
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, श्रीकृष्ण तो स्वयं ही परमात्मा थे, फिर भी वे अपने वंश के नाश को नहीं रोक पाए। क्या अंत में श्रीकृष्ण को भी शरीर त्यागना पड़ा?
आचार्य प्रशांत: हम ऐसे हैं कि जैसे हम कीचड़ में धँसे हुए हों, दलदल में बिल्कुल। और हमें बचाने के लिए कोई दलदल में उतरे, तो हम उससे कहें, "अरे, तुम हमें क्या बचाओगे, तुम तो ख़ुद दलदल में हो।”
हम परमात्मा पर भी यही इल्ज़ाम रख देते हैं। जब परम सत्ता शरीर धारण करके हमारे सामने आती है, तो हम उससे बोलते हैं, "अरे, तुम तो हमारे ही जैसे हो। तुम्हारे भी तो पाँच ही उँगलियाँ हैं, तुम हमें क्या बचाओगे।" गज़ब बात हो गई! और थोड़ी देर पहले हमने कहा था कि जहाँ देह है, वहाँ विकार है। विकारहीन देह जैसी कोई सत्ता नहीं होती।
तो अब वो तुम्हें दलदल में बचाने आया है, और तुम्हारी तोहमतों और इल्ज़ामों के बावजूद वो किसी तरह तुमको खींच के बाहर ले जाए। और बाहर वो हाँफ रहा है और सुस्ता रहा है, किसी तरह साँस ले रहा है। तो तुम उसके पास जाओ और कूल्हों पर हाथ रख के, नैन मटका के बोलो, "एक बात बताओ, भाई साहब, मेरा रुमाल कहाँ है? नहीं, मेरी जेब में रुमाल था, जब मैं दलदल में गिरी थी। मेरा रुमाल कहाँ है? निश्चित रूप से तुम कोई रुमाल चोर हो, तुम्हारा इरादा ही मेरे रुमाल की चोरी का था। ये दलदल भी तुम ही ने रचा है कि मेरे जैसे लोग दलदल में गिरें, और फिर तुम बचाने के बहाने रुमाल चुरा लो।"
बड़ी बेचारगी है परमात्मा की। वो ऊपर से न उतरे, तो तुम इल्ज़ाम भेजते हो कि तू ऊपर ही बैठा है। नीचे से इतने तुमने ताने मारे कि वो भी विकल हो गया। फिर वो अवतरित हो, शरीर धारण करे, तो तुम बोलते हो, "ले, ये तो हमारे जैसे निकले।"
“श्रीकृष्ण की मौत हो गई।” भाई, जन्म हुआ है। तुम जन्माष्टमी मनाते हो, तो मृत्यु नहीं होगी? जन्माष्टमी मनाते वक़्त तुम कभी नहीं पूछते, "श्रीकृष्ण का जन्म हो गया?” तब तो ले खीर दे खीर। आने ही वाली है जन्माष्टमी। तुमने किसी को देखा है ये सवाल पूछते हुए, कि “श्रीकृष्ण का जन्म कैसे हो सकता है?” जो अनादि है, जो अनंत है, जो अमर्त्य है, वो निश्चित रूप से अजन्मा भी होगा, अजात भी होगा कि नहीं? पर जन्म तो तुम हर्षोत्सव मनाते हो। इतने-इतने तुम वो श्रीकृष्ण पालने में झुलाओगे और सारे उपद्रव कर दोगे।
और इस बात को लेकर मुझसे, कुछ नहीं तो पचास बार सवाल पूछा जा चुका है कि, "वो तो परमात्मा थे न, तो फिर ये सब लड़ाई वगैरह हो गई थी, तो बचा क्यों नहीं पाए?” अवतार थे, अवतार। और परमात्मा की भी मजबूरी है कि तुम्हारी मदद करने के लिए उसे भी ज़मीन पर आना पड़ता है। अवतरित होना पड़ता है, काहे कि तुम तो ऊपर जाओगे नहीं। तुमने तो बाँध रखा है कि कुछ भी कर लो, ऊपर से कितनी भी रस्सी लटकाओ, हम नहीं पकड़ेंगे। हम ऊपर नहीं उठेंगे। तुम्हारी ज़िद पक्की है कि हम तो वैसे ही रहेंगे जैसे हम हैं। तो वही बेचारा फिर झुक जाता है। वही कहता है, "तुम नहीं आ रहे ऊपर, तो हम ही नीचे आ जाते हैं।" फिर वो नीचे आता है। तुम कहते हो, "ये देखो, नीचे वाले! ये आए हैं हमें बचाने।"
ऐसे ही एक ने पूछा था, "राम को इतनी भी अकल नहीं थी कि सोने का मृग नहीं होता? सीता ने बोला, 'मेरे लिए स्वर्ण मृग लेके आओ।' वो तीर बाँध के चल दिए कि हम सोने का मृग मारने जा रहे हैं। राम को नहीं पता था कि सोने का मृग नहीं होता?"
नहीं, राम को नहीं पता, तुम्हें तो पता है न। तुम काहे बीवी के पीछे चल देते हो फ़्रिज लाने। तुम्हें नहीं पता कि फ़्रिज से दिमाग़ नहीं ठंडा होता। पर जब हम रामचरितमानस कर रहे थे, माह भर अध्ययन किया था, सवाल लेते थे, तो ख़ूब आता था ऐसे ही कि, "जब उनको पता था कि बीवी ऐसी है, तो काहे को छोड़कर के चले गए मृग के पीछे? उन्हें नहीं पता था रावण आएगा?" और ये लक्ष्मण, "ये ज़मीन पर रेखा खींच रहा था। इसे नहीं पता था कि भाभी फाँद जाएगी? जब वो ऐसी है कि भैया को भेज दिया कि हिरण मार के लाओ, तो तुम मेरी लकीर की क्या इज़्ज़त करेगी? अभी फाँदेगी, भागेगी तुरंत।"
इस तरीके के तुम सवाल पूछते हो। मैं बिल्कुल अवाक रह जाता हूँ कि क्या बोलूँ क्या? "हनुमान को समझ में नहीं आता था कि बूढ़ी बूटी कहाँ पर है। उन्हें उठाना ही था, तो किसी वैद्य को पहले ही उठा के ले जाते। वो वहाँ पर पहले ही छानबीन करके बता देता कि, 'बेटा, यह रही संजीवनी।' यह तो बड़ा ही उन्होंने वेस्टफुल काम किया न, इतने सारा सब पहाड़ उखाड़ के ले आए।"
मेरे पास कोई जवाब नहीं है इन बातों का। तुम ये नहीं देखते कि तुम कैसे हो, तुम पचास तरीके के आदर्श संतों और मनीषियों और अवतारों पर थोप देना चाहते हो। और जानते हो तुम्हारी मंशा क्या है? तुम्हारी मंशा ये है कि बस ज़ाहिर हो जाए कि संतों ने भी ग़लतियाँ की हैं, अवतारों से भी चूक होती है। और अगर उनसे चूक होती है, उन्होंने ग़लतियाँ की हैं, तो फिर हमें तो ग़लतियाँ करने का हक़ मिल गया न। निकालो रे समोसा!
तुम्हारा मंसूबा बस यही है कि ज़ाहिर हो जाए कि, "देखो, जब कृष्ण भी अपने कुटुंब का उपद्रव नहीं रोक पाए, तो हम कौन होते हैं रोकने वाले? मरने दो सास-बहू को।" यही चाहते हो? प्रश्न को देखूँ या प्रश्नकर्ता के इरादे को देखूँ?
अरे बाबा, निराकार जब साकार होता है, तो साकार सदा सीमित ही होगा। और तुमको आकार से बड़ा तादात्म्य नहीं है, तुम्हारी सहायता करने के लिए निराकार को साकार होना पड़ेगा।
और जो साकार हुआ, वो सीमित हुआ, उसकी सामर्थ्य सीमित हो जाती है। दैहिक रूप से, मानसिक रूप से, वो जो कुछ करेगा, वो सीमित हो जाता है।
लेकिन तुम्हें ज़रा विवेक होना चाहिए। ज़रा भेद करना आना चाहिए। यह (माइक की ओर इंगित करते हुए) मूर्ख है, इसे कोई बोध नहीं। पर इसके माध्यम से जो हो रहा है, वो मूर्खता नहीं है। ये शरीर विकारों का और दोषों का और व्याधियों का घर है। पर अभी जो बात बोली जा रही है, वो तुम्हें निर्विकार तक ले जा सकती है, वो तुम्हें निर्दोष कर सकती है। तुममें ज़रा भेद होना चाहिए, तुम्हें ज़रा विवेक आना चाहिए कि तुम्हें इस शरीर को देखना है या बात को समझना है।
राम के विषय में जानते हो क्या कहते हैं तुलसी? कि पग के बिना चलते हैं और कान के बिना सुनते हैं। वो हैं तुलसी के आराध्य। "सुनहिं बिनु काना" तो बताओ, किस राम की बात कर रहे हैं तुलसी? निराकार की बात कर रहे हैं न?
तुम्हें यह विवेक आना चाहिए कि तुम राम को, जब सशरीर भी देखो, तो देखो तुम निराकार राम को ही।
पर तुम साकार राम को देखते हो। फिर तुम कहते हो, "ये देखो, ये तो स्वर्ण मृग को मारने चले गए।" पागल! तुम्हें दैहिक राम में निराकार ब्रह्म की प्रतीति होनी चाहिए। अगर देह भर को देखोगे, तो तुम्हें सौ खोट दिख जाएँगी। निश्चित रूप से दिख जाएँगी, दिख इसलिए जाएँगी क्योंकि है। देह में तो विकार होंगे ही। लीला में तो तुम तमाम गुण-दोष निकाल ही लोगे।
सुनो, क्या कह रहे हैं तुलसी। "पग बिना चलहिं" उस राम की बात कर रहे हैं जो बिना पाँव के चलता है और जो बिना कान के सुनता है, जो इंद्रियातीत है। उससे प्रयोजन रखो। ये मत पूछो कि श्रीकृष्ण का वंश। कृष्णों का कोई वंश होता है क्या? आत्मा असंग है, तो वंश कहाँ से आया? जिसके न आगे कोई, न पीछे कोई, उसका वंश कहाँ से आ गया? पर तुम ऐसी ही भाषा में बात करते हो, ऐसा ही तुक बिठाते हो। तुम कहते हो, "श्रीकृष्ण की पत्नियाँ।"
अरे, या तो मान लो कि अवतार की पत्नियाँ हैं। तब ठीक। अवतार की तो लीला होती है, अवतार की पत्नियाँ हो सकती हैं। लीला में पत्नी के लिए स्थान है। और अगर यही कहना चाहते हो कि परमात्मा है, तो जान लो कि परमात्मा की कोई पत्नी नहीं होती। या परमात्मा की पत्नी होती भी है, तो स्वयं परमात्मा। वो विवाह किससे करता है? अपने से ही करता है। बात आई समझ में?
ये छिद्रान्वेषण बंद करो। छेद ढूँढ़ रहे हैं कि छेद कहाँ पर है बस उँगली डाल दें उसमें। खोट ढूँढ़नी है।
"मेरा रुमाल कहाँ है?" अरे, जान बचाई है उसने तुम्हारी। ये नहीं दिख रहा है तुम्हें कि उसने तुम्हारी जान बचा दी। तुम्हें काहे की फ़िक्र पड़ी है? रुमाल की।