प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। सत्संग और शिविर वाला माहौल घर पर ख़ुद को कैसे दे सकते हैं? क्या ऐसा संभव है क्योंकि जहाँ भी मैं रहता हूँ, चाहे घर पर, स्कूल में, कॉलेज में या ऑफिस में वहाँ पर आसपास वाले दूसरे तरीक़े से जीवन जी रहे होते हैं।
आचार्य प्रशांत: ज़िद चाहिए और कुछ नहीं। सुर चढ़नी चाहिए, सुर समझते हो? श्रुति में एक बड़ा सुन्दर शब्द आता है—धृति। क्या ? धृति। उसका एक अर्थ तो होता है धैर्य और दूसरा अर्थ होता है जिद, हठ। वास्तव में दोनों एक ही हैं धैर्य भी एक तरह का हठ ही है। हठ होना चाहिए।
ये मत पूछो कि घर को शिविर में कैसे बदले या शिविर का माहौल घर तक भी कैसे चला जाए। अड़चन क्या है? कर डालो। कर डालो ना। ये जहाँ बैठे हो, ये कोई मंदिर की तरह बनायी गई है जगह है? ये क्या है? घर ही तो है किसी का। हमने क्या बना दिया इसको? बना ही तो दिया है, ऐसा ये बना हुआ नहीं था, हमने इसे बना डाला। अब बनाने के लिए जो भी श्रम करना था, जो भी क़ीमत अदा करनी थी हमने करी।
तीन दिन के लिए हो सकता है तो तीस दिन के लिए भी हो सकता है फिर तीन सौ पैंसठ दिन के लिए भी हो सकता है। उसके लिए घर गिराना थोड़ी पड़ता है, या गिराना पड़ता है? यहाँ हम क्या कर रहे हैं, बुल्डोजर लेकर आये हैं? पहले इस जगह को गिरा दिया, फिर मलबे पर बैठकर के हमने कहा कि अब होगी वार्ता, ऐसा कुछ कर रहे हैं? बदल दिया, बदल जाता है ।
विचार अच्छा होता है सच तक पहुँचाने के लिए, विचार अच्छा होता है व्यर्थ विचारों को काटने के लिए। भ्रम से मुक्ति दिलाने के लिए विचार अच्छा है, पर एक बार कोई बात समझ में आ जाए तो तुम उसके बाद भी विचार ही विचार करते रहो, ये बेईमानी है।




