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वासना का शिकार पड़ोसी || आचार्य प्रशांत के नीम लड्डू
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरे मन में जो है सेक्स से रिलेटेड (सम्बन्धित) बहुत थॉट्स (विचार) आते हैं तो कैसे कम करे या कंट्रोल (नियन्त्रित) कर सकते हैं?

आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी यूँही छोटी है, उसमें किसी ऐसे काम के लिए तुम समय कहाँ से निकाल रहे हो जो तुमको पता है कि थोड़ी देर की उत्तेजना के अलावा तुम्हें कुछ नहीं देगा? समय यूँही कम है तुम्हारे पास उसमें से भी समय तुमने समय थोड़ी देर के मसाले को दे दिया, अब क्या होगा? समय और कम बचेगा न! सेक्स में कोई बुराई नहीं थी अगर उससे तुमको मुक्ति मिल जाती, मैं सेक्स के माध्यम से..कह रहा हूँ अगर सेक्स के माध्यम से तुमको तुम्हारे दुखों से तुम्हारे बन्धनों से मुक्ति मिलती होती तो मैं कहता तुम सेक्स के अलावा कुछ करो ही मत! तुम दिन-रात अपनी वासना को ही पूरे करने में मग्न रहो, लेकिन ऐसा होता है क्या?

अरे! सब यहाँ व्यस्क बैठे हैं, प्रौढ़ हैं, चढ़ी उम्र के लोग हैं, सब अनुभवी हैं, कुछ बोलिए! ऐसा होता है? कि तुम जो यौन कृत्य होता है उसमें पचास बार संलग्न हो जाओ, कि पाँच सौ बार, कि पाँच हज़ार बार; ऐसा होता है कि अब अन्त आ गया? अब इसके बाद किसी उत्तेजना की कोई आवश्यकता नहीं, पार पहुंच गये, ऐसा होता है? या ऐसा होता है कि जो अधूरापन पहली बार था, जो अधूरापन बीसवीं बार, था जो अधूरापन दो सौवीं बार था, वहीं अधूरापन...

तो कभी न कभी तो तुम्हें ईमानदारी से इस निश्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा न कि “भई, यहाँ बात बन नहीं रही है! इस दुकान का माल खरा नहीं है, बहुत आजमा लिया यहाँ!” या तो तुम नये-नवेले बिलकुल छैल छबीले होते, पंद्रह की उम्र के और तुम कहते कि “साहब, हमने दुनिया का कुछ अनुभव लिया नहीं हम बिना जाने किसी चीज़ का त्याग कैसे कर दें?”, उतने छोटे तो हो नहीं।

दुनिया को भी देख लिया, तमाम तरह की इच्छाओं में लिप्त होकर देख लिया वहाँ चैन मिल जाता हो तो चले जाओ। उधर चैन न मिलता हो ये जानते हुए भी उधर जा रहे हो तो स्वयं को ही धोखा दे रहे हो, फिर तुम्हारा कौन भला कर सकता है?

सही काम करने के लिए भी जीवन बहुत छोटा है तो व्यर्थ काम करने के लिए तुमने समय कहाँ से निकाला? चोरी करी न? जो समय जानना चाहिए था किसी सार्थक दिशा में उसको तुमने लगा दिया वासना की सेवा में! चोरी करी कि नहीं करी? तो जो लोग इस तरह के उपद्रवों से परेशान हो कि वासना सताती है, गुस्सा सताता है, लालच या कुछ भी, कोई नशा सताता है, उनके लिए समाधान सिर्फ़ एक है; अपने जीवन को, अपने समय को अपनी ऊर्जा को, अपने दोनों हाथों को, अपने सारे संसाधनों को पूरे तरीके से झोंक दो किसी सच्चे उद्यम में, उसके अलावा कोई तरीका नहीं।

तुम्हारे शरीर की निर्मित्ती ही ऐसी है कि वासना इसको सताएगी, वासना के बीज इसी में मौजूद है, तुम सिर्फ़ ये कर सकते हो कि जब वासना सताए तो तुम उससे बोलो “ओ स्त्री, कल आना!”, क्या करना? कल आना।

पिक्चर ने बताया था वो कहानी भी मध्य प्रदेश के ही किसी गाँव की थी,‘ओ स्त्री कल आना’। तुम उसे यह नहीं कह सकते कि मत आना क्योंकि लौट कर तो वो आएगी, क्यों आएगी लौट कर? क्योंकि वो तुम्हारी देह में ही निवास करती है शरीर की एक-एक कोशिका आत्म संरक्षण के लिए तत्पर है। उसे न सिर्फ़ अपनेआप को बचाना है बल्क़ि अपनेआप को बढ़ाना है, संरक्षण ही नहीं करना है संवर्धन भी करना है। एक कोशिका कहती हैं मैं कई गुनी हो जाऊँ, यही तो वासना है, और क्या? जब वासना आये तुम कहो “मैं अभी व्यस्त हूँ, वासना कल आना!” और कहाँ व्यस्त हो तुम? तुम किसी महत प्रयोजन में समर्पित हो, तुम कोई ऊँचा काम कर रहे हो, तुम कोई मीठा काम कर रहे हो, तुम कोई ऐसा काम कर रहे हो कि तुम्हें फुरसत नहीं। किसी भी तरह के आवेग का झोंका आया तुमने अनुभव किया लेकिन तुमने उससे कहा थोड़ी देर बाद, अभी हम कुछ ऐसा कर रहे हैं जो छोड़ा नहीं जा सकता, बेशकीमती है।

‘देखो माफ़ करना, अभी हम मन्दिर में है पूजा से उठ नहीं पाएँगे’, ‘देखो माफ़ करना, अभी हम किसी ऊँचे भवन का निर्माण कर रहे हैं, काम से उठ नहीं पाएँगे थोड़ी देर में आना न!’ और तुम कहोगे थोड़ी देर में आना, वो थोड़ी देर में लौट कर आएगी! जब वो लौट कर आये तुम्हें पुनः व्यस्त पाये और तुम उससे फिर कहो “ओ स्त्री, कल आना!”, और कोई तरीका नहीं है।

शब्द समझो वासना, कभी तुमने पूछा नहीं वासना तो ठीक है वास कहाँ करती है? जो तुम में वास करे सो वासना, जिसका तुम में वास हो सो वासना। उसकी हत्या नहीं कर सकते तुम क्योंकि उसमें और तुममें कोई भेद नहीं है, तुम्हारे ही शरीर का नाम है वासना, तुम्हारा शरीर कामवासना का उत्पाद है और तुम्हारा शरीर लगातार अपनी सुरक्षा हेतु और अपने प्रसार हेतु तत्पर है, आतुर है इसी का नाम कामवासना है।

शरीर की अपनी कुछ माँगे हैं, शरीर के अपने ढर्रे हैं, शरीर के अपने इरादे हैं; तुम शरीर से ज़रा भिन्न हो अजितेश! तुम्हारा इरादा कुछ और है, शरीर का इरादा कुछ और है।

तुम हो एक अधूरी अहम् वृत्ति जो अपने होने से परेशान है, जो मिट जाना चाहती है। शरीर है प्रकृति का यन्त्र और प्रकृति का उत्पाद जो अपने होने को बचाए रखना चाहता है, तुम देख रहे हो तुम दोनों के इरादों में कितना फ़र्क है? शरीर की हसरत है बचा रहूँ और तुम्हारी गहरी हसरत है मिट जाऊँ, अब बात कैसे बनेगी? कैसे बनेगी बोलो? अब बताओ तुम्हें किसकी हसरत पूरी करनी है, अपनी या शरीर की? जल्दी बोलो! तुम और शरीर एक नहीं है हालांकि तुमने उससे नाता बहुत गहरा जोड़ लिया है पर फिर भी दोनों अलग-अलग हो, दोनों की दिशाओं में बड़ा अन्तर है।

और जो बात मैं कह रहा हूँ वो समझने के लिए बहुत गहरा अध्यात्म नहीं चाहिए, बचपन से ही तुम्हारा अनुभव रहा है, तुम पढ़ने बैठते तो तुम्हें नीन्द आ जाती थी, देख नहीं रहे अन्तर निश्चित रूप से? शरीर अपनी ही चलाता है, कोई है तुम्हारे भीतर जो कह रहा है ‘पढ़ाई करो!’ और शरीर कह रहा है “मुझे तो सोना है!”, जिन्होंने व्रत उपवास रखे हों वो खुली बात जानते होंगे।

एक ओर कोई चेतना है जो कह रही है आज निराहार रहना है और दूसरी ओर शरीर है जो कह रहा है कुछ खा ही लें, देख नहीं रहे और शरीर के इरादे हमेशा दूसरे होते हैं? और कितनी ही बार तुमने गलत पक्ष का समर्थन किया है, कितनी ही बार तुमने शरीर को जिताया है। कितनी ही बार हुआ है न कि तुमने व्रत-उपवास में भी धान्धली कर दी है? चलो ख़ुद नहीं करी तो किसी को करते देखा होगा? कि गए एक लड्डू, थोड़ा-सा पानी, ‘शरीर 70 प्रतिशत जल ही तो है, थोड़ा-सा पी लिया तो अधर्म थोड़े ही हो गया!’

सुबह ट्रेन पकड़नी है और शरीर कह रहा है रजाई से प्यारा कुछ होता नहीं, कौन बाहर निकले? ये सब देखा है या नहीं देखा है? देख नहीं रहे हो कि शरीर को इस बात से कोई मतलब ही नहीं कि तुम ट्रेन पकड़ो या न पकड़ो, उसको मतलब बस एक बात से है, आराम मिलना चाहिए!

आराम माने सुरक्षा, मस्त पड़े हुए हैं, कौन ठंड में बाहर निकले, दौड़ लगाए, प्लेटफार्म तक जाये, कौन ये सब झंझट करे? इसको आराम दे दो, इसको रोटी दे दो और इसको सेक्स दे दो, इसके अलावा इसे कुछ चाहिए नहीं और; न इसको ज्ञान चाहिए, न इसे मुक्ति चाहिए, न इसे भक्ति चाहिए, अब बताओ ऐसे का साथ देना है?

कोई तुम्हारे पड़ोस में रहता हो जिसको न ज्ञान चाहिए, न भक्त चाहिए, न मुक्ति चाहिए, उसका साथ दोगे? तुम्हारे पड़ोस में कोई आ गया है उसको सिर्फ़ खाना है, सोना है और मैथुन करना है, इन तीन के अलावा उसे कुछ करना ही नहीं, उसका साथ दोगे? उससे दोस्ती रखोगे? इसी पड़ोसी का नाम है शरीर।

अब क्या करो तुम वो आ गया पड़ोस में, तो कुछ तो उससे नाता बन ही गया है, पर जितना कम नाता रखो उतना अच्छा। शरीर को पड़ोसी की तरह ही रखो, ज़रा दूरी बना के, सर पर मत चढ़ा लो उसको!

अब तुम कुछ काम कर रहे हो, ये पड़ोसी आ गया घंटी मार रहा है, घुसना चाहता है क्या जवाब देना है? “ओ पड़ोसी कल आना!..ओ पड़ोसी? कल आना”, वो कल फिर आएगा क्योंकि बसा तो वो पड़ोस में ही है।

मानव जन्म लिया है तुमने तो ये दुर्भाग्य है तुम्हारा कि शरीर हमेशा अगल-बगल ही रहेगा पर उसे पड़ोसी ही रहने देना, उसे घर का सदस्य मत बना लेना। शरीर की अपनी वृत्तियाँ हैं चूंकि उसे सुरक्षा चाहिए इसीलिए उसमें मालकियत की बड़ी माँग रहती है। ये जो तुममें ईर्ष्या आदि उठते हैं इनको भी मानसिक मत समझ लेना, ये भी करतूतें शरीर की ही हैं! जिसको तुम मन कहते हो वो भी शरीर से अलग नहीं हैं। मन भी शरीर के रोएँ-रोएँ में वास करता है;

भ्रम, तुलना, हिंसा ये सब किसी बच्चे को सीखने नहीं पड़ते, ये उसके शरीर में ही निहित होते हैं इसीलिए पशुओं में भी पायें जाते हैं। तुम्हारा मस्तिष्क ही नहीं, तुम्हारे सर के बाल भी ईर्ष्या में पगे हुए हैं! ये सब भावनाएँ हैं, ये सब वृत्तियाँ जिस्मानी हैं, इन सबको यही कहना है “ओ ईर्ष्या कल आना!”, ‘ओ मोह, ओ क्रोध’, यही तो चीज़ें हैं जो हमें जानवरों से जोड़ती हैं। जानवरों को भी क्रोध आता है, जानवरों को भी मोह रहता है, जानवरों को भी ममता रहती है। हाँ, जानवरों को बोध नहीं! रहता जिस्म का बोध से कोई लेना-देना नहीं।

प्र: लेकिन रोज़ शरीर जीते ही जा रहा है

आचार्य: तुम जिता रहे हो, वो नहीं जीतेगा! वो अधिक-से-अधिक तुम्हारे दरवाज़े पर घंटी बजा सकता है; ये तुम्हारा निर्णय होता है कि तुम दरवाज़ा खोल दो और आगन्तुक को भीतर स्थान दे दो नहीं तो ये भी हो सकता है कि दरवाज़े की झिर्री से तुम उससे कहो ‘कल आना’।

ये मत कहो शरीर जीत रहा है, ये कहो कि तुम रस ले रहे हो शरीर को जिताने में! स्त्री भी बस पीछे से आवाज़ देती थी, मुड़ के देखोगे या नहीं देखोगे, ये तुम तय करते थे।

अब बताने वाले तुमको बता गये थे कि बचने का तरीका है, जब आवाज़ दे मुड़ के देखना मत पर वो आवाज़ में ही कुछ ऐसी मिठास, कुछ ऐसी कशिश होती है कि मुड़ ही जाते हो। और उसके बाद न जाने कहाँ नंग-धडंग कैद में पड़े हुए हो। याद है न कहानी? आवाज़ आई नहीं कि मुड़ के देख लिया तुरन्त! ये नहीं कि अपना काम करो।

अब एक बात बताओ, कोई है जिससे वास्तविक प्रेम है तुम्हें और उसकी तरफ़ चले जा रहे हो तुम, दौड़े जा रहे हो तुम और पीछे से तभी तुम्हें आवाज़ आती है ‘अजिते...श’ मुड़ के देखोगे क्या? यही तो मैं तब से समझा रहा हूँ। ये जो स्त्री है जिसका नाम देह है, इसके चक्कर में पड़ते ही वही हैं जिनके पास जीवन में कोई सार्थक काम, कोई सार्थक लक्ष्य नहीं होता; तुम्हारे जीवन में वास्तविक प्रेम हो तो वो बुलाती रहे पीछे से, तुम मुड़ के नहीं देखोगे! यही बात तुम्हें परेश ने समझाई, तुम्हें समय कहाँ से मिला?

तुम लगे हुए हो किसी सार्थक उद्यम में, वो देती रहेगी पीछे से आवाज़ तुम्हें सुनाई ही नहीं पड़ेगी, तुम्हें पता है तुम्हें किस दिशा जाना है, तुम मुड़के ही नहीं देखोगे। मुड़ कर वही देखते हैं जो यूँ ही टहल रहे होते हैं, जो पेड़ से टूटे हुए पत्ते होते हैं जिनका न ठौर न ठिकाना जो कहीं के नहीं हैं, जिनको हवा जिधर को ले जाये बस ले ही जाये वो मुड़ के देख लेंगे!

कोई भी कीमती काम सोच लो, चलो चाहे यही सोच लो कि कोई प्रियजन अस्पताल में भरती हैं और तुम उसको देखने के लिए दौड़े जा रहे हो और पीछे से आवाज़ आती है ‘अजितेश..’, तुम रुकोगे क्या? तुम्हारे पास दवाइयाँ हैं, बहुत आवश्यक है कि अभी जो तुम कर रहे हो उसको पूरा करो, तुम रुकोगे? नहीं रुकोगे!

कौन है जो रुक जाता है? कौन है जो उस पड़ोसी की, जो वासना की आवाज़ पर मुड़कर पीछे देखता है? वही जो व्यर्थ टहल रहा है, मटरगश्ती कर रहा है! व्यर्थ मत टहलो, मटर गश्ती मत करो, जीवन के पल पल को ऊँचे-से-ऊँचे काम से आपूरित रखो, भरा हुआ, खाली हो ही नहीं तुम! जो खाली होगा वो फँसेगा!

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