आचार्य प्रशांत: जिन्होंने शरीर के ही दम पर प्रसिद्धि पाई, जिनको शरीर के ही नाते जानते हो उन फ़िल्मी सितारों की जवानी की और बुढ़ापे की तस्वीरें देख लिया करो। देह क्या है स्पष्ट हो जाएगा। देहभाव से मुक्त होने का अच्छा तरीक़ा है। कोई रहे हों अपने ज़माने के फौलाद सिंह, गामा पहलवान, बलिष्ठ देह वाले, सुंदर चेहरे वाले, कोई ग्रीक हीरो, कोई कामदेव, उनकी बुढ़ापे की तस्वीर देख लो। कोई सुपरस्टार हों देख लो आजकल कैसे लगते हैं। सत्तर के दशक के किसी सुपरस्टार की आज तस्वीरें देख लो या उस ज़माने की कोई तारिका हों उनकी आज की तस्वीर देख लो। उनमें से बहुत सारी तो आजकल तस्वीरें खिंचवाती ही नहीं, लाज आती है।
जिसने ये देख लिया, देखने के बाद भी वो अपने-आपको शरीर कैसे कह सकता है? सुंदर-से-सुंदर भोजन खाते हो और उसका मल बना देते हो, ये है इस शरीर की फ़ितरत। तुम शरीर कहना चाहते हो अपने-आपको? और तब भी शरीरभाव ना छूट रहा हो तो जाकर भर्तहरि का पहले श्रृंगार शतकम् और फिर वैराग्य शतकम् पढ़ लो, पता चल जाएगा। उन्हें भी एक समय शरीर बड़ा प्रिय था, फिर दिल ऐसा टूटा कि सीधे वैराग्य पर आकर रुके। पहले कहते थे कि, "अरे सुंदर त्वचा, आकर्षक माँस, देह, उभार, नाभि इनसे आकर्षक क्या होता है।" फिर बोले, "अरे खाल, इस खाल से क्या चूमा-चाटी करनी। जिस खाल के ठीक नीचे मल, मवाद, पित्त, मूत्र, तमाम तरह के रज यही बैठे हुए हैं, बस वो दिख नहीं रहे हैं।"
बहुत पतली-सी चमड़ी की चादर है, उस चादर के पीछे छुपा हुआ है मल-मूत्र इसलिए दिख नहीं रहा है। क्या चाटे जाएँ उस चमड़ी को! चाटते वक़्त ख़्याल नहीं आएगा कि चमड़ी के ठीक पीछे क्या है। जिसको ये विचार आने लग गया वो कैसे देहभाव में जी लेगा बताओ? बड़ी बेईमानी चाहिए अपने-आपको देह कहने के लिए और किसी को तुम्हारी देह का पता हो ना हो, तुम्हें तो पता ही है। औरों से हम तो बहुत सारी चीज़ें छुपा जाते हैं। औरों के सामने आते हैं तो अपना आँख का कीचड़ पोंछ कर आते हैं, नाखून-वाखून काट लेंगे, गंदगी साफ़ कर लेंगे, भरी सभा में पाद भी मारेंगे तो थोड़ा छुप कर मारेंगे कि किसी को पता ना चले। लेकिन तुम्हें तो पता ही है न कि अभी-अभी तुमने कितनी बदबू फैलाई? तुम्हें तो अपनी देह की औकात और असलियत पता है न। औरों से छुपा लो, तुम्हें नहीं पता है क्या?
उसके बाद भी यही — मैं तो देह हूँ, मैं तो देह हूँ। बड़ी बेईमानी की बात है न। दूसरों को रिझाने जा रहे हो देह दिखा कर और जिसको रिझाने जा रहे हो उससे मिलने के ठीक पहले गरर-गरर-गरर-गरर माउथ फ्रेशनर किया है। तुम जानते हो न कि तुम्हारे मुँह से कितनी बदबू उठती है, सभी के मुँह से उठती है और फिर भी तुम मुँह में नकली खुशबू बसा रहे हो। ये तुम दूसरे को धोखा दे रहे हो या अपने-आपको दे रहे हो? और फिर ऐसे ही रिश्ते टूटते हैं, बड़ी निराशा आती है, झटका लग जाता है। शुरू-शुरू में तो दाँत चमका कर और कुल्ला मंजन कर के और गलिस्टरिंग डाल कर पहुँचते थे। फिर जब रिश्ता जम गया तो एकदिन ऐसे ही पहुँच गए — प्याज़ का डोसा खा कर और बोले, "प्रियतमा चुम्बन!" ये प्रियतमा अगर उस क्षण के बाद भी देहभाव में जिये तो ये नर्क की अधिकारी है। इसका पूरा हक़ है कि इसको नर्क ही मिले। जिसे जगना होगा, जिसे चेतना होगा, वो उस क्षण में जग जाएगी कहेगी "ये है असलियत। पान खाएँ सईयाँ हमार।"




