प्रश्नकर्ता: सत श्री अकाल आचार्य जी। आज सुबह से टीवी (दूरदर्शन) पर देख रहा हूंँ कि हमारे सिख भाई अफ़गानिस्तान से जान बचाकर भागने पर मजबूर किये जा रहे हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब जी को सिर पर धारण करके बुरी हालत में उन्हें देखकर मुझे दुख भी है और गुस्सा भी। एक समय पर हमारे महाराजा रंजीत सिंह अफ़गानिस्तान पर राज़ करते थे। उसी अफ़गानिस्तान में इतने गुरुद्वारे और मन्दिर तोड़ दिये तालिबान ने और सिखों व हिन्दुओं को भागने पर मजबूर कर दिया।
आचार्य प्रशांत: ताकत की बात है। धर्म, असली धर्म हमेशा एक नाज़ुक चीज़ होता है और उसको बचाने के लिए उसे संरक्षण देने के लिए हमेशा शक्ति की ज़रूरत होती है। असली धर्म, कोई भी चीज़ जो असली हो, कोई भी चीज़ जो सुन्दर हो, निर्दोष हो वो हमेशा कोमल होती है, सूक्ष्म होती है। तो उसको सुरक्षा देनी पड़ती है।
आपके पास अगर उसे सुरक्षा देने की ताकत नहीं है तो न आप सच्ची धार्मिकता को बचा पाएंँगे, न सच्ची संस्कृति को, न सच्ची ज़िन्दगी को। ये सब तोड़ दिये जाएँगे, नष्ट कर दिये जाएँगे।
तो ये मुद्दा बहुत सीधा है। जितने भी पूर्वी धर्म रहे हैं, भारत भूमि से उठी जितनी धाराएंँ रही हैं, वो आक्रामक नहीं रही हैं। वो बहुत बहिर्गामी भी नहीं रही हैं कि दुनिया की ओर देखें, दुनिया फ़तह करने पर ध्यान दें। अन्तर्मुखी रही हैं। उनका उद्देश्य रहा है खुद को देखना, अहंकार को पहचानना, अहंकार को समर्पित करना।
तो सारी ऊर्जा भीतर की ओर बहती रही है। जब ऊर्जा भीतर की ओर बहती रहती है तो बाहर की दुनिया में शक्ति अर्जित करना इंसान भूल सा जाता है, समाज भूल जाता है। देश भी इस बात को भूल जाता है। भीतर बहुत बड़ा काम है और उसमें बड़ी ऊर्जा लगती है। और भीतर जाने में बड़ा रस भी है, बड़ा आनन्द भी है।



