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कितनी गुलाम आज की पीढ़ी || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। आप अपने दर्शकों के लिए आचार्य प्रशांत, मेरे लिए हमेशा प्रशांत।

आचार्य प्रशांत: हाँ, प्रशांत ही रहना भी चाहिए। सब बढ़िया है।

प्र: प्रशांत, बीस साल बीत गये, जब हम आइआइएम में पहली बार मिले थे।

आचार्य: जून दो-हज़ार-एक। जून-दो-हज़ार एक से अब दो-हज़ार-इक्कीस। बीस साल बीत गये हैं पलक झपकते बिलकुल। दुनिया काफ़ी बदल गयी।

प्र: बहुत बदल गयी है। मैं सोचता हूँ पिछले बीस साल में इतना बदलाव आया है, स्पेशली इन्फॉर्मेशन (मुख्यतया सूचना) को लेकर एक्सप्लोजन (विस्फोट) सा हो गया है और उस विस्फोट से जो ये नयी पीढ़ी आयी है, इस पर निश्चित रूप से कुछ-न-कुछ असर हुआ है।

आचार्य: बहुत ज़्यादा, बहुत ज़्यादा। जैसे कि ये नयी पीढ़ी खड़ी ही हुई है बिलकुल नये तरीक़े की मानसिक सामग्री पर, जो उसको इसी इन्फॉर्मेशन एज (सूचना का दौर) ने मुहैया करायी है। इनके पास बहुत अलग तरीक़े का मेंटल कंटेंट (मानसिक सामग्री) है, जो हमारी पीढ़ी के पास नहीं था और जो हमारी पीढ़ी के पास था, वो इनके पास नहीं है। बिलकुल ठीक कह रहे हैं आप।

प्र: इससे आपको लगता है जैसे इन्फॉर्मेशन का पॉजिटिव इम्पैक्ट है कि इनकी नॉलेज (जानकारी) बहुत अच्छी है।

आचार्य: हाँ।

प्र: इनमें आत्मविश्वास भी है, उस जानकारी को इस्तेमाल करने का।

आचार्य: हाँ।

प्र: तो कुल मिलाकर हम उन जितने थे या यहाँ तक कि जब हम आइआइएम में गये थे, मुझे लगता है आज के पन्द्रह-सोलह साल के बच्चे को उतना ही एक्सपोज़र है, जितना इक्कीस-बाईस, तेइस साल के बच्चे को हमारे समय में होता।

आचार्य: हाँ।

प्र: तो ये अच्छी बात है। लेकिन एक कमी सी दिखती है मुझे, कमी ये लगती है कि, मेरा मानना है इसलिए मैं आपके विचार चाहूँगा कि, आज की पीढ़ी शायद भारतीयता को इतनी ज़्यादा महत्व नहीं दे रही है। दे आर लूजिंग दी टच विद द रूट्स ऑर बिइंग इंडियन। (वे अपने मूल से या भारतीय होने से दूर हो रहे हैं।)

आचार्य: जो आप आज की जनरेशन कह रहे हैं, तो आपका इशारा किधर को है? जो अभी दस-बारह साल के हैं या जो अभी सोलह-अठारह के हैं या आप बात कर रहे हैं चौबीस-पच्चीस साल वालों की? क्योंकि इन तीनों में फ़र्क आ चुका है।

प्र: मेरा इशारा टीनेजर्स (किशोरों) की ओर ज़्यादा है, जोकि आपके पन्द्रह-सोलह, अठारह साल के जो बच्चे हैं।

आचार्य: इसमें मेरे ख़्याल से हम बाक़ी दोनों श्रेणियों को भी जोड़ सकते हैं। जो प्री टीन्स (किशोरावस्था से पहले) हैं और जिनको हम यंग जैनरेट्स बोल सकते हैं जो अभी पच्चीस की उम्र के आस-पास के हैं। तो ये वाली जो बात है शायद उन सभी पर लागू होती है। मेरे ख़्याल से जो उन्नीस-सौ-नब्बे के बाद जिनका भी जन्म हुआ है, शायद ये बात सभी पर लागू होती है और जितना ज़्यादा हाल के बच्चे हैं, उन पर उतनी ज़्यादा ये बात लागू है। तो जो आप बोल रहे हैं कि ये अभारतीय से हो रहे हैं, इनका डीएंडियनाइजेशन या डीनेशनलाइजेशन हो रहा है, जैसा आपको लगा। तो शुरुआत करने के लिए, इसके एक-आध आप लक्षण बताइएगा, क्या हैं।

प्र: मैं देखता हूँ तो मेरे भी बच्चे इस आयु वर्ग में हैं। भिन्न-भिन्न बच्चे हैं और मैं सामान्यतया देखता हूँ, जैसे दो-तीन चीज़ें आपको बताता हूँ — जैसे भाषा है हिन्दी, अगर घर में हिन्दी बोली भी जा रही है, तो भी बच्चे शायद हिन्दी बोलना नहीं चाहते या आपकी अपनी कोई (क्षेत्रीय मातृ-भाषा) है। आप स्पेनिश, फ्रेंच , जर्मन, पढ़ना चाहेंगे। अगर आपको मौक़ा दिया जाए साहित्य पढ़ने का, तो आप अंग्रेज़ी साहित्य की ओर जाएँगे। इसी तरह से फ़िल्में हैं, यहाँ तक की फेस्टिवल्स (त्यौहार) हैं।

आचार्य: फेस्टिवल्स में क्या?

प्र: जैसे कि जितना उत्साह मैंने शायद हैलोवीन (ईसाइयों का पितृपक्ष त्यौहार) की तरफ़ देखा है बच्चों का।

आचार्य: अच्छा!

प्र: शायद दिवाली में उससे कम ही देखा है। है न। तो।

आचार्य: नहीं, हैलोवीन हमारे समय में भी हम जानते थे, पर हैलोवीन तो ऐसा था कि मज़ाक जैसी चीज़ थी। हैलोवीन दिवाली की टक्कर में खड़ा हो जाएगा ये तो हम सोच नहीं सकते थे।

प्र: बिलकुल, यही तात्पर्य था मेरा। तो इसका कुछ सम्बन्ध सूचनाओं से है या इसमें कुछ और भी कारक हैं जिनका योगदान है?

आचार्य: देखिए।

प्र: माता-पिता की कोई कमी है, हमारे सिस्टम (व्यवस्था) की कोई कमी है।

आचार्य: ये मुद्दा गम्भीर है और आपको जानता हूँ, मुद्दा गम्भीर नहीं होता तो आप इसको उठाते नहीं। तो उसको पूरी गम्भीरता के साथ हमें लेना चाहिए, समझना होगा कि हो क्या रहा है, जो हो रहा है, उसकी जड़ें गहरी हैं। उसकी अभी बात करते हैं साथ-साथ, कुछ चीज़ों तक पहुँचते हैं, पर चूँकि अभी आप बच्चों की बात कर रहे हैं — टीनेजर्स की, तो वहाँ तो सबसे पहले शिक्षा का जो इसमें रोल (योगदान) है, उसकी बात करनी पड़ेगी।

मैं समझता हूँ, अगर हमारे बच्चे भारतीयता से विमुख हो रहे हैं, इनडिफरेंट हो रहे हैं, तो उसके लिए सबसे पहले तो जो हमारी शिक्षा है, उससे हमें पूछना पड़ेगा कि तुमने उन बच्चों को भारत के बारे में बताया क्या है। क्योंकि भारत को ये बहुत ज़्यादा ख़ुद तो जानते नहीं, ऐसा नहीं कि इन्होंने भारत-भ्रमण कर रखा है या ये बहुत ज़्यादा लोगों से मिले हैं या इनका ज्ञान बहुत गहरा है भारत के बारे में। इनको भारत के बारे में जो पता है वो शिक्षा से पता है, परिवार से पता है और मीडिया से पता है।

ज्ञान के और तो कोई स्रोत होते भी नहीं न, इस उम्र के बच्चों के लिए। शिक्षा से पता चलेगा जो स्कूल में इनके पास आ रहा है या कॉलेज में आ रहा है और घर में जो देखेंगे-सुनेंगे और मीडिया से जो सोखेंगे, वहाँ से पता चल रहा है।

तो सबसे पहले तो शिक्षा की बात कि शिक्षा से हम इनको क्या शिक्षा दे रहे हैं भारत के बारे में। तो इसमें छूटती ही पहली चीज़ मेरे ख़्याल में आती है — हो सकता है सबसे महत्वपूर्ण चीज़ न हो — पर सबसे पहले वो जो मेरे दिमाग़ में आयी है — वो ये है कि भारत को लेकर के हमें जो बातें बतायी गयी हैं, चाहे वो हमारे समाज की छवि हो, चाहे वो हमारे इतिहास का ब्यौरा हो, वो ऐसा है नहीं कि कोई उसको पढ़े-समझे और फिर उसको भारतीय होने में कोई ख़ास रुचि रह जाए।

आप कह रहे हैं, ‘आज के बच्चे, जो भी भारतीय चीज़ें हैं, उनसे अलग होते जा रहे हैं। दिवाली से ज़्यादा उनको हैलोवीन होना है, हिन्दी से ज़्यादा उनको स्पेनिश होना है।’ संस्कृति में भी वो पश्चिमी तौर-तरीक़े अपनाना ज़्यादा पसन्द करते हैं। खान-पान में भी, हर चीज़ में भी, जिस भी चीज़ में हो सकता हो। तो भारत से वो दूसरी दिशा में देख ही इसीलिए रहे हैं क्योंकि भारत की दिशा में उन्हें कुछ भी रोचक या गौरवशाली, मैं समझता हूँ दिखाया नहीं गया है, जो दिखाया गया है वो बहुत कम है।

आप इतिहास की बात ले लीजिए। हिस्ट्री — जो हमें पढ़ायी जाती है, जो गौरव है भारत का। चाहे वो विज्ञान में हो, गणित में हो, राजनीति में हो, अध्यात्म में हो; वो हमें कहाँ बताया गया है? सीबीएसई, एनसीआरटी या आइसीएससी से होकर आप भी गुज़रे हैं, हम भी गुज़र रहे हैं। अब हमारा हिस्ट्री का सिलेबस देखिए। अगर उस सिलेबस से गुज़रने के बाद बच्चे के भीतर यही भावना रह जाती है, उस पर यही प्रभाव, यही इम्प्रेशन पड़ा है कि मैं तो एक बहुत ही बेकार से देश का नागरिक हूँ, जिसका इतिहास न तो रोचक है, न ऊँचा है,

प्र: न गौरवशाली है।

आचार्य: न गौरवशाली है। तो वो भारतीयता में किसी भी तरह की रुचि क्यों दिखाएगा? और ये इतिहास सिर्फ़ इसी पीढ़ी को नहीं पढ़ाया गया है, ये इतिहास पिछली तीन पीढ़ियों को पढ़ाया जा रहा है जो आज़ादी के बाद की हैं। हमसे पहले वाली एक या दो पीढ़ियाँ, हमारी और हमारे बाद वाली। तो तीन या चार पीढ़ियाँ हैं जो इस इतिहास की जो एकदम पूर्वाग्रह-ग्रस्त और संकीर्ण हैं। उसकी चपेट में आ चुकी हैं। ये इतिहास के नाम पर हमें क्या याद है कि ये ख़ास-ख़ास युद्ध थे, जिसमे भारतीय हारे। ये ख़ास-ख़ास युद्ध थे जिसमें भारतीय हारे।

प्र: और एक बहुत सीमित अनुक्रम, और भौगोलिक रूप से बहुत सीमित हिस्से के बारे में पढ़ाया गया।

आचार्य: बिलकुल। बिलकुल।

प्र: हमें अपने दक्षिण भारत का जो गौरवशाली इतिहास है।

आचार्य: बिलकुल।

प्र: उससे तो बिलकुल वंचित रखा गया।

आचार्य: बिलकुल। बिलकुल। देखिए यूपीएससी की पढ़ाई करने से पहले, जनरल स्टडीज में हिस्ट्री वहाँ पर पढ़नी पड़ी मुझे काफ़ी। मुझे भी यही अहसास था कि जैसे नौवीं-दसवीं शताब्दी के बाद से।

प्र: भारत ग़ुलाम रहा है।

आचार्य: भारत लगातार ग़ुलाम ही रहा है। और ये तब है जब कि इतिहास पढ़ने में मेरी रूचि बचपन से थी। मेरा ये हाल था तो उन बच्चों का क्या हाल होगा, जिन्होंने कभी भी अपने टेक्स्ट बुक के अलावा कुछ पढ़ा ही नहीं? जो मेरे मन में छवि थी, वो ऐसी थी कि मोहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध पर आक्रमण करा और उसके बाद से भारत लगभग लगातार ग़ुलाम ही बना रहा। तो ग़ुलाम वंश हो गया, फिर तुग़लक़ और फिर ये, फिर वो।

फिर मुगल आ गये और मुगलों के बाद सीधे अंग्रेज़ आ गये। और अंग्रेजों के बाद स्वतन्त्रता आन्दोलन और इतिहास ख़त्म। इसमें बताइए कि मुझे क्या पता चल रहा है हमारे पिछले हज़ार-बारह-सौ सालों के बारे में कि एक-के-बाद एक लड़ाइयाँ हैं जिनमें हम हारते जा रहे हैं; और जिनसे हार रहे हैं, वो मुट्ठी भर लोग हुआ करते थे, और वो अपने शौर्य के दम पर और अपनी बेहतर रणनीति के दम पर और अपनी बेहतर टेक्नोलॉजी के दम पर हमसे जीतते चले गये। तो एक तो हार, वो भी मुट्ठी भर लोगों से हार।

प्र: तो कुछ भी ऐसा नहीं बताया जा रहा है इस हिसाब से, जिससे कि बच्चों को शुरू से ही अपने देश पर गर्व होना स्टार्ट हो, इसलिए वो बाहर की तरफ़ ज़्यादा देख रहे हैं।

आचार्य: पर देखिए मैं झूठे प्राइड (गर्व) के पक्ष में नहीं हूँ। मैं नहीं कहता कि सच्चाई को छुपाकर के एक झूठा गौरव स्थापित किया जाए। नहीं, बिलकुल भी नहीं। लेकिन सच्चाई तो सामने आनी चाहिए न, मैं जानना चाहता हूँ क्या भारत की सच्चाई बस दिल्ली की सच्चाई है। हमने तो ऐसा कर दिया है जैसे दिल्ली सदा से भारत की राजधानी रही हो और जिसने दिल्ली पर राज किया वो सदा से इस पूरे उपमहाद्वीप पर राज करता रहा हो। जबकि ये बात कितनी कितनी झूठ है!

उत्तर भारत और दक्षिण भारत का जो पूरा इतिहास है, वो बहुत अलग-अलग चलता रहा है। पश्चिम में भी अलग चला है। गुज़रात का भी अपना अलग खेल रहा है और पूर्वोत्तर की बात करें तो वो तो पूरा ही अलग रहा है। असम ने मुगलों को जिस तरह से टक्कर दी थी, आप कैसे कह दोगे कि दिल्ली पर जिसका राज था उसका राज असम पर भी था, उत्तर-पूर्व पर भी था। ऐसा बिलकुल भी नहीं है। लेकिन हमारे सामने कुछ ऐसा ब्यौरा खड़ा कर दिया गया कि साहब, आक्रान्ताओं ने दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया तो उन्होंने पूरे भारत देश पर कब्ज़ा कर लिया और पूरा भारत देश ही ग़ुलाम है। तो विजयनगर बहुत पसन्द रहा है और विजयनगर की कहानी अभी पिछले।

प्र: चार-पाँच-सौ साल तक चली है।

आचार्य: चार-पाँच-सौ साल तक चली है। और ये बात हमारे दिमाग़ में लायी ही नहीं जाती कि

प्र: सोलहवीं सदी तक विजयनगर बहुत अच्छा-ख़ासा।

आचार्य: बहुत अच्छा-ख़ासा, बहुत सशक्त, बहुत उन्नत और बहुत समृद्ध राज्य था। मलेशिया, इंडोनेशिया, कंबोडिया।

प्र: पूरा दक्षिण-पूर्व एशिया में हमारा काफ़ी प्रभाव रहा है।

आचार्य: प्रभाव रहा और वो प्रभाव कोलोनाइजेशन (औपनिवेशीकरण) का नहीं रहा है। ऐसा नहीं है कि वहाँ पर जाकर उन लोगों को दबाकर के उनसे पैसे लूटे गये, जैसा कि भारत में अंग्रेज़ो ने करा कि इकोनॉमिक एक्सप्लॉयटेशन (आर्थिक शोषण) किया गया; नहीं। चाहे वो विजयनगर एम्पायर (साम्राज्य) हो, चाहे वो

प्र: चोल थे।

आचार्य: चोल राजा हों, इन सबने संस्कृति पहुँचायी बाहर तक और ट्रेड (व्यापार) किया, वाणिज्यिक सम्बन्ध बनाये। लेकिन ये जहाँ भी गये वहाँ पर इन्होंने कभी ऐसा नहीं करा कि वहाँ के लोगों का शोषण करा हो या हत्याएँ करी हों या धर्म परिवर्तन वगैरह ज़बरदस्ती कराया हो, ऐसा भारत ने कभी नहीं करा। और ये सब बातें हमें हमारे।

प्र: बच्चों को नहीं पढ़ाई जातीं।

आचार्य: बच्चों को।

प्र: ख़ासकर स्कूल में। स्कूल में नहीं बतायी जातीं।

आचार्य: बतायी जाती भी है, तो ऐसा होता है कि फुटनोट।

प्र: फुटनोट की तरह।

आचार्य: या बीस चैप्टर (अध्याय) में एक चैप्टर साउथ (दक्षिण) पर है।

प्र: हाँ, ये फुटनोट की तरह है।

आचार्य: तो वो, वो बहुत बड़ी भूल है।

प्र: और ये शायद क्योंकि जैसे आपने कहा, दो कम-से-कम तीन पीढ़ियों के साथ ऐसा हुआ,

आचार्य: तीन पीढ़ियों के साथ ऐसा हुआ।

प्र: तो माता-पिता को भी नहीं पता, तो वो भी उसको सुधार नहीं कर पाते। तो वो जो, अगर आपने कहा — शिक्षा की जो व्यवस्था है जो — वो नहीं बता रहा है, तो माता-पिता को भी नहीं मालूम, तो वो भी आगे नहीं बता रहे।

आचार्य: देखिए, नोबडी वांट्स टू साइड विद ए लूज़र (कोई एक हारे हुए के साथ कोई नहीं होना चाहता)। इस पीढ़ी के लिए लूज़र एक गाली होती है। इस पीढ़ी के लिए गाली होती है, जब इन्हें किसी को एकदम ही अपशब्द बोलना होता है तो बोलते हैं।

प्र: यू आर ए लूज़र (तुम लूज़र हो)।

आचार्य: लूज़र। अब अगर उनके सामने ये दिखाया गया है कि ये पूरा देश ही लगातार एक लूज़र रहा है, तो ये इस देश को इज़्ज़त क्यों देंगे, प्रेम क्यों देंगे?

प्र: बहुत सही! बहुत सही!

आचार्य: देश के साथ क्यों रिश्ता जोड़ेंगे, क्यों आइडेंटीफाई करेंगे? तो ये नहीं करते हैं

प्र: और फिर थोड़ा दूसरा मुझे लगता है कि जो पश्चिम सभ्यता का बहुत ज़्यादा एक खिंचाव है, एक तो है कि हमें अपने देश की अच्छी चीज़ के बारे में नहीं बताया गया, फिर शायद जिस तरह से आजकल कंज़्यूमरिज़्म (उपभोगवाद) हो रहा है उपभोक्ता से उपभोगवाद को बढ़ावा मिलता है, जैसे हैलोवीन की बात की, तो वो एक बहुत बड़ा खिंचाव भी आ रहा है।

आचार्य: वो विनर्स (विजेता) हैं। कंज़्यूमरिज़्म एक है मुद्दा, अभी उस पर आएँगे, उससे पहले ये बात है कि यहाँ पर जो कुछ है वो हारने वालों की चीज़ है, एवरीथिंग इंडियन इज़ बैकवार्ड (पिछड़ा), डिग्रेसिव (अधोगामी), डिफिटेड (हारा हुआ), और जो कुछ भी पाश्चात्य है — वेस्टर्न , वहाँ पर जीत है, गौरव है, समृद्धि है, और ताक़त है। तो ये जो फिर आज के बच्चे हैं, ये कहते हैं कि जब सब अच्छाइयाँ उधर ही हैं तो हमें हिन्दुस्तान में रहना क्यों है।

प्र: ‘हिन्दुस्तान में क्या करना है?’

आचार्य: तो वो बड़ी हेय दृष्टि से देखते हैं फिर इस देश को; और बात सिर्फ़ अभी पोलिटिकल पॉवर की भी नहीं है कि पोलिटिकली (राजनैतिक रूप से) भारत ऐसा नहीं है कि हारता ही रहा है। जो आक्रमण भी हुए हैं भारत पर, भारत ने बड़ी जान लगाकर के और कुछ हद तक बड़ी सफलतापूर्वक उनका विरोध किया है। ऐसा नहीं हुआ था कि आक्रान्ताओं की फौजें आती गयीं और भारत को एकदम ही रौंदकर आगे बढ़ती गयीं। आक्रान्ताओं की फौजें आयी हैं। सिकंदर से लेकर के और हूण, उनसे पहले के, शक और फिर तो उसके बाद सब थे ही, अफगान थे, तुर्क थे, ये सब आते रहे हैं।

लेकिन भारत उनको लगातार विरोध देता गया है। वो जो संघर्षों की गौरवशाली गाथाएँ हैं, वो हमारे इतिहास में कभी शामिल नहीं की गयीं और मैं साफ़-साफ़ कह रहा हूँ कि वो इसलिए नहीं शामिल की जानी चाहिए कि हमें उनपर गौरव हो, वो इसलिए शामिल की जानी चाहिए क्योंकि वो सच है। और मैं ये जानने में बड़ा उत्सुक हूँ कि अगर वो सब सच हैं, तो उनको छुपाया किसने और क्यों छुपाया; और मात्र इस पीढ़ी के साथ नहीं छुपाया। इस पीढ़ी में तो जो हम देख रहे हैं, वो पिछले तीन पीढ़ियों का सामूहिक अन्धेरा और अज्ञान है, जो प्रकट हो रहा है।

पिछली तीन पीढ़ियों को अन्धेरे में रखा गया है। क्यों रखा गया है? ज़बरदस्ती की बात है? (नहीं में सिर हिलाते हुए) ये मतलब एक तो राजनैतिक सत्ता को लेकर के हमें सच्चाई नहीं बतायी गयी। विज्ञान में, गणित में, ज्ञान के बाक़ी सब क्षेत्रों में, भारतीयों की जो उपलब्धियाँ थीं, वो कभी सामने लायीं नहीं गयीं ठीक से। तो बच्चे को — भारत को लेकर के बड़ी हीनभावना रहती है। वो कहता है, ‘क्या ये भारत है! यहाँ तो कभी कुछ होता ही नहीं है।’ अब फाइबोनॉकी की सीरीज़ है, जो फाइबोनॉकी के नाम पर है, इटैलियन। और फाइबोनॉकी ने ख़ुद कहा कि ये मेरी सीरीज़ नहीं है।

प्र: अच्छा।

आचार्य: ये तो मैने भारत से सीखी है। लेकिन इसका श्रेय कभी भारत को नहीं दिया गया। भई, इटैलियन फाइबोनॉकी सीरीज़ को फाइबोनॉकी सीरीज़ बोले, तो समझ में आता है। वो ख़ुद नहीं बोलते, वो ख़ुद जानते हैं कि ये फाइबोनॉकी की नहीं है। भारत में भी वो बात, आपको भी नहीं पता है शायद।

प्र: नहीं, मुझे भी नहीं पता।

आचार्य: मुझे भी बाद में पता चली है, इतनी कंप्यूटर साइंस पढ़ ली, इतनी कोडिंग कर ली और जब पहला प्रोग्राम लिखा होगा, बेसिक में, उस समय था कि राइट द प्रोग्राम टू जनरेट फाइबोनॉकी सीरिज ( फाइबोनॉकी सीरिज के लिए प्रोग्राम लिखिए)।

प्र: मुझे तो आज पता चली।

आचार्य: और वो फाइबोनॉकी सीरीज़ भारत की है। तो ये किस तरीक़े की बुद्धि है या ये किस तरीक़े का षड्यंत्र है। कि हमें ये बातें बतायी ही नहीं जातीं। चाहे वो फाइबोनॉकी सीरीज़ हो, चाहे वो पैइथागोरस थ्योरम हो। गणित में भारत में इतना काम हुआ है, इतना काम हुआ है, लेकिन जब आप बोलते हैं रिसर्च इन मैथमेटिक्स , तो आपके दिमाग़ में कभी भारत की छवि आती ही नहीं है। जबकि गणित में ख़ासतौर पर, भारत ने बहुत काम करा है। ये बच्चों को पता ही नहीं, उनके लिए तो आप पूछेंगे, तो वो, उनके लिए मैथमेटिक्स जैसे ही बोलेंगे तो उनके दिमाग़ में सारे पश्चिमी नाम आ जाएँगे। मेडिसिन — सुश्रुत हों, चरक हों, उनकी बातें आज भी प्रासंगिक हैं। दुनिया के पहले सर्जन थे सुश्रुत, जिन्होंने डिटेल तरीक़े से बताया था, सर्जरी कैसे की जानी चाहिए किन-किन चीज़ों में।

प्र: तो हमने कहाँ पर ये सब खो दिया। ये पिछले पचास साल-साठ साल में या उससे भी पहले जब हम।

आचार्य: जो सिलेबस सेटिंग चल रही है, उसकी बलिहारी है कि उनको ज़रूरी ही नहीं लगा कि भारत की सच्चाई भारतीयों को बतायी जाए! हमारी जो पूरी एजुकेशन है, वो, वो जैसे बड़ी हीनभावना के बिन्दु से आ रही हो।

प्र: लूज़र मेंटलिटी से।

आचार्य: लूज़र मेंटलिटी से,

प्र: जैसे आपने कहा कि आज की पीढ़ी हारे हुए को पसन्द नहीं करती।

आचार्य: जैसे हम अपनी नज़रों में लूज़र हैं तो हमने अपनी पूरी हिस्ट्री भी एक लूज़र्स हिस्ट्री की तरह अपने बच्चों के सामने रख दी है और वो लूज़र्स को पसन्द नहीं करते, तो वो भारत को भी पसन्द नहीं कर रहे हैं। जबकि भारत एक ज़बरदस्त विनर रहा है, कुछ बड़ी हारें हमने झेली हैं और उन हारों को सामने लाया जाना चाहिए। सच्चाई जो भी हो, सामने रखी जानी चाहिए। लेकिन इसमें क्या तुक है कि सिर्फ़ हारे बता रहे हो और जीते नहीं बता रहे? हार छुपाना घातक बात है, जीत छुपाना क्या कम घातक बात है?

प्र: बिलकुल सही।

आचार्य: आपकी असफलताएँ छुपायी जाएँ ये बात ठीक नहीं, लेकिन आपकी उपलब्धियाँ छुपायी जाएँ, ये बात ठीक कैसे हो सकती है। तो वो।

प्र: इसमें, इसमें कहीं, मैं थोड़ा सा एक अलग तरीक़े से इसको पूछ रहा हूँ, जैसे हमारा अपना सनातन धर्म है या हमारा वेदान्तिक फिलोसॉफी है, जिसमें हम बहुत ही एक हंबल और एक्सेप्टिंग वर्ल्ड व्यू (उदारवादी वैश्विक नज़रिया) रखते हैं। ये कहीं वहाँ से तो नहीं आ रहा है और इसी कारण जो पाश्चात्य नज़रिया है, बच्चों को वो ज़्यादा पसन्द आ रहा है। जोकि बहुत अग्रेसिव और यू नो इन योर फेस एंड यू नो व्हिच प्रमोट्स विनिंग एट एनी कॉस्ट, काइंड ऑफ कल्चर। (जो चहरे से आक्रामक हैं और किसी क़ीमत पर जीत हासिल करने जैसी संस्कृति रखते हैं)

आचार्य: नहीं, ये जिसको आप ह्यूमिलिटी कह रहे हैं, इसको ह्यूमिलिटी नहीं कह सकते हैं। ह्यूमिलिटी का तो अर्थ होता है — ईमानदारी, सत्यनिष्ठा। हम्बल होने का अर्थ होता है कि मैं अपना अहंकार नीचे रखूँगा, सच्चाई को ऊपर रखूँगा। हम्बल का यही अर्थ है कि मैं नीचे, सच्चाई ऊपर। तो हम्बल आदमी सच्चाई छुपा कैसे सकता है। सच्चाई को छुपाने का तो मतलब होता है — एरोगेंस , उद्दंडता, ज़बरदस्त अहंकार ही होता है, जो सच्चाई को छुपाता है।

तो अगर हमने अपने इतिहास की सच्चाई छुपायी है अपने बच्चों से, तो इसमें ह्युमिलिटी थोड़े ही है। ह्युमिलिटी क्या है इसमें। ये मजबूरी है, हम डरे हुए लोग हैं। हम, हमने, पिटाई हुई है न काफ़ी और वो पिटाई जो है, वो बिलकुल भीतर तक घुस गयी है हमारे दिमाग़ में। ये कम-से-कम उनके तो भीतर घुस ही गयी थी, जो आज़ादी के बाद हमारे नीति-निर्धाता हुए। जो पॉलिसी सेटर्स थे, उनके दिमाग़ों में तो हमें मानना पड़ेगा कि आज़ाद ख़्याली, मुक्त चिंतन नहीं था। वो बहुत ज़्यादा प्रभावित थे पश्चिमी सोच से और जो पश्चिमी दृष्टि है भारत को देखने की उससे। वो भारत को एक भारतीय की नज़र से नहीं देख रहे थे। वो भारत को एक यूरोपियन की नज़र से देख रहे थे। तो हमें जो इतिहास भी पढ़ाया गया है, वो लगभग वही है।

प्र: जो अंग्रेजों ने बताया कि आज का इतिहास है।

आचार्य: जो अंग्रेज़ देखना पसन्द करेंगे। ये वो इतिहास नहीं है, जो एक भारतीय को जानना चाहिए। वो इतिहास है जैसा कि बाहरी चाहेंगे कि आपको पता हो। ये बहुत बड़ी भूल हुई है। जो शिक्षा के साथ खिलवाड़ किया गया है, आज़ादी के तुरन्त बाद, वो बहुत बड़ी भूल है, उसको ठीक (करना होगा)।

प्र: ये एक प्रमुख और जैसा आपने कहा कि ये एक बड़ा कारण है जो सबसे पहले दिमाग़ में आता है। तो प्रशांत, इससे जुड़े और क्या कारण हो सकते हैं जैसे मैंने कहा कि माता-पिता को, पेरेंट्स को ख़ुद ही नहीं पता तो वो भी उसको ठीक नहीं कर पाते हैं। शायद वो ही तर्क हम टीचर्स के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं। तो शिक्षा एक हो गया। इसके अलावा और क्या हो सकता है? कंज़्यूमरिज़्म — उस पर आप बताना चाहेंगे।

आचार्य: बिलकुल-बिलकुल। अब इसमें हम कोई अभी वरियता-क्रम नहीं स्थापित कर सकते। बाद में अगर बैठकर के थोड़ा सोचेंगे तो पता चलेगा कि हम जितने कारणों की चर्चा कर रहे हैं, उसमें सबसे प्रमुख, पहला कौन सा है। लेकिन ये जो कंज़्यूमरिज़्म (उपभोगवाद) वाली बात बोली, ये भी बहुत प्रमुख बात, कारण है, जिसकी वज़ह से आज के बच्चे भारतीयता से अलग होते जा रहे हैं। देखिए, हुआ क्या है। इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन (औद्योगिक क्रान्ति) के बाद से, जो इंसान की ताक़त है पैदा करने की, वो बहुत बढ़ गयी है, अनन्त हो गयी है।

उसमें बाधाएँ बस दो जगहों पर आती हैं। मशीन है, आप उसे फुल कैपेसिटी पर चलाइए तो वो बहुत कुछ पैदा कर सकती है, इतना पैदा कर सकती है कि पूछिए मत। दो जगहों पर उसमें प्रॉब्लम (समस्या) आती है। पहला तो कुछ भी पैदा करें उसके लिए उसे रिसोर्स चाहिए, रॉ मटेरियल चाहिए। दूसरा वो जो कुछ भी पैदा करे, उसके लिए उसको कोई कंज़्यूमर (उपभोक्ता) चाहिए। और यही जो दो समस्याएँ हैं, ये आज मानवता की सबसे बड़ी समस्याएँ हैं।

मशीन चल रही है और अपने चलने के लिए वो रिसोर्सेज का अन्धा-धुन्ध दोहन कर रही है। जिसकी वजह से आज ये जो पूरा ग्रह है, वो एकदम पर्यावरण के ज़बरदस्त ख़तरे से जूझ रहा है और जो अभी के मुद्दे के लिए महत्त्वपूर्ण बात है, वो ये है कि अगर हम प्रोडक्शन ख़ूब कर रहे हैं, तो उसके लिए हमें फिर कंज़्यूमर चाहिए। कंज़्यूमर चाहिए तो हमें कंज़्यूमर का दिमाग़ ऐसा करना पड़ेगा कि वो कंज़म्शन को बहुत बड़ी वैल्यू (मूल्य) और वर्च्यु (गुण) माने। उसको लगे कि कंज़म्शन बहुत सही चीज़ है, कंज़म्शन बहुत बढ़िया बात है।

आदमी के भीतर बचपन से ही कंज़म्शन की अर्ज तो होती ही है, वो तो बायोलॉजिकल , प्राकृतिक है। लेकिन एक सीमा पर जाकर के रुक जाएगी। मशीन की जो कैपेसिटी (क्षमता) है, वो किसी सीमा पर रुक नहीं रही है। वो कितना भी कर सकती है। तो जो मशीन चलाने वाला है, जो मशीन का ओनर है, वो चाहता है कि लोगों में भोगने की, कंज़्यूम करने की हवस लगातार बढ़ती जाए। वो प्राकृतिक तौर पर बढ़ती नहीं है। एक सीमा पर रुक जाती है, तो फिर उसको कृत्रिम तरीक़े से, आर्टिफिशियली बढ़ाना पड़ता है।

आपको विज्ञापन दिखा-दिखाकर के, सब कुछ करके, आपको मजबूर किया जाता है कि आप चीज़ों को खरीदें, कंज़्यूम करें उनको। जो सबसे बड़ी बाधा आती है ऐसे कंज़म्शन के सामने, वो आती है अध्यात्म या ऐसी संस्कृति जिसमें सरलता और सन्तोष को आदर दिया जाता है। तो मशीन चलती रहे और माल बिकता रहे, इसके लिए ज़रूरी हो जाता है कि जो कंज़्यूमर है उसके दिमाग़ से इस संस्कृति को ही हटा दिया जाए जिसमें सरलता और सन्तोष और संयम के लिए स्थान था।

प्र: हाँ।

आचार्य: आप समझ रहे हैं? आप वरना कंज़्यूम करोगे ही नहीं। कंज़्यूम करने के लिए सबसे पहले कंज़्यूम करने की इच्छा का होनी चाहिए।

प्र: इच्छा होनी चाहिए।

आचार्य: और वो इच्छा लगानी पड़ती है। और उस इच्छा को हटाने का, उस इच्छा को मिटाने का काम करती है आध्यात्मिक संस्कृति। तो उस संस्कृति को नष्ट करना बहुत ज़रूरी है, जो कंज़्यूमरिज़्म के आड़े आती है। क्योंकि वो संस्कृति अगर बची रह गयी तो इंसान एक सीमा के आगे भोग, कंज़म्शन करेगा ही नहीं। तो वही किया जा रहा है। हर तरीक़े से मीडिया में और अन्य जगहों पर, ख़ासतौर पर मीडिया में कंज़म्शन को ग्लोरिफाई (गौरान्वित) किया जा रहा है। और जो इंडियन कल्चर है या इंडियन इथोज़ कहूँगा, ’नॉट कल्चर ( कल्चर नहीं); इथोज़ ; उसका मज़ाक उड़ाया जा रहा है, जैसे वो तो पिछड़े लोगों की बात हो। वो एक तरह की साज़िश है, ज़बरदस्त साज़िश है। मैं समझता हूँ, ये जो नयी पीढ़ी है — इसका एक तरीक़े से, हम बहुत गम्भीरता के साथ बोल रहे हैं ये बात, मजाक में नहीं, मैं कहूँगा — इसका रिलीजियस कंवर्जन ही किया जा रहा है।

प्र: और हमें पता नहीं चल रहा है।

आचार्य: आपको पता नहीं चल रहा।

प्र: ये साइलेंट है।

आचार्य: बिलकुल। साइलेंट रिलीजियस कंवर्जन चल रहा है इनका। आप इन्हें मैं पूछ रहा हूँ, किस दृष्टि से, किस कोण से सनातनी कह सकते हैं? और मैं इसमें ये भी नहीं बोलूँगा कि इनको एक धर्म से दूसरे धर्म में दीक्षित किया जा रहा है। नहीं-नहीं, नहीं। इनको बस धार्मिक से अधार्मिक बनाया जा रहा है।

प्र: इररिलीजियस।

आचार्य: इररिलीजियस। इररिलीजियस भी छोटा शब्द है। एंटी रिलीजियस , इनको एंटी रिलीजियस बनाया जा रहा है। क्योंकि जो वास्तविक धर्म होता है, वो आपको कंज़म्शन में एक बिन्दु से आगे नहीं जाने देता, वो आपको कहता है, ‘तुम पागल हो गये हो क्या? ये भोग-भोगकर क्या पाओगे!’

प्र: असल में कंज़म्शन का अर्थ हुआ कि आप अपने अहंकार को प्रमाणित कर रहे हैं।

आचार्य: बिलकुल। बिलकुल।

प्र: और धर्म चाहे कोई भी हो, धर्म का अर्थ होना चाहिए कि आपने अपने अहंकार को कम कर दिया है या नियन्त्रित कर दिया है। तो दोनों क्रॉस परपज पर (विरुद्ध हेतु) काम करते हैं। हैं न?

आचार्य: कंज्यूमरिज्म (उपभोगवाद) के लिए और, और कंज़म्शन (उपभोग) के लिए, अहंकार को और अन्धेरे में डालना पड़ता है, उसको बोलना पड़ता है कि तू भोग-भोगकर संतुष्टि पा जाएगा। ‘और भोग इसी में तेरा कल्याण है और भोग, कंज़्यूम मोर। ये खरीद, वो खरीद, यहाँ जा, वहाँ जा, ऐसा एक्सपीरियंस (अनुभव) ले, ऐसा कर, वैसा कर।’ ये बात ईगो को बोलता है जो कैपिटलिस्ट (पूँजीवादी) है, जो चाहता है कि ईगो एक कंज्यूमिंग ईगो (भोगी अहंकार) बन जाए और बिलकुल इसके ख़िलाफ जो संदेश होता है, शिक्षा होती है, वो होती है अध्यात्म की।

अध्यात्म ईगो को समझाता है कि भोग-भोगकर के तुझे शान्ति, सन्तोष नहीं मिलने वाला। तो फिर जो मशीन चलाने वाला है, जो मशीन का मालिक है उसके लिए ज़रूरी होता है कि अगर उसे माल बेचना है, तो उसे अध्यात्म को ही ख़त्म करना पड़ेगा। तो इस पीढ़ी के मन से अध्यात्म की हत्या की गयी है। इस पीढ़ी के मन से अध्यात्म को बिलकुल खींचकर जड़ से उखाड़ा गया है, जैसे एक पौधे को ज़मीन से उखाड़कर के उसको मारा जाता है।

प्र: और ये, और ये ऐसे हो रहा है कि इसमें कोई एक सेंट्रल व्यक्ति या अथॉरिटी नहीं है। सिस्टम चल रहा है।

आचार्य: सिस्टम चल रहा है।

प्र: ये सिस्टम चल रहा है इसलिए।

आचार्य: अगर कोई और धर्मावलम्बी आकर के आपके बच्चे का रिलीजियस कंवर्जन करे, तो आप विरोध करोगे। आप कहोगे, ‘अरे! तुम मेरा बच्चा हिन्दू है, तुम उसको मुसलमान बना रहे हो, तुम उसको ईसाई बना रहे हो, मैं नहीं स्वीकार करता।’ कोई एक एजेंसी आकर के आपके बच्चे को कोई पाठ पढ़ाए, आप उसका भी विरोध कर लोगे। लेकिन जब आपके बच्चे का कंवर्जन न व्यक्ति कर रहा हो, न कोई इंस्टिट्यूशन कर रहा हो, न कोई एजेंसी कर रही हो, बल्कि एक एंवायरमेंट कर रहा हो, एक माहौल ही कर रहा हो, तब आप किसको गुनहगार बताओगे। गुनहगार तो तब बताओगे जब आपको पहले पता चले।

जैसा कि आपने कहा ये साइलेंटली (चुपके से) होगा, आपको पता ही नहीं चलेगा। आपको पता नहीं चलेगा और आपका बच्चा भीतर-ही-भीतर से कुछ और हो चुका है। ऊपर-ऊपर से आपको ऐसा लगेगा कि ये भारतीय है या हिन्दू है, भीतर से वो न भारतीय रह गया, न हिन्दू रह गया और आप इस बात का विरोध भी नहीं कर पाये क्योंकि ये बात आपको पता ही नहीं चली। तो कितनी अजीब सी बात है!

देखिए, पाँच लोगों का कहीं पर धर्मांतरण हो जाए, तो उस पर शोर मच जाता है। एक धर्म से दूसरे धर्म में लोग चले गये, शोर मच जाता है और एक पूरी पीढ़ी का विधर्मीकरण कर दिया गया है, धर्मांतरण नहीं, विधर्मीकरण, ये विधर्मी हो गये हैं, एंटी रिलीजियस हो गये हैं, तो उस पर कोई शोर नहीं मचता है। एक पूरी संस्कृति ही बिलकुल जला दी गयी, गला दी गयी, ख़त्म कर दी गयी और उस पर कोई शोर नहीं बच रहा, क्योंकि वो चीज़ कहीं दिखाई नहीं दे रही।

प्र: हाँ।

आचार्य: वही वैसी सी बात है कि अभी सड़क पर किसी की हत्या हो जाए, तो खून बहता है, लाश गिरती है, शोर मच जाएगा, मीडिया इकट्ठा हो जाएगा। लेकिन यहाँ इतना सब प्रदूषण कर दिया गया है, स्मॉग है, इससे करोड़ों लोग धीरे-धीरे करके मर रहे हैं, इसमें कहीं पता नहीं चलेगा कि कौन मरा। आप गिन नहीं सकते कि इतने लोग मरे, लेकिन मर सब रहे हैं। ये उसी तरीक़े की बात है।

प्र: और हत्या किसने की, ये भी नहीं पता चलेगा।

आचार्य: बिलकुल सही बात है। जब ये आपको पता ही नहीं कि कातिल कौन, तो आप शोर किसके ख़िलाफ मचाएँगे। इसी तरीक़े से आज जो ये हमारे बच्चे न भारतीय रह जा रहे हैं, न हिन्दू रह जा रहे हैं। आपको पता ही नहीं चलेगा कि उन्हें किसने बर्बाद किया; तो आप किसको पकड़ेंगे जाकर के? आप उनका कल्चर देखिए, आप उनका पूरा मन देखिए, वो डिइंडियनाइज़ हो चुका है।

प्र: और ये-ये, ये जो हम डिइंडियनाइज़ की बात कर रहे हैं ये मेरे ख़्याल से बहुत व्यापक है। ये छोटे शहरों में, बड़े शहरों में, हर जगह है, ये ऐसा नहीं है कि कहीं पर केन्द्रित है ये समस्या। आपका क्या विचार है?

आचार्य: ये हर जगह है। इंटरनेट की रीच (पहुँच) हर जगह है न?

प्र: हाँ, ये वो इन्फॉर्मेशन एक्सप्लोजन (सूचना विस्फोट) की जो हम बात कर रहे थे।

आचार्य: इंटरनेट की रीच हर जगह है। इंटरनेट , टीवी , फ़िल्में हर जगह हैं। तो आप सुदूर गाँवों में भी आप चले जाएँ अगर, तो वहाँ भी ये जो विधर्मीकरण और विराष्ट्रीयकरण चल रहा है, डिनेशनलाइज़ेशन — ये बहुत ज़ोर से चल रहा है। भारत राष्ट्र को जड़ों से ही खोखला किया जा रहा है, मैं कहूँगा, बहुत हद तक कर दिया गया है। और ये हमारे लिए बड़े शर्म की बात है कि ये सब कुछ हमारे काल में हो रहा है, हमारी आँखों के सामने हो रहा है।

जब इतिहास लिखा जाएगा तो हमारी पीढ़ी — हमारी-आपकी पीढ़ी, वो पीढ़ी होगी, जो अपने पीछे से पीढ़ियों का नाश रोक नहीं पाई। इल्ज़ाम हम पर आएगा।

प्र: क्या कर सकते हैं इसको? जैसे आपने कहा कि बहुत हद तक शायद ये समस्या हो चुकी है, है न? तो हम इसको रोकने का या इसको ठीक करने के लिए एक समाज के तौर पर क्या कर सकते हैं?

आचार्य: देखिए, एक-दो बातें तो बिलकुल साफ़ है। सबसे पहले तो इतिहास सही पढ़ाओ। ये नहीं चलेगा। हमारे मन में अगर हमारा अतीत ही ग़लत बता दिया गया है, तो फिर हमारे मन में हमारी अपनी पहचान ही ग़लत है। आप समझ रहे हो। और हम जीते पहचान में ही हैं अपनी। एक लड़के को बता दिया आपने कि तेरी पिछली चालीस पुश्तें किसी काम की नहीं थीं। वो गरीब थे, भिखमंगे थे और कमज़ोर थे और कायर थे। वो न तो कोई टेक्नोलॉजी पैदा कर पाए, न कोई आविष्कार करा कभी, युद्ध में हारते रहे, ज्ञान उनको कुछ था नहीं; तो उसको अपने बारे में फिर कैसी भावना उठेगी?

आपने उसको बता दिया कि तुम्हारे चालीस पुरखे सब बेकार थे। तो तथ्य ये है कि भारत दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्था था, लगभग, लगभग दो-हज़ार सालों तक।

प्र: मैं, प्रशांत! मैं कहीं पढ़ रहा था कि अंग्रेजों के ग़ुलाम होने से पहले विश्व का पच्चीस-प्रतिशत जीडीपी है न, भारत से आता था।

आचार्य: प्लासी की लड़ाई के समय भी, सत्रह-सौ-सत्तावन की बात कर रहे हैं। औरंगज़ेब के जाने के लगभग पचास साल बाद तक भी, भारत सत्रह प्रतिशत जीडीपी दुनिया की अर्थव्यवस्था का पैदा करता था। बहुत बड़ी बात है, सत्रह प्रतिशत। अमेरिका का जितना योगदान है दुनिया की जीडीपी में आज, उससे ज़्यादा भारत का योगदान था अपने बुरे दिनों में भी। बुरे दिनों में भी। और वो अंग्रेजों के समय में घटकर के लगभग एक प्रतिशत या दो प्रतिशत रह गया। उन्नीस-सौ-सैंत्तालिस में आप अगर देखेंगे तो एक प्रतिशत से भी कम रह गया था।

और ये जो हम बात कर रहे हैं अठारहवीं शताब्दी की कि सत्रह प्रतिशत था, अगर आप थोड़ा और पीछे जाएँगे, तो ये आँकड़ा और ज़्यादा ऊँचा है। सच तो ये है कि मुगलों के काल में आबादी बढ़ी भारत की, शेयर ऑफ जीडीपी कांस्टेंट (सकल-घरेलू-उत्पाद का शेयर स्थिर) रहा। लेकिन पर कैपिटा जीडीपी (प्रति व्यक्ति जीडीपी ) भारत का गिर रहा था लगातार, आप उनसे भी और पहले जाएँगे तो भारत का जीडीपी भी और पर कैपिटा जीडीपी भी दुनिया में ज़बरदस्त था।

आज जैसे आप अमेरिका को देखते हो कि समृद्धि की प्रतिमूर्ति है, द लैंड ऑफ ऑपोर्चुनिटीज। वो भारत हुआ करता था। ये बात आज की पीढ़ी के दिमाग़ में ही नहीं घुसेगी। उनकी समझ में ही नहीं आएगा कि ऐसा कैसे हो सकता है। ‘ऐसा सही में होता था?’ हाँ, ऐसा होता था और भारत के समकक्ष में कोई देश आता था अगर जीडीपी वगैरह में, आर्थिक समृद्धि में, तो वो चीन था, वरना नम्बर एक पर भारत ही है लगातार। ये इतिहास हमें ज़रा ठीक करना पड़ेगा।

तो मानव गतिविधि के हर पहलू में जो हमारी उपलब्धियाँ थीं, वो सच्चाई से सामने लानी पड़ेगी। मैं बिलकुल भी नहीं कह रहा हूँ कि तिल का ताड़ बनाया जाए या ज़बरदस्ती का ढिंढोरा पीटा जाए जहाँ कोई तथ्य नहीं। लेकिन जहाँ सच्चाई है, वो तो बताना पड़ेगा। इतिहास ठीक करना पड़ेगा। और दूसरी बात भारत को लेकर के जो उनके मन में धारणाएँ हैं, वो मिटानी पड़ेगी। भारत को लेकर के और धर्म को लेकर के। अब जैसे यही कि भारतीय सैनिक एक अच्छा सैनिक नहीं होता है और लड़ लेता है, वीरता से लड़ लेता है, लेकिन हार जाता है।

हमें हमारे बारे में बस यही बता दिया कि शौर्य दिखाया ज़रूर पर हार गये। नहीं, वो बात बतानी पड़ेगी कि भारतीय सैनिक एक विजेता होता है। आप प्रथम विश्वयुद्ध को ख़ासतौर पर अगर देखें तो उसमें जीतने वालों को जिताने में भारतीय सैनिकों का बहुत-बहुत बड़ा योगदान था। तो किसने कह दिया कि भारतीय सैनिक विजेता नहीं होता है? और जो धर्म को लेकर के नकारात्मक छवियाँ हैं, इस, इस पीढ़ी के मन में, उनको हटानी पड़ेगी।

कुछ बातें तो देखिए, उनकी बिलकुल ठीक भी है। वो आप हिन्दू धर्म की ओर देखते हैं और पाते हैं कि यहाँ तो अन्धविश्वास बहुत है, भेदभाव बहुत है, जातिगत बेवकूफ़ियाँ बहुत हैं। तो उनकी ये धारणा सुदृढ़ हो जाती है कि हाँ हमारी जो टीचर ने हमको बताया था न हिस्ट्री वाली कि भारतीय तो हैं ही पिछड़े हुए और बेवकूफ़ लोग, वो धारणा उनके मन में घर कर जाती है कि ये बिलकुल सही बात है। देखो, ये धर्म के नाम पर क्या सुपरस्टीशियस बातें करते रहते हैं उल्टी-पुल्टी। तो फिर ये जो नयी पीढ़ी है, ये धर्म से और ज़्यादा कट जाती है।

प्र: कट जाती है।

आचार्य: और देखिए यहाँ मैं भारत और हिन्दू धर्म दोनों की बात एक साथ इसलिए करूँगा क्योंकि जो भारतीय राष्ट्रीयता है, उसके केन्द्र में तो सनातन धर्म ही है हम कुछ भी बोलें, भारत है तो सनातन राष्ट्र ही। आप आज उसे संवैधानिक तौर पर कुछ भी बोलते रहिए लेकिन जो यथार्थ है वो यही है। सनातन मूल्यों से अगर आज की पीढ़ी कटी हुई है, तो भारत से भी कटेगी। सनातन मूल्यों से आप कटे हुए हैं और आप कहें कि नहीं भारत देश से मुझे प्यार है तो वो प्यार कागज़ी होगा, बहुत उथला होगा।

तो मैं इसलिए कह रहा हूँ कि सनातन धर्म में जितनी विकृतियाँ हैं, उनको हटाना होगा। ये पीढ़ी हमारे, हमारे ऊल- जलूल अन्धविश्वासों को और व्यर्थ की परम्पराओं को स्वीकार नहीं करेगी बल्कि माफ़ भी नहीं करेंगे। क्योंकि हमने जिस तरीक़े की भी परम्पराएँ पकड़ ली हैं, वो किसी भी तरीक़े से न तो वैज्ञानिक हैं और न ही वेदान्तिक हैं। न उनमें विज्ञान है और न उनमें वेद है। उनमें बस क्या है? एक भद्दा सा रीति-रिवाज़।

प्र: रिचुअल्स।

आचार्य: रिचुअल्स है। उन रिचुअल्स का समर्थन न वेद-वेदान्त करते हैं, न विज्ञान करता है। और ये जो पीढ़ी है वो इतना देख सकती है कि हमारे घर वाले और ये हमारे समाज वाले, धर्म के नाम पर यूँ ही बेवकूफ़ियाँ कर रहे हैं, तो इनका मन फिर धर्म से और उचट जाता है। कहते हैं, ‘इस तरह का धर्म हमें चाहिए ही नहीं।’ हमें ज़्यादा अच्छा फिर क्या लगता है? हमें जो उधर चल रहा है पश्चिम में वो हमें ज़्यादा अच्छा लगता है।

प्र: लेकिन ये शार्ट टर्म सोल्यूशन नहीं है। इसमें काफ़ी मेहनत, काफ़ी समय।

आचार्य: बहुत-बहुत।

प्र: मतलब इसमें जान लगानी पड़ेगी।

आचार्य: जान लगानी पड़ेगी।

प्र: जैसे एम्बिशन (महत्वाकांक्षा) के साथ।

आचार्य: देखिए लग करके जितनी हमारी थोड़ी बहुत सामर्थ्य है, कर भी रहे हैं। अभी एक अक्टूबर को वेदान्त दिवस घोषित किया है। उस दिन घोषणा की कि घर-घर उपनिषद् पहुँचाएँगे और लक्ष्य बनाया अपने लिए कि कम-से-कम बीस लाख घरों तक तो अभी उपनिषद् पहुँचाना है पहले चरण में और लगभग आठ-दस हज़ार लोगों ने अपना पता, फोन नम्बर , ईमेल-आइडी वगैरह भी हमारी वेबसाइट पर भेज दिया है कि हमारे घर आए उपनिषद् ।

एक-जनवरी से हम इन चीज़ों को पोस्ट करना भी शुरू कर देंगे, लोगों के घर में पहुँचने भी लग जाएँगे और बहुत लम्बा-चौड़ा मिशन है, जैसा आपने कहा। भारत का गौरव हर तरीक़े से इस पीढ़ी तक पहुँचाना पड़ेगा, नहीं तो ये पीढ़ी सीधे-सीधे समझ लीजिए कि भारत को और सनातन धर्म दोनों को छोड़े दे रही है। पासपोर्ट पर ये भारतीय रहेंगे। जो उसमें रिलीजन का कहीं पर कॉलम होगा किसी भी फॉर्म में, उसमें ये लिख देंगे हिन्दू। लेकिन इनका धर्म सिर्फ़ फार्म के लिए होगा, जनगणना होगी उसमें बोल देंगे हिन्दू हैं, इनका धर्म सिर्फ़ फॉर्म के लिए होगा और इनकी राष्ट्रीयता सिर्फ़ पासपोर्ट के लिए होगी। भीतर से न ये भारतीय हैं, न ये हिन्दू हैं और इसके ज़िम्मेदार हम ही लोग हैं।

आप एक पन्द्रह साल के या पच्चीस साल के जवान को क्या दोष दोगे? वो तो हमारी ही परवरिश, हमारी ही शिक्षा और हमारे ही द्वारा दिये गए संस्कारों का उत्पाद है। हम कहें, ‘वो ग़लत है, वो ग़लत है,’ वो क्या ग़लत है! उसका निर्माण हमने किया है, उस निर्माण में अगर कुछ ग़लती है, तो निर्माता से सवाल किया जाना चाहिए, निर्माता हम हैं। तो ये जो कुछ भी हुआ है, उसको सुधारना हमें ही पड़ेगा और भूल भीषण है। देखिए, हम इतने दिनों तक बड़ी आपदाओं को झेलते रहे, ख़ासतौर पर उत्तर भारत।

फिर बाद में दक्षिण भारत भी। बड़े अत्याचार सहे, बड़ा रक्तपात हुआ, सब झेल गये, क्यों झेल गये, क्योंकि भीतर जो हमारा केन्द्र था न, हमने उसको नहीं हारने दिया। हमने कहा, ‘चलो, बाहर से जो भी उपद्रव हो रहा है, होता रहे, भाग्य की बात है, संयोग की बात है। हम अधिक-से-अधिक जो प्रतिरोध कर सकते हैं करेंगे, लेकिन भीतर से हमारी हार नहीं होनी चाहिए।’

तो हज़ारों सालों तक बाहर कई तरीक़े, भारत बाहरी कई तरीक़े के ख़तरों से और आक्रमणों से संघर्षरत रहा, भीतर से कभी नहीं हारा। अभी पिछले पचास-सौ साल में, ख़ासतौर में पिछले बीस-तीस साल में, भारत अब भीतर से हार रहा है।

प्र: हाँ।

आचार्य: अब जो हो रहा है, वो उससे कहीं ज़्यादा भयानक है, जो भारत में अफगानों ने या तुर्कों ने या अंग्रेजों ने या पुर्तगालियों ने किया था। वो लोग तो अधिक से अधिक हमारा धन लूटना चाहते थे। पिछले पचास सालों में तो जैसे हमारा धर्म ही लुट रहा हो, धन का लुट जाना तो ठीक है, पर अगर आत्मा लुट जाए तो। और तब जो हुआ, जैसा आपने कहा, वो बहुत प्रकट था, बहुत ज़ोर का था। अभी जो हो रहा है, वो गुपचुप हुआ है, जैसे भीतर-ही-भीतर कैंसर हो किसी को और वो चुपचाप आपके पूरे शरीर में फैलता जा रहा हो और आपको पता भी न चले।

प्र: आपके समक्ष तब आता है जब तक बहुत ज़्यादा हो चुका होता है।

आचार्य: बहुत ज़्यादा हो चुका होता है तब जब आपका बच्चा घर में खड़ा होकर के आपको ही गाली दे रहा होता है। फिर आप कहते हो, ‘ये कैसे हुआ? ये कैसे हुआ? ये मैंने तो इसको संस्कार दिए नहीं!’

प्र: ‘निर्माता तो मैं ही हूँ।’

आचार्य: वो लेकिन ज़िम्मेदारी मानना बहुत कम लोगों में होता है, ईमानदारी कि ज़रूर मैंने कहीं भूल करी है। फिर कहते हैं, ‘अरे! ऐसा है, वैसा है।’ पचास दूसरी चीज़ों पर इल्ज़ाम कर देते हैं। तो अब देखिए न, कैपिटल के हाथ में, धन के हाथ में, मीडिया है और मीडिया के हाथ में कल्चर है। तो ले-देकर के आपका जो कल्चर है, उसको संचालित कौन कर रहा है? कैपिटल। कैपिटल इज डिक्टेटिंग कल्चर। तो कैपिटल तो कल को वैसा ही बनाएगा न जो कंज़्यूमरिज़्म को

प्र: बढ़ावा देगा।

आचार्य: बढ़ावा देगा। मीडिया पूरा लगा हुआ है युवाओं में धर्म को मिटाने में और बहुत घातक ज़हरीले मूल्य बैठाने में। तो जितना नाकारा क़िस्म का आदमी होगा, मीडिया उसको सुपरस्टार बना देगा एकदम और अगर कभी उनकी पोल खुलती है, तो आप देखिए, यहाँ मीडिया किस तरीक़े से कमर कस के, उनको डिफेंड करने में लग जाता है हज़ार तरीक़ों से। मान लीजिए, बॉलीवुड से कोई किसी अपराध में पकड़ जाए किसी भी तरीक़े का अपराध।

तो मीडिया का बहुत बड़ा वर्ग है, जो चुपचाप उसकी पैरवी में लग जाएगा। वो उसकी अच्छी-अच्छी फोटोज दिखाएगा, उसके पक्ष में अच्छे-अच्छे लेख लिखेगा। कामुकता को बढ़ावा देकर क्योंकि जहाँ कामुकता है, वहाँ कंज़्यूमरिज़्म है।

आप सोचते हो न कि ये बीस साल में भारत में इतना सेक्सुअल एक्प्लोजन कैसे हो गया। वो इसीलिए हो गया क्योंकि अगर आपको किसी को कुछ कंज़्यूम कराना है, तो बहुत ज़रूरी है कि उसके भीतर आप सेक्सुअल फीलिंग्स अराउज कर दें। जो सेक्सुअली अराउज़्ड बन्दा है, उसके सोचने-समझने की ताक़त ख़त्म हो जाती है और वो भोगने में लग जाता है। और उसको बेवकूफ़ बनाना आसान हो जाता है।

एक आदमी जब कामुक हो जाए तो बहुत आसानी से बेवकूफ़ बनाया जा सकता है। तो इसीलिए पूरा मीडिया इस वक्त अश्लीलता से भरा हुआ है। क्योंकि उन्हें पूरे समाज को, पूरे धर्म को, बेवकूफ़ बनाना है। लोग बेवकूफ़ बनाये जा सकें, इसके लिए ज़रूरी है कि उनको पहले सेक्सुअल बनाया जाए।

कैसे छीनोगे आप किसी का धर्म? पहले आपको उसे कामवासना का लालच देना पड़ेगा, आप उसे कामवासना का लालच दे दो, आप उसका धर्म छीन सकते हो। ये सब बातें आपस में जुड़ी हुई हैं। इनको आप समझिएगा। कैपिटलिज़्म नीड्स कंज़्यूमरिज़्म , कंज़्यूमरिज़्म नीड्स ए पर्टिकुलर काइंड ऑफ कल्चर फॉर दैट मीडिया हैज टू बी यूज़्ड (पूँजीवाद को उपभोगवाद की आवश्यकता होगी, उपभोगवाद को एक विशेष तरह की संस्कृति की आवश्यकता होगी; उसके लिए मीडिया का इस्तेमाल होगा)। और मीडिया में फिर घटिया तरीक़े के कंटेंट को बढ़ावा दिया जाना। बहुत ही लो क्वालिटी कंटेंट , जिसमें, जिसमें लो क्वालिटी , सबकुछ लो क्वालिटी, कॉमेडी भी लो क्वालिटी , कॉमेंट्री भी लो क्वालिटी , सेक्सुएलिटी भी लो क्वालिटी , सब कुछ ही।

प्र: मैंने जब आपसे प्रश्न पूछा था, सच में मुझे भी नहीं लगा था कि ये इतना गम्भीर विषय हो सकता है और इतनी चीज़ें आपस में जुड़ी हुई हैं, जैसा की आपने समझाया।

आचार्य: ये पन्द्रह, अठारह, पच्चीस साल वाले, इन बेचारों को पता भी नहीं है कि दे आर बीइंग अटैक्ड, दे आर बिसिज्ड — उनकी घेराबन्दी हो चुकी है। वो तो ऐसे सोच रहे हैं कि ज़िन्दगी कूल है। उन्हें ये पता ही नहीं है कि एक कोई ऊपर से बैठकर के लगातार उनको मोहरों की तरह इस्तेमाल कर रहा है और उनको ग़ुलाम बनाया जा रहा है। ये तो अपनी नज़र में बस अभी-अभी अंडे से निकले हुए ताजे-ताजे चूजें हैं, छोटी बत्तखें हैं या अपना इधर-उधर घूमते रहते हैं न, वही निब्बा-निब्बी, इनको कि अपना इधर-उधर घूम रहे हैं, हम तो अभी नए-नए बाहर आए हैं चिलिंग आउट, हैंगिंग आउट — ‘हम तो इंजॉय कर रहे हैं दुनिया को। इनको पता ही नहीं है कि ये कितनी बड़ी साज़िश के शिकार हैं।

प्र: इनको नहीं, मुझे लगता है कि हमें सामान्य रूप से एक समाज के तौर पर शायद ये बात नहीं पता।

आचार्य: नहीं पता, नहीं पता।

प्र: चाहे वो पेरेंट्स हैं, टीचर्स हैं, तो ये जिस खूबसूरती से आपने इसको जोड़ा, वो शायद आम आदमी नहीं समझ पाएगा, है न?

आचार्य: ये सोचते हैं कि ये कल्चर इनका है। इन्हें पता ही नहीं है कि इनके दिमाग़ में डाला गया है।

प्र: ताकि ये कंज़्यूम करें।

आचार्य: ताकि ये कंज़्यूम करें।

प्र: और ये सारी चीज़ें जो इसके आसपास बनायी गयी हैं।

आचार्य: बिलकुल।

प्र: ये उसको पढ़ाने के लिए।

आचार्य: चाहे वो हिस्ट्री का डिस्टोर्शन (विकृतिकरण) हो, चाहे वो डिइंटलेक्चुअलाइजेशन हो एक पूरी जनरेशन का कि उसकी सोचने-समझने की ताक़त हटाई जा रही है। चाहे वो फोर्स्ड कंज़्यूमरिज़्म और फोर्स्ड सेक्सुअलाइजेशन हो कि लड़कियाँ होती हैं छोटी-छोटी, बारह साल-चौदह साल की, वो भी अब अपनेआप को सेक्चुअल ऑब्जेक्ट की तरह देखने लगी हैं। मुझे इस तरीक़े से होना है, आइ मस्ट बी सेक्चुअली प्लीजिंग टू द मेल आइ। कि लड़के मुझे देखकर के अगर सेक्सचुअली अराउज नहीं हो रहे तो फिर मेरी आइडेंटिटी ये क्या है। उनको ये लग रहा है कि ये बातें उनके भीतर से आ रही हैं, उनको ये अभी समझ ही नहीं है कि ये बात।

प्र: कंडीशन्ड थॉट।

आचार्य: हाँ, ये कंडीशन्ड थॉट है। ये तुम्हारे भीतर से नहीं आ रहा है, तुमको मोहरा बनाया गया है और किसने तुमको मोहरा बनाया है, वो फेसलेस है बन्दा। तुम उसका चेहरा नहीं जानते, तुम कभी नहीं जान पाओगे कि वो लोग कौन हैं, जो तुमको मोहरे की तरह इस्तेमाल करके सिर्फ़ अपने मंसूबे पूरा करना चाहते हैं। आप पूछोगे कि उनके मंसूबे क्या है। उनका मनसूबा कुछ नहीं, पागलपन का है। उनको पैसा कमाना है, उनको अपने भीतर ये भावना लानी है कि हम ताक़तवर हैं, तो वो पैसे के पीछे हैं, वो पॉवर के पीछे हैं, बस यही है। और वो पाने के लिए, वो कुछ भी करने को तैयार हैं। भारत पर उनका आक्रमण बहुत ज़ोरदार है।

भारत एकदम उनके निशाने में एक नम्बर पर है, क्योंकि भारत आध्यात्मिकता का गढ़ रहा है और अभी भारत एक सौ-चालीस-करोड़ लोगों का देश है। एक-सौ-चालीस-करोड़ लोग माने एक-सौ-चालीस-करोड़ परस्पेक्टिव कंज़्यूमर्स। अब ये बात समझिएगा। एक-सौ-चालीस-करोड़ उपभोक्ता। जो पूँजीपति है उसके मुँह में पानी आ जाता है। एक-सौ-चालीस-करोड़ उपभोक्ता, ये सब मेरा माल खरीदें, तो मैं कितना अमीर हो जाऊँगा, तो मैं कितना अमीर हो जाऊँगा, एक-सौ-चालीस-करोड़ उपभोक्ता!

फिर वो देखता है कि ये एक-सौ-चालीस-करोड़ माल इसलिए खरीदने में ज़रा परहेज करते हैं क्योंकि इनके मूल्य, इनके आध्यात्मिक मूल्य, इनके धार्मिक मूल्य, इनको क्या सिखाते हैं। सन्तोष सिखाते है, विवेक सिखाते हैं, डिस्क्रिशन , तो वो कहता है कि मैं तुम्हारे धार्मिक मूल्य ही मिटा दूँगा। मैं तुम्हारे भीतर से सोचने-समझने की ताक़त ही समाप्त कर दूँगा, तभी तो तुम मेरे प्यादे बनोगे, तभी तो तुम मेरे इशारों पर नाचोगे। तो ये जो पूरी पीढ़ी है वो हमसे छीन ली गयी और ये हमारे लिए बड़े धिक्कार की बात है कि हमारे बच्चे हमसे छीन लिए; किसने छीन लिए वो उसका नाम भी नहीं जानते।

प्र: और कितनी, जिसको कहना चाहिए आयरनी (हास्यास्पद) है, जितना मैं समझता हूँ, पढ़ता हूँ कि जो पश्चिम सभ्यता है, वेस्टर्न सिविलाइजेशन है, वो अध्यात्म की तरफ़ जा रही है।

आचार्य: हाँ।

प्र: वो कितने लोग भारत में आते हैं, शिविर का गठन करते हैं कितने लोग। वो अध्यात्म की ओर जा रहे हैं। है न? और हम शायद छोड़ रहे हैं।

आचार्य: बिलकुल, बिलकुल। हम छोड़ ही नहीं रहे हैं, मैं जो देख पा रहा हूँ, भारत दुनिया का जैसे एक, एक स्लम जैसा बनेगा। बड़ा दुख और बड़ा क्रोध आता है। जैसे होता है न कि एक, एक बहुत साफ़-सुथरी, बड़ी गेटेड कम्युनिटी है, जैसे मान लिया आपके गुड़गाँव में है। और उससे कुछ दूरी पर, बहुत ही निम्न-मध्यम वर्गीय कॉलोनी है और उस निम्न-मध्यम वर्गीय कॉलोनी के लोग क्या करते हैं, उस गेटेड कम्युनिटी में आकर के कोई बर्तन माँजता है, कोई गाड़ी साफ़ करता है, कोई गार्ड बनता है।

तो जितने भी उनके लो वैल्यूज टास्कस् हैं वो ऊँचे लोगों के, उन सबको करने में काम आते हैं वो झोपड़पट्टी के लोग। ये पूरी दुनिया जो है न, ये भारत को अपनी झोपड़पट्टी बनाना चाहती है। ये है हमारे बच्चों का भविष्य। भई, भारतीयों को अंग्रेज़ी आनी चाहिए, ये अंग्रेजों के लिए ज़रूरी क्यों था। क्योंकि इन्हें अंग्रेज़ी आएगी, तभी तो हम इन्हें जो आदेश देंगे उनका पालन करेंगे न। आपको एक पियोन चाहिए। आपको एक पियोन चाहिए तो आप उसको अंग्रेज़ी सिखाओगे न? आप एक अंग्रेज़ हो, आपको एक पियोन चाहिए, आपको एक नौकर चाहिए, तो उसे आप अंग्रेज़ी सिखाओगे न? तो इसलिए ज़रूरी है कि भारतीयों को अंग्रेज़ी सिखायी जाए, नहीं तो वो अमेरिका वालों की ख़िदमत कैसे करेंगे!

फिर, मैं अंग्रेज़ हूँ, मुझे अपने यहाँ नौकर रखने हैं, तो ज़रुरी है न, मैं उनको अपना कल्चर भी सिखाऊँ, अगर उनको मेरा कल्चर नहीं पता होगा तो वो मेरी कैसे सेवा करेंगे। मेरी ख़िदमत कैसे करेंगे। तो इसलिए भारतीयों को अंग्रेज़ी सिखायी जा रही है, इसलिए भारतीयों को पश्चिम का कल्चर सिखाया जा रहा है, ताकि वो पश्चिम वालों की सेवा कर सकें। ये भारत का भविष्य है।

जिसको हम ग्लोबलाइजेशन कहते हैं भारत का न! भारत बिलकुल ग्लोबलाइज हो जाएगा, दुनियाभर से कनेक्ट (जुड़ना) हो जाएगा, ठीक वैसे ही कनेक्ट हो जाएगा जैसा किसी समृद्ध कॉलोनी से झोपड़पट्टी कनेक्ट होती है। कि वहाँ से बाइयाँ आ रही हैं और वहाँ से जितने भी लो वैल्यु टास्क है, वो आउटसोर्स किए जा रहे हैं। और वो सब भारत के लोग करेंगे। द क्लर्क ऑफ द वर्ल्ड, द पियून ऑफ द वर्ल्ड।

पश्चिम भारत को अपने सारे घटिया काम देना चाहता है, लो वैल्यू, लो कॉस्ट मैन-पॉवर के सप्लायर के रूप में यूज करना चाहता है भारत को। समझ रहे हो। वो कहते हैं कि भई, हमारे समाज में बहुत सारे गिरे हुए काम होते है, निचले दर्जे के काम होते हैं, हाथ के काम होते है। वो हम थोड़े ही करेंगे। बर्तन माँजने के लिए कोई चाहिए, वो बर्तन माँजने वाला कौन होगा। कनाडा में बर्तन माँजने के लिए कोई चाहिए, वो बर्तन माँजने वाला कौन होगा? वो भारतीय होगा। टैक्सियाँ चलानी हैं हमें, हमारी टैक्सियाँ कौन चलाएगा? भारतीय चलाएगा। पर मुझे अपना जो टैक्सी ड्राइवर चाहिए, वो अंग्रेज़ी में अच्छा हो और उसका कल्चर भी मेरे जैसा हो ताकि हम उससे कोई बात करें तो ढंग से जवाब दे सके।

मैं प्रतीक के तौर पर यूज (उपयोग) कर रहा हूँ, जब मैं कह रहा हूँ टैक्सी ड्राइवर या मैं कह रहा हूँ बर्तन माँजने वाला तो मैं इन कामों को प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल कर रहा हूँ। तो जो पूरी पश्चिमी अर्थव्यवस्था है, वो भारत को इस तौर पर तैयार कर रही है। ए हब ऑफ एबेंडेंट, लो क्वालिटी एंड कल्चरली डिग्रेडेड मैनपॉवर। ए हब ऑफ एबेंडेंट — एक सौ चालीस करोड़ यंग डेमोग्राफिकल यंग एंड कल्चरली इमेस्कुलेटेड , कल्चरली क्लीन्ड अप मैन-पॉवर। तो ये हमारी सेवा बहुत अच्छे से।

प्र: एंड कंज़्यूमर्स।

आचार्य: एंड कंज़्यूमर्स। क्योंकि भई, हमारी सेवा करेंगे तो इन्हें पैसे देंगे और उसी पैसे से ये हमारे ही प्रोडक्ट खरीदेंगे। भारत में क्या होता था अंग्रेजों के समय में? यहाँ से जाता था कच्चा माल। ठीक है? चाहे कपास हो, चाहे नील हो, इंडिगो; इंडिगो तो आपको पता है कितना बड़ा मुद्दा था। तो भारत से कच्चा माल जाता था, कहाँ जाता था। इंग्लैंड। वहाँ मेनचेस्टर पहुँचता था और वहाँ से कपड़ा बनकर के भारत आता था और भारतीय ही वो कपड़ा खरीदते थे। और वो महँगा कपड़ा होता था।

भारतेंदु हरीशचंद्र की पंक्ति याद है न — "विदेशी दुल्हन के मानो भए ग़ुलाम" इसीलिए फिर गाँधी जी ने कहा था कि विदेशी कपड़े की होली जलाओ, खादी पहनो, क्योंकि उस पूरी प्रक्रिया में भारत का आर्थिक शोषण निहित था। हमारे ही कच्चा माल ले जाकर के वो हमें हमारी ही चीज़ का उपभोक्ता बना रहे थे। वही काम फिर से होगा। इंडिया विल बी ए सप्लायर ऑफ एबेंडेंट मैनपॉवर एंड आलसो लॉट ऑफ रॉ मटीरियल (भारत प्रचुर मात्रा में मानव शक्ति और कच्चे पदार्थों का आपूर्ति करेगा)।

तो यहाँ से रॉ मटेरियल जाएगा, वहाँ प्रोसेस होगा। ये भारत का भविष्य तैयार किया जा रहा है। मैं समझता हूँ हमें इस भविष्य के ख़िलाफ बहुत ज़ोर की लड़ाई लड़नी पड़ेगी। हम तो उतर गये हैं। ये लड़ाई लड़ी जानी ज़रूरी है। भारत ने बड़े संघर्ष झेले हैं पिछले हज़ार-डेढ़ हज़ार साल में। आज जो हमारे सामने चुनौत खड़ी है, इतनी बड़ी चुनौती भारत ने कभी नहीं झेली। राष्ट्र ही मिटने को तैयार है और किसी को पता नहीं चलेगा क्योंकि पासपोर्ट पर तो इंडियन ही लिखा होगा। भीतर उसके कुछ इंडियन नहीं हैं बस पासपोर्ट पर तो इंडियन ही लिखा होगा, तो हम कहेंगे कहीं कुछ भी नहीं हुआ, कुछ भी नहीं हुआ, क्यों शोर मचा रहे हो फालतू। कोई समस्या नहीं खड़ी हुई है, कहीं कोई प्रॉब्लम नहीं है। होली-दिवाली वो मना लेगा।

तो मिलेगा हिन्दू ही तो है, देखो, होली-दिवाली मनाता है, तो हिन्दू है। पर भीतर उसके कुछ हिन्दू जैसा नहीं बचा होगा। तो हम कहेंगे, नहीं-नहीं, कुछ भी नहीं हुआ, कुछ भी नहीं हुआ, सब कुछ ठीक तो है। हिन्दूओं को क्या समस्या है। कौन कहता है, हिन्दू धर्म ख़तरे में है। कुछ भी नहीं हुआ है। जबकि सबकुछ हो चुका होगा। आदमी चल रहा होगा, भीतर प्राण नहीं बचे होंगे। बाहर-बाहर से लगेगा सब ठीक है, भीतर कुछ नहीं, खोखला है; कठपुतली हो चुका होगा।

प्र: बहुत-बहुत ही बढ़िया समझाया, प्रशांत आपने। जैसा आपने कहा कि आप इसके लिए जो कर सकते हैं, अपने सामर्थ्य के अनुसार कर रहे हैं इसे; घर-घर उपनिषद् वाला पहल जो आपने बताया। एक समाज, एक देश के तौर पर प्रत्येक व्यक्ति को क्या करना चाहिए? मतलब आपके कुछ सुझाव हैं, आम आदमी के लिए?

आचार्य: देखिए, सबसे पहले मैं कहूँगा, अगर आप एक अभिभावक हैं, अपने बच्चे के साथ ज़रा गहरी चर्चा में उतरिए और गहरी चर्चा का मतलब ये नहीं है कि ऐसी बातें जो समझ में नहीं आएँगी। बिलकुल शून्य से शुरुआत करके। आपका बच्चा कुछ कह रहा है, आपको उससे पूछना होगा, क्या ये तुम कह रहे हो, क्या तुम हमेशा ऐसा कहते थे, क्या ये बात तुम्हारी अपनी है, क्या साल भर पहले भी तुम ये बात कहते थे। अगर साल भर पहले नहीं कहते थे, अब कह रहे हो, इसका मतलब तुम्हारे मन में कहीं से तो आयी है न। कहाँ से आयी है। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम जो कुछ भी कहते हो, वो सब कुछ ही तुम्हारे मन में कहीं बाहर से आ रहा है!

बच्चे सीखने को तैयार होते हैं, अगर जो बात सिखायी जा रही है, उस बात में दम हो और जो सिखा रहा है उसमें सिखाने का सामर्थ्य हो। ये संवाद हर घर में होना चाहिए। करना पड़ेगा बच्चों के साथ कि तुम जो कुछ भी कह रहे हो — तुम कहते हो कि भई, ’योर लाइफ़ इज योर लाइफ़, माय लाइफ़ इज माई लाइफ़। यू गो योर वे, आइ विल गो माय वे।’ ठीक है? ’माय लाइफ़ माय रूल्स।’ (आपकी ज़िन्दगी आपकी है, मेरी ज़िन्दगी मेरी है। मेरी ज़िन्दगी मेरे नियम।)आप जो कुछ भी बोलते हो, वो बात तुम्हारे दिमाग़ में कहाँ से आयी?

वो बात तुम्हारी अपनी नहीं है, बेटा। वो बात तुम्हारे दिमाग़ में किसी बहुत काँइया आदमी ने डाली है। तुम भोले हो, तुम बात समझ ही नहीं रहे हो, तुम्हारे दिमाग़ का कोलोनाइजेशन किसने कर दिया, कौन छा गया तुम्हारे दिमाग़ पर? तुम्हें ये बात पता नहीं है, ठीक वैसे जैसे हमें कई बार नहीं पता होता कि कोविड हमें कहाँ से लग गया। पता होता पर लग तो गया। कोविड हल्की चीज़ है क्योंकि उसमें तमाम ख़तरे हैं, मरने का भी ख़तरा है। लेकिन ये पता तो चल जाता है, लग गया है, साफ़-साफ़ सामने आ जाता है न — कोविड पॉजिटिव। लेकिन आपका दिमाग़ ख़राब कर दिया गया, अभी कौन बताएगा आपको, कौन सा ऐसा मीटर है जो आपको बताएगा — स्लेवरी पॉजिटिव ? कोई काश, ऐसा।

प्र: और इंडियननेस पॉजिटिव।

आचार्य: हाँ।

प्र: और इंडियननेस पॉजिटिव।

आचार्य: नेगेटिव।

प्र: नहीं, इंडियननेस पॉजिटिव

आचार्य: हाँ, ये कौन बताएगा कि अब आपके दिमाग़ में कौन सा वायरस किसी बाहर वाले ने घुसेड़ दिया? ये सारे डिस्कशन करने पड़ेंगे, ये इनको समझ में आ जाए न कि ये एक कॉन्सपिरेसी , एक षड्यंत्र का शिकार बन रहे हैं हमारे बच्चे। तो सोचता हूँ — ख़ुद उनके भीतर से विद्रोह उठेगा। वो कहेंगे, ’मीडिया हमें जो कुछ दिखा रहा है, ये किताबें हमें जो कुछ पढ़ा रही हैं, ये जो पूरा कल्चरल सिस्टम हमने बना लिया है अभी नया-नया, ये ग़लत है, ये कॉन्सपिरेसी है।’ वो ख़ुद इसके ख़िलाफ खड़े हो जाएँगे।

प्र: तो असल में एक चिंगारी चाहिए। चाहे वो अभिभावक हो या अध्यापक हो, उनका जो एक्सपोज़र भी है, उससे हटकर एडिशनल एक्सपोज़र चाहिए। चाहे वो जैसे आपने बोला — चर्चा का या और ज़्यादा कुछ पढ़ने का, साहित्य का।

आचार्य: और उसमें आप ये भी कहें कि इंडिया की बात करनी है, रीजन की बात करनी है, तो भी ज़रूरी नहीं है। हम कह रहे हैं सच की बात करेंगे। सच की। ‘चलो बताओ, सच क्या है?’ और अगर भारत जिन मूल्यों पर खड़ा है, उनमें सच है, तो सच की जीत, भारत की जीत अपनेआप हो जाएगी।

प्र: बिलकुल।

आचार्य: तो आप भारत को भी मत जिताइए, आप सच को जिताइए।

प्र: और वही सच जो आपने दूसरा कहा, आपकी सोच का। ये जो आपकी सोच है, उसका गूढ़ क्या है, उसका रूट क्या है।

आचार्य: आपकी जो सोच है, वो कहाँ से आ रही है, बस हमें ये सच्चाई जाननी है। इस सच्चाई तक अगर हम पहुँच गये तो उसके बाद काम बहुत आसान हो जाएगा। जब तक हमें ये लगता रहेगा, हमारी सोच तो हमारी अपनी सोच है, मेरी है, ओरिजनल है, तब तक हमें बात समझ में नहीं आएगी। जैसे ही समझ में आएगा कि ये जो हमें विज्ञापन दिखाए जा रहे हैं, ये जो माहौल।

प्र: कितने तरीक़े से कंडीशनिंग (संस्कारित) की जाती है!

आचार्य: हाँ, पूरा सोशल मीडिया ही है और उसमे भी जिन लोगों को प्रमोट किया जा रहा है पीछे वेस्टेड इंटरेस्ट द्वारा। हम शिकार बन रहे हैं। हम शिकार बन रहे हैं।

प्र: बिलकुल सही। बहुत-बहुत।

आचार्य: और जो हमें शिकार बना रहे हैं, वो इतने एक तो काँइया बोला शब्द और साथ ही बेवकूफ़ भी। बोलते हैं न, बेवकूफ़ लोग हैं। कि वो अपने दो रुपये के मुनाफ़े के लिए, एक पूरा प्राचीन धर्म ही नष्ट करने को तैयार हो जाएँगे। वो कहेंगे, ‘हमारा कुछ मुनाफा हो जाए, उस मुनाफ़े के लिए अगर हमें पूरा राष्ट्र ही नष्ट करना पड़ेगा, तो हम कर देंगे।’

भई, आपने एक राष्ट्र की पूरी पीढ़ी ही ख़त्म कर दी, तो अब वो राष्ट्र बचा कहाँ? राष्ट्र माने सिर्फ़ ज़मीन-नदी, पहाड़-तालाब तो होता नहीं, राष्ट्र माने राष्ट्र के लोग, हम-आप नहीं रहेंगे, ये पीढ़ी रहेंगी। ये पीढ़ी अगर नष्ट कर दी गयी, तो अब राष्ट्र कहाँ बचा। फिर तो राष्ट्र बस एक किताबी बात बची।

प्र: बिलकुल। बिलकुल, प्रशांत, इस पर लगना पड़ेगा एकदम से। मिशन बनाकर, हर एक घर में। है न।

आचार्य: एक चीज़ इसमें और रह गयी है। हमने स्थितियाँ ऐसी पैदा कर दी हैं कि रोटी नहीं मिलती है बिना कल्चरली डिग्रेड हुए। उदाहरण के लिए हमने ज़बरदस्ती अनिवार्यता बना दी है कि कुछ नौकरियों के लिए अंग्रेज़ी आनी ज़रुरी है। इंटरव्यू वगैरह में ख़ास तरह का कल्चर प्रदर्शित करना ज़रूरी है, एक ख़ास तरीक़े के कपड़े पहनने ज़रूरी हैं। अगर आप पूरे तरीक़े से भारतीय और धार्मिक होना चाहें तो आपके लिए रोटी कमाना

प्र: मुश्किल हो जाएगा।

आचार्य: मुश्किल हो जाएगा। हमने ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दी है। व्यवस्था हटानी पड़ेगी। जब तक व्यवस्था ऐसी है कि आपको ज़िन्दगी में आगे बढ़ने के लिए, तरक्की करने के लिए, अपनी संस्कृति, अपना राष्ट्र और अपनी समझ को पीछे रखना होगा, तब तक कोई सम्भावना नहीं बचने की। इंजीनियर बनने के लिए अंग्रेज़ी क्यों आनी चाहिए? मुझे बताओ। बोलो। कोई वज़ह है।

प्र: वज़ह कोई नहीं। आपका सारा का सारा जो टेक्स्ट बुक्स हैं, आपका करिकुलम है, वो सारा अंग्रेज़ी में है इसलिए।

आचार्य: आपने मैंने दोनों ने दो हज़ार, सन् दो हज़ार, दो हज़ार एक का कैट क्लियर किया था। इतनी ज़्यादा उसमें अंग्रेज़ी को क्यों तवज्जो दी गयी? वज़ह बतायी जाए। एक मैनेजर की ज़िन्दगी में क्या वाक़ई अंग्रेज़ी उतनी ज़रूरी होती है, जितनी कैट (कॉमन एडमिशन टेस्ट) में होती है? कुछ महत्त्व होता है, मैं समझता हूँ। ठीक है। पर क्या उतना ज़्यादा? लगभग पचास प्रतिशत? जो कॉमन एडमिशन टेस्ट होता है उसमें दो ही चीज़ें हमारे समय में, शायद अभी भी, जाँची जाती थी गणित और अंग्रेज़ी। गणित में लॉजिक भी आ गया।

पचास प्रतिशत अंग्रेज़ी का महत्व है, एक अच्छा मैनेजर बनने में? पचास प्रतिशत? तो हम क्या बता रहे हैं उसको, लड़के को? यही तो बता रहे हैं, ‘देख, हिन्दी के साथ रहेगा तो भूखा मरेगा।’ ‘हिन्दी के साथ रहेगा तो भूखा मरेगा।’ आप किसी की कल्पना नहीं कर पाते न कि एमएनसी में और कुर्ते में। आप और डायरेक्टर हो चुके हो एक बड़ी एमएनसी में, आप मुझे बताओ, आपके काम में क्या कुछ भी ऐसा है जो कुर्ते में नहीं हो सकता? पर आपको भी कभी ये कल्पना नहीं आती होगी कि आप कुर्ते में बैठकर के काम कर रहे हो। ठीक कह रहा हूँ कि नहीं?

प्र: बिलकुल ठीक।

आचार्य: आप जो भी करते हो, आपको इतने लोग रिपोर्ट करते हैं, आपकी ये ज़िम्मेदारी, वो ज़िम्मेदारी, उसमें से क्या कहीं भी, कुछ भी ऐसा है, जो कुर्ते में नहीं किया जा सकता। लेकिन दिमाग़ में ये बात आ गयी है, व्यवस्था ऐसी बना दी गयी है कि अगर अपनी संस्कृति, अपनी भाषा के साथ रहे, तो भूखे मरोगे। इतनी बड़ी जब धमकी दे दी जाए किसी लड़के को किसी लड़की को, तो वो कैसे अपने धर्म की ओर, अपनी संस्कृति की ओर, अपनी भाषा की कदर करेगा? उसके मन में होगी बड़ी भावना अपनी जड़ों के लिए, अपने अतीत के लिए।

प्र: पर उसको पेट के लिए करना पड़ेगा, सीखना पड़ेगा।

आचार्य: पेट सब भावनाओं पर भारी पड़ता है न? पेट सब भावनाओं पर भारी पड़ता है। ये सारे जॉब इंटरव्यू अंग्रेज़ी में क्यों होते है? चलिए, मैं वहाँ मानता हूँ जहाँ पर कोई आपका बाहर से इंटरफेस है कि आप कहो कि साहब, ‘हमारे विदेशी क्लाइंट्स हैं और आपको उनसे डील करना है, तो इसलिए आपको अंग्रेज़ी आनी चाहिए।’ पर भारत में निन्यानबे-दशमलव-नौ प्रतिशत — भारत बहुत ओपन इकॉनमी नहीं है, भारत में जो ट्रेड का अनुपात है, जीडीपी से, ट्रेड एंड (01:16) जीडीपी रेशियो , वो दुनिया के देशों में लगभग बहुत नीचे आता है। चीन की अर्थवयवस्था में ट्रेड का बहुत बड़ा स्थान है, भारत में तो नहीं है।

तो हमारे यहाँ निन्यानबे दशमलव नौ प्रतिशत नौकरियों में, बाहर वालों से, फॉरेन क्लाइंट्स से, बहुत कम इंटरेक्शन होता है, बहुत कम इंटरेक्शन होता है। तो फिर सारे जॉब इंटरव्यूज़ अंग्रेज़ी में क्यों हो रहे हैं। अब एक मैनुफेक्चरिंग सेटअप में उसे काम करना है। ठीक है? मान लीजिए ऑटो मोबिल्स प्रोडक्शन या ऑटो कुछ भी। वो एक फैक्ट्री में सुपरवाइजर बनने जा रहा है, वो सुपरवाइजर उस फैक्ट्री का ख़्याल करेगा, जिसका विदेशियों से कोई लेना-देना नहीं, उसका जॉब इंटरव्यू अंग्रेज़ी में क्यों हो। मैं नहीं कह रहा कि अंग्रेज़ी नहीं आनी चाहिए, पर हमने तो अंग्रेज़ी को बिलकुल रानी बना दिया — इंडिस्पेन्सिबल कि इसके बिना तो कुछ हो ही नहीं सकता। तो जब आप ऐसा कर दोगे तो फिर हिन्दी के लिए और हिन्दुस्तान के लिए फिर आज के लड़के-लड़कियों के मन में कोई इज़्ज़त बचेगी कैसे?

प्र: सही बात है और यही चीज़ मेरे ख़्याल से रिजनल लैंग्वेजेज के लिए भी एप्लीकेबल है।

आचार्य: बिलकुल। सारे रिजनल , हिन्दी की जो दुर्दशा हो रही है, उससे ज़्यादा दुर्दशा तो क्षेत्रीय भाषाओं की हो रही है और उस पर तुर्रा ये है कि माना ये जाता है कि हिन्दी और बाक़ी जो क्षेत्रीय भाषाएँ हैं, ये आपस में एक-दूसरे का विरोध कर रही हैं। जबकि तथ्य ये है कि अंग्रेज़ी एक-एक भारतीय भाषा को खा रही है। चाहे वो हिन्दी हो, बंगाली हो, उड़िया हो, तमिल हो, पंजाबी हो। तमिल और हिन्दी का आपस में क्या विरोध होगा?

असली बात ये है, आप तमिलनाडु में चले जाइए। आप तमिलों से बात करिए। तमिल को भी अंग्रेज़ी ने ही खा लिया आप तमिलनाडु की नयी पीढ़ी देख लीजिए न, आप देखिए कि उनमें तमिल कितनी बची है, तमिल को भी अंग्रेज़ी खा गयी, हिन्दी को भी अंग्रेज़ी खा गयी और हम हिन्दी बनाम तमिल के ही झगड़े में पड़े रह गये।

प्र: सही बात है। तो इसको पूरा जैसा कि आपने कंज्यूमरिस्ट कल्चर के बारे में बताया, हिस्ट्री के बारे में बताया, तो ये भी एक अपने आप में बहुत इम्पोर्टेंट प्वाइंट है। है न? कि किस तरीक़े से हमारी पूरी व्यवस्था में उन सब चीज़ों का ज़्यादा महत्व है जो आपको भारतीयता से दूर ले जाते हैं नहीं तो आपकी रोटी का सवाल हो जाएगा।

आचार्य: मैं कई बार पूछता हूँ मेडिसिन की पढ़ाई आज भी हिन्दी में नहीं हो सकती। आप एमबीबीएस नहीं कर सकते हिन्दी माध्यम से। ह्यूमन एनाटॉमी (मानव शरीर रचना में) में ऐसा क्या है जो हिन्दी भाषा अभिव्यक्त नहीं कर सकती?

प्र: मेरे ख़्याल से सारा जो सिस्टम बना हुआ है आपके एजुकेशन का, जो किताबें हैं, जो रिसर्च पेपर्स हैं, जो आपके मेडिसिन्स की रिसर्च होती है, मुझे लगता है पूरा-का-पूरा सिस्टम ही इंग्लिश में है शायद। हिन्दी में है।

आचार्य: [01:19:07]=== ये नहीं हो पाएगा क्या?

प्र: हाँ, ये है कि बहुत किसी को लगना पड़ेगा किसी को प्रयास करना पड़ेगा।

आचार्य: ये कितनी, ये कितना बड़ा काम है बात करना? भई, दुनिया में जो भी देश शीर्ष पर हैं, वो अपनी-अपनी भाषा और अपनी-अपनी संस्कृति पर चलते हैं। जापान — जापानी; जर्मन, फ्रेंच, स्पेन।

प्र: यहाँ तक कि चीन भी।

आचार्य: चाइना भी। इतना बड़ा उदाहरण ख़ुद चीन है। जिन्होंने भी तरक्की करी है, अपने मूल को बचाकर के और अपने मूल को ही अभिव्यक्त करके तरक्की करी है । भारत अपने मूल को खोकर के प्रगति कैसे कर जाएगा? कर ही नहीं सकता।

प्र: तो आपका वो उदाहरण याद आ रहा है। विल बिकम कॉलोनी टू द ग्लोबल वर्ल्ड ऑर स्लम टू द ग्लोबल वर्ल्ड (कि हम वैश्विक संसार के कॉलोनी या झोपड़पट्टी बनकर रह जाएँगे)।

आचार्य: बिलकुल। एक-सौ-चालीस करोड़ की निम्न-मध्यम वर्गीय ग़ुलामों की मंडी।

प्र: काफ़ी चिन्ता होती है ये सब बात करके-सुनकर।

आचार्य: हम सब उसमें साझीदार हैं और इसीलिए हम सबके ऊपर ज़िम्मेदारी है कि जितना रोक सकते हैं रोकें। देखिए, बहुत नुक़सान हो चुका है। अब जितना रोका जा सकता है, रोकने पर काम करना पड़ेगा। हमें बिलकुल नहीं अच्छा लगेगा जिस दिन हमें दिखाई देगा कि हमारे बच्चे, हमारे बच्चे नहीं रहे। वो न जाने किसके बच्चे हो चुके हैं, न जाने वो किसकी भाषा बोल रहे हैं, न जाने वो किसके विचार हमें पढ़ा रहे हैं, हमारे बच्चे, हमारे बच्चे नहीं रहे।

प्र: और जैसा कि आपने कहा कि हमें ये भी नहीं पता चलेगा कि ये किसने कर दिया।

आचार्य: किसने कर दिया है।

प्र: इतना छिपा हुआ है ये, साइलेंट है।

आचार्य: ये हमारे स्कूल कॉलेज , ये एक तरीक़े से फिर से बहुत जिमेदारी के साथ बोल रहा हूँ, ये धर्मांतरण के अड्डे बन चुके हैं। सेंटर्स ऑफ प्रोज़लटाइजेशन। वहाँ ऐसा नहीं हो रहा, फिर कह रहा हूँ कि हिन्दू को कुछ और बना रहे हैं, मुसलमान को कुछ और बना रहे है। न। वहाँ पर ये हो रहा है कि जिसका जो भी धर्म है, उससे वो धर्म को छीन ले रहे हैं। आप अपने बच्चे को स्कूल भेजते हो घर से कि वो पढ़ने जा रहा है। वो पढ़ने नहीं जा रहा है, वो वहाँ बहुत कुछ गँवाने जा रहा है, ख़त्म होने जा रहा है और फिर वो वहाँ से वापस आता है, तो वो सोशल मीडिया खोल लेता है और सोशल मीडिया में जितने गँवार हैं, सब छाये हुए हैं। तो ये दोहरा आक्रमण हो रहा है आज की पीढ़ी पर।

प्र: और जैसा कि आपने कहा, इसका उपाय वही है — चर्चा। गहरी चर्चा बच्चों के साथ और एक्सपोज़र , है न। जो सच जो है हमारे, इतिहास का सच है, हमारी संस्कृति का सच।

आचार्य: सच सामने लाया जाना चाहिए और वेदान्त कोई बिलीफ़ सिस्टम नहीं है, वेदान्त पूछता है — ‘सच्चाई बताओ।’ तो एक तरफ़ तो हम इतिहास के सच की बात कर रहे हैं और दूसरी तरफ़ इंसान का सच होता है। इतिहास का सच सामने लेकर के आओ और इंसान का सच क्या है, ये आपको वेदान्त से मिलेगा और बातचीत से मिलेगा। ये हमारे दिमाग़ का सच क्या है, हम कैसे कुछ भी सोचना शुरू कर देते हैं, हम कैसे कोई मान्यता, कोई विश्वास को उदाहरण, कोई बिलीफ़ बना लेते हैं?’

तो इतिहास का सच और इंसान का सच, ये दोनों सामने लाए जाने चाहिए, तभी भारत बच सकता है, नहीं तो मामला बहुत गड़बड़ है।

प्र: चलो, कोशिश शुरू करते हैं। मैं यही कह सकता हूँ और आपने जिस तरीक़े से समझाया और जिस तरीक़े से सब चीज़ों को जोड़ा। मैं तो ख़ुद बहुत जागरुक हुआ आज।

आचार्य: इसमें लगकर काम करना पड़ेगा।

प्र: बहुत-बहुत धन्यवाद, प्रशांत।

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