प्रश्नकर्ता: ये जो परिस्थितियाँ वर्तमान में चल रही हैं जिसमें असत्य की सत्य के ऊपर जीत देखी जाती है तो ऐसी परिस्थितियों में एक मनुष्य अपने आदर्शों को कैसे कायम रख सकता है? कैसे दृढ़ संकल्प रह सकता है? उसके लिए आप कुछ ज्ञान या दिशानिर्देश दें।
आचार्य प्रशांत: पहली बात तो ये है कि असत्य आज तक सत्य पर जीता नहीं। कोई है यहाँ पर जो असत्य का पक्ष लेना चाहता हो? असत्य भी यदि कभी जीतता प्रतीत होता है तो सत्य का नाम लेकर, सत्य का चेहरा पहनकर। असत्य बेचारे की मजबूरी ये है कि वो खुलेआम बोल भी नहीं सकता कि मैं असत्य हूँ क्योंकि अगर वो खुलेआम बोलेगा कि मैं असत्य हूँ तो लोग पूछेंगे, ‘ये बात सत्य है कि असत्य?’
असत्य को भी कहना यही पड़ता है कि मैं (सत्य हूँ)। तभी आप उसके फेर में आते हैं, नहीं तो आएँगे नहीं। असत्य कभी जीतता नहीं। सत्य या तो सीधे-सीधे जीतता है या असत्य के रूप में जीतता है। और जो ये खेल चल रहा है ये कोई आज का नहीं है। वर्तमान में कोई सामाजिक परिस्थितियाँ विशेष रूप से भ्रष्ट नहीं हो गयी हैं।
आदमी जैसा है वैसा सदा से था। आदमी का मन जैसा है वैसा सदा से था। ये खेल लगातार चलता ही आ रहा है लेकिन हमें नये की उम्मीद रहती है और चूँकि हमें नये की उम्मीद रहती है इसीलिए हम इस खेल में फँसे रहते हैं। नये की उम्मीद कई तरीकों से हो जाती है। नये की उम्मीद ये भी बता देती है हमें कि देखो नया-नया कुछ अच्छा हो रहा है। देखो कोई नया अवतार ही उतर आया। देखो कोई नयी तकनीक आ गयी है। विज्ञान के कुछ नये आविष्कार हो गये है। एक नया युग, एक नया स्वर्ग उतरने वाला है।
ये भी मन की जो नये की चाहत है, उसका प्रतीक है और मन की जो नये की चाहत है वो इसमें भी परिलक्षित होती है कि देखो ये युग विशेषतया गर्हित है, ये भी तो एक नयी ही बात हुई न कि पहले जितना बुरा नहीं होता था अब उससे ज्यादा बुरा हो रहा है नयी बात।




