
दुनिया अगर आपको शरीर के आधार पर तौलती है, तो वो आपके बारे में नहीं, अपनी सीमित समझ के बारे में बता रही है। मनुष्य की पहली पहचान देह नहीं, चेतना है। जो लोग आपको दया, कमजोरी या “अलग” नज़रों से देखते हैं, उन्होंने खुद को सिर्फ़ शरीर तक सीमित कर रखा है। इसलिए खुद को कभी दूसरों की नज़रों से मत मापिए। आपकी असली कीमत चेतना तय करती है, शरीर नहीं।



शरीर की बुद्धिमत्ता सिर्फ शरीर के संरक्षण और शरीर की ही सुरक्षा मात्र के लिए है। आग में हाथ जा रहा होगा, शरीर हाथ को पीछे खींच लेगा। पर शरीरधारी कुसंगति में बढ़ रहा होगा, तो शरीर अपने आप को पीछे नहीं खींच लेगा क्योंकि तुम संगति में हो चाहे कुसंगति में हो शरीर को अंतर नहीं पड़ता। शरीर तो बस ये चाहता है कि वो भौतिक दृष्टि से बना रहे, बचा रहे; खुद भी बचा रहे और अपने साथ-साथ अन्य जीवों का निर्माण भी करता चले। इतनी बस शरीर की माँग है।


Acharya Prashant: Man is both Prakriti and something else. Prakriti is y=sin(x). You are confined within duality- ups and downs, ups and downs, leading to nothing. The up will not remain up, forever; the down will not remain down, forever. Crests and troughs, crests and troughs; that is

आचार्य प्रशांत:अगर मैं अपनी हस्ती में बस देह को कीमत दूँगा तो मुझे अपना नुक़सान भी सिर्फ़ कब दिखाई देगा? जब नुक़सान होगा शरीर का। तो मैं कहूँगा, 'अब कुछ नुक़सान हुआ है।' क्यों? क्योंकि मैं ख़ुद मूल्य,

आचार्य प्रशांत: स्त्री में इस बात की कभी बहुत प्रशंसा नहीं की गयी कि उसके पास दमदमाता, दहकता रूप है। और आज भी अगर आप थोड़ा देहात की तरफ जाएँगे, जहाँ पाश्चात्य हवा ज़रा कम बहती हो, तो आप पाएँगे कि अगर कोई लड़की बहुत ज़्यादा रूप-श्रृंगार करके घूम रही


आचार्य प्रशांत: जो भीतर के अंधेरे को हटा सके, उसके लिए नाम दिया गया—गुरु। अब उस शब्द का जनमानस दुरुपयोग कर ले तो वो अलग बात है। ध्यान दीजिएगा, भीतर का अंधेरा। और भीतर के अंधेरे का ही नाम होता है, 'मैं' भाव। मैं, मेरा संसार, मेरे इरादे, मेरी इच्छाएँ,

प्रश्नकर्ता: सर प्रणाम। सादर नमन। सर इतनी बातें सुनने के बाद अपनी मन की एक मूर्खता के विषय में आपसे सवाल है। ये अच्छा और बुरा लगता है कि हमने समझ लिया। इस बात पर भी शक है कि अगर मैंने समझ लिया, तो फिर मैं उसपर चल क्यों नहीं


प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मुझे ये समझ में कई बार नहीं आता कि जब मैं किसी माहौल में होती हूँ तो जैसे बार-बार ये बात होती है कि माया को हमें सत्य नहीं समझना चाहिए। लेकिन जैसे मैं आज दशहरा मेले में अपने बच्चों को लेकर गयी तो मैं वहाँ पर


प्रश्नकर्ता: नमस्कारम आचार्य जी, पन्द्रह साल की उम्र है, पुरुषों के प्रति काफ़ी आकर्षित रहता हूँ। मुझे पता है कि समलैंगिकता एक विकार है। इस विकार का कैसे विगलन हो? कृपया इस पर मार्गदर्शन करें।

प्रश्नकर्ता: अगले प्रश्नकर्ता आपके साथ गोवा शिविर में भी थे और वहीं से ही वे उद्धृत करते हैं। आपने कहा था, ‘आदमी वास्तव में जान जाए उनके ऊपर कौन है। तो आगे लिखते हैं कि आचार्य जी, इस बात को मैं कैसे समझूँ और जान पाऊँ कि ज़िन्दगी निजी भोग


आचार्य प्रशांत: तुम छह-छह, आठ-आठ साल की लड़की को ‘मुन्नी बदनाम हुई’ और ‘मैं तो तेरा बटर चिकन हूँ’ और इस तरीक़ों के गानों पर नचा रही हो। तुम उन बच्चियों में कौन सी भावना का संचार कर रही हो?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा प्रश्न महिलाओं से सम्बन्धित है, रेप (बलात्कार) से सम्बन्धित। तो अभी जैसे ये कानून में बदलाव हुआ है कि लड़कियों की उम्र अठारह से इक्कीस कर दी है शादी की। तो इसमें काफ़ी नेता और समाज के लोग भी ये कह रहे हैं कि इससे

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी! मेरे दो प्रश्न हैं। पहला प्रश्न है कि टिपिकली (आमतौर पर) ऐसा माना जाता है कि जो महिलाएँ होती हैं, वो थोड़ा प्राकृतिक रूप से केयर गिवर्स (देखभाल कर्ता),इमोशनल (भावुक), ह्वेरैज़ मेन (जबकि पुरुष) वो थोड़ा,लॉजिकल (तार्किक), गो-गेटर्स (उद्योगी), ऐम्बिशस (महत्वाकांक्षी) होते हैं।



आचार्य प्रशांत: जिन लोगों को भारतीय संस्कृति की चिंता हो, उन्हें वेदान्त के पास निश्चितरूप से जाना ही पड़ेगा। और अगर तुम नहीं जाओगे वेदान्त के पास, तो जिसको तुम भारतीय संस्कृति कहते हो, इसका भविष्य कोई बहुत उजला नहीं दिख रहा है। नई पीढ़ी बस नाम की भारतीय या


आचार्य प्रशांत: आप जब किसी को देखते हो और आप कहते हो कि, "अरे, मुझे प्यार हो गया", या ख़ास तौर पर ये जो पहली नज़र में प्यार, लव एट फ़र्स्ट साइट, का पूरा सिद्धांत है, खेल है – उसमें आपने कोई उसके गुण देखे? आपने उसको पहली नज़र


आचार्य प्रशांत: दुनिया की कुल संपत्ति दो-चार प्रतिशत महिलाओं के पास है, पच्चानवे प्रतिशत पुरुषों के पास है। दुनिया की संसदों में और विधान सभाओं में स्त्रियों का अनुपात पाँच-दस प्रतिशत, नब्बे प्रतिशत कौन हैं? पुरुष हैं। दुनिया की कंपनियों में, शीर्ष पदों पर जो लोग हैं—'सी एक्सओज़' बोलते हैं


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, हाल ही में मैं एक न्यूज़ (ख़बर) पढ़ रहा था, जिसमें यूके इंग्लैंड के एक कोर्ट ने रुलिंग (निर्णय) दी है कि पुरूषों को — जो गंजे हैं — उनको गंजा कहना एक सेक्सुअल हेरासमेंट (यौन उत्पीड़न) के तौर पर लिया जाएगा।
और उसमे उन्होंने तर्क…

प्रश्नकर्ता: मेरा शरीर यादों से भरा हुआ है। यहाँ तक कि मैं अपने बालों के रंग, अपनी आँखों के रंग को भी स्मृति ही कहूँगा। और ये स्मृतियाँ मुझे पुरानी पीढ़ियों से मिली हैं क़रीब-क़रीब विरासत के तौर पर।

प्रश्नकर्ता: परिस्थितियाँ प्रतिकूल हों, मन आहत हुआ हुआ हो, संवाद के लिए तैयार न हो, इसमें इन सभी के प्रति कोई क्रिया न करना तभी सम्भव हो पाएगा अगर उसी समय, उसी परिस्थिति में देख सकें कि ये सच्चा नहीं है। लेकिन उसको सच्चा न देख पाना तब हो पाता

आचार्य प्रशांत: जिन्होंने शरीर के ही दम पर प्रसिद्धि पायी, जिनको शरीर के ही नाते जानते हो, उन फिल्मी सितारों की जवानी की और बुढ़ापे की तसवीरें देख लिया करोl देह क्या है, स्पष्ट हो जाएगाl देह भाव से मुक्त होने का अच्छा तरीका हैl


आचार्य प्रशांत: तुम जो इतना विचार करते हो कि पति क्या कर रहा होगा, पत्नी क्या कर रही होगी; और क्या है माथे का भार? दिन भर और क्या सिर पर चलता रहता है? नात, रिश्तेदार, काम, सम्बन्ध, पति, पत्नी, बच्चे, माता, पिता — यही मन है। इसी को कबीर

आचार्य प्रशांत: इतनी पतली सी चमड़ी की चादर है, उस चादर के पीछे छुपा हुआ है मल-मूत्र, इसलिए दिख नहीं रहा है। क्या चाटे जाऍं उस चमड़ी को! चाटते वक्त ख़याल नहीं आएगा कि चमड़ी के ठीक पीछे क्या है? जिसको ये विचार आने लग गया वो कैसे अब देहभाव






अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि ज्ञान से आनंद और मस्ती जन्म लेते हैं। सच्ची मित्रता, प्रेम और शांति किसी को पकड़ने से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता देने से मिलते हैं। मन स्वयं चंचल नहीं होता; उसमें क्या भरा जाए, यह हमारी सजगता तय करती है। जीवन का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि ज्ञान से प्रेम करना, प्रश्न करना, आत्मावलोकन करना और अपने भ्रमों को पहचानकर भीतर की स्वतंत्रता की ओर बढ़ना है।








आप में से जो लोग टेनिस देखते होंगे, आपसे कहा जाए कि अपनी ज़रा पसंदीदा महिला खिलाड़ियों के नाम बताइए, तो आपको मार्टिना नवरातिलोवा बाद में याद आएँगी; आपको पहले कौन याद आएँगी? एना कोर्निकोवा। ज़बरदस्त पॉपुलैरिटी थी उसकी। हमें कहाँ मतलब है इस बात से कि एक व्यक्ति या एक महिला अपने बंधनों को, अपनी शारीरिक सीमाओं को चुनौती देकर टेनिस के कोर्ट पर कुछ जीत रही है। आपके सामने एक ऊँचा खिलाड़ी भी आ जाए, विशेषकर महिला खिलाड़ी, वो कुछ नहीं है, बस सेक्सुअल ऑब्जेक्ट है। इससे बस यही पता चलता है कि हमारी ज़िंदगी में भी सत्य से कहीं-कहीं ज़्यादा सेक्स है।
नारी नरक का द्वार है, उसके लिए जो नारी को वासना की दृष्टि से देखे। नहीं तो जैसे कोई भी व्यक्ति है, वैसे ही एक महिला भी है। तुम महिला को देखो और तुम्हें व्यक्ति दिखाई ही न दे, तुम्हें उसकी चेतना दिखाई ही न दे, तुम्हें बस उसका शरीर दिखाई दे तो नरक और क्या होता है? नरक उस व्यक्ति में नहीं है जिसे नारी कहते हैं, नरक तुम्हारी दृष्टि में है। अगर देह-केंद्रित होकर जियोगे, तो ये जीवन ही नरक है।
ज्ञान है आपकी असली ताकत; आपका कौशल आपकी असली ताकत है; आपने दुनिया कितनी देखी है, ये आपकी असली ताकत है। अगर शरीर की भी सुंदरता की बात करनी है तो शरीर की सुंदरता है शरीर की ताकत, फिटनेस। शरीर ताकतवर रखो, फिट रखो।
आचार्य प्रशांत: जो ये सारा छवि बचाने का खेल है, ये माल के लालच का खेल है।
ये जो पूरी बात ही है कि समाज में अपनी छवि अच्छी रहे, इज्ज़त ऊँची रहे, समझिए अच्छे से, कि वो बात पूरे तरीक़े से भौतिक है, मटेरियल है। भौतिक है, मटेरियल है।…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। क्रान्ति लाने के लिए धारणा पर काम करें कि मैं अभी आत्मा हूँ, शरीर नहीं हूँ, मन नहीं हूँ या फिर स्वीकारें कि अभी मैं शरीर हूँ, अहंकार है तो क्रान्ति आएगी, आत्मा राम तक पहुँचेंगे। दोनों में से कौनसा?
आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी के साथ ज़रा…
प्रश्नकर्ता: आपने ऐसे बताया कि “तुम कौन हो उसको जानो।“ तो इसको हम कैसे जानें और मन से कैसे अपने-आप को अलग कर के देखें और मन को कैसे अपने ऊपर हावी न होने दें, ‘मैं’ को कैसे कंट्रोल करें हम; और इवेन्चुअली माइंड और बॉडी से डिस्टेंस बना कर…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, चालीस वर्षीय महिला हैं, डॉक्टर हैं पेशे से। लिखती हैं, 'प्रणाम, आचार्य जी। मैं छोटे शहर की निम्न-मध्यवर्गीय, रूढ़ीवादी परिवार की सबसे बड़ी लड़की हूँ। बचपन से ही ग़रीबी, डिप्रेशन (अवसाद), डोमेस्टिक वायलेंस (घरेलू हिंसा) बहुत कुछ झेला, फिर सोचा कि इस जीवन को बदलना है; अत्यन्त…
आचार्य प्रशांत: समलैंगिकता विकार है, ऐसा तुम्हीं कह रहे हो। इस विकार का समाधान, मैं…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा सवाल सामाजिक मुद्दे को लेकर है। जो ट्रांसजेंडर कम्युनिटी होती है उसमें मैंने कई बार देखा कि हम जब समाज में बाहर निकलते हैं तो वो लोग पैसे माँगते हैं या ट्रेन में भी जाते हैं तो वो काफ़ी परेशान करते हैं, पैसे दो यह…
ये कला है? आग लगे ऐसी कला को।
तुम एक…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरे मन में जो है सेक्स से रिलेटेड (सम्बन्धित) बहुत थॉट्स (विचार) आते हैं तो कैसे कम करे या कंट्रोल (नियन्त्रित) कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी यूँही छोटी है, उसमें किसी ऐसे काम के लिए तुम समय कहाँ से निकाल रहे हो जो तुमको पता है…
आचार्य प्रशांत: जिन्होंने शरीर के ही दम पर प्रसिद्धि पाई, जिनको शरीर के ही नाते जानते हो उन फ़िल्मी सितारों की जवानी की और बुढ़ापे की तस्वीरें देख लिया करो। देह क्या है स्पष्ट हो जाएगा। देहभाव से मुक्त होने का अच्छा तरीक़ा है। कोई रहे हों अपने ज़माने के…
आचार्य प्रशांत: ज़िंदगी में पहले कुछ बन जाओ, कोई आंतरिक मुकाम हाँसिल कर लो, फिर तुम्हें समझ में आएगा न रिश्ता किससे बनाना है। अब रिश्ता बना लिए हैं छब्बीस की उम्र में ही। तुम्हारा लक्ष्य हो सकता है ज़िंदगी में ऊँचे उठना; जिससे तुमने रिश्ता बना लिया है उसे…
प्रश्नकर्ता: स्त्री की सुंदरता से उसकी कोमलता का जो एहसास होता है, क्या वो परमात्मा की कोमलता जैसा होता है?
आचार्य प्रशांत: रोमेंटिक उपन्यास पढ़ रहे हो? हमें तो पता था सत्यम-शिवम्-सुंदरम, स्त्री कब से सुन्दर होने लग गई? सत्य सुन्दर होता है। स्त्री-पुरुष कब से सुन्दर हुए? कोमलता माने…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप ही के साथ रहकर पिछले कुछ समय से मुख्य उपनिषदों को पढ़ने का मौक़ा मिला। जब मुख्य उपनिषदों का पाठ कर रहा था तो मैंने एक बात उसमें देखी, जो बड़ी अजीब लगी। कि आज के समय में अध्यात्म का जो प्रचलित मतलब है, वो चक्रों…
तो हम इन मेमोरीज़ को, स्मृतियों को फॉरमैट कैसे कर सकते…
कोई सुपरस्टार हो, देख लो…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न ये है कि ज़िन्दगी में बड़ा-से-बड़ा दुख हुआ, मतलब जो सबसे प्रिय था वो भी चला गया, इसके बावजूद भी अहंकार नहीं टूटता। आत्मज्ञान में भी चल रही हूँ, लेकिन कहीं-न-कहीं लगता है देहभाव किसी भी तरह नहीं जाता है, कम ही नहीं होता है।…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कुछ ख़ास दिन जैसे नवदुर्गा के नौ दिनों में सब द सेक्रेड फेमिनिन (पवित्र स्त्रीत्व) वगैरह की बहुत बातें करते हैं। हर जगह स्त्री शक्ति का ही ज़ोर रहता है। पंडालों में भी देवी और अखबारों में भी नारी का, स्त्री का महिमामंडन रहता है और तब…
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
भूतों का डर अक्सर किसी वास्तविक भूत से नहीं, बल्कि हमारी कल्पना, डर और सस्ते रोमांच की चाह से पैदा होता है। भूतिया फ़िल्में और कहानियाँ मन में ऐसी धारणाएँ बना देती हैं कि साधारण चीज़ें भी डरावनी लगने लगती हैं। डर से भागने के बजाय उसके आधार पर प्रश्न करना चाहिए। सस्ते रोमांच के बजाय ज्ञान, इतिहास और सार्थक चुनौतियों में वास्तविक आनंद और उत्साह खोजना अधिक उपयोगी है।
डर वास्तविकता से नहीं, बल्कि अस्पष्टता और कल्पना से ताक़त पाता है। वह कभी स्पष्ट नहीं बताता कि किस बात का भय है, बल्कि धुंधले संकेतों से मन को विचलित करता रहता है। डर से भागने के बजाय उसे सामने बुलाकर उसके हर दावे से स्पष्टता माँगनी चाहिए। जैसे ही भय को सटीक होने के लिए मजबूर किया जाता है, उसकी शक्ति समाप्त होने लगती है, क्योंकि उसका पूरा अस्तित्व भ्रम और धुंध पर टिका होता है।
डर बोलने से नहीं, बल्कि दूसरों की राय और अपनी छवि खोने के भय से पैदा होता है। जब हम अपनी पहचान को लोगों की स्वीकृति पर टिका देते हैं, तब साधारण काम भी कठिन लगने लगता है। गलती करना गलत होना नहीं है; गलती सीखने का अवसर है, पहचान नहीं। आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और दूसरों की राय से मुक्त होकर ही व्यक्ति निडर होकर बोल सकता है और आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सकता है।
क्या आपके विचार भी आपको सच जैसे लगते हैं? यही भ्रम है। विचार कभी सत्य नहीं होते, वे सिर्फ़ मन की गतिविधि हैं। जब तक “मैं हूँ” का भाव है, तब तक वस्तु, व्यक्ति और विचार रहेंगे ही। उनसे भागना नहीं, उन पर विवेक लगाना है। जो अहंकार को पोषित करे उसे छोड़ो, जो उससे टकराए वही सही दिशा है। यही चुनाव जीवन को बंधन या मुक्ति की ओर ले जाता है।
युद्ध, मुनाफाखोरी और हिंसा का मूल कारण अहंकार है, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों ही नहीं, स्वयं को भी नष्ट कर सकता है। समाज अपनी बुराई को स्वीकार नहीं करता और खुद को अच्छा मानकर धोखे में जीता है। इसी अज्ञान से शोषण, युद्ध और अन्याय चलते रहते हैं। समाधान केवल आत्म-अवलोकन और भीतर की सच्चाई को ईमानदारी से देखने में है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…
तुम्हारे घर में कोई चीज़ अँधेरे में रखी थी, कोई आकर उस पर थोड़ी रोशनी डाल सकता है। उस पर थोड़ा प्रयोग करके बता सकता है कि ये चीज़ सड़ी हुई है। उसके आगे का काम तो तुम्हारी नीयत का है। उसको उठा के बाहर तुम्हें ही फेंकना पड़ेगा। नीयत, फ़ैसला, ईमानदारी, इनका कोई विकल्प नहीं होता। डूबे रहो इधर-उधर की चीज़ों में, वासना हो, डर हो। जिस दिन तुम जलोगे, उस दिन डर और वासना भी जल जाएँगे। कहानी कभी न कभी तो ख़त्म होनी है। या तो ख़ुद अभी ख़त्म कर लो, नहीं तो चिता पर ख़त्म हो जाएगी। मर्ज़ी है।
अपने आप को लग्ज़री देने से पहले मैं क्या पूछूँगा? क्या मेरा काम इस लायक है? बस। और जितना मेरे काम का स्तर बढ़ता जाएगा, उतना मैं अपने आप से कहता जाऊँगा, “हाँ, काम अब माँग रहा है एक नया मोबाइल फ़ोन। काम अब माँग रहा है लैपटॉप। काम माँग रहा है कि मैं ऐसी जगह पर न रहूँ जहाँ बहुत भीड़-भड़ाका हो, क्योंकि भीड़-भड़ाके में काम नहीं हो पाता।” तो मैं उस हिसाब से फिर काम की ख़ातिर, काम के सेवक की तरह, काम के साधन की तरह, काम के निमित्त की तरह, मैं अपने आप को फिर सुविधाएँ देती चलूँगी। उससे पहले नहीं।
ये घटना है जो आपको परेशान कर रही है। मैं चाहता हूँ कि आप सिद्धांत की ओर जाएँ, और ये आपको एक बहुत बेहतर और गहरे तरीके से सुरक्षित करेगा। एक बात ये है कि कोई आपको बताता है, “ओह, यूरेनियम की गेंदों के साथ मत खेलो, कुछ बुरा हो सकता है।” एक बात ये है कि आप सिद्धांत जानते हैं। आप ठीक-ठीक जानते हैं कि *क्रिटिकल मास,* गेंद का *रेडियस,* और ऐसी चीज़ें कैसे गणना की जाती हैं। आप क्या चाहेंगे? आप सिद्धांत के बारे में जानना चाहेंगे, है न?
तुम एक झूठी मान्यता में जीना चाहते हो कि इंसान बाय डिफॉल्ट होता तो अच्छा है, बस वो पावर उसको करप्ट कर देता है। पावर ने इंसान को नहीं करप्ट किया, इंसान पावर को करप्ट करता है। मौका देकर देखो, पूरी दुनिया की आबादी आ जाएगी एप्स्टीन फ़ाइल्स में। पर आप सारा दोष डाल दोगे व्यवस्थाओं पर, कुछ लोगों पर। बात उन व्यक्तियों की नहीं है। हमारी प्रजाति के मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट की है — अहंकार। उसी डिफेक्ट को ठीक करने के लिए जो होता है, उसको बोलते हैं अध्यात्म, आत्मज्ञान।
जो जितना ज़्यादा दूसरों की नज़रों में अपनी झूठी छवि बनाकर रखना चाहता है, उस पर तानों का उतना ज़्यादा असर होता है। अगर तानों से बचना है, तो दूसरों की नज़रों में अपनी छवि की परवाह करना छोड़ो। आपको इसलिए बुरा नहीं लगता कि किसी ने आपको कुछ ग़लत बोल दिया, आपको इसलिए बुरा लगता है कि जो सच आपने छुपा रखा था, उसने वह खोल दिया। इतने बेहतर हो जाओ कि छुपाने के लिए कम-से-कम रहे। और बेहतर होने के बाद भी जो कमज़ोरियाँ बची रहें, उनको उद्घाटित रखो, प्रकट रखो।