल जाएगी।

तुम मेरे सामने बैठी हो। कठिन से कठिन बातें भी तुम्हें मैंने आसानी से समझा दिये हैं। तुम्हें आसानी से समझा दिया तो तुम्हें लगता है ये बातें तो यूँही आसान होंगी, सस्ती होंगी। तो फिर तुम्हें बड़ा ताज्जुब होता है कि इतनी आसान बातें मेरे घरवाले क्यों नहीं समझते। क्योंकि ये बातें आसान हैं ही नहीं। तुम अपना धन्य भाग मानो कि तुम्हें मिल गयीं। तुम्हें मिल गयीं इसका मतलब ये नहीं कि पूरी दुनिया को मिल जाएँगी।

तुम्हारी लॉटरी लग गयी है और अब तुम्हें ताज्जुब हो रहा है कि ये दुनिया वाले इतने ग़रीब क्यों हैं? लॉटरी तो बहुत आसान होती है। नहीं, आसान नहीं होती। करोड़ों में किसी एक की लगती है। तुम्हारी लॉटरी लग गयी है और अब तुम कह रही हो, ‘वो न मेरा जो ममेरा पुन्नु है, वो अभी तक साइकिल में ही क्यों घूम रहा है। आचार्य जी, आपने मुझे तो बिलकुल पुष्पक विमान पर बैठा दिया। वो पुन्नु साइकिल पर क्यों घूम रहा है?’

पुष्पक विमान सस्ता आता है क्या? पुष्पक इतना सस्ता है कि उसमें पुन्नु भी बैठ जाएगा? तुम्हें पुष्पक की ही कद्र नहीं है। नहीं तो तुम्हारा दिल नहीं टूटता। तुम कहती, ‘भाई, बात तो सही है, पुन्नु तो पुन्नु है न। पुन्नु थोड़े ही गया है आचार्य जी की शरण में। पुन्नु ने थोड़े ही अपने आप को अध्यात्म को समर्पित किया है।‘ तो पुन्नु तो बातें पुन्नु जैसे ही करेगा न।

पुन्नु कहेगा, ‘दीदी, जवान हो रही हो, शादी करो, बच्चे पैदा करो जल्दी।’ और फिर तुम्हारा दिल टूटा। ‘अरे! पुन्नु तूने ये क्या बात कर दी! तूने तो बिलकुल शरीर के तल की बात कर दी। मैं तो आत्मा हूँ।‘ एक तरफ़ तो तुम बताती हो तुम आत्मा हो और दूसरी तरफ़ पुन्नु से तुम्हारा मोह कम ही नहीं हो रहा। ये आत्मा को पन्नु से कैसे मोह होने लग गया, भाई!

ये बात ही बड़ी निराली होती है। एक ओर तो बताते हो, ‘आचार्य जी, हम अध्यात्म में बहुत आगे बढ़ गये लेकिन हमारे रिश्तेदार आगे नहीं बढ़ पा रहे। हमें बड़ी तकलीफ़ होती है। जो अध्यात्म में आगे बढ़ गया, अब वो अपने आप को किसी का रिश्तेदार मानेगा?

अध्यात्म में आगे बढ़ने का अर्थ होता है देहभाव से मुक्त होना, आत्मस्थ हो जाना।

आत्मा के रिश्तेदार होते हैं? आत्मा का चचेरा भाई होता है? फुफेरी मौसी होती है? होती है? पर तुम कह रहे हो — हम अध्यात्म में आगे बढ़ गये, हमारे रिश्तेदार आगे नहीं बढ़ पा रहे। हमें बड़ी तकलीफ़ होती है। इसका अर्थ ये है कि तुम ही अभी आगे नहीं बढ़े हो।

तुम आगे बढ़ गये होते तो तुम कहते कि वो जो कुछ भी कर रहे हैं, वो वैसा ही है जैसा मछली का पानी में तैरना और चिड़िया का हवा में उड़ना। वो जो कुछ भी कर रहे हैं, वो वैसा ही है जैसा शेर का हिरण का शिकार करना, जैसा खरगोश का घास को खाना। वो प्रकृति में जी रहे हैं। उन्हें आत्मा की कोई ख़बर ही नहीं। इसमें दुख क्या मानना है! इसमें तो देखना है कि प्रकृति ऐसी होती है।

और मैं बार-बार क्यों कह रहा हूँ कि दुख मत मानो, बस देखो कि प्रकृति ऐसी होती है? क्योंकि जब तक तुम उनसे मोह रखे हो, उनसे जुड़े हो, तब तक तुम उनकी सहायता नहीं कर पाओगे। जिससे तुम्हारा मोह बना हुआ है, उसकी तुम सहायता नहीं कर सकते। इसीलिए तुम आध्यात्मिक रूप से कितने भी ऊँचे उठ जाओ, सबसे मुश्किल होता है अपने घरवालों की सहायता करना।

जिसकी सहायता करना चाहते हो सबसे पहले उसके लिए तुम्हारे मन में साक्षीत्व का भाव होना चाहिए। उससे रिश्ता बनाओगे, उसको बदल नहीं पाओगे। करुणा रखो, सहानुभूति नहीं।

अंतर समझना।

करुणा का अर्थ होता है कि ये जान तो रहे हो कि सामने वाला दुखी है लेकिन तुम उसके दुख के साथ तादात्म्य नहीं कर रहे, आइडेन्टिफ़ाइ नहीं कर रहे। बस कह रहे हो कि हाँ, मैं जान रहा हूँ कि तुम दुखी हो। मैं जान रहा हूँ तुम दुखी हो लेकिन मैं ये भी जान रहा हूँ कि तुम्हारा सारा दुख अनावश्यक है। तुम्हारा सारा दुख अज्ञानमूलक है। तुम्हारे दुख में कोई दम नहीं है।

ये भी मैं जान रहा हूँ तुम्हारा दुख वैसे ही है जैसे कोई सपना देखते हुए ख़ौफ़ में आ जाए। तो ख़ौफ़ में तो वो आ गया है। डर का उसको अनुभव तो हो रहा है। हम नहीं कहेंगे कि उसे डर का अनुभव नहीं हो रहा। पर हमें ये भी पता है कि उसका डर झूठा है; सिर्फ़ सपना है, सपने से डर गया है। ये करुणा है।

सहानुभूति, सहानुभूति बिलकुल दूसरी बात हो जाती है। जिससे तुम्हारी सहानुभूति होने लग गयी तुम उसी के जैसे हो गये। सह-अनुभूति; अनुभूति अगर एक है, सह-अनुभूति हो रही है तो फिर अनुभोक्ता भी एक हो गया न। अगर अनुभोक्ता एक नहीं है तो अनुभूति एक कैसे हो जाएगी! और जब तुम वही हो वो जो दूसरा है, दूसरा जो अनुभोक्ता है वही तुम हो, तो फिर तुम दूसरे को बदल कैसे दोगी, भाई!

करुणा में तुम वही नहीं हो जाते जो सामने वाला दुखी व्यक्ति है। सहानुभूति में तुम वैसे ही हो जाते हो जैसा सामने वाला है। बल्कि ऐसे कह लो कि जब तक तुम वैसे ही हो जैसा सामने वाला है तो तुममें सहानुभूति का ही भाव रहेगा। कि अरे! अरे! अरे! तुम्हें बड़ी तकलीफ़ रहेगी उनको लेकर के।

देख नहीं रही कि तुम्हें पूरे जगत को लेकर के कोई तकलीफ़ नहीं है। जगतभर में अज्ञान पसरा हुआ है न। जगतभर में दुख ही दुख है, उसको लेकर के तो तुम्हें कोई तकलीफ़ नहीं। क्या तुम ये कह रही हो कि अफ्रीका के किसी देश के किसी गाँव में आग लग गयी है और पूरा गाँव जलकर तबाह हो गया है, इतने लोग मर गये, आचार्य जी, मुझे बड़ी तकलीफ़ है।

कुछ नहीं।

तुम्हें तकलीफ़ किसकी है? उन्हीं की जिनसे तुम्हारा देह का रिश्ता है। तो तुम ही देह के रिश्ते को बड़ा महत्व दे रही हो। तो जब तुम ही देह के रिश्ते को बहुत महत्व दे रही हो तो वो भी ऐसे ही बोलते हैं। क्या? कि अरे! लड़की, तू देह है और तेरी देह की उम्र हो गयी पच्चीस साल, तीस साल। चल जल्दी से देह वाले काम निपटा सारे।

यही बात तुम्हें तकलीफ़ दे रही है न कि वो तुमसे कह रहे हैं कि अब ये कर लो, अब ये कर लो, तुम्हारी उम्र होती जा रही है। माने वो तुम्हें देह की तरह देख रहे हैं। पर तुम भी तो उन्हीं की बात कर रही हो जिनसे तुम्हारा देह का रिश्ता है। तो तुममें और उनमें अंतर क्या हुआ?

अंतर बनाओ।

अज्ञान मात्र अज्ञान है। वो तुम्हारे किसी प्रियजन का अज्ञान नहीं है। अज्ञान माने अज्ञान। माया मात्र माया है, चाहे वो पड़ोस के घर में हो और चाहे तुम्हारे घर में हो। दो तरह की माया में अंतर मत कर लिया करो कि दुनिया में अगर दिखायी दे माया तो उसे कहेंगे माया और अपने घर में दिखायी देगी माया तो उसको कहेंगे, ‘नहीं, नहीं, नहीं, ये तो मौसी है, ये तो ताई है, ये तो फूफी है, ये तो मम्मी है!’ ये नहीं चलेगा। माया माने माया।

दुनिया में जब माया दिखायी देती है तो उसको निरपेक्ष भाव से देख पाती हो न मात्र दृष्टा की तरह कि हमने क्या देखा अभी-अभी — माया। वैसे ही अपने घर में भी जब माया दिखायी दे तो उसको बस बोलो कि क्या है ये — माया। उसको ये न कहो ‘ये फूफी है’; फूफी नहीं है। क्या है? माया; माया है।

और ये जो मैं बात कह रहा हूँ ये कठोरता या हृदयहीनता की नहीं है। जैसे ही तुमने माया को मात्र माया कहना शुरू किया, वैसे ही तुम भी माया से मुक्त हो गये और अब तुम दूसरों की भी मदद कर पाओगे।

आ रही है बात समझ में?

विज्ञान के सिद्धांत क्या तुम्हारे स्वजनों, प्रियजनों के लिए बदल जाते हैं? बदल जाते हैं क्या? पूरी दुनिया के लिए प्रकाश की जो गति होती है, तुम्हारे स्वजनों के लिए दूसरी हो जाती है क्या? पूरी दुनिया पर जो दवाइयाँ काम करती हैं, तुम्हारे घरवालों पर भी तो वही काम करती हैं न। पूरी दुनिया के लिए गुरुत्वाकर्षण अगर तुम नापते हो, कहते हो g= ९.८ m/s2, तो तुम्हारे घरवालों के लिए कितना होता है? कितना होता है? ९.८ की जगह १८.८ हो जाता है क्या? या २.८ हो जाता है? ऐसा होता है क्या?

जब विज्ञान के नियम नहीं बदलते तुम्हारे घरवालों के लिए तो अध्यात्म के नियम क्यों बदलेंगे भाई। क्यों बदलेंगे, बोलो। पर जब अध्यात्म की बात आती है, जब जीवन की बात आती है तो हमारी उम्मीदें बड़ी विचित्र होती हैं। हम कहते हैं — बाक़ी दुनिया में अगर अज्ञान है तो उसको हम कह देंगे अज्ञान और मेरे घर में अगर अज्ञान है तो उसको हम कहेंगे, ‘वो तो ये बड़े क्यूट हैं!’

बाहर का अज्ञानी कहलाया बेवकूफ़ और घर का अज्ञानी कहलाया क्यूट! ये नहीं चलेगा। बाहर कोई आम औरत घूम रही हो और वो करे निरा मूर्खता की बात, तो वो कहलाएगी स्टूपिड (बेवकूफ़) और सिली (नासमझ)। और घर में तुम्हारी जानेमन उतनी ही मूर्खता की बात करे तो उसको बोलोगे, ‘विटी एंड फ़नी’ (विनोदपूर्ण और मज़ेदार)। ये नहीं चलेगा। ये तो तुमने नियम ही बदल दिये।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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