पीछे हटने का मन क्या होता है? मन क्या होता है? मैंने कभी बोला मन करता है? मैंने कहा, पीछे हटने का फ़ैसला लेना चाहते हो स्वार्थवश। चाहते हो। “मन करता है,” तो बहुत छुपा-छुपाई वाला मुहावरा है। “मन कर रहा है,” मन क्या कर रहा है, बोलो, फ़ैसला ले रहा हूँ। “मन कर रहा है,” तो ऐसा लगता है जैसे किसी और के प्रभाव में आ गए हो, मन कोई और है। आप ही मन हो, बोलो, फ़ैसला ले रहा हूँ।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। सर, मैं अहमदाबाद से आया हूँ, पहली बार आपसे प्रश्न कर रहा हूँ। आपको मैं लगभग चार साल पहले से सुन रहा था, और उसके बाद अभी गीता-सत्र से एक साल दो महीने से आपसे जुड़ा हूँ। जीवन में बहुत बदलाव आए हैं, सर। जैसे कि मुझे दिखने लगा कि ये पशुओं की जो हत्याएँ वग़ैरह हो रही हैं, उसका सीधा-सीधा संबंध हमारे दूध, दही इन सब से है जो हम खा रहे हैं, पी रहे हैं। तो अभी तीन महीने से वो भी छोड़ दिया है। घर में बहुत फोर्स किया जाता है, लेकिन मैं अड़ा हुआ हूँ। और घर में भी लोगों को समझाता हूँ, लेकिन वो नहीं समझ रहे हैं।
और इसके बावजूद काफ़ी चीज़ें हैं, जो मेरी मान्यताएँ हैं, मेरी जो अंदर की गंदगी है, उनको जब आत्म-अवलोकन करता हूँ, तो बहुत ख़राब तरीके से दिखती हैं अंदर। और जब उन मान्यताओं के हिसाब से नहीं जीता हूँ, जैसे कि आप बताते हैं कि हमारे ज़्यादातर कर्म अतीत से ही हो रहे हैं, क्योंकि हम अतीत में कुछ सोचते हैं कि हम ऐसे जीते थे, और उस हिसाब से फिर पैटर्न हमारा चलने लगता है, तो वो दिखता है, सर। लेकिन जब उनको छोड़ता हूँ, मान्यताओं को छोड़ता हूँ, अपनी ये सब चीज़ें दिखती हैं, उनको छोड़ने के बाद दुख बहुत बढ़ जाता है। और मेरे घर में भी सबके साथ में, अभी मतलब मैं जिस तरह से जी रहा हूँ, उस हिसाब से घर में तालमेल नहीं बैठ रहा है, न पत्नी के साथ।
हालाँकि पत्नी भी गीता-सत्रों से जुड़ी हैं, उन्हें अभी दो-तीन महीने ही हुए हैं, पर उनका ऐसा कहना है कि "तुम पहले जैसे जीते थे, उसमें बहुत अंतर आ गया है। तुम पहले जैसी बातें नहीं करते, तुम दूर-दूर रहते हो। तुम पूरे




