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हिंदू इतने देवताओं को क्यों पूजते हैं?: पाकिस्तान से जिज्ञासा ||आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। हम पाकिस्तान से हैं। वैसे तो आप हिंदुओं के गुरु हैं, लेकिन हम मुसलमान भी आपको आलिम-फ़ाज़िल की तरह देखते हैं। आपके चाहने वाले पाकिस्तान में भी कम नहीं हैं। खासकर उपनिषद् और गीता पर आपकी तक़रीर को हम बड़ी इज्ज़त से सुनते हैं।

हमारा प्रश्न है कि जब वेदांत भी 'एक' ईश्वर को मानता है—जैसे कि अल्लाह एक है—तो हिंदू लोग इतने अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा क्यों करते हैं?

आचार्य प्रशांत: देखो, सत्य एक है; और सत्य वह है जो बदल नहीं सकता, जिसमें पूर्ण आश्वस्ति है, नित्यता है; और दुनिया में सबकुछ बदलता रहता है। तो सत्य दुनिया से एक अलग तल की चीज़ है, लेकिन उस तक जाते तो दुनिया का प्रयोग करके ही हैं न?

तो जिन प्रतीकों की पूजा सनातन धर्म में की जाती है साजिद, उनको सत्य मानकर नहीं पूजा जाता; उनको माध्यम और सहायक मानकर पूजा जाता है। कोई भी व्यक्ति जिसने सनातन धर्म को जाना होगा, वह आपसे यह नहीं कहेगा कि यदि नदी की पूजा हो रही है तो नदी ही सत्य है। या वृक्ष की हो रही है, या मूर्ति की हो रही है, या जीवों की हो रही है, या पर्वतों की हो रही है तो यही सत्य है। नहीं, हिंदू मन कहता है कि सत्य मुझे इतना प्यारा है कि जो मुझे सत्य तक ले जाता है, मैं उसको पूजने लगता हूँ।

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय।।

~ कबीर साहब

गोविंद की क्या पूजा करें; गोविंद जो वास्तविक हैं, वो तो निर्गुण है, निराकार है, उनकी तो पूजा वास्तव में हो ही नहीं सकती। तो पूजा उसकी करेंगे जो वहाँ तक ले जाता है, इसलिए गुरु की पूजा है। कोई भी, जो माध्यम बनेगा उसको पूजेंगे। जो आख़िरी है, उसको पूज सकते ही नहीं। जो आख़िरी है, उसकी पूजा ही नहीं की जा सकती।

आप कह रहे हो कि पूजा तो एक अल्लाह की होनी चाहिए, इतने देवी-देवताओं की क्यों होती है। आप कह रहे हो, निर्गुण की पूजा होनी चाहिए, सगुण की क्यों होती है। सनातन धर्म उससे थोड़ा अलग जाता है, बल्कि और आगे जाता है। सनातन धर्म कहता है कि सत्य की तो पूजा भी नहीं हो सकती।

ब्रह्म को समर्पित आपको कहीं कोई मंदिर नहीं मिलेगा। कोई मंदिर नहीं है, जहाँ ब्रह्म की पूजा होती हो। क्योंकि अगर ब्रह्म माने सत्य, जो आख़िरी है, वह वास्तव में निर्गुण है और निराकार है, तो तुमने उसकी पूजा भी कैसे कर ली? आपने जिसकी पूजा या इबादत शुरू कर दी, आपने उसको सगुण बना दिया। सोचकर देखो! आप जैसे ही किसी की पूजा करते हो, या किसी को संबोधित करके कोई प्रार्थना या दुआ करते हो, क्या आपने उसको सगुण नहीं बना दिया? आप जैसे ही किसी को कोई नाम भी दे देते हो, आप उसको मन के क्षेत्र में ले आए; माने उसको सगुण बना दिया।

तो इसलिए बड़ा स्पष्ट विभाजन चला है सनातन धारा में। एक ओर तो वह है जो जीवन का लक्ष्य है — 'मुक्ति'। वह लक्ष्य है, उसको ब्रह्म कहते हैं। ब्रह्मलीनता जीवन का लक्ष्य है, ब्रह्मलीनता को ही या बाह्मी स्थिति को ही मुक्ति कहते हैं। एक ओर तो वह है जो आख़िरी है, लक्ष्य है, और बाकी सब माध्यम हैं। क्या माध्यम है?

हिंदू ने कहा, जो कुछ है, सबकुछ माध्यम है वहाँ तक जाने का; और वह माध्यम है वहाँ तक जाने का तो मैं उसे पूजूँगा। जो भी कोई मुझे ऐसा मिलता है, जो मुझे वहाँ ले जा सकता है, मैं उसको पूजना शुरू कर दूँगा। क्यों? क्योंकि जो आख़िरी है वहाँ तो पूजा हो नहीं सकती। क्यों? क्योंकि जो आख़िरी है, वो तो अद्वैत है। वहाँ तो दो बचेंगे ही नहीं, कौन किसको पूजेगा!

ब्राह्मी स्थिति में तो अद्वैत है, वहाँ दो बचने नहीं हैं; तो कैसे कोई किसी की पूजा करेगा? तो ब्रह्म की हम उपासना नहीं करते। हम उपासना करते हैं उन सबकी, जिनको अगर समझ लिया तो ब्रह्म तक पहुँच जाओगे। तो वहाँ से फिर बात आती है कि हज़ारों विषय हैं पूजा के, और लाखों देवी-देवता हैं। वो जितने देवी-देवता हैं, वो सब वास्तव में प्राकृतिक शक्तियों के प्रतिनिधि हैं।

कहा ये जा रहा है कि उनके निकट आओ। निकट आने को ही कहते हैं उपासना। उप-आसन: उप माने निकट, आसन माने बैठना। प्रकृति के निकट आओ तो प्रकृति ही अपने से पार जाने का रास्ता बता देगी; ये उपासना है। तुम्हारे और ब्रह्म के बीच में जो बाधा है, उसका क्या नाम है? प्रकृति; उसी को माया कहते हैं। प्रकृति को ही माया कहते हैं। एक ओर तुम हो, और दूसरी तरफ़ ब्रह्म है—ये मैं सरल करके बता रहा हूँ; ऐसे मत समझिएगा कि जैसे कोई सच में सड़क हो और एक किनारे तुम हो और दूसरे किनारे ब्रह्म—तुम हो, ब्रह्म है और बीच में प्रकृति का पूरा विस्तार है; उसी को भवसागर बोलते हैं, वही माया है।

और कहते हैं न, हमें उस पार जाना है। उस पार जाना है और हम इस पार हैं, बीच में भवसागर लहरा रहा है। अब उस पार भी अगर जाना है, तो सागर का प्रयोग करके ही तो उस पार जाओगे न! और सागर बाधा भी हो सकता है और सहायक भी हो सकता है। आपको अगर तैरना आता है, आपको अगर नाव चलाना आता है, तो वही सागर आपकी सहायता करेगा पार जाने में।

हिंदू ने कहा, सागर सहायता करेगा। ये एक दृष्टि है देखने की, प्रकृति को। अतः यह सब सहायता करेगा। पेड़ भी सहायता करेगा, चींटी भी सहायता करेगी, हवा सहायता करेगी, अग्नि सहायता करेगी; तो अग्नि की पूजा है, वायु की पूजा है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि यहाँ अग्नि या वायु को ब्रह्म का स्थान दे दिया है, या अल्लाह का स्थान दे दिया है। नहीं! बहुत स्पष्ट विभाजन है, ये देवी-देवता हैं। इनकी पूजा करके अधिक-से-अधिक आपको पुण्य लाभ होता है, स्वर्ग लाभ होता है; मुक्ति नहीं मिलती। लेकिन ये सहायक होते हैं, सहायक किस अर्थ में होते हैं? कि गौर से देखो तो नदी को; और अगर नदी को गौर से देखोगे तो जीवन के कुछ राज़ खुल जाएँगे। वो राज़ तुम्हारे काम आएँगे, तुम्हें मुक्त करने में सहायक होंगे; तो नदी की फिर पूजा है।

नदी की पूजा में यह भाव कहीं भी नहीं है कि नदी ही अंतिम सत्य है, नहीं बिलकुल भी नहीं है। पर अंतिम सत्य तक जाना है, तो कोई रास्ता तो बनाओगे, कोई माध्यम तो चाहिए न? हिंदुओं ने कहा, 'यह समस्त सृष्टि ही माध्यम बनेगी। यह सब हमारे काम आएँगे, हम इन सबसे सहायता माँगेंगे। हम पानी से, हम आकाश से, हम कीट पतंगों से, हम सबसे सहायता माँगेंगे।' और सहायता किस तरह की माँगेंगे?

उपासन करके, उनको समझकर के, उनके निकट जाकर के। क्योंकि प्रकृति ही बंधन है, प्रकृति को समझ जाओ तो मुक्ति है। प्रकृति को समझ जाओ तो मुक्ति है; वास्तविक पूजा यही है, समझना, बोध। समझ जाओ तो मुक्ति मिल जाएगी। यही जो तुम्हें जकड़े हुए है, अगर तुम उसी को जान लो, तो वह जकड़ खुल जाएगी।

तो इस्लाम में तो बस इतना ही है कि आप अल्लाह का कोई चित्र नहीं बना सकते। वेदांत तो और आगे जाता है; वो कहता है कि ब्रह्म का कोई मंदिर भी नहीं बना सकते। इस्लाम में अल्लाह के लिए मस्जिद तो बनती है? सनातन धारा में तो ब्रह्म के लिए कोई मंदिर भी नहीं बनता। क्योंकि अगर मंदिर भी बना दिया तो निर्गुण को निर्गुण नहीं छोड़ा फिर।

आपने ब्रह्म की कोई आरती सुनी है? कोई भजन सुना है? कुछ सुना है? क्योंकि ये बात सीधी है कि उसका नाम लेकर के ज़्यादा कुछ बोल दिया तो उसको भी फिर हमने सांसारिक तल पर ही उतार दिया। तो उसके बारे में हम ज़्यादा कुछ बोलेंगे ही नहीं। जो बोलेंगे भी—क्योंकि बोलने की ज़रूरत पड़ती है किसी को समझाने के लिए—जो बोलेंगे भी उसको तो नकार की भाषा में बोलेंगे, नेगेटिवा में बोलेंगे, नेति-नेति करके बोलेंगे। कम-से-कम बोलेंगे और नकार की भाषा में बोलेंगे।

हाँ, गड़बड़ ये हुई है कि जो आम हिंदू मन है, वह मुक्ति को भूल गया। 'ब्रह्मविद्या' की उसे कोई शिक्षा ही नहीं मिली। ब्रह्मविद्या माने — वेदांत। वह कर्मकांड में ही उलझ कर रह गया। उसको लगने लगा कि प्राकृतिक शक्तियों की पूजा ही धर्म है। प्रकृति से ही रास्ता निकलना है। संसार में जो कुछ है, वो भला है क्योंकि वो पार जाने का साधन बन सकता है। इसी बात ने साजिद, हिंदुओं को बड़ा उदार रखा है, क्योंकि हिंदु के लिए सबकुछ मददगार है।

वह कहता है, 'कण-कण में नारायण।' कण-कण में नारायण से आशय यही है, कण-कण में शक्ति है कि नारायण से मिला दे। कण में नारायण बैठे नहीं हैं, पर उस कण की यदि उपासना कर लो, माने उसके यदि निकट चले जाओ, तो अपने बंधनों से मुक्त हो जाओगे; इसी को कहते हैं, नारायण से योग। नारायण से मिल गए क्योंकि अपने बंधनों से मुक्त हो गए। जब कण-कण में नारायण है, तो किसी के प्रति भी फिर द्वेष कैसे रखें? तो जो कुछ है सब चलेगा।

तो जो हिंदुओं में तुम उदारता और सहिष्णुता पाते हो, वो इसी कारण रही है। और सब धार्मिक धाराओं की अपेक्षा तुम यह स्वीकार करोगे साजिद कि हिंदू मन ज़्यादा उदार रहा है, ज़्यादा सहनशील रहा है, ज़्यादा अकोमोडेटिव रहा है, सहिष्णु रहा है। वो इसीलिए है क्योंकि वह इतने देवी-देवताओं की पूजा करता रहा है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि वह असंख्य शक्तियों में विश्वास करता है। जो हिंदू है, उसका भी सत्य एक ही है, उसका नाम ब्रह्म है। सत्य एक है पर सत्य तक पहुँचने के साधन तो अनंत हो सकते हैं न? हिंदू उन सब साधनों को भी सम्मान देता है। लेकिन पश्चिम में इसका यह उल्टा अर्थ कर दिया गया कि हिंदू लाखों भगवानों की पूजा करता है। नही! ये क्या आपने इसका विकृत अर्थ निकाल लिया! हिंदू के लिए भी एक ही है।

आत्मा एक है, ब्रह्म एक है, सत्य एक है। लेकिन वो इतना बड़ा है कि उस तक जाने के लिए हमें हर प्रकार की सहायता और साधन चाहिए। और वो हमें इतना प्यारा है कि हमें जो भी सहायता-साधन मिल रहा होगा, हम उसको स्वीकार करेंगे। और हमें उस तक पहुँचने की इतनी ललक है कि जो भी साधन हमें उस तक ले जा रहा होगा, हम उसके प्रति अनुग्रह से भर जाएँगे।

तो इतने सारे साधन हैं, अनंत साधन हैं जो हमें उस तक ले जाते हैं, हम उन सबके सामने सर झुकाते हैं। एक पेड़ के पास जब मैं ध्यान से बैठ जाता हूँ, मुझे जीवन समझ में आने लग जाता है, मैंने पेड़ों को नमन कर लिया; ये एक हिंदू की दृष्टि है।

एक विशाल वटवृक्ष के नीचे जब मैं बैठ जाता हूँ, जीवन के बारे में कुछ बातें सुलझनी शुरू हो जाती हैं। चूँकि इससे मुझे जीवन के बारे में कुछ पता चला, मेरे बँधन थोड़े शिथिल पड़े इसके पास बैठकर के, तो मैंने वहाँ सर झुका दिया। इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं कह रहा हूँ कि पेड़ ही परमात्मा है। परमात्मा नहीं है, मददगार है। जो मदद करेगा, उसके सामने सर झुकाने में कोई हानि है क्या? नदी ने मदद करी, पेड़ ने मदद करी, चाँद-सूरज ने मदद करी, दिन ने मदद करी, रात ने मदद करी। शायद ही कोई जानवर ऐसा हो, जिसकी भारत में पूजा न की जाती हो।

अलग-अलग समुदाय हैं, सबकी अलग-अलग परंपराएँ हैं; कोई जानवर यदि पूरब में नहीं पूजा जाता, मान लो बंगाल तरफ़, तो वह पश्चिम में पूजा जाता होगा, गुजरात में। कहीं साँप की पूजा हो रही है, तो कहीं बिच्छू की हो रही है। जो कोई बाहर वाला आदमी इस चीज़ को देखता है तो पगला जाता है। बोलता है, कैसे लोग हैं ये! ये साँप की पूजा, बिच्छू की पूजा कर रहे हैं।

कोई समुदाय है, वह कौवे की पूजा कर रहे हैं। कोई दूसरा है, वह तोते की पूजा कर रहा है। तो वो सोचते हैं कि हिंदुओं को लगता है शायद कि तोता ही भगवान है। नहीं, ऐसा नहीं लगता है। तोते को प्रकृति का प्रतीक माना गया है। और एक बात समझी गई है सनातन परंपरा में कि यह जो प्रकृति माँ है—प्रकृति ही माँ है न, महामाया, यह जो महा-माँ है प्रकृति—यही बँधन है तुम्हारा, और इस माँ की सहायता के बिना तुम बंधनों के पार भी नहीं जा पाओगे।

माया ही बँधन है, और माया ही मुक्ति का द्वार भी है। तो माया से अगर मुक्ति चाहिए, तो माया के सामने नमित होकर रहना। और नमित होकर रहने का अर्थ है — माया को जानना। अकड़ में जान नहीं पाते, अकड़ में कुछ समझ में नहीं आता। नमित होना माने — समझना। अहंकार को नीचे रखो, तब बोध ऊपर आता है। नमन माने — नीचे। ये बात समझ में आ रही है?

तो अगर आप सब देवी-देवताओं को माध्यम की तरह प्रयुक्त कर पाते हैं, तो हम जितनी मूर्ति पूजा करते हैं, सब सार्थक है। जितने देवी-देवता हैं, सब हमारे काम आएँगे। अगर आपको पता हो कि वह जो देवी की मूर्ति है, वह किसका प्रतीक है, सिर्फ़ तब काम आएँगे; अँधी पूजा काम नहीं आएगी। और विशेषकर यदि आपकी मान्यताएँ अंधविश्वास बन गई हों, तब तो पूजा-अर्चना बिलकुल काम नहीं आएगी। ये जो पेंथिज्म (देवपूजा) है सनातन परंपरा का, यह बहुत विचार से निकली हुई बात है। ये बोध की कमी से निकली हुई चीज़ नहीं हैं; ये बोध के उफान से उठी हुई बात है।

कोई बहुत समझदार आदमी रहा होगा, जिसने पहली बार पेड़ के सामने सर झुकाया। कोई बहुत गहरा आदमी रहा होगा, जिसने पहली बार नदी को माँ बोला, और झुक गया बिलकुल। यह अंधविश्वास नहीं है, यह बहुत गहरी बात है। लेकिन यही गहरी बात जब आप समझते नहीं हैं, और इसका बस परंपरा के तौर पर निर्वाह कर देते हैं, तो यही गहरी बात, गहरी कुरीति और अंधविश्वास बन जाती है।

यहाँ लोग हैं, जो जाकर के नदी के सामने सर झुकाते हैं—मैं ऋषिकेश की गंगा की बात कर रहा हूँ—उसके बाद गंगा में खड़े होकर के शैंपू करते हैं। तुम्हें अगर समझ में आया होता कि क्यों हमने नदियों को माँ कहा, तो तुम नदी को गंदा कैसे कर लेते? समझ में आ रही है बात?

तुम भी यही पाओगे साजिद; जब वो जो एक होता है एक, दिल जब उसी का दीवाना हो जाता है न, तो आदमी उसकी क़ायनात के सामने भी ठगा सा खड़ा रह जाता है! चमत्कृत! दीवाना सा! 'इश्क़-ए-हक़ीकी होता है, तो इश्क़-ए-मजाज़ी पीछे-पीछे छाया की तरह आ जाता है।'

भारत में संतों ने गाया है कि, 'राम तजू पर गुरु न बिसारू।' हमने माध्यमों की पूजा करी है। हम कहते हैं, वहाँ तो पहुँच ही जाएँगे, उस पार तो पहुँच ही जाएँगे, उस पार की बहुत बात क्या करनी; मैं तो बात नाव की करना चाहता हूँ, नाव ठीक है तो उधर पहुँच जाएँगे।

मैं बार-बार उधर की बात करूँ और उधर जाने के लिए मेरे पास कोई नाव है ही नहीं, तो यह तो पाखंड हो गया। और प्रकृति ही नाव है। प्रकृति ही मझधार है, और प्रकृति ही नाव भी है। जो नहीं समझा, उसके लिए मझधार है, वो डूब मरेगा। जो समझ गया, उसके लिए नाव है, वह पार कर जाएगा।

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