ये जो तुम आसमानों में ईश्वर बैठा देते हो, ये बस तुम्हारा एक बहुत बचकाना प्रयास है, सत्य को भी ऑब्जेक्टिफ़ाई करने का। किन्हीं आसमानों में तुमसे दूर कोई नहीं बैठा हुआ है। बाहर कोई नहीं ताक़त है जो तुम्हारी ज़िंदगी चला रही है। “तत्त्वमसि,” वो तुम हो, वो तुम्हारा ऑब्जेक्ट नहीं है। इसीलिए उस “तत्” को और “आत्म” को अभिन्न भी कहा गया। तुम्हारी सच्चाई और परम सत्य एक है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा नाम यादवेंद्र त्रिपाठी है और मैं KIIT-विश्वविद्यालय का ही विद्यार्थी हूँ। आचार्य जी, बच्चा हूँ, बच्चे जैसा ही एक सवाल है। सबसे पहले, क्या ईश्वर हैं या नहीं? और यदि ईश्वर हैं, तो जैसे कि हाइडेगर ने कहा, मूलभूत से हमारी सारी चीज़ें, जो हम सुनते हैं, करते हैं, जीते हैं, वो बॉरोड हैं, उधार की हुई हैं। तो जो हमारे समाज की, ख़ासकर जो भारतीय समाज है, उसकी जो पृष्ठभूमि है, जो आस्था की पृष्ठभूमि है, कहीं वो भी तो उधार ली हुई नहीं है? कहीं जो हमारे ईश्वर हैं, वो भी तो उधार लिए हुए नहीं हैं; उस हेज़ से, जिसके बारे में हम नहीं जानते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम लोग एक पर्दे को एक दीवार समझ रहे हैं?
आचार्य प्रशांत: प्रश्न ईश्वर के बारे में है। कोई ऐसा तो नहीं कि भावनाओं को ठेस वग़ैरह लग जाएगी, कुछ बोलूँ तो? भाई, आपका मंच है, तो आपकी अनुमति से ही बोलूँ बेहतर है।
हमारा काम है अपने विचार व्यक्त करना है नहीं, दर्शन माने जानना होता है। व्यक्तिगत मत, ओपिनियन तो किसी के भी हो सकते हैं, उसको दर्शन नहीं बोलते। दर्शन माने प्रमाण, प्रयोग, परीक्षण। ठीक है? चलो, समझते हैं।



