प्रश्नकर्ता: सब ही भूमि बनारसी, सब नीर गंगा तोय। ज्ञानी आतम राम है, जो निर्मल घट होय।। ~गुरु कबीर साहब
आचार्य जी, मेरी समझ से इस दोहे का ये अर्थ है कि ज्ञानीजन कोई भेदभाव नहीं करते। उनके लिए सिर्फ़ गंगाजल ही पवित्र नहीं होता, बल्कि हर जगह का जल पवित्र होता है। उनके लिए राम केवल अयोध्या में नहीं बसते हैं, बल्कि राम तो उनके भीतर ही बसते हैं। कृपया अर्थ स्पष्ट करें।
आचार्य प्रशांत: “सब ही भूमि बनारसी, सब नीर गंगा तोय।” ये छोटे मन की बात है कि वो किसी खास जगह को पवित्र देखता है और किसी खास जगह को गन्दा देखता है। वो हमेशा बाँटकर रखता है; बाँटना उसका काम है। दुनिया में हमेशा वो कुछ अच्छा, कुछ बुरा बनाता है; कुछ पवित्र, कुछ अपवित्र बनाता है; कुछ अपना, कुछ पराया बनाता है। ये छोटे मन का काम है — बाँटना।
सन्त का मन बाँटता नहीं है। वो फिर ये नहीं कहता कि कोई खास जगह है जिसे मन्दिर-मस्जिद बोलेंगे। उसके लिए हर जगह फिर पवित्र है। समझ रहे हो? वो ये नहीं कहेगा कि जब मन्दिर पहुँचेंगे, तभी मन में धार्मिकता उठेगी। वो जहाँ भी बैठा है, उसको लगातार सच्चाई याद है।
देखो, आदमी का मन इतना गड़बड़ होता है न कि वो धर्म के नाम पर भी अपनी ही सुविधा चलाता है। उदाहरण लो। तुम बोलते हो कि हर धर्म में होता है — हिन्दू और मुसलमानों में — कि जब पूजा के लिए जाओ, जब दुआ के लिए जाओ तो साफ़ होकर जाओ। गन्दे होकर जाने को ठीक नहीं मानते। तुम कबीर साहब से पूछोगे तो कबीर हँस देंगे। कबीर कहेंगे कि वज़ू (नमाज़ पढ़ने से पहले हाथ-पैर धोना) क्या सिर्फ़ नमाज़ के समय किया जाए, और स्नान क्या सिर्फ़ मन्दिर के लिए किया जाए।


![क्या आप आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी [इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग] के भाग हैं?](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-3dc72262-a991-4f45-a9d4-a0397e21022c/30/image.jpg)
