जैनों ने विरोध किया, हिंदुओं ने क्यों नहीं? (तीर्थाटन बना पर्यटन) || आचार्य प्रशांत (2023)

प्रश्नकर्ता१: आचार्य जी, थैंक यू अपना समय देने के लिए, हम सभी को। तो हम सभी यहाँ पर आपस में एक विषय पर स्पेशली हाल ही में जो तीन घटनाएँ घटी हैं उनके ऊपर चर्चा कर रहे थे, और चर्चा करते वक़्त हमने यह पाया कि वो जो घटनाएँ हैं वो काफ़ी महत्वपूर्ण है, रोचक हैं और साथ ही गम्भीर हैं।
आचार्य प्रशांत: कौन सी घटनाएँ हैं।
प्र१: तीन घटनाएँ हैं हाल ही में घटी हैं, पिछले एक-डेढ़ महीने में। पहली है जैनियों से सम्बन्धित, मैं ख़ुद भी एक जैन हूँ। सम्मेद शिखर जी में वहाँ उस पूरी जगह को जो कि जैनियों का सबसे प्रमुख तीर्थ है, वहाँ पर उस जगह को टूरिस्ट प्लेस बनाने की कोशिश की जा रही थी।
पहली घटना यह थी जो हाल ही में घटी है। दूसरी घटना जोशीमठ से सम्बन्धित है, जहाँ पर ज़मीन जो है धँसने की बात वहाँ पर हो रही थी और वो भी उसमें जो ज़्यादातर कॉन्ट्रीब्यूशन (योगदान) है वो शायद मैनमेड एक्टिविटीज (मानव सम्बन्धित क्रिया-कलाप) का ही है।
और तीसरी जो घटना है वो गंगा विलास के बारे में है। जो कि अगेन टूरिज्म (पर्यटन) से ही रिलेटेड (सम्बन्धित) है। रिलीजियस टूरिज्म से रिलेटेड (धार्मिक पर्यटन) है। तो हम जब चर्चा कर रहे थे आपस में तो हमने ये पाया कि जो तीनों ही विषय हैं, तीनों ही घटनाएँ हैं— ये साझे रूप से किसी ओर इशारा कर रही हैं।
तो वो इशारा क्या है? यह बहुत ज़रूरी है कि हम आपसे जानें कि असल में बात है क्या। तो इस पर कृपया बताएँ।






