किसी ग्रंथ में कुछ खटका, तो हमने पूरी परंपरा ही ठुकरा दी, ठीक वैसे जैसे साल भर पढ़ाई से भागे छात्र फ़ेल होकर किताब ही जला दें। या हम सब ग्रंथ अपने पास सजा लेते हैं, पर उन्हें अलग-अलग मानकर, और फिर दो प्यारी बातें हमें दो उलटी दिशाओं में खींचने लगती हैं: ज्ञान चुनें या भक्ति? दोष ग्रंथों का नहीं, हमारी नासमझी का है, और यह बँटवारा ही वह ज़मीन है जिस पर हमारी अलग पहचान टिकी है। अगर गीता, बुल्ले शाह और लाओ त्ज़ु एक ही बात कह रहे हों, तो हम आख़िर किस बात पर लड़ रहे हैं?
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[लाओ त्ज़ु पर एक सत्र से, 2026। आचार्य जी परंपरा से जुड़ने के तीन आम तरीक़े गिना रहे हैं: किसी एक धारा में बह जाना, सब धाराओं को एक साथ सजा लेना, और सबको ठुकरा देना।]
आचार्य प्रशांत: यह ग़ज़ब ही तरह का अहंकार है। परंपरा छी-छी! किसी परंपरा की मत सुनो, मेरी सुनो। मैं बस अपनी सुनता हूँ। मैं किसी की नहीं सुनता, क्योंकि सारी परंपराएँ तो छी-छी हैं। छी-छी तो है, हम मानते हैं। पर परंपरा छी-छी थी या तुम्हारी नज़र छी-छी थी? लोगों ने तो उपनिषदों में भी क्या-क्या बवाल ढूँढ निकाला है। लोगों ने तो गीता में भी स्त्रियों का अपमान ढूँढ निकाला और जातिभेद भी ढूँढ निकाला। अब गीता को छी-छी बोलें या तुम्हारी दृष्टि को छी-छी बोलें? अपनी दृष्टि साफ़ करने की जगह ऐसे लोग बोल देते हैं, हमने अब सारे ग्रंथों और सारी परंपराओं को त्याग दिया है। बेड़ियाँ हैं ये सब, और हम आसमान में मुक्त उड़ने वाले परिंदे हैं। हम नहीं बँधते किसी ग्रंथ में। ग्रंथ तुम्हें बाँध रहा था या ग्रंथ तुम्हें मुक्ति दे रहा था? हाँ, तुममें इतना जुनून है बँधे रहने का कि तुम ग्रंथ को भी अपने बंधनों का हिस्सा बना लो, तो ये तुम्हारी बात है ना। इसमें ग्रंथ का तो कोई दोष नहीं।
मैं एक उदाहरण दिया करता हूँ। आप में से कितने लोग या तो शिक्षक हैं या किसी न किसी तरीक़े से शिक्षा व्यवस्था से जुड़े हुए हैं? कितने लोग हैं जो अभिभावक हैं और अपने बच्चों को स्कूल




