श्रीकृष्ण, श्रीराम और अन्य अवतारों को केवल उनके मानवीय जीवन से समझना भ्रम पैदा करता है। साकार रूप सीमित होता है, जबकि उसका उद्देश्य मनुष्य को निराकार सत्य की ओर ले जाना है। देह, परिवार या घटनाओं में कमियाँ खोजने के बजाय उनके संदेश का सार समझना आवश्यक है। विवेक, कृतज्ञता और सही दृष्टि ही आध्यात्मिक समझ का आधार हैं, जबकि हर बात में दोष ढूँढ़ना केवल अहंकार को पोषित करता है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, श्रीकृष्ण तो स्वयं ही परमात्मा थे, फिर भी वे अपने वंश के नाश को नहीं रोक पाए। क्या अंत में श्रीकृष्ण को भी शरीर त्यागना पड़ा?
आचार्य प्रशांत: हम ऐसे हैं कि जैसे हम कीचड़ में धँसे हुए हों, दलदल में बिल्कुल। और हमें बचाने के लिए कोई दलदल में उतरे, तो हम उससे कहें, "अरे, तुम हमें क्या बचाओगे, तुम तो ख़ुद दलदल में हो।”
हम परमात्मा पर भी यही इल्ज़ाम रख देते हैं। जब परम सत्ता शरीर धारण करके हमारे सामने आती है, तो हम उससे बोलते हैं, "अरे, तुम तो हमारे ही जैसे हो। तुम्हारे भी तो पाँच ही उँगलियाँ हैं, तुम हमें क्या बचाओगे।" गज़ब बात हो गई! और थोड़ी देर पहले हमने कहा था कि जहाँ देह है, वहाँ विकार है। विकारहीन देह जैसी कोई सत्ता नहीं होती।
तो अब वो तुम्हें दलदल में बचाने आया है, और तुम्हारी तोहमतों और इल्ज़ामों के बावजूद वो किसी तरह तुमको खींच के बाहर ले जाए। और बाहर वो हाँफ रहा है और सुस्ता रहा है, किसी तरह साँस ले रहा है। तो तुम उसके पास जाओ और कूल्हों पर हाथ रख के, नैन मटका के बोलो, "एक बात बताओ, भाई साहब, मेरा रुमाल कहाँ है? नहीं, मेरी जेब में रुमाल था, जब मैं दलदल में गिरी थी। मेरा रुमाल कहाँ है? निश्चित रूप से तुम कोई रुमाल चोर हो, तुम्हारा इरादा ही मेरे रुमाल की चोरी का था। ये दलदल भी तुम ही ने रचा है कि मेरे जैसे लोग दलदल में गिरें, और फिर तुम बचाने के बहाने रुमाल चुरा लो।"



