जिन लोगों की तुम बात कर रहे हो वो वही कर रहे हैं जो अस्तित्व का नियम है। वो देह हैं, वो शरीर हैं। वो उसी की बात करते हैं। तुम्हें तकलीफ़ इसलिए होती है क्योंकि तुम भी बहुत हद तक उनके जैसी हो। तुम्हारी तकलीफ़ की वजह ये नहीं है कि उन्होंने तुमसे कुछ व्यर्थ की बातें कह दी हैं या उनकी कुछ व्यर्थ की धारणाएँ हैं। तुम्हें तकलीफ़ इसलिए है क्योंकि तुम्हारे पास भी ये धारणा है कि वो तुम्हारे हैं और तुम्हारे और उनके रिश्ते में कुछ सच्चाई है, कुछ पवित्रता है, कुछ ताक़त है।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। हम शिविर में घर पर थोड़ा-बहुत लड़ाई झगड़ा करके आये हैं। जो ढाँचा उन्होंने सोचकर रखा है, उस ढाँचे में मैं बिलकुल नहीं चल सकती हूँ और ये बात मैंने बतायी उनको साफ़-साफ़। तो इससे वो लोग बहुत आहत होते हैं और फिर रोना-धोना करते हैं।
ये मुझे बहुत तकलीफ़ देता है उन लोगों के लिए कि ऐसे इसी में जीवन को पूरा बिता दे रहे हैं, तो असल जीवन को वो लोग कब जानेंगे?
आचार्य प्रशांत: अभी बारिश हो रही है। एक कितनी आसमान से साफ़ सुंदर बूंद गिरती है वो मिट्टी में मिल जाती है, कीचड़ हो जाती है। तुम्हें तकलीफ़ होती है?
प्रश्नकर्ता: नहीं, ज़्यादा नहीं होती। कभी-कभी हो जाती है।
आचार्य प्रशांत: कुछ भी नहीं होता है। जितनी देर में तुमने ये बोला उतनी देर में सैकड़ों-हज़ारों बूंदें मिट्टी हो गयीं। कोई फ़र्क पड़ा क्या तुमको? कुछ फ़र्क नहीं पड़ा न। छोटे कीड़े, पतंगे, बारिश हो रही है वो जा-जाकर के रोशनी में जले जा रहे हैं, मिटे जा रहे हैं। तुम्हें हो रही है कोई तकलीफ़ क्या?




