प्रश्नकर्ता: नमस्कारम आचार्य जी, पन्द्रह साल की उम्र है, पुरुषों के प्रति काफ़ी आकर्षित रहता हूँ। मुझे पता है कि समलैंगिकता एक विकार है। इस विकार का कैसे विगलन हो? कृपया इस पर मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: समलैंगिकता विकार है, ऐसा तुम्हीं कह रहे हो। इस विकार का समाधान, मैं ये नहीं बताऊँगा कि तुम विपरीत लिंगी की ओर आकर्षित होना शुरू कर दो। वो कोई बड़ी तरक़्क़ी नहीं हो जानी है कि पहले पुरुष पुरुष की ओर आकर्षित होता था, अब पुरुष स्त्री के पीछे भागने लगा है। देखो, इसने ज़िन्दगी में कितनी तरक़्क़ी कर ली। ये कोई तरक़्क़ी नहीं हो गयी।
हाँ, सामाजिक तौर पर अगर तुम ऐसा कोई परिवर्तन ले आ लोगे अपने अन्दर, तो ज़्यादा स्वीकृत हो जाओगे। लोग ज़रूर ऐसा कहना शुरू कर देंगे कि भई, पहले ग़लत काम कर रहा था, लड़कों के, आदमियों के पीछे भागता था, अब सही काम कर रहा है, अब लड़कियों के, औरतों के पीछे भागता है।
पर सच की नज़र से, अध्यात्म की दृष्टि से, ये कोई तरक़्क़ी हुई ही नहीं। कोई वास्तविक परिवर्तन हुआ ही नहीं। अभी भी पगलाए हुए हो और औरतों के पीछे भागोगे तो भी पगलाए हुए ही रहोगे।
तुम किसी के भी शरीर के पीछे भागना बन्द ही क्यों नहीं कर देते? समाज बहुत भेद करता है इस चीज़ में, वो भी कुछ समाज, सारे समाज नहीं भेद करेंगे। कुछ जगहों पर, कुछ देशों में, कुछ समाजों में समलैंगिकता इत्यादि को मान्यता प्राप्त है। वहाँ पर समलैंगिक लोग शादी-वादी भी कर लेते हैं। कोई रोकने-टोकने नहीं आता। हाँ, कुछ समाजों में समलैंगिकता को नीची नज़र से देखा जाता है, वगैहरा-वगैहरा, अप्राकृतिक माना जाता है, इत्यादि।
तो समाजों की दृष्टि में ये एक सुधार की बात होती है, तरक़्क़ी की बात होती है कि लड़का पहले




