धर्म की आज के समय में जो आपको हानि दिख रही है, वह इसीलिए है क्योंकि हमारा धर्म आचरणवादी, परंपरावादी हो चुका है। कुछ भी ढकोसला या अंधविश्वास चल रहा हो, हम तत्काल उसका संबंध धर्म से जोड़ देते हैं। ऐसे काम, जो कोई आम आदमी अपनी ज़िंदगी में करे तो कहेंगे—'पागल है, मूर्ख है, यह सबके लिए ख़तरा है, इसे पागलखाने में डालो'—वही काम जब धर्म के नाम पर होते हैं, तो सम्माननीय हो जाते हैं।
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प्रश्नकर्ता: अभी जो अध्यात्म के बारे में आपने कहा है बस इसी के आगे गीता हम इस बार पढ़े, जो यहाँ से मिला था तो उसमे फिर धर्म लग रहा है कि अर्जुन धर्म जान रहे हैं और श्रीकृष्ण उनको जो बता रहे हैं अध्यात्म। हमारे मन ने ये महसूस किया, तो धर्म की एक तरह से श्रीकृष्ण निंदा ही कर रहे हैं, जो पूजा-पाठ इस तरह की बात होती है। इसमें जो भेद कर-करके हम लोग देखते हैं, इसका कुछ स्पष्टीकरण चाहिए।
आचार्य प्रशांत: तीन शब्द हैं, अगर आदर्श स्थितियाँ होतीं, अगर हम लोग जगे हुए होते तो तीनों शब्दों का बिल्कुल एक अर्थ और एक ही दिशा होनी चाहिए थी। ‘कर्तव्य, धर्म और अध्यात्म।’ एक जागृत मन के लिए यह तीनों बिल्कुल एक होते हैं, कर्तव्य = धर्म = अध्यात्म।
लेकिन जब व्यक्ति जागृत नहीं होता तो वो इनके अलग-अलग अर्थ कर लेता है। कर्तव्य का अर्थ वो कर लेता है वो सारे काम जो उसको दुनिया के प्रति करने हैं, परिवार के प्रति करने हैं, समाज के प्रति करने हैं, तमाम सब व्यवस्थाओं के प्रति करने हैं। वो सबकुछ जो इनके प्रति करणीय है, उसका नाम वो ले देता है कर्तव्य, और वो सब उसने सीखा कहाँ से? वो सब उसने इन्ही संस्थाओं से, इन्हीं व्यवस्थाओं से सीखा।
परिवार के प्रति क्या कर्तव्य है, उसे किसने बताया? परिवार ने ही। समाज के प्रति क्या कर्तव्य है, किसने बताया? समाज ने ही। तो वो इन सब बातों को कर्तव्य समझ लेता है।




