मेरा भगवान मेरा प्यार मेरी ज़िम्मेदारी — किसी और पर क्यों छोड़ दूँ?

Acharya Prashant

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मेरा भगवान मेरा प्यार मेरी ज़िम्मेदारी — किसी और पर क्यों छोड़ दूँ?
प्यार होना चाहिए न। बात सारी उस ज़िंदगी की है, जिसके दिल में प्यार धड़क रहा हो। मैं साधारण प्यार की बात कर रहा हूँ, अभी मान लीजिए आदमी–औरत वाले ही प्यार की। आपको प्रेम है किसी से, पंद्रह लोग आकर कह रहे हैं, “इसको हमारे हवाले कर दो।” छोड़ोगे क्या? मैं बताता हूँ, छोड़ देते हो, क्योंकि अपनी ज़िंदगी में तुम अपने दम पर, अपने पुरुषार्थ पर, एक लड़की को भी नहीं रख सकते, तो भगवान को कैसे रखोगे? जैसे अपना प्यार समाज के सुपुर्द कर देते हो न, वैसे ही फिर अपना भगवान भी समाज के सुपुर्द कर देते हो। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: साहब नमस्कार। मेरा नाम चेतन है। मैं मथुरा में पैदा हुआ हूँ, वृंदावन में मेरी पढ़ाई हुई है। तो मैंने देखा है कि मेरे शहर की इकोनॉमी मंदिरों पर चलती है। जब शहर में ज़्यादा व्यापार बढ़ाना होता है, तो एक नया मंदिर खुलता है। अभी भी एक नए मंदिर की नींव रखी जा चुकी है। उस मंदिर की पहचान बस इतनी है कि वो दुनिया का सबसे ऊँचा मंदिर है, मंदिर है और ऊँचाई है। बस यही।

तो उससे रिलेटेड मेरे पास कुछ आँकड़े हैं कि 9000 टेंपल्स में से कुछ 1185 करोड़ का डोनेशन कलेक्ट किया गया है, और ये जो आँकड़े हैं, ये मिनिस्ट्री के थ्रू दिए गए हैं। वर्सेस मतलब, मेरे शहर में लोग मेहनत करते हैं, नौकरियों में पैसा कमाते हैं और यहाँ पर दान दे देते हैं। सबसे ज़्यादा यहीं पर चलता है। मैं अपने शहर में जाता हूँ, तो बड़ा अजीब लगता है क्योंकि सिर्फ़ धंधे खुले हुए हैं। मंदिरों के बाहर बाजार खुले हुए हैं। अंदर और ज़्यादा ठगी चलती है जितनी उनसे बाहर चलती है। तो बस, मुझे इस पर थोड़ी सी अगर हम बात कर पाएँ तो, आगे इस बात को ले जा पाएँ तो।

आचार्य प्रशांत: मैं इस पर क्या बात करूँ?

प्रश्नकर्ता: और सर, ये जो आँकड़े हैं, ये सिर्फ़ एक रिलीजन के हैं और बहुत कम रिपोर्टेड हैं। इनकी तो कोई रिपोर्टिंग भी नहीं होती, कोई ऑडिट भी नहीं होती। बिल्कुल अनऑर्गनाइज़्ड हैं। अगर इसे पूरी तरीके से रिपोर्ट कर लिया जाए, शायद ये जो आँकड़े हैं, वो सिर्फ़ ज़मीन के रहे होंगे क्योंकि उसे रिपोर्ट करना ज़रूरी होता है। अगर कैश, सोना, मैनपावर, जाने क्या-क्या मिला दिया जाए, तो ये बहुत सारी मिनिस्ट्री पर से ज़्यादा बजट इस मिनिस्ट्री का हो जाएगा।

आचार्य प्रशांत: और इसमें जब सिर्फ़ हिंदू धर्म ही नहीं, सारे धर्म जोड़ दो, इसमें सिर्फ़ भारत देश ही नहीं पूरी दुनिया जोड़ दो, तो पता चलेगा कि सबसे बड़ी इकोनॉमी तो यही है। क्या अमेरिका और क्या जर्मनी, दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी तो यही है। ठीक है, ऐसा ही है, देखो, जानो, क्या बोलूँ मैं इसमें?

दान पेटी उछल करके आपकी जेब में नहीं घुसी थी और न कैंची से उसने आपकी जेब काटी, न उसने आपका बैंक अकाउंट हैक कर लिया और धोखे से पैसे निकालवा लिए। आपने सारी बात ऐसे कर दी जैसे कि दोष मंदिरों का हो। मंदिर तो बेचारे अपनी जगह पर खड़े हुए हैं। अगर आपको किसी भी तरह के मिश्रण से, दूषण से समस्या है। अगर आपको इस बात से समस्या है कि इतना दान, इतना चंदा जाता है, उसका क्या होता है। तो वो सारा काम तो आदमी कर रहे हैं न, इंसान कर रहे हैं। और इंसान कहकर के मैं लेने वालों की ही बात नहीं कर रहा, मैं देने वालों की भी बात कर रहा हूँ। देने वाले तो आप ही हो। और कौन है? आप बताओ न।

धर्म इंसान की केंद्रीय ज़रूरत होता है। अभी कह रहा था मैं, कि रोटी के बाद हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत धर्म ही है। और उसको मैं रोटी से नीचे इसलिए रख रहा हूँ कि शरीर ही न रहे, मर ही जाओ तो धर्म किसके लिए? लेकिन बस रोटी कहा है और नहीं कुछ कहा है, कि और पचास चीज़ें धर्म का नंबर उनके बाद लगाना है, ये नहीं कहा है। तो बहुत केंद्रीय ज़रूरत होता है इंसान की धर्म, और इंसान आप सब हो पर धर्म को आपने क्या बना डाला? आप बताओ न, किसी और पर दोष क्यों डाल रहे हो। आपका धर्म है न? धर्म किसके लिए है? आपका है न? या किसी संगठन का है, किसी संस्था का है, किसी मठ का है, किसी आश्रम का है, किसी ऑर्डर का है? किसका धर्म है? बोलो भाई।

श्रोता: हमारा।

आचार्य प्रशांत: अपने बच्चे को अपना बच्चा बोल देते हो। बोल देते हो कि नहीं? अपने घर को, अपनी कुर्सी को, अपने कपड़ों को, अपने जूतों को अपनी चीज़ बोल देते हो। अपने पति-पत्नी को कभी किसी और का नहीं बोलोगे।

तो धर्म के मामले में भी वही जोश, वही अपनापन क्यों नहीं दिखाते? वो सब कुछ जहाँ ममत्व घातक होता है, वहाँ तुम ममता लेकर चले आते हो, “मम; मेरा है, मेरा है।” और जो सचमुच तुम्हारा है, तुम्हारा अपना हार्दिक सत्य, वो तुमने दूसरों के हवाले कर दिया है। और बस शिकायत कर रहे हो कि देखो, यहाँ ऐसा हो रहा है, वहाँ ऐसा हो रहा है, ऐसा हो जाता है। लोग बिल्कुल अंधे होकर अनुदान देते हैं। वो लोग माने कौन? आप ही तो हो।

जो चीज़ ऊँची से ऊँची है, वहाँ आप नीची से नीची चेतना लेकर चले जाते हो। तो इसमें किसका दोष मानें? मेरे लिए बहुत आसान होता कि मैं किसी और को दोषी कर देता, बहुत आसान है। हम कर लेते हैं, हर बात में हमें आदत होती है किसी और की खोट निकालने की। और ये खूब रहा है, जो लोग थोड़ा क्रांतिकारी तबीयत के होते हैं, वो कहेंगे, “अरे, ये सब पंडे, पुरोहित, मौलाना, पादरी, ये सब इन्हीं लोगों ने दुनिया बर्बाद कर रखी है।” मैं सहमत ही नहीं हूँ। धर्म तुम्हारा है, तुमने किसी और के हाथ में छोड़ा क्यों? क्यों छोड़ा? ये ऐसी-सी बात है कि आप अपने बच्चे को किसी और के हाथ में छोड़ दो, बच्चा बर्बाद हो जाए तो बोलो, “उन लोगों ने मेरे बच्चे को बर्बाद कर दिया।”

पहला सवाल ये है, कि तुमने छोड़ा क्यों? बच्चा तुम्हारा है। दिल तुम्हारा लगा होना चाहिए था, प्रेम तुम्हारा होना चाहिए था, स्टेक्स तुम्हारे होने चाहिए थे। तुमने छोड़ा क्यों?

तुम पढ़े-लिखे लोग हो, तुम्हें भाषाएँ आती हैं। अनुवाद भी उपलब्ध है, ग्रंथ तुम्हें दे दिए गए हैं। तुम क्यों जाकर आश्रित हो गए? बोलो न। और उन ग्रंथों में जो प्रकाश है, उसके आधार पर चलने के लिए तुम्हारे पास आँखें भी हैं और टाँगें भी हैं। रोशनी आई बाहर से, उस रोशनी ने तुम्हारी आँखें खोल दीं। जैसे जब सुबह होती है, तो देखा है न खिड़की से रोशनी आती है, अपने-आप नींद खुल जाती है। धर्म वही चीज़ है, वो आपकी आँखें खोल देता है। वो बस बाहर की रोशनी नहीं है, वो आँखों की रोशनी है। आँखों को रोशनी मिल गई। टाँगों में जान है, क्योंकि चले हो। तो ख़ुद क्यों नहीं चले? तुमने क्यों कहा कि “कोई और आकर मुझे ऐसे हाथ देगा तो मैं अब चलूँगा।”

“बताइए, बताइए, मौलवी जी, आप बताइए कैसे मुझे ज़िंदगी जीनी चाहिए।” क्यों भाई? घर में दुर्घटना हो गई है, खट से डायल किया पंडित। अब तो डायलिंग भी नहीं होती, अब तो पंडित जी ऐप पर बैठते हैं। पंडित जी ऐप पर बैठे हैं, वहाँ जाकर उनसे पूछा, “घर में आग लग गई और ये हो गया, वो हो गया, और मुझे शक है। ये न कहीं और जाकर कुछ करा करती, गड़बड़ है मामला।” पंडित जी ने कहा, “हाँ, हमारी तीसरी आँख बता रही है कि…।” पंडित जी, इन दो आँखों पर तो तुम्हारे चश्मा चढ़ा हुआ है। ये दो भी तुम्हारी ठीक से नहीं चलती, तीसरी तुम्हारी क्या होगी?

तुमने ये सब मामले आउटसोर्स कैसे कर दिए? आउटसोर्सिंग का सिद्धांत पता है न क्या होता है? जो अपना कचरा काम होता है ज़िंदगी का, वो आउटसोर्स किया जाता है। आप में से कितने लोग अपने कहीं भी काम-धंधे में आउटसोर्सिंग को क़रीब से देखते हैं या समझते हैं? (कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं)। कोई संस्था, कोई कंपनी ऐसी होती है जो अपने कोर काम को आउटसोर्स करती हो?

श्रोता: नहीं।

आचार्य प्रशांत: कोई बैंक बैंकिंग को आउटसोर्स करेगा? वो क्या आउटसोर्स करेगा बैंक? बाहर के सपोर्ट फ़ंक्शन्स, कि क्रेडिट कार्ड का किसी ने पैसा नहीं दिया, तो उसके पास जाकर खटखटाकर कहना, “आपका ये बिल है, पैसा।” तो ये किसी एक्स्टर्नल एजेंसी को आउटसोर्स कर दिया जाएगा।

अमेरिकन कंपनी है, ‘कार मैन्युफ़ैक्चरर’ डेट्रॉइट में, वो अपनी मैन्युफ़ैक्चरिंग आउटसोर्स करेगी? वो क्या कस्टमर सपोर्ट इंडिया को आउटसोर्स कर सकती है, कि “भइया, फोन आएगा, वो पूछेगा कि ‘क्या करें, गाड़ी में ऐसा।’ तो ये टेम्प्लेट है, इसके आधार पर जवाब दे देना।” बाहर के काम आउटसोर्स। आपने तो दिल ही आउटसोर्स कर दिया। आपने तो धर्म को ही आउटसोर्स कर दिया। जो यहाँ की बात है, आपने वहाँ बैठा दी नज़र। वहाँ भी कोई अपनी मर्ज़ी से नहीं, वहाँ भी आपको किसी और ने बता दिया कि “वहाँ है, वहाँ है।”

दुनिया भर में पर्वत हैं, वहाँ आप एक पर्वत पकड़ लोगे, और कहोगे, “वहाँ है मामला।” और वो भी क्या आप चढ़े हो उस पर्वत पर देखने के लिए कि मामला कहाँ है? कोई और आया है एकदम, और उसने आपको बता दिया कि “वहाँ है।” और भीतर हीन-भावना इतनी है कि आपने मान लिया कि वहीं कुछ है। “नो, बट ही इज़ सेइंग… सो यू नो, बेस्ड ऑन हिज़ एक्सपीरियन्स ऐंड मेटाफ़िज़िकल ऐंड मिस्टीकल एनकाउण्टर्स विद द पैरानॉर्मल, आइ रियली थिंक ही हैज़ सम, यू नो, एक्स्ट्राऑर्डिनरी अदरवर्ल्डली नॉलेज।”

ये पढ़े-लिखों का हाल है!

मैंने इतना ही बोल दिया था कि “भैया, नारी-देह का और भी काम होता है। ये बच्चा पैदा करने के लिए ही नहीं है। ये आउटसोर्स कर दो।” मेरे ऊपर आकर चढ़ गए सब! और चीन में अब रोबोट्स सरोगेसी का काम अपने ऊपर ले रहे हैं। और ये काम है जो फिर भी आउटसोर्स कर सकते हो, कि “मैं काहे के लिए दो साल तक अपने शरीर को बर्बाद करूँ?” दो साल और समझ लो, लंबा। वहाँ बड़ी समस्या हो गई, “नहीं, ये तो बिल्कुल हमारा कोर फ़ंक्शन है। ये आउटसोर्स कैसे कर सकते हैं?”

आपका कोर फ़ंक्शन ‘कोख’ नहीं होता, आपका कोर फ़ंक्शन ‘दिल’ होता है। दिल आउटसोर्स करके बैठे हो। वो भी किनको दे दिया है? सब अनपढ़। अनपढ़ सिर्फ़ अविद्या भर में ही नहीं, कि तुम इनसे पूछो साइकोलॉजी, फ़िलॉसफ़ी, समाजशास्त्र, भौतिकी, केमिस्ट्री, इतिहास, कुछ पूछो इनसे, वो तो इनको नहीं ही पता होगा। तुम इनसे जाकर के अगर जो विद्या-विषयक ग्रंथ हैं, वो भी पूछ लो। जाकर पूछ के देख लो, पहली बात तो पूछने का मौका नहीं देंगे। तुम इनके सामने जाकर रख दो, कि “ये रहा, ये ब्रह्मसूत्र में सत्रहवाँ, बताइए।” बताएँगे ही नहीं। मार और दिए जाओगे। बोलेंगे, “अपमान करने आए हो, बाबा जी का! ब्रह्मसूत्र पूछ रहे हो! बाबा जी ख़ुद ब्रह्म हैं।”

वहाँ प्रश्न भी पूछने कौन-से अनुमत हैं? “बाबा जी, मेरी बछिया जो है, बीमार है और पड़ोसी कुत्ता रखता है, वो कुत्ता भौंक देता है, तो जब उसके सामने खली-चूनी लेकर जाते हैं, तो मेरी बछिया खाती नहीं।” बाबा जी वहीं बैठे-बैठे मंत्र कहेंगे, “कुत्ता पालने वाले ये सब स्वान हैं, स्वयं पतित हैं। और इनको ये लगेगा, वो लगेगा, ऐसा करो, वैसा करो।”

ये प्रश्नोत्तरी का स्तर होता है। ये तुमने “धर्म” का स्तर बना लिया। कौन-सा धर्म? आपका धर्म।

जो अपनी चीज़ पर मालिकियत न रख पाए, उसको क्या बोलें? कायर? कापुरुष? पुरुषार्थहीन? क्या बोलें? और कोई छोटी-मोटी चीज़ तुम्हारी कोई उठा लेता है, कुछ कर लेता है, तो लड़ने को खड़े हो जाओगे “हैं जी! मेरा दुपट्टा कैसे छू दिया जी आपने? पूरा प्रेस करा है, चार फोल्ड मारे हैं, मेरा दुपट्टा ख़राब कर दिया!” तुम्हारा दुपट्टा कोई छू दे, तो बहुत बड़ी बात हो गई। और कुछ तो इतने वो होते हैं, ट्रेन की सीट पर देखा था मैंने, बहुत साल पहले की बात है, उनके साथ के लोग दूसरे डब्बे में थे, वो जाकर दूसरे ही डब्बे में बैठे हुए हैं।

एक सज्जन हैं मेरे सामने उनकी यहाँ सीट है। उनके साथ के लोग दूसरे डब्बे में हैं; वो दूसरे ही डब्बे में बैठे हैं। तो अब सामने एसी‑3 टियर था, वो तीन ऐसे होते हैं; वो उधर चले गए तो जो बाक़ी दो थे, वो फैल के बैठ गए। एक इधर आ गया, एक पूरा ही फैल गया; खाली पड़ा है। वो इस पर भी चिढ़ गए वापस आकर, बोले, “मैं मौजूद हूँ कि नहीं मौजूद हूँ? मैं मौजूद हूँ कि नहीं मौजूद हूँ, क्या फ़र्क पड़ता है? मैं ट्रेन पर चढ़ा हूँ। सीट खाली नहीं है, टीटीई ने किसी और को दी नहीं है। आपने पाँव कैसे रख दिया? आप होते कौन हैं मेरी सीट को छूने वाले?”

यहाँ तो इतनी मालिकीयत चल रही है, कि ऐसी ट्रेन जिससे अभी चार घंटे में उतर जाओगे, ऐसी सीट जिस पर तुम्हें बैठना नहीं है, उसको लेके तुम ख़ून‑ख़च्चर करने को तैयार हो गए। और धर्म जो प्राणों का प्राण है हमारा, वो तुम जाकर के इन लोगों को सौंप आए हो और उसके बाद वहाँ जाकर शत‑शत नमन भी कर लेते हो। क्या बोलूँ मैं इसको?

माँ‑बाप होंगे, उनको सौ ताने पड़ जाएँगे, “नहीं, नहीं आप लोगों को न, थोड़ा अपने बच्चे को लेके और केयरफ़ुल होना चाहिए, यू शुड वॉच आउट फॉर हिज़ कंपनी। नहीं, आप लोग देखते नहीं हैं! अच्छा, डे‑केयर में दिया है? कोई बात नहीं। उस वाले में दीजिएगा जैसे सीसीटीवी में लाइव दिखाते रहते हैं कि आपका बेबी वहाँ क्या कर रहा है।”

आप कहीं स्टॉक में पैसा लगाते हो, उसका भी डे‑बाय‑डे मूवमेंट आप वॉच करते रहते हो कि “मेरा पैसा है, मुझे पता होना चाहिए; हर घंटे में कर्व कैसा जा रहा है?” हर चीज़ आप कहते हो “मेरी है, तो मैं बिल्कुल उसको जान‑के, समझ‑के रखूँगा और नियंत्रित करके रखूँगा। है न? संभालूँगा।”

धर्म? धर्म किसको दे दिया है? इससे तो यही पता चलता है कि धर्म से कोई लेना‑देना ही नहीं है। जब लेना‑देना ही नहीं है तो भाई आप सवाल क्यों पूछ रहे हो मुझसे? ऐसी चीज़ पर सवाल पूछो न जिससे आपको कुछ लेना‑देना हो, ऐसी चीज़ पर सवाल पूछो। जो अपना होता है आदमी उसको छोड़ता नहीं कभी। आप क्यों छोड़ आए धर्म को?

कितने लोगों ने अपने संस्थान वग़ैरह के लिए कभी कुछ हायरिंग की है? या हायरिंग‑प्रक्रिया में किसी तरह से शामिल रहे हैं? छोटी से छोटी पोस्ट भी होती है, तो पहले आप वहाँ साफ़ लिखते हो कि जेडी ये है, जॉब डिस्क्रिप्शन, उसमें आप बताते हो कि काम में क्या‑क्या होगा। फिर आप कैंडिडेट‑प्रोफ़ाइल होती है, वो विज्ञापित करते हो कि भाई आपको ये‑ये हों। एक ज़रा‑सी कोई प्रोफ़ाइल हो सकती है, बहुत साधारण‑सी असिस्टेंट‑लेवल की कुछ हो सकती है, उसके लिए भी एक राउंड, दो राउंड होंगे इंटरव्यू के। एक विधिवत प्रक्रिया होती है। योग्यता परखते हो बहुत अच्छे से, और उसके बाद कहते हो, “साहब! पहले छह महीने तो आप रहोगे प्रोबेशन पर, और उसमें गड़बड़ करी प्रोबेशन में, तो निकाल दिए जाओगे।”

सरकारी नौकरियाँ होती हैं, जो सबसे ऊँची सरकारी नौकरियाँ, उसमें आप छह महीने भी नहीं, कई साल तक प्रोबेटरी रहते हो। गड़बड़ करोगे तो निकाल दिए जाओगे; अभी नए‑नए आए हो, ठीक से। आप किसी को धर्मगुरु कैसे नियुक्त करते हो, ये बताओ।

एक बिल्कुल निचले‑तल की नियुक्ति के लिए भी आप सावधानी दिखाते हो, प्रक्रिया दिखाते हो, विधिविधान बनाते हो, और जो बिल्कुल हमारे दिल का मामला है; धर्म हमारा, वहाँ आप किसी के भी सामने जाकर झुक जाते हो।

आप पूछते भी नहीं कि “भाई! तू वहाँ कैसे खड़ा हो गया? तू कौन है? हम परखेंगे तुझे। हम परीक्षा लेंगे पहले तेरी!”

मैं हर प्रकार के श्रम का सम्मान करता हूँ, तो मैं अब ‘चपरासी’ कहूँगा तो उसको अपमान में मत ले लीजिएगा। पर क्या ऐसा आप होने दोगे कि आपके यहाँ पर कोई प्यून है तो वो कहे, “मैं प्यून हूँ तो मेरा बेटा अगला प्यून बनेगा।” ऐसा होने देते हो क्या? क्या आप ये भी होने दोगे कि “मैं प्यून हूँ, तो अगला प्यून मैं नियुक्त करके जाऊँगा।” ये आप होने देते हो क्या? नहीं होने देते न। आप कहते हो, “मेरिट जाँची जाएगी।” तो जहाँ जाकर आप सर झुका आते हो, उनकी मेरिट किसने जाँची? वो कैसे नियुक्त हुए?

मैंने कितना गहरा सवाल पूछ दिया, उफ़! ये इतना गहरा, इतना असंभव प्रश्न है कि आपके दिमाग में ख़ुद तो कभी आएगा ही नहीं। है न? या कि बिल्कुल सीधा सवाल है ये? सीधा सवाल है कि नहीं है? मैं बताता हूँ लेकिन आपके दिमाग में क्यों नहीं आएगा? क्योंकि दूसरों की बैसाखियों पर जीवन के हर क्षेत्र में चलने की आदत पड़ चुकी है। तो धर्म का क्षेत्र फिर अपवाद कैसे हो जाएगा? हर तरीके से हम दूसरों पर आश्रित होकर जीने के आदी हैं, तो धर्म के क्षेत्र में भी हम आश्रित हो लेते हैं बहुत आसानी से।

और जिस पर आश्रित होओगे, वो तुम्हारा शोषण करेगा ही करेगा। फिर रोना मत कि “मैं वहाँ जाकर के…।” छोटा‑मोटा चंदा नहीं जाता है, बिल्कुल ठीक बोला आपने। और वहाँ तो सीधे इस पर जाता है कि “देखो, अब हम भगवान का मंदिर बना रहे हैं। लाला जी! आपने जीवन भर जितना भी पाप किया है, दस करोड़ यहाँ पर दे दो। चार पत्थरों पर आपका नाम लिख दिया जाएगा और सीधे आपके लिए स्वर्ग में सीट आरक्षित हो जाएगी।” और बिल्कुल जाता है पैसा, अथाह पैसा जाता है, अथाह पैसा।

जब हम लाइफ़ के लिए ही किसी और पर अपने आप को डिपेंडेंट मानते हैं, तो आफ़्टर‑लाइफ़ के लिए तो मानेंगे ही मानेंगे न।

यही काम राजनीति में करते हो। यही काम राष्ट्र में करते हो। जैसे धर्म को छोड़ आए हो कि “कोई और संभाल ले,” वैसे ही राष्ट्र को भी छोड़ रखा है, “कोई भी और संभाल ले।” अपने पूरे जीवन को ही हमने छोड़ रखा है, “वहाँ ऊपर कोई बैठा है; वो चलाएगा। हम हैं ही क्या? हम कुछ नहीं हैं। हम कुछ हैं ही नहीं।” जब तुम कुछ हो ही नहीं, तो ये जो कुछ नहीं है इसको दुख भी क्यों हो रहा है? शून्यता को तो दुख भी नहीं हो सकता न, तुम्हें दुख भी न हो फिर।

उदाहरण मौजूद है, इतिहास में भी और दुनिया में भी; जहाँ बड़े-बड़े क्षेत्रों को बना ही दिया गया है रिलीजियस इकोनॉमी और उन क्षेत्रों का भला नहीं हुआ इससे, वो बर्बाद हो गए। रिलीजियस इकोनॉमी समझते हो? कि यहाँ पर लोग और कुछ नहीं करते हैं, बस इस जगह को बहुत बड़ा एक धार्मिक अड्डा बना दो। हर तरफ़ से लोग आएँगे और यहाँ पर दान‑चंदा देकर चले जाएँगे। खूब बड़े-बड़े होटल खड़े हो जाएँगे। इस जगह की महिमा खूब बढ़ा दो, तो हर तरफ़ से लोग आएँगे; उससे ट्रांसपोर्ट इकोनॉमी चलेगी, होटल इकोनॉमी चलेगी, डोनेशन इकोनॉमी चलेगी और जितने तरीके की। कुछ सामान भी यहाँ ख़रीदेंगे, उसकी इकोनॉमी भी चलेगी। लैंड भी जो है यहाँ पर महँगा हो जाएगा क्योंकि धार्मिक किस्म के लोग कहेंगे कि वो पवित्र भूमि है, वहाँ जाकर घर ख़रीदो।

इस पूरी चीज़ में वैल्यू एडिशन है क्या कहीं पर? नहीं। सिर्फ़ एक बिलीफ़ है। इसमें कोई रियल वैल्यू एडिशन तो हो नहीं रहा न, तो एक बबल बनता है जो बर्स्ट करता है और अंजाम अच्छा नहीं होता।

बहुत सारे पुराने लोग हैं, जिनका कहीं न कहीं पर ये बिंदु आ जाता है कि अब हमने जाकर के फलानी जगह पर एक बार में ही पाँच लाख, दस लाख दे दिया है तो अब हमारे पास आपकी संस्था को देने के लिए कुछ नहीं है। वो पहले बताएँगे नहीं। तो इधर-उधर की बात करेंगे, कहेंगे व्यापार में घाटा हो गया, कभी कुछ, कभी कुछ, फिर असली बात बोल देंगे। बोलेंगे, “वो फलानी संस्था है, उसने अब हमारे ही इलाके में एक नया मंदिर बनाना शुरू करा है। तो हमारे ही इलाके में बन रहा था, तो हमने तो वहाँ सीधे जाकर के दस लाख दे दिया है। तो अब एक दो साल अब रुक जाइए, अब जब कुछ होगा तो फिर आपको भी देंगे।” इतने ज़बरदस्त तरीके से मानसिक ग़ुलामी है कि आपको समझ में भी नहीं आता कि धर्म है कहाँ पर।

जैसे ही किसी ने आकर के बोला, कि “देखो, इतनी ईंटों का योगदान करो या इतने पत्थरों का योगदान करो और इसमें इतने लाख रुपए लगेंगे, और इतना अगर नहीं दोगे तो भगवान नाराज हो जाएँगे, क्योंकि भगवान पर तो हमारी मोनोपोली है।” थर-थर, काँपने लग जाते हैं आप लोग तुरंत। बिल्कुल नहीं कह पाते, कि “भगवान यदि हैं तो मेरे हैं न। मैं जानती हूँ, मैं हूँ मेरा भगवान है। मैं, मेरी ज़िंदगी, मेरा दिल, मेरा भगवान, मेरी आत्मा। तू कौन आ गया? मुझे भगवान के नाम पर ब्लैकमेल करने के लिए?”

और धर्म का तरीका हमेशा से यही रहा है, ये तरीका अगर समझना हो तो बहुत अच्छी केस स्टडी है। यूरोप के डार्क एजेस वहाँ जाकर पढ़ो। ख़ासकर जब वो डार्क एजेस रेनसा की लहर से टकराते हैं। तब क्या होता है? तब देखो कि ऑर्गनाइज़्ड रिलीजन ने कैसे‑कैसे हथकंडे लगाए थे, विचार को और चेतना को दबाने के लिए। इन्हीं सब प्रीस्ट, पादरियों ने किया था ये सब। जिसको आज आप वैचारिक रूप से आज़ाद और उदार यूरोप कहते हो, वो ऐसे ही नहीं आ गया। लाखों लाशें गिरी हैं। चर्च ने जितने तरीके के हथकंडे हो सकते थे और हिंसा हो सकती थी, सब लगाई चिंतकों और दार्शनिकों को रोकने के लिए।

उसके बाद वो हो पाया कि यूरोप, और उसी यूरोप का जो विचार है, उससे फिर अमेरिका खड़ा हुआ। और वही, फिर जो यूरोप का विचार था, वो भारत पहुँचा। तो फिर भारत में भी जो बहुत सारी पुरानी बुराइयाँ चल रही थीं, वो हटाई गईं।

वो आसानी से नहीं होता, मन पर बहुत ज़बरदस्त कब्ज़ा होता है, और उन लोगों का धंधा ही है आपके मन पर तरह-तरह से कब्ज़ा करना। तुम सोचो, उनके पास और कोई योग्यता है? उन सब लोगों को सोचो जो अपने आप को धर्म के क्षेत्र का बोलते हैं। सोचो, अगर वो उस क्षेत्र के नहीं होते तो क्या कर रहे होते? तो सोचो, भिखारी की लॉटरी लग गई है। वो जान दे देगा, लेकिन अपनी लॉटरी नहीं छोड़ेगा न। और उसको पता है कि अगर ये नहीं, तो फिर उसके पास…। तो वो हर हथकंडा लगाएगा, आपको अपने बस में रखने का, अपना धंधा चमकाने का।

लेकिन मैं उसके बाद भी बताता हूँ। कोई रिलीजियस ऑथॉरिटी अभी आपके सामने आ जाए। आपके भीतर कोई होगा जो बहुत ज़ोर लगाएगा कि “यार, एक बार इसको नमस्कार तो कर ही लो न।” बोलिए है कि नहीं? वही उनकी ताक़त है।

मैं आपको कुछ भी कह लूँ, कुछ भी समझा लूँ। आपके सामने एक ख़ास लिबास में ख़ास तरीके से बात करने वाला एक पारंपरिक व्यक्तित्व खड़ा हो जाए। कुछ होगा आपके भीतर, जैसे आप बैठे हो खट से आपके घुटने सीधे हो जाएँगे। आपको पता भी नहीं चलेगा ये क्यों हुआ। आपका सर झुक जाएगा, आपके हाथ जुड़ जाएँगे। कुछ हो जाएगा। आपकी बुद्धि, आपकी चेतना आपको समझाती रहेगी, “क्या कर रहे हो? ये फ़्रॉड है। तुम जानते हो ये फर्जी है।” लेकिन फिर भी आप खड़े हो जाओगे, आप ऐसे (हाथ जोड़कर झुकने का अभिनय करते हैं) करोगे। आप उससे ‘जी’ करके ही बात करोगे। कारण सीधा है, आपने अपना भगवान उनको सौंप दिया, उनको बहुत बड़ी चीज़ सौंप दी आपने।

मैं आपसे कह रहा हूँ, अपना भगवान वापस लीजिए। भगवान हमारे हैं और कहीं किसी ढाँचे में नहीं रहते, हमारे दिल में रहते हैं। उन्हीं भगवान को वेदांत कहता है; आत्मा सत्य।

सोचने में ही जान निकल रही है। करेंगे कैसे? अभिमंत्रित जल छिड़क के शाप दे दिया तो! चुहिया बना दिया तो!

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी ऐसा इसमें क्या है कि समूह में लोग आते हैं। मैंने दो साल से प्रयास किया जब भी आते हैं, हम प्लान करके भी बैठते हैं कि हम उठेंगे नहीं अपनी सीट से नॉर्मल एकदम नॉर्मल बैठेंगे। काफ़ी सफलता मिली है, आपसे जैसे-जैसे मैं जुड़ता जा रहा हूँ, आज मैं पहली बार यहाँ पर आया हूँ। वाइफ़ को अचानक लखनऊ तक ट्रीटमेंट दिलवाया, सफल नहीं हो पाया। तो यहाँ के लोगों ने मुझे खींचा “यहाँ आ जाओ, यहाँ आ जाओ।” मैं 14 दिन से यहाँ पड़ा हूँ। इस लालच में, शायद मुझे यहाँ आपसे मिलने का मौका मिल जाए।

हम सिंधी कम्युनिटी से हैं। हर साल तीन-तीन बार समाज के लोग आके इंटेरोगेट करते हैं। पहले पाँच-चार-छह आते थे। अब बारह-पंद्रह आदमी हमारे प्रतिष्ठान के अंदर आ जाते हैं। अब ये होता है कि इनको कैसे फेस करें?

आचार्य प्रशांत: प्यार होना चाहिए न। बात सारी उस ज़िंदगी की है, जिसके दिल में प्यार धड़क रहा हो। मैं साधारण प्यार की बात कर रहा हूँ, अभी मान लीजिए आदमी–औरत वाले ही प्यार की। आपको प्रेम है किसी से, पंद्रह लोग आकर कह रहे हैं, “इसको हमारे हवाले कर दो।” छोड़ोगे क्या? मैं बताता हूँ, छोड़ देते हो, क्योंकि अपनी ज़िंदगी में तुम अपने दम पर, अपने पुरुषार्थ पर, एक लड़की को भी नहीं रख सकते, तो भगवान को कैसे रखोगे? जैसे अपना प्यार समाज के सुपुर्द कर देते हो न, वैसे ही फिर अपना भगवान भी समाज के सुपुर्द कर देते हो। ये सब बातें आपस में जुड़ी हुई हैं, समझो इस बात को।

आपने कहा, “पीयर प्रेशर या ग्रुप साइकोलॉजी,” वो चीज़ तो बचपन से दिखाई देती है। स्कूल कैसे चुना गया? मोहल्ले वालों ने कहा, फलाना स्कूल। ग्यारहवीं में क्या, कॉमर्स, साइंस, क्या लेना है? जैसा कि दिल तो है नहीं न कहीं। उसके बाद इंजीनियरिंग में घुस गए, मान लो ब्रांच कौन-सी लेनी है? जो सबने बताया कि ‘हॉट’ चल रही है, इसमें नौकरी बढ़िया लगती है। दिल हो सकता है केमिकल में हो, पर नौकरी कंप्यूटर में लगती है, तो वो कंप्यूटर में ही घुसेगा।

उसके बाद नौकरी, पचास तरह के हो सकता है आपके पास विकल्प हों, लेकिन वही चुनोगे जो समाज में प्रतिष्ठित माना जाता है। हर काम जब समाज के दबाव में ही कर रहे हो, और फिर तो वही आ जाता है, लड़की या लड़का, जो कि अपने-आप में बहुत-बहुत निजी बात होती है। कोई और घुस कैसे गया इस मामले में, बीच में? लेकिन जो व्यक्ति समाज के दबाव में अपने प्रेम की कुर्बानी दे सकता है, भगवान की भी देगा, क्योंकि भगवान से भी रिश्ता तो प्यार का ही होता है न। प्यार नहीं है, तो भगवान से भी कैसे रिश्ता बनाओगे? भगवान को भी किसी और को सौंप दिया, आउटसोर्स कर दिया, “तुम देख लो जी, हाँ जी, ठीक है जी, हाँ जी।”

सारी समस्या प्रेमहीनता की है, हम बहुत रूखे लोग हैं। हमें प्रेम सीखने की ज़रूरत है। ‘लवलेस’ हैं, इश्क़ नहीं जानते। बहुत डरे हुए हैं, तो बहुत सहम-सहम और सध-सध के चलते हैं। दीवानगी नहीं जानते। भविष्य को लेकर के बहुत आशंकित रहते हैं। तो अज्ञेय में हम कदम बढ़ाना, कूदना तो दूर की बात है, कदम लेने से भी thraarte हैं।

यहाँ बैठे हैं, हमें बता देता है समाज, बताइएगा आपकी ज़िंदगी ऐसी चली है कि नहीं? आप यहाँ हो, आपको एक छवि बता दी जाती है, “वहाँ पहुँच जाओगे न, तो वो अच्छी ज़िंदगी है, हैप्पी लाइफ़ है।” एक ऐसे वहाँ इमेज प्रोजेक्ट कर दी है दीवार पर। ऐसा ही होता है न? अगर तुम वहाँ पहुँच गए, तो तुम बिल्कुल *सक्सेसफुल, सफल, और ये सब कहलाओगे।

और फिर आप अपनी पूरी ज़िंदगी सिर्फ़ पता है क्या करते हो? रिवर्स-इंजीनियरिंग। वो बस एक छवि है, और ये जो है यहाँ से वहाँ तक, ये एक यात्रा है जिसको जीवन बोलते हैं। ये यात्रा आप अपने प्रेम पर नहीं जीते, ये यात्रा आप अपने डर पर करते हो। “मुझे वहाँ पहुँचना है, तो वहाँ पहुँचने के लिए जो कुछ करना होगा, वो मैं हर कदम पर करूँगा।” ऐसे हमारी ज़िंदगी चलती है न?

“मुझे अमेरिका में सेटल होना है या कनाडा में होना है।” आठवीं से मेरे माँ-बाप उस हिसाब से मेरा सब शुरू करा देंगे। जो कुछ भी होता है, “तुम ये सीखो, तुम ये सीखो।” वो पहले तय हो गया, क्योंकि मैं इतना डरा हुआ हूँ कि मैं एक अपरिचित ज़िंदगी, एक इनसिक्योर ज़िंदगी, अज्ञात ज़िंदगी, मैं बर्दाश्त ही नहीं कर पाता। तो वो तो पहले ही तय कर देता हूँ कि वही होना चाहिए। वो, वो लक्ष्य है जीवन का, और फिर पूरा जीवन बस वो, जो हमने एक छवि बना दी है जो हमारे हिसाब से सुरक्षित है, क्योंकि ज्ञात है, क्योंकि अतीत से आ रही है, उस तक पहुँचने में हम लगा देते हैं।

अब एक-एक कदम बस रिवर्स-इंजीनियर्ड है। अगर वहाँ पहुँचना है, तो फिर ये करो, फिर अगर ये करना है तो ये करो, फिर ये करो। वहाँ से एक कदम पीछे, फिर ऐसे-ऐसे तय होता है कि फिर आज क्या करूँ।

सब कुछ तो डर से हो रहा है। तो फिर कोई अगर आकर डरा देगा कि “आसमानों पर ऊपर कोई बैठा है, उसका कोप बरसेगा तुम्हारे ऊपर अगर फलाना काम नहीं किया। अरे! ये क्या किया? महापाप कर दिया तुमने! ये क्या कर दिया? बिल्ली मार दी। अब सोने की बिल्ली बनाकर पंडित-जी को दान करो, नहीं तो कुंभी-पाक नरक में सड़ोगे।” बड़ी ये रोचक कहानी है हिंदी साहित्य में।

प्रश्नकर्ता: सर, एक्चुअली क्या है न, हम चीज़ें जो हैं, ये देख रहे हैं। एक्चुअली मैं भी मथुरा से हूँ, तो ऐसे सौ लोगों को मैं देख रहा हूँ कि वो मंदिरों में जा रहे हैं। तो शुरू से ये सब चीज़ें हमने देखी नहीं, जो आप, जो चीज़ बता रहे हैं, जो आपसे सीखने को मिल रहा है। लेकिन हमने शुरू से वो सब चीज़ों को देखा ही नहीं। हम सौ लोगों को देख रहे हैं और हम अभी भी, जैसे मेरे लाइफ़ में कुछ प्रॉब्लम्स थीं, वो आपके ये सुनने से दूर हुईं। लेकिन एक बार को अभी भी डाउट आ जाता था कि “यार, कहीं मैं कुछ…।”

आचार्य प्रशांत: नहीं, डाउट आ नहीं जाता। वही काम कर रहे हो जो इन्होंने करा है। अच्छा, क्या पढ़ाई करी है आपने?

प्रश्नकर्ता: मैंने एम.सी.ए. किया है, सर।

आचार्य प्रशांत: एम.सी.ए. करा है। तो आपने प्रोग्रामिंग छठी में देखी थी?

प्रश्नकर्ता: जी।

आचार्य प्रशांत: एम.सी.ए. माने मैथ्स ऐंड कम्प्यूटर एप्लिकेशन्स।

प्रश्नकर्ता: हाँ, मास्टर ऑफ कम्प्यूटर एप्लिकेशन।

आचार्य प्रशांत: कम्प्यूटर एप्लिकेशन्स न? तो प्रोग्रामिंग छठी में देखी थी।

प्रश्नकर्ता: नहीं।

आचार्य प्रशांत: आठवीं में देखी थी?

प्रश्नकर्ता: हाँ, आठवीं में देखी थी।

आचार्य प्रशांत: जब आठवीं में देखी तो कहा क्या? कि पिछले एक दशक में तो कभी देखी नहीं, तो अब कैसे देख लूँ? आपको प्रोग्रामिंग पढ़ाई गई और आप कोड लिखने लगे। इसमें कितना समय लगा? पहली भाषा कौन-सी सीखी थी? बेसिक?

प्रश्नकर्ता: बेसिक, सी (C)।

आचार्य प्रशांत: सी (C) थी। सी (C) आपने सीखी और आपने जो पहला अपना छोटा-सा प्रोग्राम लिखा हो, भले ही C = A + B वाला। उसमें कितना समय लग गया?

प्रश्नकर्ता: कुछ चंद मिनट।

आचार्य प्रशांत: तो क्यों कह रहे हो कि कोई चीज़ ज़िंदगी में पहली बार आई है तो कैसे स्वीकार कर लें? हर चीज़ तुम्हारी ज़िंदगी में पहली ही बार आई है और झट से स्वीकार करा है, क्योंकि वहाँ स्वार्थ का मसला था। और कम्प्यूटर ज़िंदगी नहीं है कि ख़ुद को बेवकूफ़ बना लो, वो कम्पाइल ही नहीं करेगा तुम्हारी रबिश।

या कहते हो कभी, कि अरे! इतनी जल्दी सी (C) कैसे? पहले सिखाइए ‘A,’ फिर ‘B,’ फिर ‘B+,’ फिर ‘B++,’ फिर तो आएगा ‘C।’ ऐसे कहते हो क्या, कि पुराने संस्कार हैं, ऐसे कैसे छूट जाएँगे? कहते हो? जैसे बाहरी जगत में नहीं कहते कि पुराने संस्कार कैसे छोड़ देंगे हम। वैसे क्यों कह रहे हो? लीनियर इक्वेशन से क्वाड्रेटिक इक्वेशन में जाने में कितना समय लगाया था आपने? कितना समय लगाया था? या बोला था कि हमारा तो संस्कार ही लीनियर है, बोला था क्या?

जो लोग फिज़िक्स से हैं, न्यूटोनियन फिज़िक्स से मॉडर्न फिज़िक्स में जाने में कितना समय लगाया? या बोला कि अरे! ऐसे थोड़ी होता है। ऐसे थोड़ी, हमें तो पता है, न्यूटन बाबा सब बता गए, वो हमारे संस्कारों में घुस गया। अभी आप ये क्वांटा लेके कहाँ से आ गए? ऐसे थोड़ी होता है। ये कहा क्या कभी? तो वहाँ तो खट से पलट लेते हो, क्योंकि मामला स्वार्थ का है। ये मत बोलो, कि कुछ हावी हो जाता है। ये बोलो, स्वार्थ है। तो बस ये देख लो, स्वार्थ कहाँ पर है। और ये देख लो कि उससे तुम्हें कुछ मिल रहा नहीं है। स्वार्थ की जगह पुरुषार्थ का ख़्याल करो।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। अभी जो बात चल रही थी, धार्मिक चंदे की बात चल रही थी, मैं उसी पर कुछ कहना चाहता हूँ, कि अपने अनुभव से जो मैंने देखा है, कि दो चीज़ें हैं और साथ में उसमें। एक तो, जो डर की बात हो रही थी, कि डर लगता है कि लोग–परलोक में क्या होगा? ये सब होगा, लोग इसकी बात करते हैं। जो मैंने देखा है, कि एक तो सामाजिक डर होता है। जैसे मैं अपने अनुभव से बताऊँ कि जब मैंने काम शुरू किया था, आसपास के लोग आते थे, कि डॉक्टर साहब, कुछ तो चंदा दे दो। कोई हम मंदिर बना रहे हैं, या कई बार जागरण करते हैं। तो मैं कभी इनको कभी नहीं देता, कभी नहीं दिया मैंने।

तो उसमें फिर बड़ा प्रेशर आता था, लोग इकट्ठे होके आते थे, कितने सारे लोग इकट्ठे आते थे। अभी पीछे भी दो साल पहले भी आए, जन्माष्टमी के लिए, तो मैंने बिल्कुल मना कर दिया, कि नहीं बिल्कुल नहीं। तो वो फिर बातें करते हैं कि अच्छा, आप हिन्दू नहीं हो। तो मैंने कहा, ठीक है, अभी तो आप चले जाइए, बाद में क्लीनिक के बाद आइएगा, फिर बात बताऊँगा मैं, बात करते हैं कि हिन्दू क्या होता है।

तो उससे पहले बताऊँ कि जब वो चंदा माँगते थे, तो मैं उनसे उल्टा ये कहता था, कि जो आप कर रहे हो सारे लोगों को जगाओगे, कितने लोग वृद्ध लोग होंगे, स्टूडेंट होंगे जो नहीं पढ़ पाएँगे, आपके इस काम की वजह से, और इससे आपको मिलेगा क्या? किसी को भी क्या मिलेगा? तो ये बातें होती थीं। तो एक तो ये मेरा अनुभव है।

दूसरा; सामाजिकता, कि जो आसपास के लोग हैं, जितने भी कि इनमें मैं बुरा न बन जाऊँ। कल को मेरा काम कम न हो जाए इस चीज़ से। लोगों में ये देखिए, भावना इस तरह की, ठीक है, माँगने आया है इसको दे दो पैसे। कोई बात नहीं है, मैं क्यों इसमें थोड़ा-सा बुरा बनूँ? थोड़ा देना पड़ रहा है। तो लोग इसलिए उनको दे देते हैं पैसा।

आचार्य प्रशांत: नहीं, इसमें आप बहुत हो गया, बैकफ़ुट पर मत खेलिए। वो आपके पास आते हैं कि हम जागरण कर रहे हैं, कुछ कर रहे हैं। अपने आप में ये अच्छी बात भी हो सकती है, बशर्ते ‘जागरण’ माने फिर जागरण हो। मत कहिए कि नहीं दूँगा पैसा। कहिए, कि बिल्कुल दूँगा, पर जागरण होना चाहिए। शोर-शराबा जागरण नहीं होता, ये जो तुम करते हो, ये जागरण नहीं होता। वास्तविक जागरण करो। मैं सबसे ज़्यादा दूँगा चंदा, मैं दूँगा। और ये सब मैं लिख करके दे रहा हूँ, ऐसे-ऐसे जागरण आयोजित करो और ऐसे-ऐसे करो, और मैं दूँगा चंदा। और वो फिर कहेंगे, नहीं, ऐसे तो नहीं होगा। तो कहिए, क्या तुम हिन्दू नहीं हो?

धर्म को छोड़ थोड़ी देना है, धर्म को सुधारना है। शब्द तो बहुत सुंदर है न; ‘जागरण।’ जागरण माने ये थोड़ी, कि रात भर चला रहे हो, चिड़िया नहीं सो पा रही। चिड़ियों को क्यों जागरण करा रहे हो? कुत्ते बेचारे इधर-उधर भाग रहे, दुम दबाकर। उनका क्या जागरण करा रहे हो? बूढ़े लोग, बीमार लोग, उनका क्या जागरण करा रहे हो? और तुम ये, हो हल्ला–हुड़दंग, ये जागरण है? ये क्या कर रहे हो?

आप सबको भी लज्जित होना पड़ता है जब वो सब सामने आता है, कि ये देखो धर्म के नाम पर ये क्या, कौन-सा नाच गाना। ये क्या कर रहे हैं? कभी देवी प्रतिमा सामने रख के, कभी कुछ और करके, ये धर्म है? ये किस तरह का धर्म है?

तो करेंगे जागरण, बेशक करेंगे पर इस तरह से करेंगे कि सचमुच ये जो पूरा क्षेत्र है हमारा, जो इससे प्रभावित होगा, ये भीतर से थोड़ा साफ़ हो पाए, थोड़ा बेहतर हो पाए, केंद्र में शुद्धता आ पाए। ऐसे करेंगे जागरण। तुम ऐसे करो और मैं देता हूँ डोनेशन। और मैं ही नहीं दूँगा, एक संस्था को मैं जानता हूँ, मैं उनसे भी कहूँगा कि आप इनको डोनेशन दीजिए। और नहीं माने तो?

श्रोता: क्या तुम हिन्दू नहीं हो?

आचार्य प्रशांत: बहुत हो गया बैकफ़ुट पर खेलना। वो आपसे बोल रहे हैं, आप हिन्दू नहीं हैं। आपका हक़ है आप उनसे बोलिए, तुम हिन्दू नहीं हो। आपका हक़ है, आप असली सनातनी हो। आपको बोलना चाहिए, क्या, तुम हिन्दू नहीं हो? ये क्या कर रहे हो? ये नहीं है सनातन धर्म। आप क्यों डर जाते हो? कोई आकर बोल देता है, “अरे! तुम नास्तिक निकले।” बोलो, बेटा, हम तो पक्के हैं, तुम क्या हो? अपनी बताओ। अपना परिचय दीजिए आप जनाब। हम तो पक्के आस्तिक हैं, तुम अपना परिचय दो, तुम कौन हो?

क्या करें? इनको छोड़ दें श्र कृष्ण को? छोड़ दें? ये कह करके कि देखो, उनके नाम पर तो अब बस यही होता है, शोर-शराबा, और लड़के–लड़कियाँ नाच रहे हैं कृष्ण–राधा बनकर के, और यही हा हा हा; बिल्कुल रस है, रास है, रस है, रंग है, यही है? छोड़ दें? या गीता को बिल्कुल शुद्ध–साफ़ रूप में सबके पास लेकर आएँ? बोलो।

श्रोता: सबके पास लेकर आएँ।

आचार्य प्रशांत: क्यों छोड़ें श्रीकृष्ण को? हमारे हैं। दिल की बात है, प्यार का मामला है, नहीं छोड़ेंगे। ऋषियों की धरोहर है, बहुत ऊँची बात है, गहरा दर्शन है मनुष्य को दुख से मुक्ति दिला सकता है। छोड़ दें? नहीं छोड़ेंगे। वापस लेंगे, रिक्लेम। डर मत जाया करिए। डिफ़ेन्सिव मत हो जाया करिए। बल्कि ऐसा कोई मिले तो कहो, “दरवाज़े पर ही खड़े रहेंगे, भीतर आइए और जब भीतर आएँ तो पहले दरवाज़े पर ताला लगाएँ, भागने का कोई जुगाड़ मत छोड़िए। तसल्ली से बैठो, बोलो, तीन घंटे से पहले बाहर नहीं जाना है, पूरी चर्चा होगी, पूरी बात खुलेगी आज।

आप क्यों पीछे हट जाते हो? क्रोधित हो जाते हो, प्रतिक्रिया करने लगते हो, क्यों? ऐसों की तो तलाश में रहना चाहिए, जो अपने आप को बताए, कि मैं धार्मिक आदमी हूँ, मैं बड़ा आस्तिक हूँ। और आपके पास अभी मौका है, मेरा तो चूक गया। मेरे पास अब आते ही नहीं ऐसे। मेरे तो आसपास, कहीं मैं निकल जाऊँ बाहर शहर, मोहल्ला, मॉल, कहीं, तो ऐसे अगर होते भी हैं तो ऐसे देखेंगे आपस में (बड़ी-बड़ी आँखे करके भागने का अभिनय करते हुए)।

एक-आध दो बार तो मुझे हुआ है, मैं कहूँ, अरे रुको, ठहरो ज़रा इधर आओ, कॉफ़ी मैं पिलाऊँगा, बैठो तो। वो भागते हैं बहुत ज़ोर से। प्यार है कि नहीं? या बस नाम मात्र की बात है, राम की और श्रीकृष्ण की? बोलिए।

श्रोता: है।

आचार्य प्रशांत: प्यार है न, तो अपनी चीज़ वापस लीजिए ठीक। क्यों छोड़ूँ? और चाहूँ भी तो छोड़ सकता हूँ क्या?

श्रोता: नहीं।

आचार्य प्रशांत: बस ख़त्म। आऊँ, मतलब जगराता हो रहा है भाई, मैं मुख्य अतिथि बन के आऊँगा। छोड़ कैसे सकता हूँ?

प्रश्नकर्ता: छोटे-से प्रश्न और हैं इसी में कि कुछ लोग कैसे बच जाते हैं इन आडंबरों में। जैसे मैं देखता हूँ यहाँ पर, तीन साल हो रहे हैं संस्था में, यहाँ आते हुए। मैं ज़्यादातर लोगों को देखता हूँ, वैसे भी देखता हूँ कि ये लोकधर्म का, झूठा धर्म का बहुत ज़्यादा बोलबाला है। लेकिन फिर मैं अपने को पाता हूँ, मैं इस चीज़ में कम से कम अलग से पाता हूँ शुरू से। अपने आप ही था कि ये कभी नहीं रहा, श्रीकृष्ण नहीं मिले मुझे पहले लेकिन ये लोकधर्म में कभी नहीं फँसा मैं, शुरू से ही।

और जबकि मेरा जो घर का माहौल है, आसपास है, जितने फ्रेंड्स हैं, सब मिलने वाले हैं, सब ऐसे ही हैं। तो ये ऐसे क्या रहा होगा कि कैसे मैं यहाँ पर?

आचार्य प्रशांत: असल में आपने जो करा वो आसान है। वो जो कर रहे हैं, वो कठिन है। क्योंकि जो बातें लोकधर्म में चलाई जाती हैं, वो इतनी मूर्खता की हैं, इतनी प्रत्यक्ष रूप से, स्पष्ट, ऑब्वियस रूप से खोखली हैं कि ताज्जुब इस बात पर होना चाहिए कि इतने लोग फँस कैसे जाते हैं। वो ताज्जुब की बात है। आपने जो करा, वो तो कोई भी स्वस्थ आदमी अपनी सहज बुद्धि से करेगा। उसको दिखेगा, कि भाई, ये क्या? क्या तुम मेरा मज़ाक कर रहे हो? नॉनसेंस क्या लेकर आए हो ये? उसको तो दिखेगा। माया का चमत्कार ये है कि उन सब बातों में करोड़ों, 99% वहाँ फँसे हुए हैं। वो है चमत्कार।

कुछ नहीं हैं। इन सब सारी बातों के पीछे वही है, भय और प्रेम का द्वन्द्व। प्रेम की राह पर डर तो है ही है, अहंकार को चुनना होता है। इधर (आत्मा की ओर) जाने में क्या लगना है निश्चित रूप से? भय है। क्या ख़र्च होना है? श्रम। पर मामला तो प्रेम का इधर ही है, अहम्, आत्मा। इधर (प्रकृति की ओर) सुविधा है। हम सुविधा चुन लेते हैं, प्रेम छोड़ देते हैं; सुविधा चुन लेते हैं। वही ज़िंदगी की कहानी है हमारी। छोटी-छोटी बातों में प्रेम छोड़ा, सुविधा चुनी। प्रेम त्यागा, सुविधा चुनी। तो फिर वही चीज़ हमारी धार्मिकता में है।

फिर एक बात बोलूँगा मैं, जैसे मैं पहले बता रहा था, अभी चंदे वाली बात, उस समय मुझे था ये कि, भई, इसकी बहुत क़ीमत चुकानी पड़ सकती है; कि ये लोग आसपास नहीं आएँगे। उस समय तब परवाह भी नहीं की। मैंने कहा, नहीं आएँगे तो अच्छा, कुछ नहीं है; लेकिन मुझे ये गलत काम में नहीं देना है एक पैसा भी। सही जगह देता रहूँगा, लेकिन गलत काम में नहीं देना। तब भी ये बात थी। और उसी समय मैं देखता था कि शायद नुक़सान होगा मुझे, इससे लोग आसपास के नहीं आएँगे। और ये तब से अभी भी होता है ऐसा, कि लोग आते हैं फिर। शायद मुझे ये है कि अपना ये लोभ छोड़ना पड़ेगा, इस चीज़ का लालच।

आचार्य प्रशांत: नहीं, मैं इसमें थोड़ा-थोड़ा-सा अलग बात कह रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ, इसमें अभी भी एक डिफ़ेन्सिवनेस है। वो है न कि “बॉल को ऐसे खेलूँगा, बेसलाइन पर ही रहूँगा।” नेट पर जाना शुरू करिए। फ़्रंटफुट पर और आगे जाकर के बॉल, ख़त्म करिए। वो आपके पास आए हैं, तो बस ये आशंका नहीं आनी चाहिए कि “इसकी वजह से मेरा समाज में नुक़सान हो जाएगा, अगर मैं नहीं दूँगा इनको।” और मैं नुक़सान बर्दाश्त करने को तैयार हूँ, पर मैं तुम्हें नहीं दूँगा। एक तो ये तरीका है। इसमें वीरता है, निश्चित रूप से; पर इसमें अभी भी आशंका है, कि “मुझे दिख रहा है मेरा नुक़सान हो जाएगा। मैं मान रहा हूँ कि तुम बहुत ताक़तवर हो, पर मैं तुमको नहीं दूँगा।” ये अच्छा है, ये एक रेज़िस्टेन्स है।

मैं और अब इससे आगे जाने की बात कर रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ, सिर्फ़ रेज़िस्ट मत करिए, जीतिए। उसको घर के अंदर बुलाइए। समझ रहे हो मैं क्या बोलना चाह रहा हूँ? आप क्यों? ये समाज आपका होना चाहिए। आपने उनको क़ब्ज़ा क्यों करने दिया है? मैं ये कह रहा हूँ। आप पीछे हट जाओगे। आप कहोगे, “तुम जो भी आयोजन कर रहे हो, तुम कर लो और मैं उसमें शामिल नहीं हूँ।” तो आयोजन तो सफल ही हो गया न! आप शामिल होइए और आप पूछिए बात-बात में, “हाँ भाई, बताओ। बताओ, क्या मामला है?”

श्रोता: आचार्य जी भगा देते हैं।

आचार्य प्रशांत: कौन?

श्रोता: मैं ऐसे जवाब कर रही थी तो मुझे भगा दिया वहाँ से।

आचार्य प्रशांत: कहिए कि “तुम हिन्दू नहीं हो क्या? एक धार्मिक काम से एक हिन्दू को बेदख़ल कर रहे हो? ये तुम क्या पाप कर रहे हो? जहाँ धर्म का काम चल रहा हो, वहाँ एक अच्छी, सात्त्विक, पवित्र, पावन हिन्दू स्त्री आकर बैठी है और तुम उससे कह रहे हो कि हटो यहाँ से? तुम्हें पाप लगेगा?”

श्रोता: मैं ऐसा बोलती हूँ तो लोग मुझे बदतमीज़ बोलते हैं।

आचार्य प्रशांत: “अरे! बदतमीज़ हूँ, तब तो मुझे धर्म की और ज़रूरत है न! मैं यहाँ बैठूँगी पालथी मार के। मुझे ज्ञान दो और मेरे शंका-समाधान करो। एक पूरी टोकरी लेकर आई हूँ शंकाओं की। ये लो पहली।”

मैं छोटा था तब से, वैष्णव परिवार मेरा भी, पिताजी मेरे। माताजी की ओर से पूरा मामला वैष्णव। पिताजी दूसरी प्रकृति के। उस दिन आपसे ज़िक्र कर रहा था अघोरी बाबा का, रमैया बाबा का। तो वो उधर से आए, और उनकी दूसरी इक्वेशन रहती थी पंडितों के साथ। तो वो बैठ जाएँ उनके बगल में। और संस्कृत के बहुत अच्छे ज्ञाता थे, पापा। पंडित जी बोलें, वो “पंडित जी, उच्चारण ऐसे नहीं ऐसे करो। हाँ, दोबारा बोलो अब। अरे पंडित जी, इसमें ये क्यों जोड़ के बोल रहे हो? अनर्थ हो गया।”

अब पंडित जी मना भी नहीं कर सकते, क्योंकि जो बात कही जा रही है वो शुद्ध है और विद्वत्ता की है, और वहाँ बात खुल भी रही है। अब एक तरीका तो ये हो सकता है कि वो सब कुछ तुम सुपुर्द कर दो पंडित जी के ही, कि “पंडित जी, आपको जो करना है करो।” दूसरा ये कि घुस जाओ, “बताओ, मतलब बताओ? और अर्थ का अनर्थ क्यों कर रहे हो? ये बताओ। और अभी जो मौका है, इस मौके पर इस श्लोक की प्रासंगिकता क्या है? ज़रा वो भी बताना। जिन देवताओं से प्रार्थना कर रहे हो, वो सब देवता किन प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक हैं, थोड़ा वो भी बताना।”

मुझे बड़ा मज़ा आए। मैं वहाँ बैठ जाऊँ बिल्कुल बगल में कि देखूँ अब नेक्स्ट राउंड, हाँ। समझ रहे हो?

इररेवरेन्स; ये सिर है ये फ़ालतू नहीं झुकता। एक जगह झुकता है और कहीं नहीं। और न डरते हैं, बेधड़क आएँगे, देखते हैं क्या नुक़सान कर लोगे?

मेरी माँ उनसे कई बार कहती थी, कि “आप अपने विभाग में जाकर के मंत्री को ये बोल आए हो, अब यहाँ पर ये कर रहे हो। हर जगह कुछ न कुछ आप ये करते ही रहते हो।” तो एक उन्होंने बात कही थी। उन्होंने कहा था, कि “भ्रष्ट आदमी से कभी सामना हो और देखो कि वो बहुत ताव दिखा रहा है, बहुत क्रोध दिखा रहा है, तो ये जान लेना कि दिखा रहा है क्रोध और भीतर से डर हुआ है। तो भ्रष्ट आदमी कभी भी कुपित दिखे, धमकी देता दिखाई दे तो जान लो कि ये डर गया है।”

उनका वाक्य था, “भ्रष्ट आदमी गुस्साता बाद में है, डरता पहले है।” तो उसके गुस्से से तुम पीछे मत हट जाना। जान लेना कि डर गया। तभी गुस्सा दिखा रहा है।

प्रश्नकर्ता: जैसे-जैसे यहाँ पर मनी का फ़्लो बढ़ रहा है, एक दूसरे तरीक़े के मुद्दे, इंस्टीट्यूशनलाइज़ेशन होते जा रहा है उनका; कि मूर्ति निकल रही है, वहाँ पर और ज़्यादा खुदाई हो रही है, इसको मुद्दा बनाया जा रहा है। और यहाँ पर बहुत आइज़-गैप हो रही है, यहाँ पर बहुत अटेंशन-गैप हो रही है। वहाँ से एक अलग तरीके का कट्टरपंथ निकलता जा रहा है, जो कहता है कि देखो।

आचार्य प्रशांत: अलग तरह का नहीं है, वो बहुत पुराना है। जिसका भगवान यहाँ (हृदय) नहीं है, उसके भगवान को न, ये पूरा जहान कम पड़ेगा। वो दस लाख मंदिर बना लेगा तो भी पूरा नहीं पड़ेगा। वो कहेगा, और ज़मीन चाहिए, और ज़मीन चाहिए। इसका भी खाट दो, यहाँ जाओ और जगहों पर कब्ज़ा कर लो, दूसरे देशों पर कब्ज़ा कर लो, लोगों को कन्वर्ट कर दो। यहाँ भगवान नहीं होता न, तो पूरी दुनिया में नहीं होता। फिर आप पूरी दुनिया में जगह-जगह पर मंदिर–मस्जिद बनाते रहते हो, पूरा नहीं पड़ता। तभी तो लोगों को इतना कन्वर्ज़न करना पड़ता है।

जिसके यहाँ होता है न, वो समाज में दूसरे का कन्वर्ज़न करने क्यों जाएगा? और जिसके यहाँ होता है, वो जाकर के कहीं और गड्ढा क्यों खो देगा, कि यहाँ पर भी बनाऊँगा, वहाँ भी बनाऊँगा? भाई, है यहाँ पर पहले से हैं। और यहाँ नहीं है, तो तुम बनाओ, पूरी दुनिया में जो बनाना है तुम्हें; चर्च, मंदिर, मस्जिद, पूरा नहीं पड़ेगा। सारी समस्या लवलैसनेस की है, “यहाँ नहीं है, यहाँ नहीं है।”

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं बस इसी में एक एग्ज़ाम्पल देना चाहूँगी। एक्चुअली, दिल्ली में एक काफ़ी बड़ा हॉस्पिटल है। उसकी एक ब्रांच खुली है रोहिणी में, नॉर्थ दिल्ली में। तो जब उसके लिए उन्होंने पैसे इकट्ठे करने थे टु मेक दैट हॉस्पिटल, तो लोगों को क्या लालच दिया? कि 5 लाख वाज़ द मिनिमम डोनेशन। तो उसके बाद वो इतना बड़ा एक पोस्टर-टाइप देते थे, और वो लोग अपने घर के बाहर उसको लगाते थे, कि ट्रस्टी ऑफ दिस हॉस्पिटल।

तो वो बात तक तो मुझे समझ आई कि चलो, कोई बात नहीं, आप डोनेशन कर रहे हो। अभी मैंने रिसेंटली क्या देखा? कि राजस्थान का एक बहुत फ़ेमस मंदिर है। उसकी एक ब्रांच खुली है दिल्ली में। उसके लिए जब डोनेशन्स ले रहे हैं, तो उसमें भी वो इतना बड़ा दे रहे हैं, ऐसे आपका फ़ोटो होगी, आपका नाम होगा, ट्रस्टी ऑफ दिस मंदिर और वो लोग अपने घर के बाहर लगा रहे हैं उसको।

मतलब मंदिर बनाने के लिए भी आप पहले चंदा देते हो, और फिर उसके लिए आप अपनी पब्लिसिटी भी करते हो कि हमने यहाँ चंदा दिया है, हम यहाँ के *ट्रस्टी *हैं।

आचार्य प्रशांत: जिस दिन ऐसा हो जाएगा, कि एकदम मेरा देश फैसला ही सुना देगा आख़िरी कि “इसने इसी राह को चुन लिया है। ऐसे ही आगे बढ़ेगा।” देखेंगे। और क्या करेंगे? जब तक जान है, तब तक भिड़ेंगे। अपना हक़ तो नहीं छोड़ेंगे। और जब एक के सामने फिर दस लाख ही खड़े हो जाएँगे, उस दिन गरिमा के साथ।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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