प्यार होना चाहिए न। बात सारी उस ज़िंदगी की है, जिसके दिल में प्यार धड़क रहा हो। मैं साधारण प्यार की बात कर रहा हूँ, अभी मान लीजिए आदमी–औरत वाले ही प्यार की। आपको प्रेम है किसी से, पंद्रह लोग आकर कह रहे हैं, “इसको हमारे हवाले कर दो।” छोड़ोगे क्या? मैं बताता हूँ, छोड़ देते हो, क्योंकि अपनी ज़िंदगी में तुम अपने दम पर, अपने पुरुषार्थ पर, एक लड़की को भी नहीं रख सकते, तो भगवान को कैसे रखोगे? जैसे अपना प्यार समाज के सुपुर्द कर देते हो न, वैसे ही फिर अपना भगवान भी समाज के सुपुर्द कर देते हो।
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प्रश्नकर्ता: साहब नमस्कार। मेरा नाम चेतन है। मैं मथुरा में पैदा हुआ हूँ, वृंदावन में मेरी पढ़ाई हुई है। तो मैंने देखा है कि मेरे शहर की इकोनॉमी मंदिरों पर चलती है। जब शहर में ज़्यादा व्यापार बढ़ाना होता है, तो एक नया मंदिर खुलता है। अभी भी एक नए मंदिर की नींव रखी जा चुकी है। उस मंदिर की पहचान बस इतनी है कि वो दुनिया का सबसे ऊँचा मंदिर है, मंदिर है और ऊँचाई है। बस यही।
तो उससे रिलेटेड मेरे पास कुछ आँकड़े हैं कि 9000 टेंपल्स में से कुछ 1185 करोड़ का डोनेशन कलेक्ट किया गया है, और ये जो आँकड़े हैं, ये मिनिस्ट्री के थ्रू दिए गए हैं। वर्सेस मतलब, मेरे शहर में लोग मेहनत करते हैं, नौकरियों में पैसा कमाते हैं और यहाँ पर दान दे देते हैं। सबसे ज़्यादा यहीं पर चलता है। मैं अपने शहर में जाता हूँ, तो बड़ा अजीब लगता है क्योंकि सिर्फ़ धंधे खुले हुए हैं। मंदिरों के बाहर बाजार खुले हुए हैं। अंदर और ज़्यादा ठगी चलती है जितनी उनसे बाहर चलती है। तो बस, मुझे इस पर थोड़ी सी अगर हम बात कर पाएँ तो, आगे इस बात को ले जा पाएँ तो।
आचार्य प्रशांत: मैं इस पर क्या बात करूँ?



