‘धर्मो रक्षति रक्षितः' यदि सच है, तो इतने महापुरुष मारे क्यों गए?

धर्म आपके शरीर की रक्षा थोड़ी करेगा। रक्षा शब्द की जब बात आती है तो ये समझना पड़ेगा कि आपको बड़ा ख़तरा क्या होता है। ख़तरे के संदर्भ में ही रक्षा शब्द का कुछ अर्थ है ना। ख़तरा हो तभी रक्षा की बात होती है। ख़तरा ही नहीं तो रक्षा शब्द अर्थहीन है। हाँ तो सबसे पहले तो ये जानना पड़ेगा कि हमें ख़तरा क्या है? एक मनुष्य को सबसे बड़ा ख़तरा क्या है? क्या मृत्यु? क्या किसी इंसान को सबसे बड़ा ख़तरा ये होता है कि उसका शरीर गिर जाएगा, मृत्यु हो जाएगी — ये होता है? किसी इंसान को सबसे बड़ा ख़तरा ये होता है कि मृत्यु आने से पहले वो मुक्त नहीं हो पाएगा। ये होता है ख़तरा।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी हम कहते हैं “धर्मो रक्षति रक्षितः” कि जो धर्म की रक्षा करते हैं धर्म उनकी रक्षा करता है। लेकिन हमारे जितने भी धर्म रक्षक रहे हैं, जितने भी महापुरुष रहे हैं उनकी हत्या समाज के गलत ताकतों के हाथों ही हुई है। चाहे वो बुद्ध हो, ईशु हो या अन्य महापुरुष। तो फिर ऐसा क्यों होता है कि धर्म उनकी रक्षा नहीं कर पाता।
आचार्य प्रशांत: धर्म आपके शरीर की रक्षा थोड़ी करेगा। रक्षा शब्द की जब बात आती है तो ये समझना पड़ेगा कि आपको बड़ा ख़तरा क्या होता है। ख़तरे के संदर्भ में ही रक्षा शब्द का कुछ अर्थ है ना। ख़तरा हो तभी रक्षा की बात होती है। ख़तरा ही नहीं तो रक्षा शब्द अर्थहीन है। हाँ तो सबसे पहले तो ये जानना पड़ेगा कि हमें ख़तरा क्या है? एक मनुष्य को सबसे बड़ा ख़तरा क्या है? क्या मृत्यु? क्या किसी इंसान को सबसे बड़ा ख़तरा ये होता है कि उसका शरीर गिर जाएगा, मृत्यु हो जाएगी — ये होता है? किसी इंसान को सबसे बड़ा ख़तरा ये होता है कि मृत्यु आने से पहले वो मुक्त नहीं हो पाएगा। ये होता है ख़तरा।
जो बहुत देहाभिमानी होगा, वो ये कहेगा कि बड़े से बड़ा ख़तरा मृत्यु है। जो थोड़ा भी समझदार हो, वो कहेगा मृत्यु ख़तरा नहीं है। मृत्यु तो तथ्य है जो टाला नहीं जा सकता। ख़तरा ये है कि जीवन रहते जीवन मुक्त नहीं हो पाए, ये होता है ख़तरा। अगर ये है ख़तरा तो अब बताओ रक्षा किसको बोलेंगे? कि इस ख़तरे से बच गए, जीवन मुक्त हो गए। अगर ख़तरा ये था कि ज़िन्दगी मिली पर ज़िन्दगी मुक्ति में नहीं जी पाए तो फिर रक्षा भी यही हुई ना, कि जीवन से मुक्ति मिल गई। जीवन मुक्त हो गए, ये काम धर्म करता है।



