प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं पिछले दो-तीन महीने से अध्यात्म में हूँ। थोड़े समय से बिलकुल सही चल रहा था, जब तक मन और बुद्धि पर काम हो रहा था तो ज़्यादा डर नहीं था, पिछले हफ़्ते कुछ ऐसा हुआ कि बहुत ज़्यादा डर लगने लगा। मैं जिनसे सीख रही हूँ, मैंने उनसे पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है, तो उन्होंने मुझे बताया कि ये अहम् है। इतने में एक स्वयंसेवक का फ़ोन आया और उन्होंने बोला कि तुम आचार्य जी से जाकर पूछो, वो तुम्हें अच्छे से समझा पाएँगे अहम् के बारे में। डर बहुत ज़्यादा लगता है, जैसे-जैसे आगे बढ़ रही हूँ वैसे-वैसे डर बहुत लग रहा है। तो मैं इस डर का क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: हमारे भीतर कुछ है, उसको बचाने के लिए डर ज़रूरी होता है। डर भीतर क्या बाहर भी है, इस शरीर में है। तो डर कोई ग़लत चीज़ तो हो ही नहीं गयी, (शरीर की ओर इशारा करते हुए) ये नहीं बचेगा अगर डर न हो।
डर का मतलब क्या होता है? ये भाव कि कुछ ख़तरे में है, कुछ छूट जाएगा, कुछ जो मिल सकता है नहीं मिलेगा, इस भाव को डर कहते हैं। तो ये भाव यूँही नहीं आ गया, ये भाव जो हमारी पूरी विकास प्रक्रिया रही है — जैसे हम पिछले करोड़ों सालों में नन्हें तंतुओं से बढ़कर के इतने बड़े-बड़े हो गये हैं न, और हम कहते हैं कि हमारा मस्तिष्क जो है वो अब बहुत विकसित हो गया है, ये सब चीज़ें। तो ये सब एक दिन में हुआ नहीं, एक बड़ी लम्बी यात्रा रही है, उस पूरी यात्रा में डर का बड़ा योगदान रहा है।
डर नहीं होता तो ये जितने भी जीव रहे हैं हमारी यात्रा में, या हमारी ही यात्रा में जो हमारी अलग-अलग स्थितियाँ रही हैं, अवस्थाएँ रही हैं, हम उनमें बच ही नहीं पाते। एक जंगली जानवर आपके पीछे पड़ता है, आपने देखा है आप कितनी ज़ोर से भागते हो? वो जो आपके भीतर भागने की ऊर्जा उठती है, वो कौन देता है आपको? यही भाव, कि भाग नहीं तो ख़त्म हो जाएगा; इसी को तो डर कहते हैं। तुम ख़त्म हो जाओगे, इसी भाव को कहते हैं डर, और ये भाव हमारे लिए उपयोगी रहा है आजतक। तो कुछ ग़लत नहीं हो गया अगर डर है; बात ये है कि डर किसको है।




