प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न ये है कि ज़िन्दगी में बड़ा-से-बड़ा दुख हुआ, मतलब जो सबसे प्रिय था वो भी चला गया, इसके बावजूद भी अहंकार नहीं टूटता। आत्मज्ञान में भी चल रही हूँ, लेकिन कहीं-न-कहीं लगता है देहभाव किसी भी तरह नहीं जाता है, कम ही नहीं होता है। मतलब कुछ भी ऊँचा करने की सोचती हूँ, तो मन में, मतलब केन्द्र में यही रहता है कि मैं कुछ प्रूफ़ (सिद्ध) करना चाहती हूँ अपनेआप को। तो इसको कैसे दूर करुँ?
आचार्य प्रशांत: ये दुख आया, कोई अपना था चला गया, देहभाव रहता है, ये सब है न?
प्र: जी।
आचार्य: ये हो सकता है रहने के लिए ही बने हों। हो सकता है प्रकृति ने हमारी रचना करी ही ऐसे हो कि ये रहें। तो हमें बस अधिक-से-अधिक ये जानने का अधिकार है कि ये रहता है। तो दुख है, दुख है और मैं जानती हूँ कि दुख है। इन दोनों में बड़ा अन्तर आ जाता है और एक होता है कि दुख है, दुख न रहे। जब आप कहते हैं कि दुख है तो उसके साथ में एक कामना आती है कि दुख?
प्र: न रहे।
आचार्य: दुख है। मैं जानती हूँ दुख है। ये उत्तर हो सकता है हमारा। दुख की स्थिति को उत्तर ‘सुख की कामना’ से नहीं दिया जा सकता। दुख कि स्थिति है उससे, उसको हमारा आमतौर पर उत्तर क्या होता है? ‘दुख हटे, सुख आये।’ यही रहता है न? हमारा जैसा निर्माण है, बड़ा सख़्त निर्माण होता है। ये मशीन ज़बरदस्त तरीक़े से हार्ड-वायर्ड (यंत्रस्थ) है। इसके क्रियाकलापों को बदल पाना आसान नहीं होता।


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