कोई खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीतकर लौटती है, और बधाई के साथ ही सवाल आता है कि खुशखबरी कब दोगी। उम्र का पैमाना और परिवार की अपेक्षा मिलकर उसकी पूरी मेहनत को एक देह की भूमिका तक सीमित कर देते हैं। पर सफलता केवल वह नहीं जिसे दूसरे गिन सकें। जब हम स्वयं को देह भर मान लेते हैं, तो हमारे विचार, लहजा और अपनी छवि तक उसी में बँध जाते हैं। इंसान बनकर जीना और किसी के हाथों न बिकना अपने आप में बड़ी और बिरली सफलता है। हमारे लिए असली खुशखबरी क्या है?
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सुचिका तरियाल ने एशियाई खेल 2026 में मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स (एम.एम.ए.) में भारत के लिए कांस्य पदक जीता, जो इन खेलों में एम.एम.ए. में भारत का पहला पदक है। यह प्रश्न एक लाइव सत्र में आचार्य जी से सुचिका तरियाल के पति ने पूछा था।
प्रश्नकर्ता: उम्र का भी एक पैमाना रखा हुआ है लोगों ने। जैसे अब सुचिका मेडल जीतकर भी आई तो लोगों ने मेडल की बधाई के साथ-साथ इनसे पूछा कि अच्छा अब खुशखबरी (बच्चा) कब दे रही हो? फ़ैमिली की खुशखबरी भी सबसे बड़ी है। वो लोग इस चीज़ को कम मान रहे थे।
आचार्य प्रशांत: कौन से लोग हैं जिन्हें मेडल की खुशखबरी काफ़ी नहीं पड़ रही? पहले तो हमारे बहुत मेडल आते नहीं। ठीक है। चीन हमारी ही जनसंख्या का देश है। हमारे आज शाम तक भी 15 गोल्ड थे और चीन के कितने? 150–200 गोल्ड उनके। अगर कुल मेडल्स में भी देखें तो चीन के कुल मेडल भी हमसे कुछ चार-पाँच गुना हैं। मेडल वैसे नहीं आते। और जो एथलीट आपके लिए मेडल




