किसी बड़ी जीत के बाद मन करता है कि अब बस, जो पाने लायक था, पा लिया, अब सब कुछ ऐसा ही बना रहे। पर रुकने की यह चाह उस पहचान से उठती है जो जीत के साथ हमने ओढ़ ली है और जिसे हम बचाए रखना चाहते हैं। जीवन में कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है, और चलती राह पर जो रुक जाता है, वह घिसने लगता है। पिछली चुनौती जीती ही इसलिए जाती है कि उससे बड़ी उठाई जा सके। क्या हम देख पाएँगे कि सेटल होने की चाह में हम असल में क्या बचा रहे हैं?
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श्रोता: कितना समय हो गया है आपको आचार्य से जुड़े हुए?
प्रश्नकर्ता: अगर आप समय देखो तो एक साल अराउंड, एक साल से अबव, जब से हमने कॉमनवेल्थ की स्ट्रैटेजी स्टार्ट की, एशिया गेम्स में। कल सेशन अटेंड करने के बाद चीज़ें चेंज हो गईं, मैं मानूँगा। सर, नमस्कार। मेरा नाम उत्तम रावत है, सर। प्रोफ़ेशनली आई एम अ पावरलिफ़्टर फ़्रॉम इंडियन टीम, और अभी रिसेंटली, सर, मैं कॉमनवेल्थ खेल कर आया हूँ, विद टू मेडल्स, सिल्वर एंड गोल्ड। [तालियाँ] अगर आप मेरी एज गेस कर पाएँ, तो बताइए, कितनी होगी? [हँसने की आवाज़] बताइए, सर।
आचार्य प्रशांत: बताइए भाई आप लोग। बताइए, बताइए उम्र बताइए आपकी।




