आचार्य प्रशांत:अगर मैं अपनी हस्ती में बस देह को कीमत दूँगा तो मुझे अपना नुक़सान भी सिर्फ़ कब दिखाई देगा? जब नुक़सान होगा शरीर का। तो मैं कहूँगा, 'अब कुछ नुक़सान हुआ है।' क्यों? क्योंकि मैं ख़ुद मूल्य, वैल्यू ही शरीर को देता हूँ। तो मैं शरीर के नुक़सान को नुक़सान मानता हूँ और अगर भीतर जो मन है मैं उसको मूल्य दूँगा तो फिर मैं उसकी सफ़ाई का भी ख़्याल रखूँगा न, कि नहीं?
हम आमतौर पर बाहर की हानि को और बाहर के ही लाभ को मूल्य देते हैं क्योंकि हम अपनेआप को भी बस जो बाहर-बाहर दिखाई देता है, उतना ही जानते हैं। तो उदाहरण के लिए कोई आपकी शर्ट गन्दी कर जाए, आप चिढ़ जाते हैं। कोई आपका मन गन्दा कर गया, आप कम चिढ़ते हैं या हो सकता है खुश हो जाते हों।
लेकिन जो लोग आपका मन गन्दा कर रहे हैं वो भी इतना तो लिहाज़ रखते ही हैं, इतनी सावधानी तो बरतते ही हैं कि वो कभी आपकी शर्ट नहीं गन्दी करते। उन्हें पता है कि मन गन्दा कर लो, ये कुछ नहीं बोलेगा, शर्ट गन्दी कर दी तो ये चिल्लाएगा और फिर मन गन्दा नहीं करने देगा।
जैसे-जैसे तुम अपनी ज़िन्दगी में देह से ज़्यादा मन को अहमियत देना शुरू करोगे, वैसे-वैसे उन लोगों की संगति से बहुत बचोगे जो मन ख़राब करते हैं। और जब तक तुम एक देह केंद्रित जीवन जी रहे हो जिसमें देह के ही सुखों की प्राथमिकता है, कि बढ़िया लज़ीज़ खाना मिल गया, ‘क्या बात है! क्या बात है!’ या, ‘वाह क्या जगह है, यहाँ घूमने को मिल जाए, क्या बात है, क्या बात है!’ या देह के और सुख मिल गये, सेक्स (सम्भोग) वगैरह। जबतक इन सब चीज़ों को तुम बहुत मूल्य देते हो — वैल्यू की बात है — जबतक इन चीज़ों को बहुत मूल्य देते हो, तब तक तुम बस जो ग्रॉस (स्थूल) फ़ायदे और ग्रॉस नुक़सान होंगे, उनको ही मूल्य दोगे। फिर तुम कहोगे कि ये चीज़ है, इस चीज़ को पाया तो बहुत कुछ मिलेगा। क्यों? क्योंकि चीज़ भी स्थूल है, हम भी स्थूल हैं। चीज़ों के लिए तुम जान लगाने को तैयार हो जाओगे। लेकिन जहाँ मन साफ़ होता हो, मन शुद्ध होता हो, उस जगह को तुम उतना वैल्यू नहीं दे पाओगे। तुम कहोगे, 'ये तो ठीक है, इसमें क्या रखा है।'




