प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, हाल ही में मैं एक न्यूज़ (ख़बर) पढ़ रहा था, जिसमें यूके इंग्लैंड के एक कोर्ट ने रुलिंग (निर्णय) दी है कि पुरूषों को — जो गंजे हैं — उनको गंजा कहना एक सेक्सुअल हेरासमेंट (यौन उत्पीड़न) के तौर पर लिया जाएगा।
और उसमे उन्होंने तर्क ये दिया है कि महिलाओं की अपेक्षा पुरूषों में जो गंजापन है, वो ज़्यादा होता है। तो उनको इस बात पर चिढ़ाना या उनको इस तरीके से कमैंट्स (टिप्पणी) करना, ये ऑफेंसिव (अपमानजनक) है।
तो ये न्यूज़ पढ़कर मैं काफ़ी चकित हुआ, क्योंकि बचपन में या काफ़ी बड़े होने के बाद भी, हम अपने यार-दोस्तों में या फिर जो भी हमारे जो क्लोज्ड वन्स (क़रीबी) हैं, उनसे ऐसा मज़ाक तो करते ही रहते हैं।
किसी को टकला बोल दिया या फिर मोटा बोल दिया, नाटा बोल दिया, मतलब उनके शरीर के किसी अंग को लेकर के थोड़ा-मज़ाक कर दिया।
तो मेरा सवाल इसमें ये है कि मज़ाक की एक सीमा कहाँ तक होनी चाहिए? एक हैल्दी जोक (स्वस्थ मज़ाक) क्या होना चाहिए और किसके बाद ये निर्धारित किया जा सकता है कि ये ऑफेंसिव हो जाता है?
कहाँ पर इसको ऑफेंस (अपराध) का नाम दिया जा सकता है? ये बॉउंड्री (सीमा) हम कहाँ तय करें?




