किसी से मिलते ही हम पूछ लेते हैं: आपके गुरु कौन हैं, आप किस परंपरा से हैं? नाम बड़ा हो तो सिर अपने-आप झुक जाता है। कोई एक मठ से जुड़कर उसका वारिस बन जाता है, कोई सब परंपराओं की दुकान सजा लेता है, और कोई सबको ठुकराकर कहता है, मैं ख़ुद काफ़ी हूँ। तीनों रास्ते आसान हैं, और तीनों में समझ कहीं नहीं है। दस किताबों पर उथली बात एक किताब पर उथली बात से बड़ी कैसे हो गई? क्या हम सिर्फ़ फैल रहे हैं, या कहीं ऊपर भी उठ रहे हैं?
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[लाओ त्ज़ु पर एक सत्र से, 2026]
आचार्य प्रशांत: ना जाने कौन-सा मोह है, हटा भी नहीं जा रहा। ना जाने कौन-सी आशा है, हटाया भी नहीं जा रहा। जिनको सिखा रहे हो कि आज़ाद हो जाओ, ख़ुद उन्हीं के ग़ुलाम बन गए हो। क्या करें? दुनिया भर की आध्यात्मिक पारंपरिक धाराएँ रही हैं। हम भी वेदांत के साथ होते हैं, जिसको आमतौर पर ज्ञान मार्ग कहा जाता है। कभी हम संतवाणी के साथ होते हैं, जिसको आमतौर पर भक्ति या प्रेम मार्ग कह देते हैं। कभी हम उनके साथ होते हैं जिनके दर्शन को ही नास्तिक दर्शन कहा गया। आचार्य नागार्जुन, बौद्ध दर्शन, शून्यता सप्तति। बीच-बीच में हम पाश्चात्य दार्शनिकों से भी मिल लेते हैं। है ना? और लाओ त्ज़ु हैं यहाँ पर। अष्टावक्र गीता, उपनिषद, अवधूत गीता, ये सब मोटे तौर पर वेदांत की परंपरा के भीतर ही समाहित हो जाते हैं।
बहुत सारी परंपराएँ रही हैं। अब बाबा बुल्ले शाह, “बुल्ला की जाना मैं कौन?” भक्ति मार्ग ही है। वहाँ हम नाम देंगे, भाई ये सूफ़ियों की धारा है। है ना? इतनी सारी धाराएँ हैं। अब ये जितनी धाराएँ हैं, इनके साथ तीन काम करना बड़ा आसान रहा है। बहुत आसान। हम कोई चौथा काम करना चाहते हैं, क्योंकि वो आवश्यक है। क्योंकि वही मूलभूत है। तुरीय काम। पर तुरीय तक जाने के लिए पहले प्रथम, द्वितीय, तृतीय को समझ लेते हैं।




