लड़कियों की ज़िंदगी इसलिए है? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा प्रश्न महिलाओं से सम्बन्धित है, रेप (बलात्कार) से सम्बन्धित। तो अभी जैसे ये कानून में बदलाव हुआ है कि लड़कियों की उम्र अठारह से इक्कीस कर दी है शादी की। तो इसमें काफ़ी नेता और समाज के लोग भी ये कह रहे हैं कि इससे अब आने वाले समय में रेप के मामले ज़्यादा बढ़ जाएँगे। तो मैं इसपे थोड़ा स्पष्टीकरण चाहती हूँ और ये भी है कि मतलब ये पैट्रीआर्कल सोसायटी (पितृसत्तात्मक समाज) से महिलाएँ कैसे मुक्त हो सकती हैं? क्योंकि बोला जाता है कि फाइनेंशियल फ्रीडम के ज़रिए हो सकती हैं वो इससे मुक्त। पर जो लड़कियाँ आर्थिक रूप से आत्म निर्भर भी होती हैं, मैं उनको भी देखती हूँ, उनका भी बन्धन रहता है घर से, समाज से। कृपया इस बात पर।
आचार्य प्रशांत: ये बन्धन कभी किसी बाहर वाले से नहीं रहता। बन्धन हमेशा आन्तरिक ही होता है। और महिलाओं की मुक्ति हो या पुरुष की मुक्ति, आवश्यक है मनुष्य की मुक्ति। महिला जब तक अपनेआप को महिला मानकर मुक्ति की कोशिश करेगी, उसको मुक्ति मिल ही नहीं सकती क्योंकि महिला होना ही उसका बन्धन है। पुरुष जब तक अपनेआप को पुरुष मानकर मुक्ति की कोशिश करेगा, उसे मुक्ति मिल ही नहीं सकती क्योंकि पुरुष होना ही उसका बन्धन है। तो महिला मुक्ति, ये बात ही अपनेआप में एक पैराडॉक्स (विरोधाभास) है। इस बात में ही एक आन्तरिक विरोधाभास है।
मनुष्य की मुक्ति हो सकती है, महिला की नहीं हो सकती। मनुष्य की हो सकती है, पुरुष की नहीं हो सकती। आप अपनेआप को महिला मानते ही रहोगे तो कौनसी मुक्ति? मनुष्य की मुक्ति कैसे होती है? उसके बोध के बढ़ने से, उसकी कामनाओं के कम होने से, उसके विवेक के जगने से। महिलाओं की मुक्ति भी वैसी ही होगी।
महिलाओं और पुरुषों की मुक्ति के रास्ते कुछ अलग-अलग नहीं हैं। समझ रहे हो बात को? अगर एक व्यवस्था चल रही है समाज में, हमें ये कहने में बड़ी सुविधा रहती है कि पुरुष शोषक है और महिला शोषित है पर मैं फिर भी ये कहता हूँ, ‘आपकी मर्ज़ी के बिना आपका शोषण नहीं हो सकता।’ नहीं तो आप उस व्यवस्था में रुकेंगे ही नहीं, आप वहाँ से भाग जाएँगे। अगर इतनी बड़ी संख्या में महिलाएँ एक व्यवस्था में भागीदार बनी हुई हैं तो कहीं न कहीं, उनको या तो ये बता दिया गया है या उन्होंने सीख लिया है कि उस व्यवस्था में उनके लिए भी कुछ लाभ है। ये भावना ही बन्धन है। तुमने अभी कहा कि लड़कियाँ होती हैं जो कमा भी रही होती हैं, आर्थिक रूप से स्वतंत्र भी होती हैं लेकिन फिर भी वो बन्धन में होती हैं। क्या तुम्हें इसी बात से नहीं दिख जाता है कि बन्धन आन्तरिक हैं।



