
प्रश्नकर्ता: मेरा एक सवाल आपसे है आचार्य जी कि आज कि समय में कौन असली हिन्दू है? उसके बारे में आप मुझे ज़रा बताइए। किसको मैं असली हिन्दू बोलूँ?
आचार्य प्रशांत: जो मुक्ति मात्र को जीवन का लक्ष्य बनाता है, वेदान्त में दीक्षित है वो हिन्दू है। उनके अलावा जो…



श्रीकृष्ण, श्रीराम और अन्य अवतारों को केवल उनके मानवीय जीवन से समझना भ्रम पैदा करता है। साकार रूप सीमित होता है, जबकि उसका उद्देश्य मनुष्य को निराकार सत्य की ओर ले जाना है। देह, परिवार या घटनाओं में कमियाँ खोजने के बजाय उनके संदेश का सार समझना आवश्यक है। विवेक, कृतज्ञता और सही दृष्टि ही आध्यात्मिक समझ का आधार हैं, जबकि हर बात में दोष ढूँढ़ना केवल अहंकार को पोषित करता है।

सोमवारी और काँवड़ यात्रा का बाहरी आयोजन तभी सार्थक है जब उसका संबंध शिवत्व और सत्य से हो। केवल भीड़, दिखावे, मांसाहार छोड़ने की औपचारिकता या पुत्र की कामना को धर्म मान लेना वास्तविक धर्म नहीं है। काँवड़ियों को दोष देने के बजाय उस सामूहिक मानसिकता को देखना चाहिए जो ऐसे कर्मों को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य लोकधर्म की रूढ़ियों को बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेक और समझ के द्वारा उनसे मुक्त करना है।
धर्म का अर्थ अंधविश्वास या मान्यताओं को मान लेना नहीं, बल्कि निर्भीक जिज्ञासा और सत्य की खोज है। बच्चों पर धार्मिक नियम थोपने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। भय, शर्म और अपराधबोध पर आधारित धार्मिक संस्कार व्यक्ति को सत्य से दूर और देह-केंद्रित बना देते हैं। सच्चा धर्म हर मान्यता की निष्पक्ष जाँच, तथ्य के प्रति ईमानदारी और आंतरिक स्वतंत्रता का नाम है। प्रश्नचिह्न ही धार्मिकता का सबसे बड़ा प्रतीक है।
आप आस्था खोज रहे हैं, पर क्या आस्था कभी ज़बरदस्ती पैदा होती है? आस्था फूल है, जो सही बीज, सही मिट्टी और सही संगति मिलने पर अपने आप खिलती है। शुरुआत श्रद्धा से नहीं, जिज्ञासा से होती है। सम्मान से नहीं, संदेह से होती है। परखिए, पूछिए, प्रयोग करिए। जहाँ वास्तविक लाभ होगा, वहाँ आस्था अपने आप जन्म लेगी, बनावटी नहीं।

आस्था और ज़िम्मेदारी अलग नहीं हैं; सच्ची आस्था खुद ज़िम्मेदारी बन जाती है। धर्म के नाम पर प्रकृति का नुकसान और अंधविश्वास, धर्म नहीं बल्कि अज्ञान है। वास्तविक धर्म समझ और सत्य पर आधारित है, न कि परंपराओं की अंधी नकल पर। अंधविश्वास पर प्रश्न उठाना धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उसे बचाने का काम है।

आचार्य प्रशांत कलिंग में युवाओं से संवाद करते हैं। वे कहते हैं कि दर्शन सत्य की खोज है, जो आत्म-अनुसंधान से शुरू होती है। परंपरा सदा से चली आ रही है, बस रूप बदल गया है। विकृत धर्म बाजार बन गया है। युवाओं को अपनी बीमारी पहचानी चाहिए। सोशल मीडिया एल्गोरिदम मन को नियंत्रित कर रहा है। सच्चा शिक्षक वह है जो आपकी झूठी धारणाओं को चुनौती दे।

समसामयिक हिन्दू धर्म पुराणों, स्मृति ग्रंथ और स्थानीय क़िस्म की परंपराओं पर चल रहा है। वो हिन्दू धर्म है ही नहीं। हिन्दू धर्म से अगर हमारा आशय है वेदों के दर्शन पर आधारित धर्म, तो हिन्दू धर्म न अगड़ा है, न पिछड़ा है; हिन्दू धर्म एकमात्र धर्म है। धर्म तो एक ही है, ये जो दुख में बैठा हुआ है, इसका दुख दूर करना। बाक़ी सब कुछ किसी धर्म, पंथ, मज़हब में हो रहा हो, वो सब अंधविश्वास है। हिन्दू धर्म कहता है, “वो है कौन जो दुःखी है? प्रश्न करो, और प्रश्न का जवाब परंपरा नहीं, प्रयोग देगा।”

अब लोकधर्म में क्या हो गया है कि ईश्वरवादिता को ही आस्तिकता मान लिया गया है। पर ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है, आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है। सही बात तो ये है कि ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। क्योंकि सत्य को समर्पित नहीं हैं वो। आस्तिक वो है, जो सत्य को समर्पित हो।

गीता की ब्रांडिंग एक लोकधार्मिक बुक के रूप में हो गई है। तो ये जो जेन-ज़ी है, जब लोकधर्म को ठुकराती है, तो लोकधर्म के साथ-साथ गीता को भी ठुकरा देती है। थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथ-वॉटर। तो उनके लिए गीता, पुराण सब एक है। और जो चलती है, रावण संहिता उनके लिए वो सब एक है।

ये जो तुम आसमानों में ईश्वर बैठा देते हो, ये बस तुम्हारा एक बहुत बचकाना प्रयास है, सत्य को भी ऑब्जेक्टिफ़ाई करने का। किन्हीं आसमानों में तुमसे दूर कोई नहीं बैठा हुआ है। बाहर कोई नहीं ताक़त है जो तुम्हारी ज़िंदगी चला रही है। “तत्त्वमसि,” वो तुम हो, वो तुम्हारा ऑब्जेक्ट नहीं है। इसीलिए उस “तत्” को और “आत्म” को अभिन्न भी कहा गया। तुम्हारी सच्चाई और परम सत्य एक है।

मैं हूँ और यह दुनिया है, तो सबको यह सवाल उठेगा कि, “डज़ गॉड एग्ज़िस्ट?” अब इसमें तुमने सवाल लगाया है ‘गॉड’ पर। यह छोड़ो कि गॉड माने क्या, पहले बताओ ‘एग्ज़िस्टेन्स’ माने क्या? इसलिए फ़िलॉसफ़ी ज़रूरी है। उसके बिना ये सारी जो बहसें हैं, ये बस ऐसे ही हैं, बेकार की बात, दोनों तरफ़ से। आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है, ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है। आस्तिक होने का अर्थ है, सत्य को समर्पण। मेरी निष्ठा सत्य के प्रति है। तुम अगर गॉड, गॉड करोगे भी, तो मैं कहूँगा, सत्य ही गॉड है।

आम आदमी को भले ही कम चोट लगती हो, आप धार्मिक आदमी को कहोगे, उसे खट से चोट लगती है। अभी यहाँ कोई बैठा हो बहुत धार्मिक आदमी, वह भीतर से छलनी हुआ जा रहा होगा, “क्या बोल रहे हैं! महापाप!” तुमने अनंत को इतनी छोटी चीज़ क्यों बना दिया कि कोई उसको घाव दे सके, बताओ न। आकाश पर चोट लग सकती है? मारो गोली, आकाश को लगेगी चोट? थूको आकाश पर, आकाश गंदा हो जाएगा? सत्य तो आकाश है, जिसमें घुला जा सकता है उसमें लीन हुआ जा सकता है।

डॉक्टर अंबेडकर मृत्यु की रात को भी क्या कर रहे थे? वह धर्म पर ही किताब लिख रहे थे, और उन्हें बड़ी हड़बड़ी थी कि इसको पूरा कर दें। तबीयत बहुत ख़राब थी, दिख रहा था कि जाने वाले हैं। उनकी मृत्यु के बाद वह किताब प्रकाशित हुई, ‘The Buddha and His Dhamma.’ वह कोई पॉलिटिकल या इकोनॉमिक्स की किताब नहीं लिख रहे थे। वह धर्म पर लिख रहे थे। जो भारतीय दर्शन रहा है, उसकी सारी खूबियाँ बौद्ध धर्म में ज़बरदस्त तरीके से मौजूद हैं। बौद्ध धर्म तो पूरा ही जिज्ञासा का धर्म है, रूढ़ियों के लिए वहाँ एकदम ही कोई जगह नहीं है।

धर्म तो सबसे ऊँची बात होनी चाहिए न? तो धर्म के नाम पर ऐसे काम क्यों कर रहे हो, जो एक छोटे बच्चे को भी दिख रहा है कि गलत है? और सबसे खौफ़नाक बात ये है, कि हमारे बच्चों को धीरे-धीरे झटका लगना बंद हो जाता है। वो इसी माहौल के हो जाते हैं, रच-बस जाते हैं। ज़िंदगी हिसाब करेगी, जवाब माँगेगी और तब लज्जित होने के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

जो बाहर रहता है ना भगवान, जो आँखों से दिखाई देता है, जिसको तुम कहते हो, ‘यह जगह है, ये ऐसा-ऐसा;’ वो तो तुम्हारा भगवान है। तुम उस पर अपने सब पसंद–नापसंद आरोपित कर देते हो। उसकी सारी कहानियाँ तुम अपनी सुविधा के हिसाब से बना लेते हो। "हरि मरें तो हम मरें, और हमरी मरे बलाय। साँचे गुरु का बालका, मरे ना मारा जाय, कबीरा।।” यहाँ दिल में बैठा लिया है, यहाँ वाला जो भगवान होता है, वो राजा होता है। उसको तुम अपने हिसाब से नहीं चला सकते। तुम्हें उसके हिसाब से चलना होता है।

प्यार होना चाहिए न। बात सारी उस ज़िंदगी की है, जिसके दिल में प्यार धड़क रहा हो। मैं साधारण प्यार की बात कर रहा हूँ, अभी मान लीजिए आदमी–औरत वाले ही प्यार की। आपको प्रेम है किसी से, पंद्रह लोग आकर कह रहे हैं, “इसको हमारे हवाले कर दो।” छोड़ोगे क्या? मैं बताता हूँ, छोड़ देते हो, क्योंकि अपनी ज़िंदगी में तुम अपने दम पर, अपने पुरुषार्थ पर, एक लड़की को भी नहीं रख सकते, तो भगवान को कैसे रखोगे? जैसे अपना प्यार समाज के सुपुर्द कर देते हो न, वैसे ही फिर अपना भगवान भी समाज के सुपुर्द कर देते हो।

प्रश्न: ‘भगवान’ क्या हैं?
वक्ता: इसका जवाब देना बहुत आसान हो जाता अगर तुमको वाकई पता ही ना होता, अगर पहले ये शब्द कभी सुन ही न रखा होता। अगर कोई बिल्कुल साफ़ स्लेट के साथ ये सवाल पूछे, ‘भगवान का क्या मतलब है?’ तो इसका जवाब देना…

मेरे घर का मंदिर साफ़ रहेगा, बाकी मंदिर गंदे हैं तो रहें। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मैं जाकर अपने उद्धार के लिए गंगा में डुबकी मार रहा हूँ और गंगा को गंदा कर रहा हूँ? दुनिया में किसी देश में इतनी गंदी नदियाँ आपको नहीं मिलेंगी। वाराणसी शायद दुनिया का सबसे पुराना नगर है, भोले बाबा की नगरी है, और जाकर देखो गंदगी। ख़ुद साफ़-स्वच्छ होकर रहे आना धर्म नहीं होता। ‘तुझे साफ़ करने की ख़ातिर मुझे ख़ुद मैला होना स्वीकार है,’ यह धर्म होता है।

The spirit of question. दो लोगों का साथ बैठ के कोशिश करना कि हम समझें कि दुनिया क्या है? ज़िंदगी क्या है? हम कहाँ कैसे सोच रहे होते हैं? हमारी ड्रीम्स कहाँ से आती हैं? डेथ क्या है? लाइफ़ क्या है? लव क्या है? When you go into these questions and not just once, but continuously, you are continuously observing life — वो ट्रू रिलिजन है। उसमें जादू, ये कहानी, वो कहानी इन सब के लिए कोई जगह नहीं होती। नो मिरेकल, नो सुपरस्टिशन, बट डीप डीप ऑनेस्टी।

सभी देवता वास्तव में आपकी आंतरिक शक्तियों के प्रतीक हैं, क्योंकि स्थूल जगत में कोई देवता नहीं होते; वे आपके भीतर ही हैं। दानव तुम्हारा वही हिस्सा है जो बार-बार चोट खाकर भी हठी की तरह खड़ा हो जाता है, अपनी पुरानी गलतियाँ दोहराने के लिए। यदि तुम्हें अपने भीतर के दानव को परास्त करना है, तो अपने काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ और भय — इन 6 गुणों को सत्य और ऊँचाई की सेवा में माने देवी को समर्पित करना होगा।

धर्म की आज के समय में जो आपको हानि दिख रही है, वह इसीलिए है क्योंकि हमारा धर्म आचरणवादी, परंपरावादी हो चुका है। कुछ भी ढकोसला या अंधविश्वास चल रहा हो, हम तत्काल उसका संबंध धर्म से जोड़ देते हैं। ऐसे काम, जो कोई आम आदमी अपनी ज़िंदगी में करे तो कहेंगे—'पागल है, मूर्ख है, यह सबके लिए ख़तरा है, इसे पागलखाने में डालो'—वही काम जब धर्म के नाम पर होते हैं, तो सम्माननीय हो जाते हैं।

बहुत ज़रूरी है कि सनातन धर्म को रिक्लेम किया जाए। उसको वापस ऋषियों के पास पहुँचाया जाए। नहीं तो ये जो उल्टा-पुल्टा अर्थ चल गया है, आस्तिकता-नास्तिकता का। अभी तो चलिए, फिर भी मेरे जैसे कुछ हैं जो बता देंगे। काल की धार आगे बढ़ेगी, ये बताने वाला भी कोई नहीं रहेगा। आने वाली पीढ़ियों को यही लगेगा कि यही होती है आस्तिकता, कि जैसे पश्चिम में गॉड बिलीवर और गॉड फियरिंग होता है। इसी को आस्तिक बोलते हैं भारत में। वो यही मानने लग जाएँगे।

ये दुनिया किसी को भी प्यार दे सकती है। कृष्णों, बुद्धों को थोड़ी प्यार दे देगी। यही महाभारत है, यही दुख है, यही सर्वनाश है। सब प्यारे हैं, सिंहासन प्यारा है, दुशासन प्यारा है, यार प्यारा है, परिवार प्यारा है — सत्य प्यारा नहीं है। सोचो, क्या कर रहे हैं लोग? ये बाण अर्जुन पर चला रहे हैं, सारथी कौन बैठे हैं? श्रीकृष्ण। इन्हें ख़्याल तो आया होगा कि एक आध भूला-भटका बाण श्रीकृष्ण को भी लग सकता है, आया तो होगा न? और लगे भी होंगे बाण, पर अपने आग्रहों के लिए ये श्रीकृष्ण का खून बहाने से भी नहीं चूक रहे।

मात्र एक धर्म है, जो सचमुच महिला का मित्र है, और वह है वेदांत धर्म। बाकी सब लोक-धार्मिक परंपराओं में महिलाओं के लिए बस अपमान और शोषण है। जैसे, विच-हंटिंग और सती प्रथा के नाम पर हज़ारों स्त्रियाँ जलाई गईं। लोकधर्म महिला की भावनाओं से खेलना जानता है; इसीलिए आज भी स्त्रियाँ ही ज़्यादा हैं जो बाबाओं की शरण में जाती हैं। यदि महिला को अपनी निजता को अभिव्यक्ति देनी है, तो उसे उपनिषदों की ओर आना ही होगा। वेदांत अकेला है, जहाँ आत्मा का कोई लिंग नहीं है।

धर्म के साथ कई तरह की परंपराएँ जुड़ी हैं, जिनका उद्देश्य होता है — मन को भ्रम और दुख से मुक्ति देना। ‘शिव’ परम सत्य का दूसरा नाम है। यदि तीर्थाटन करने से मन साफ़ हो रहा है, आपके मन में सच्चाई दृढ़ता से स्थापित होती है, तो तीर्थयात्रा बहुत शुभ है — चाहे वह कावड़ यात्रा हो, अमरनाथ यात्रा हो, या केदार यात्रा। लेकिन यदि शिव का अर्थ बस मानसिक तल पर कुछ मान लिया है, उस पवित्रता से प्रेम ही नहीं, तो फिर क्या ही लाभ।

पर एक साधारण सी बात है कि दूसरों की गंदगी बताने से पहले अपनी गंदगी तो साफ करूँ और मेरी गंदगी साफ होगी। उसके बाद कोई आकर के मुझसे बात करना चाहेगा उसके घर की गंदगी के बारे में। तो मैं प्रस्तुत हूँ। भई आखिरकार तो आप इंसान हो और हर इंसान से आपका सरोकार है। बात पंथ, मज़हब, संप्रदाय की तो नहीं होती है। कोई भी आकर आपसे बात करेगा और वो साफ होना चाहता है। बेहतर होना चाहता है तो आप बिल्कुल खुलकर बात करोगे। उसमें कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन सबसे पहले तो आप अपनी बात करोगे ना। अपना भीतर झाँक कर देखोगे।

गीता बिल्कुल आज की है। जैसे श्रीकृष्ण ने आपके लिए आज ही कही हो। बहुत-बहुत मॉडर्न है गीता, क्योंकि मनुष्य के अंतस की पुकार है गीता। यही वो असली धर्म है, जिसकी चाहत हर इंसान को है, और यही एकमात्र धर्म है, जिसका जेन ज़ी और उसके बाद की जेनेरेशन पालन कर पाएँगे, क्योंकि धीरे-धीरे जो धर्म, धारणा और अंधविश्वास बनकर रह गया है, वह विलुप्त हो जाएगा।

जितनी भी विधियाँ दी जाती हैं, वो जो हम कचरा इकट्ठा कर लेते हैं दिमाग़ में न, उसको साफ़ करने की विधियाँ हैं। सत्य को पाने की तो कोई विधि आज तक बनी नहीं। और विधि बनाने की कोई ज़रूरत भी नहीं है क्योंकि वो चीज़ पाने की है भी नहीं।

धर्म का अर्थ होता है गहरी, अथक, निर्मम जिज्ञासा। सत्य से पहले कहीं भी ना रुकने का नाम धर्म है। भारत को ही नहीं पूरे विश्व को आज सच्चे धर्म की अध्यात्म की बहुत-बहुत जरूरत है। हम जहाँ खड़े हुए हैं वहाँ पर धर्म के अलावा अब पूरे विश्व को कोई नहीं बचा सकता।

वैज्ञानिक का काम है — मलहम तैयार करना, तरह-तरह के रसायनों का इस्तेमाल करके। लेकिन विज्ञान अपने आप में ये नहीं कहेगा कि इस मलहम को अब ले जाओ और लोगों को लगाओ। विज्ञान कहेगा: “ये मलहम तैयार है।” अब इसके बाद कोई चाहिए — जिसको मुक्ति की या करुणा की क़द्र हो और वो उसको ले जाकर के लोगों को मलहम लगा दे।

धर्म आपके शरीर की रक्षा थोड़ी करेगा। रक्षा शब्द की जब बात आती है तो ये समझना पड़ेगा कि आपको बड़ा ख़तरा क्या होता है। ख़तरे के संदर्भ में ही रक्षा शब्द का कुछ अर्थ है ना। ख़तरा हो तभी रक्षा की बात होती है। ख़तरा ही नहीं तो रक्षा शब्द अर्थहीन है। हाँ तो सबसे पहले तो ये जानना पड़ेगा कि हमें ख़तरा क्या है? एक मनुष्य को सबसे बड़ा ख़तरा क्या है? क्या मृत्यु? क्या किसी इंसान को सबसे बड़ा ख़तरा ये होता है कि उसका शरीर गिर जाएगा, मृत्यु हो जाएगी — ये होता है? किसी इंसान को सबसे बड़ा ख़तरा ये होता है कि मृत्यु आने से पहले वो मुक्त नहीं हो पाएगा। ये होता है ख़तरा।

का जाति:। जातिरिति च। न चर्मणो न रक्तस्य न मांसस्य न चास्थिनः। न जातिरात्मनो जातिर्व्यवहारप्रकल्पिता॥१०॥
शरीर (त्वचा, रक्त, हड्डी आदि) की कोई जाति नहीं होती। आत्मा की भी कोई जाति नहीं होती। जाति तो व्यवहार में प्रयुक्त कल्पना मात्र है।
~ निरालंब उपनिषद (श्लोक क्रमांक १०)
आचार्य प्रशांत: आज जो…

पुरानी कबीलाई रवायतें और इस्लामिक दर्शन — ये दोनों बातें आपस में गुथ गई हैं। बहुत सारी चीज़ें, जिनको आम मुसलमान मज़हब समझता है, वो वास्तव में बस अरब की प्रथाएँ हैं। धर्म के नाम पर जो चल रहा है, वो हज़ारों-लाखों लोगों की मौत बन रहा है। इसके प्रतिरोध में पूरी दुनिया कट्टर होती जा रही है। संसद, न्यायालय, कार्यालय, शैक्षिक संस्थाएँ — हर जगह से मुसलमान नदारद है। इस पिछड़ेपन का कारण अशिक्षा और ग़रीबी है। इसे दूर करने के लिए ज्ञान का प्रकाश चाहिए — विज्ञान, इतिहास, तर्क में शिक्षा चाहिए।

धर्म की दिशा सबसे पहले भीतरी होती है। दूसरों को काफ़िर कहकर मार देना धर्म की दिशा नहीं है। धर्म जब गलत दिशा ले लेता है, तो ऐसी व्यापक तबाही करता है जिसकी कोई इंतहा नहीं होती। धर्म दोधारी तलवार है — अगर सही से समझा गया, तो ऊँचाइयों पर ले जाएगा; और नहीं समझा गया, तो ऐसा गिराएगा कि उठना असंभव हो जाएगा।

महाभारत में एक दर्जन जगह आया होगा 'अहिंसा परमो धर्म:,’ लेकिन उसमें साथ में आगे कहीं भी नहीं लिखा है कि 'धर्म हिंसा तथैव च।' 'धर्म हिंसा तथैव च' — अहिंसा तो परम धर्म है लेकिन हिंसा भी धर्म है; किसी भी ग्रंथ में कहीं पर भी नहीं लिखा हुआ है। इससे आपके रोंगटे खड़े हो जाने चाहिए कि ये कौन लोग हैं और ये कौन-सी सेंट्रलाइज़्ड जगहें हैं, जहाँ इस तरह की साज़िशें की जा रही हैं। जो उन्होंने जोड़ा है इसी से उनके मंसूबे पढ़िए — वो हिंसा करना चाहते हैं। यहाँ सीधे-सीधे धर्मग्रंथ के साथ पूरी खिलवाड़ ही कर दी गई है।

लोकधर्म हमेशा मान्यताओं पर चलता है। एक आतंकवादी अपनी मान्यता के लिए किसी को मार रहा है, क्योंकि जो उसकी मान्यता, उसकी कहानी में विश्वास नहीं करेगा, वो गंदा आदमी है। बहुत सारे बुद्धिजीवी यही कहते हैं कि रिलीजन इज़ वन ऑफ़ द फॉरमोस्ट सोर्सेज ऑफ़ स्ट्राइफ़ एंड कॉन्फ्लिक्ट। धर्म एकता का स्रोत सिर्फ़ तब हो सकता है, जब वो व्यक्ति को सब विभाजनों से दूर कर दे। वेदांत ही शायद एक अकेला है जो ‘ग्रेट यूनिफ़ायर’ है, बाक़ी तो सब तोड़-फोड़ के अड्डे हैं।

संतों ने इतना समझाया कि असली तीर्थ है आत्मस्नान, और आत्मस्नान यदि नहीं हो रहा है, तो तुम गंदे ही रह जाओगे। अभी हमारी हालत यह है कि हम भीतरी गंदगी और बढ़ा रहे हैं धर्म के नाम पर। जब मन की मैल बचाकर रखनी होती है, तो फिर हम गंगा को भी बस मैला ही करते हैं। जब हम भीतर के पशु को समझकर उससे आज़ाद नहीं होते, तो बाहर वाले जितने पशु होते हैं, उनके साथ भी बड़ा अत्याचार करते हैं।

मनुष्य की देह होने भर से आपको कोई विशेषाधिकार नहीं मिल जाता, यहाँ तक कि आपको जीवित कहलाने का अधिकार भी नहीं मिल जाता। सम्मान इत्यादि का अधिकार तो बहुत दूर की बात है, ये अधिकार भी नहीं मिलेगा कि कहा जाए कि ज़िन्दा हो।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण को बोलना पड़ता है, “अर्जुन! ये सीधा-सीधा श्लोक है बिल्कुल इन्हीं शब्दों में है; अर्जुन! जब तक तुम वेदों की सकाम ऋचाओं से ऊपर नहीं उठते, जब तक जो काम्य कर्म हैं तुम उनसे बँधे हुए हो, तब तक तुम्हें मेरी बात समझ में नहीं आएगी।” उपनिषदों में कामनाओं की बात नहीं है, पर मंत्रों में है, वहाँ सब कुछ कामनागत ही है। सब प्राकृतिक देवी, देवताओं से कहा जा रहा है हमारी ये कामना पूरी कर दो वो कामना, और कामनाएँ सारी वही हैं पुरानी कामनाएँ — बेटा दे दो, ज़मीन दे दो, हमारे पशुओं के ज़्यादा दूध आए और हमारे शत्रुओं को आग लगाकर के मार दो, यही हैं। ये लोकधर्म है। और वास्तविक धर्म — निष्कामता।

महाकुंभ जैसे पावन पर्व तथा गंगा तट के किनारे श्रीमद्भगवद्गीता जैसे ५०० धार्मिक ग्रंथों को जलाया गया। ऐसा आक्रमण कोई पहली बार नहीं हुआ है। हम खिलजी की बात करते हैं कि उसने नालंदा आकर के विश्व का सबसे बड़ा पुस्तकालय जला दिया था और हम उसे भारत पर हुए अत्याचार की तरह देखते हैं। दरअसल, यह वास्तविक धर्म और विकृत लोकधर्म के बीच का संग्राम है जो भारत राष्ट्र और महान सनातन धर्म का भविष्य तय करेगा।

धर्म की बुनियाद धर्मग्रंथ होते हैं। वे बताते हैं कि कैसे जीना है और जीव की सच्चाई क्या है। जिसे तुम हिंदू कहते हो, उसका अपने धर्म की केंद्रीय किताबों से कोई संबंध ही नहीं रह गया है। सनातन धर्म को अन्य धर्मों से नहीं, बल्कि इस वक्त सबसे बड़ा खतरा झूठे धर्मगुरुओं से है, जो भीतर-भीतर सनातन धर्म की नींव खोद रहे हैं। सनातन धर्म में हिंदुओं को किसी दूसरे धर्म से बाद में खतरा होगा; पहला खतरा उन्हें हिंदुओं से ही है, क्योंकि जिसे तुम हिंदू कहते हो, वह केवल परंपरा और अंधविश्वास को मानने वाला हिंदू है।

आम आदमी— रीति-रिवाज़, कर्मकांड, मान्यताएं, अन्धविश्वास — इसी को हिन्दू धर्म समझता है। भारतीय दर्शन में जो केन्द्रीय हीरा बैठा हुआ है, वो आम जनता में कभी प्रचलित ही नहीं होने पाया। जिन लोगों की धर्म में ज़रा भी रुचि हो, या अपने आप को हिन्दू कहने में गौरव हो— वेदांत के बिना हिन्दू जैसा कुछ नहीं। तमाम तरह की परंपराओं और प्रथाओं से सत्य नहीं आता। वेदांत अकेला है जो सत्य का अनुसंधान करता है, जिसमें मुक्ति है।

प्रश्नकर्ता: सनातन धर्म का अर्थ क्या है?
आचार्य प्रशांत: सनातन कौन है, ये समझ लीजिए तो ये भी समझ जाएँगे कि सनातन धर्म क्या हुआ।
सनातन माने वो जो लगातार है; जो लगातार है। लगातार कौन है? लगातार प्रकृति है, अस्तित्व है न लगातार? तो माने प्रकृति है लगातार, और…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पिछले बहुत समय से हिंदु जहाँ भी हैं उनके साथ अन्याय और अत्याचार ही हुआ है, भारत देश में भी और दूसरे देशों में भी। चाहे वह पश्चिमी देश हों और चाहे वह एशियाई देश हों, हर जगह हिंदुओं को असम्मान और उत्पीड़न मिलता रहा है और…

आज न कोई हिन्दू है, न मुस्लिम, हमारा मुख्य धर्म उपभोक्तावाद बन चुका है। सोचो, कौन तुम्हें प्रभावित कर पैसे कमाने को प्रेरित कर रहा है, ताकि तुम कमाओ और वो तुमसे फालतू चीज़ों के बहाने पैसा ले ले। खर्च करने से पहले सोचो, अपनी ज़रूरतें कम करो, कम खरीदो, क्योंकि जितना खर्च करोगे, उतना ही खुद को बेचना पड़ेगा। आपका खर्च करना बहुत दूर तक जाता है।

प्रश्नकर्ता: आज शिविर में वज्रसूचिकोपनिषद् का पाठ किया तो जाना कि सचमुच में ब्राह्मण कौन होता है। आज तक लगता था कि ब्राह्मण जन्म या जाति के आधार पर बनते हैं; आज वो धारणा टूट रही है। ब्राह्मण कौन होता है, आचार्य जी और स्पष्ट करें।
आचार्य प्रशांत: पहले तो…

आचार्य प्रशांत: देखो, डाउट और ट्रस्ट दोनों किसी ऑब्जेक्ट पर होते हैं। फ़ेथ भी जब तक उस तरह की है कि कोई ऑब्जेक्ट है उसका, तब तक तो घटेगी-बढ़ेगी है ही। फ़ेथ एबसोल्यूट तब होती है जब वो ऑब्जेक्टलेस (निष्प्रयोजन) होती है। अगर तुम इतना भी कह रहे हो न…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, बचपन से ही एक सवाल है जो काफ़ी अजीब लगता है कि अभी दिवाली आने वाली है और जैसे प्रचलित कहानी है कि दिवाली के दिन राम घर वापस आए थे। पर दिवाली के दिन राम का तो कहीं भी नाम नहीं होता है,…

बुद्ध निर्विकल्प जीवन जीने को कहते थे| निर्विकल्पता में आता है कि पात्र में जो दे दिया विधि ने, वहीं खा लेना है। अगर बुद्ध ने अपवाद खड़ा कर दिया होता, तो भिक्षु निर्विकल्पता का पालन करने से मुकर जाते| तो बुद्ध ने कहा, ‘नहीं, अब आ ही गया है माँस तो खा लो। वैसे भी इसको तुमने मारा नहीं’। पर ये समय सापेक्ष बात है | भूल होती है, जब कहते हैं ‘बाज़ार में जो माँस है, हमने तो मारा नहीं,तो हम उसे खाएँगे।’ ये मत कर लेना, ये केंद्रीय, कालातीत बात नहीं|