
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा नाम यादवेंद्र त्रिपाठी है और मैं KIIT-विश्वविद्यालय का ही विद्यार्थी हूँ। आचार्य जी, बच्चा हूँ, बच्चे जैसा ही एक सवाल है। सबसे पहले, क्या ईश्वर हैं या नहीं? और यदि ईश्वर हैं, तो जैसे कि हाइडेगर ने कहा, मूलभूत से हमारी सारी चीज़ें, जो हम सुनते हैं, करते हैं, जीते हैं, वो बॉरोड हैं, उधार की हुई हैं। तो जो हमारे समाज की, ख़ासकर जो भारतीय समाज है, उसकी जो पृष्ठभूमि है, जो आस्था की पृष्ठभूमि है, कहीं वो भी तो उधार ली हुई नहीं है? कहीं जो हमारे ईश्वर हैं, वो भी तो उधार लिए हुए नहीं हैं; उस हेज़ से, जिसके बारे में हम नहीं जानते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम लोग एक पर्दे को एक दीवार समझ रहे हैं?
आचार्य प्रशांत: प्रश्न ईश्वर के बारे में है। कोई ऐसा तो नहीं कि भावनाओं को ठेस वग़ैरह लग जाएगी, कुछ बोलूँ तो? भाई, आपका मंच है, तो आपकी अनुमति से ही बोलूँ बेहतर है।
हमारा काम है अपने विचार व्यक्त करना है नहीं, दर्शन माने जानना होता है। व्यक्तिगत मत, ओपिनियन तो किसी के भी हो सकते हैं, उसको दर्शन नहीं बोलते। दर्शन माने प्रमाण, प्रयोग, परीक्षण। ठीक है? चलो, समझते हैं।
क्या प्रश्न था? क्या ईश्वर है? ठीक है।
ये मग है? क्या ये मग है?
श्रोता: बिल्कुल है।
आचार्य प्रशांत: क्या ये मग है? साथ चलना। जब प्रश्न आता है, “ईश्वर है?” और उसके आगे प्रश्न-चिह्न लगा है, “क्या ईश्वर है?” तो ये “ईश्वर है,” इसमें महत्त्वपूर्ण शब्द कौन-सा लग रहा है, जिस पर ध्यान दिया जा रहा है?
श्रोता: है।
आचार्य प्रशांत: “ईश्वर,” कि ईश्वर के बारे में बात होने जा रही है। मैं चाहता हूँ, हम “ईश्वर” नहीं “है” के बारे में बात करें। “ईश्वर” नहीं, किसके बारे में? “है” के बारे में। ये होना क्या होता है? व्हाट डज़ इट मीन टू बी, टू एग्ज़िस्ट? ईश्वर का अस्तित्व है कि नहीं इस पर बाद में आएँगे, पहले ये तो समझें कि अस्तित्व, मान होना माने क्या? “है” माने क्या?
“ईश्वर है, ईश्वर नहीं है” हटाओ ये सब। पहले बताओ, “है” माने क्या होता है? तो चलो ठीक है, ये मग है। कैसे बोल दिया? कैसे पता?
श्रोता: दिख रहा है।
आचार्य प्रशांत: ये दूर का है। कौन इसको उठाए-फिरेगा? ये माइक है? ये माइक है, सब मान रहे हैं माइक है। कैसे पता ये माइक है?
श्रोता: दिख रहा है।
आचार्य प्रशांत: दिख रहा है; पकड़ में आ रहा है; मेरी कामनाओं की पूर्ति कर रहा है; मैं जो बोल रहा हूँ, उसको ये विस्तार दे रहा है, ऐम्प्लिफ़ाइ कर रहा है। किसी भी चीज़ का होना, जब हम कहते हैं “है,” तो ये जो होना है हम किससे निर्धारित कर रहे हैं?
श्रोता: सेल्फ से।
आचार्य प्रशांत: स्वयं से। ठीक है न? ख़ुद से निर्धारित कर रहे हैं न। मेरी इंद्रियों को दिख रहा है, तो है। मेरा मन अगर उसको परिभाषित कर सकता है, तो है। मेरी त्वचा स्पर्श कर सकती है, तो है। मेरे कान सुन सकते हैं, तो है। आँख देख सकती है, तो है। हाथ उठा सकते हैं, तो है। मन इसको एक डिज़ाइन, एक आकार दे सकता है, तो है। तो यानी होने की परिभाषा में ऊपर कौन है, माइक या मैं?
श्रोता: मैं।
आचार्य प्रशांत: ये है अगर मुझे दिखता है; ये है अगर इसका डिज़ाइन मैंने बनाया है; ये है अगर ये मेरे काम आता है; ये है अगर मैं और ये अलग-अलग हैं। कभी भी आप ये तो नहीं कह पाओगे कि कुछ है और वो तुमसे अभिन्न है, इनसेपरेबल है। बोल सकते हो क्या? जब भी कुछ होगा, किसी भी चीज़ को कहोगे “है” तो क्या कहोगे? “वो है। ये मैं देख रहा हूँ। मुझसे अलग है, मैं उसको देख रहा हूँ। मैं और वो एक नहीं हैं, मैं बस उसका दृष्टा हूँ, ऑब्ज़र्वर हूँ।” यही कह रहे हो न?
मैं कहूँ, कि क्या ये माइक मैं हूँ? तो ये तो नहीं हो पाएगा। ये माइक है, और इसके होने की शर्त में ये शामिल है कि अगर ये है, तो मुझसे अलग है। और इसको प्रमाणित करने वाली भी मेरी इंद्रियाँ हैं। ठीक है?
क्या ये (हाथ से माइक पकड़ने का अभिनय करते हुए) माइक है?
श्रोता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: क्या ये माइक है?
श्रोता: नहीं है।
आचार्य प्रशांत: नहीं है न। किसने गायब कर दिया इस माइक को? आँखों को नहीं दिखा तो नहीं है, मन की पकड़ में नहीं आया तो नहीं है। तो ऊपर कौन है, माइक या मेरी इंद्रियाँ?
श्रोता: इंद्रियाँ।
आचार्य प्रशांत: मेरी इंद्रियाँ अगर सर्टिफ़िकेट देंगी तो है, और इंद्रियों ने सर्टिफ़िकेट देना बंद कर दिया तो?
श्रोता: नहीं है।
आचार्य प्रशांत: तो मैं इससे ऊपर किसको रख रहा हूँ?
श्रोता: इंद्रियों को।
आचार्य प्रशांत: इंद्रियों को, और इंद्रियों का भी मालिक कौन है? मैं हूँ। तो इससे ऊपर इंद्रियाँ, और इंद्रियों से ऊपर मैं। और नाम मैं इसको क्या दूँ? अब मान लो माइक है, तो ठीक है, माइक से ऊपर मेरी इंद्रियाँ, और इंद्रियों से ऊपर मैं।
तो माइक तक तो ये बात चल जाती है। पर अब आप बोलो, गॉड, ईश्वर, थोड़ा फँसेगा मामला। क्यों फँसेगा? क्योंकि उसकी परिभाषा में ही आप बोल रहे हो कि वो सबसे ऊपर है। माइक की परिभाषा में आप कभी नहीं बोलते कि वो सबसे ऊपर है। पर गॉड में आप क्या बोलते हो? कि परम है, माने, सबसे ऊपर है। लेकिन जो कुछ भी है, वो मुझसे तो नीचे होगा। जो भी है, वो है इसलिए क्योंकि वो मेरी इंद्रियों की, मन की, सिद्धांतों की, कल्पना की पकड़ में आ रहा है। तभी मैं कहता हूँ, कि “है।”
अगर कुछ ऐसा है, जिसके बारे में आप सोच ही नहीं सकते, तो उसको कहोगे कि है? पृथ्वी है, क्योंकि आपने पाँव रखा हुआ है। जुपिटर है, क्योंकि वो भी दिखाई दे जाता है। इलेक्ट्रॉन है, क्योंकि आपका मन उसको इक्वेशन्स से डेराइव कर लेता है। दूसरी जो गैलेक्सीज़ हैं, वो भी हैं, क्योंकि आप कम-से-कम कांसेप्चुअली उनको प्रूव कर सकते हो। प्लस, उनसे जो वेव्स आ रही होती हैं, आप उनको भी डिटेक्ट कर लेते हो प्लेनेट पर अपने। ठीक है न?
“है” तभी कह पाते हो जब उससे ऊपर तुम्हारे मन और इंद्रियाँ हों। और मन और इंद्रियों से ऊपर कौन होता है? मन और इंद्रियों को चलाने वाला। इससे ऊपर मेरी आँखें हैं, पर आँखों को मैं बंद कर सकता हूँ तो आँखों से भी ऊपर कौन है?
श्रोता: मैं।
आचार्य प्रशांत: मैं। ये (माइक) है, ये मैं इसी आधार पर बोल सकता हूँ कि मेरी आँखें इसको देख रही हैं। पर इन आँखों का राजा कौन है? मैं। मैं चाहूँ तो इन आँखों से कहूँ, इधर देख, और कहूँ तो इधर देख। तो ये तो मेरे नौकर का नौकर हो गया। मैं और मेरा नौकर है मेरा मन। ठीक? और मेरे मन की नौकर हैं ये सब इंद्रियाँ, इंद्रियाँ। और इंद्रियों का नौकर है, ये माइक। इंद्रियों को ये माइक दिखना बंद हो जाए, हाथ की पकड़ में आना बंद हो जाए, तो हम कहेंगे, “है ही नहीं।” यही तो होगा न?
आज मैं आपसे इस माइक से बात करूँगा, देखो, हँसने लग गए कि जोकर खड़ा है सामने, पागल। क्योंकि माइक तो है ही नहीं। क्यों नहीं है? क्योंकि इंद्रियों ने कहा?
श्रोता: नहीं है।
आचार्य प्रशांत: माइक मेरी इंद्रियों का नौकर, इंद्रियाँ मेरे मन की नौकर और मन मेरे अहंकार का नौकर। चलता है, ठीक है, कोई समस्या नहीं। माइक तक ठीक है, तो हमने कह दिया माइक है। ये जो इज़-नेस है, इज़-नेस, होना, उसमें ये बात शामिल है कि ये मेरे नौकर के नौकर का नौकर होगा, वही हो सकता है। जो मेरे नौकर के नौकर का नौकर होगा, सिर्फ़ वही एग्ज़िस्ट कर सकता है। ठीक है? यहाँ तक ठीक है न? यहाँ तक ठीक है कि नहीं है?
माइक तक चल जाती है बात। अब आपने कह दिया कि ये गॉड है, और साथ ही ये भी कह रहे हो कि ये मेरे नौकर के नौकर के नौकर का नौकर है। तो अब बात जम रही है क्या? ये फँस गया। इसलिए जो हाइएस्ट है, उसके बारे में न तो कहा जाता है कि “है” और न ही कहा जाता है कि “नहीं है”। क्योंकि होना और न होना, दोनों की जज मेरी इंद्रियाँ होती हैं।
यहाँ ये तौलिया है? बोलो है कि नहीं है?
श्रोता: है।
आचार्य प्रशांत: ठीक है, किसने जज किया?
श्रोता: आँखों ने।
आचार्य प्रशांत: आँखों ने। क्या यहाँ पर तौलिया है?
श्रोता: नहीं है।
आचार्य प्रशांत: किसने जज किया?
श्रोता: आँखों ने।
आचार्य प्रशांत: तो मैं बोलूँ कि “है,” तो भी जज कौन था? आँखें। और मैं बोलूँ “नहीं है,” तो भी जज कौन है? आँखें। इसी तरह से अगर मैं ईश्वर को बोलूँ “है,” तो भी जज कौन है? मैं। मैं बोलूँ “नहीं है,” तो भी जज कौन है? मैं।
तो ये जो फालतू की बात होती है न, कि एक डिबेट हो रही है, उनमें एक आदमी कह रहा है “है,” एक कह रहा है “नहीं है,” दोनों अनाड़ी हैं। न “है”, न “नहीं है”। संतों ने इस बात को बहुत ख़ूबसूरती से कहा है। वो कहते हैं; उनसे पूछा गया, संत कबीर से किसी ने पूछा, “ईश्वर है कि नहीं?” तो बोले, “है कहूँ तो है नहीं, और नहीं कहा न जाए।”
अगर मैं कहूँ कि “है”, तो भी मैंने इंद्रियों का ग़ुलाम बना दिया उसको, मन का ग़ुलाम बना दिया। तो ये नहीं कहूँगा कि “है” और ये भी नहीं कह सकता कि “नहीं है”, क्योंकि “नहीं है” कहने में भी मैंने उसको अपनी इंद्रियों और मन का ग़ुलाम बना दिया। तो
है कहूँ तो है नहीं, नहीं कहा न जाए। है नहीं के बीच में साहब रहा समाय।।
न है, न नहीं है। जो कहे, कि “मैं तो आस्तिक हूँ”, और कहता है कि “है,” वो भी ईश्वर को अपना गग़ुलाम बना रहा है। जो कहे, कि “मैं नास्तिक हूँ”, और घोषित करता है कि “नहीं है” वो भी ट्रूथ को अपना ग़ुलाम बना रहा है। अगर गॉड ट्रूथ है तो ट्रूथ हाइएस्ट होना चाहिए न, हमसे ऊपर का; या हमारा ग़ुलाम होना चाहिए? हमसे ऊपर का होना।
तो उसको लेकर मौन ही सही है, न हाँ, न नहीं। बस सर का झुकना और मौन हो जाना, चुप। कह रहे हो, हम ये धृष्टता नहीं करेंगे। धृष्टता समझते हो? इमॉडेस्टि, हम ये धृष्टता नहीं करेंगे कि कहें कि ईश्वर है, और हम ये भी नहीं कहेंगे कि ईश्वर नहीं है। “हाँ” या “नहीं”, “होना” या “न होना” सिर्फ़ मटीरियल ऑब्जेक्ट्स के बारे में कहा जा सकता है। सिर्फ़ मेंटल ऑब्जेक्ट्स के बारे में कहा जा सकता है।
और जिसको भी आपने कह दिया कि है या जिसको भी आपने कह दिया कि नहीं है, उसको आपने ऑब्जेक्टिफ़ाई कर दिया।
क्या कर दिया? ऑब्जेक्टिफ़ाई कर दिया। क्योंकि “है” या “नहीं है” ये एग्ज़िस्टेंशियल कैटेगरीज़ हैं जो सिर्फ़ ऑब्जेक्ट्स पर लागू होती हैं। तो ये डिबेट जो है, ये फ़िलॉसफ़ीकली इनवैलिड डिबेट है। जो लोग ये डिबेट कर रहे हैं, अगर वो थोड़ा फ़िलॉसफ़ी को समझेंगे, तो कहेंगे कि ये लगभग ऐसा ही सवाल है, कि “ख़ुशबू का रंग क्या होता है?”
साहब, आप कैटेगरी एरर कर रहे हैं। ख़ुशबू का रंग नहीं होता।
या कोई पूछे, “अच्छा बताओ, ये सफ़ेद रोशनी है इसकी गंध क्या है?” तो ये कैसा डिबेट है? और एक कह रहा है, “इसकी गंध अच्छी है;” एक कह रहा है, “इसकी गंध बुरी है” और ज़बरदस्त डिबेट चल रहा है। ये पागलपन का डिबेट है। तुम जिस चीज़ के बारे में कह रहे हो कि ख़ुशबू बताओ, उसकी ख़ुशबू होती नहीं। तुम जिसका कह रहे हो रंग बताओ, उसका रंग होता नहीं। तुम जिसके बारे में कह रहे हो, है या नहीं है, वो कोई ऑब्जेक्ट नहीं है कि बोल दें, कि है या नहीं है।
ऑब्जेक्ट्स के बारे में बार-बार बोला जाता है, कि है या नहीं है। और ऑब्जेक्ट्स तो बहुत छोटी चीज़ होते हैं। ऑब्जेक्ट्स तो सब मेरी हस्ती के ग़ुलाम होते हैं। और ऑब्जेक्ट सिर्फ़ फ़िज़िकल नहीं होता है, जो मेंटल है वो भी ऑब्जेक्ट है।
जिस भी वस्तु के विषय की आप कल्पना भी कर सकते हो, आपने उसको ऑब्जेक्टिफ़ाई कर दिया। आप जिसको नाम भी दे सकते हो, आपने उसको ऑब्जेक्टिफ़ाई कर दिया। जिसके बारे में आप कुछ नहीं जानते, आप उसको नाम भी नहीं दे सकते। और नाम देते ही आप उसके बारे में कुछ-न-कुछ कल्पना शुरू कर देते हो। असंभव है कि नाम दो और कल्पना न करो, असंभव है।
मैं आपको कोई नाम दूँ ऐसे ही, फ़ालतू नाम, देसी नाम नहीं, वो तो आपने सुन रखे होंगे, ऐसा नाम जिसका कोई अर्थ नहीं। देखिएगा क्या होता है। अभी वैचारिक प्रयोग ख़ुद ही कर लीजिए, टूटूपेर। ये कम-से-कम किसी भारतीय भाषा का शब्द नहीं है। इमानदारी से बताइए “टूटूपेर” सुनते ही भीतर कुछ कल्पना शुरू-सी होने लगी कि नहीं? बोलो।
श्रोता: हाँ, होने लगा है।
आचार्य प्रशांत: नाम भी नहीं दे सकते। सत्य को “ईश्वर” भी नहीं बोल सकते। उसको नाम देते ही ऑब्जेक्टिफ़िकेशन शुरू हो गया। तो इसलिए फिर जिन्हें बात समझ में आई थी, जो फ़ालतू बहसें नहीं करते थे, उन्होंने कहा, उसका कोई नाम भी नहीं हो सकता; उसका कोई लक्षण नहीं हो सकता; उसकी कोई पहचान नहीं हो सकती; न वो भीतर है, न वो बाहर है; न वो छोटा है, न वो बड़ा है; वो कहीं होता नहीं, और कोई ऐसी जगह नहीं जहाँ वो होता नहीं।
आँखें उसको देख नहीं सकतीं, क्योंकि वो आँखों के पीछे है। आँखें अपने पीछे कैसे देखेंगी? केन उपनिषद् कहता है, वाणी निकलती है उसका वर्णन करने, थक कर वापस लौट आती है। मन निकलता है उसकी कल्पना करने, असफल होकर गिर जाता है। आँख निकलती है उसको खोजने, कुछ पाती नहीं। कान उसको सुनना चाहते हैं, वो शब्दों में समाता नहीं। उसका कोई नाम ही नहीं। इसीलिए जहाँ उसको नाम नहीं दिया गया है, उसको महावाक्य बोला गया। “तत्त्वमसि” सुना है? नाम ही नहीं दिया। बस क्या बोल दिया? “तत्”। बोले, नाम देंगे तो गड़बड़ हो जाएगी। उसको नाम मत दे देना।
ये तो छोड़ो कि उसको तुमने आकार दे दिया, रूप दे दिया, रंग दे दिया, कपड़े पहना दिए, उसकी कहानी बना दी, ये तो तुमने बहुत बड़ी गुस्ताख़ी कर दी। ये तो बहुत ही बड़ी गुस्ताख़ी है। तुम इतना भी मत करना कि उसको नाम दे देना, नाम तक मत दे देना। जहाँ तुमने नाम दिया, बहुत बड़ी भूल कर दी। तो बस क्या बोला? “तत्”। और वो तुम्हारा ऑब्जेक्ट नहीं है, वो तुम्हारी सच्चाई है। तुमसे अभिन्न है। तुमसे इनसेपरेबल है।
तो वो जो “तत्” है, “तत्” बोल के रुके नहीं। बोला, “तत्त्वमसि”, “तत् त्वम् असि”। क्योंकि अगर उसमें और तुम में गैप है, तो वो तुम्हारा ऑब्जेक्ट बन गया। वो तुम्हारा ऑब्जेक्ट नहीं है, वो तुम्हारी सच्चाई है, तुम्हारा केंद्र है, वो तुम हो। “तत्” दैट। यू आर दैट। “तत्,” नाम नहीं, कोई नाम नहीं। और बाहर की चीज़ नहीं, ऑब्जेक्ट नहीं। ऑब्जेक्ट बाहर का होता है, सब्जेक्ट से अलग होता है ऑब्जेक्ट। मैं सब्जेक्ट, वो ऑब्जेक्ट; नहीं, वो और मैं एक हैं। क्योंकि अगर वो मुझसे अलग है, तो ऑब्जेक्ट बन गया। भले ही मैं अपनी कहानी में ये बोलता रहूँ, कि मैं उसका ऑब्जेक्ट हूँ, उससे कुछ नहीं होता। भले ही मैं बोलता रहूँ, कि वो क्रिएटर है, मैं क्रिएशन हूँ।
पर भाई साहब, आपने उसको अगर बाहर बनाया न, तो बात करने वाले आप हैं। आप उसको अपना ऑब्जेक्ट बना रहे हैं, ये आप गुस्ताख़ी कर रहे हैं। और आप बोलते रहिए कि उसकी कोई छवि नहीं होती, उसका कोई आकार नहीं होता, पर आपने एक नाम तो दे दिया न! और नाम के साथ कहानी भी जोड़ दी। जिसमें एक कहानी ये भी है कि उसने इस पृथ्वी का क्रिएशन करा। कहानी जोड़ दी न! कहानी जोड़ते ही गड़बड़ कर दी आपने, भूल कर दी आपने, अस्तित्वगत अपराध कर दिया आपने। कैसे कहानी जोड़ दी आपने ये?
क्योंकि ऑब्जेक्ट के साथ ही कहानी जोड़ी जा सकती है। आपने उसको ऑब्जेक्टिफ़ाई कर दिया नाम देकर, कहानी बनाकर, मिथ बनाकर, लेजेंड बनाकर, रूप-रंग देकर के। कुछ भी बोल करके आप उसे ऑब्जेक्टिफ़ाई कर रहे हो।
ऑब्जेक्टिफ़िकेशन में पहले तो आपने उसको बहुत छोटी-सी चीज़ बना दिया; दूसरे, स्वयं से दूर कर दिया। क्योंकि सब्जेक्ट-ऑब्जेक्ट कभी एक नहीं होते उनमें दूरी होती है। क्यों उसको ऑब्जेक्ट बनाकर ख़ुद से दूर कर रहे हो? अगर वो उच्चतम है, अगर वो हाईएस्ट है, तो वो दूर होना चाहिए या दिल में होना चाहिए?
श्रोता: दिल में।
आचार्य प्रशांत: तो इसलिए “तत्त्वमसि,” वो तुम हो, वो तुम्हारा ऑब्जेक्ट नहीं है। इसीलिए उस “तत्” को और “आत्म” को अभिन्न भी कहा गया। तुम्हारी सच्चाई और परम सत्य एक है।
ये जो तुम आसमानों में ईश्वर बैठा देते हो, ये बस तुम्हारा एक बहुत बचकाना प्रयास है, सत्य को भी ऑब्जेक्टिफ़ाई करने का। किन्हीं आसमानों में तुमसे दूर कोई नहीं बैठा हुआ है। बाहर कोई नहीं ताक़त है जो तुम्हारी ज़िंदगी चला रही है।
बात आ रही है समझ में?
“तो मुझे बनाया किसने? मुझे बनाने वाला कोई तो होगा?” तुम्हें बनाया किसने? तुम हो कौन कि तुम्हें कोई बनाएगा? तुम कौन हो? इतना बड़ा ब्रह्मांड है, उसमें इतनी चीज़ें अपने आप बन-बिगड़ रही हैं। उन्हें कोई बनाने वाला चाहिए क्या? प्रक्रियाएँ हैं।
“अच्छा, तो ये इतना बड़ा ब्रह्मांड है तो ब्रह्मांड को भी किसी ने बनाया होगा?” इतना बड़ा ब्रह्मांड है, तो ये बोल कौन रहा है? तुम्हें कैसे पता ब्रह्मांड है? तुम्हें कैसे पता ये माइक है? क्योंकि तुम्हारी इंद्रियाँ बता रही हैं। माइक में और ब्रह्मांड में क्या अंतर है? ब्रह्मांड भी तभी तक है, जब तक तुम्हारी इंद्रियाँ बता रही हैं। तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। एक ही बात है। ब्रह्मांड भी ऑब्जेक्ट है, जिसके सब्जेक्ट तुम हो। क्यों इतने ज़ोर से बोलते हो, कि “मैं तो हूँ ही, तो मेरा कोई क्रिएटर होगा।”
तुम्हें कैसे पता, तुम हो? तुम्हें कैसे पता, तुम हो? नहीं, “अब ये मैं अपना हाथ देख सकता हूँ न, तो मैं हूँ।” यही तर्क जाता है न, कि “मैं हूँ, तो मेरा रचयिता भी तो कोई होगा, क्रिएटर भी कोई होगा।”
दर्शन पलट कर पूछता है, ये तो छोड़ो कि तुम हो, तो तुम्हें बनाने वाला भी कोई होगा। तुम ये बताओ, तुम्हें कैसे पता कि तुम हो? और ये बात बहुत अच्छे से समझो, यादवेंद्र, क्योंकि यही सवाल तुमको पकड़ने आएगा। वो कहेंगे, “ये इतनी बड़ी दुनिया है। तुम हो, बच्चे हैं, बूढ़े हैं, आदमी हैं, औरत हैं, तो किसी ने तो बनाया होगा।” यही कहा जाता है न? हम पूछ रहे हैं, हमें कैसे पता कि ये सब कुछ है? किसने बताया कि ये सब कुछ है?
“पर हम तो हैं।” अच्छा, तुम रहो और तुम न ख़ुद को देख सकते हो, न छू सकते हो, न सुन सकते हो, न तुम अपनी कल्पना कर सकते हो, तो क्या तुम हो? तो क्या तुम हो? तुम आईने के सामने जाकर खड़े हो जाओ और कुछ दिखाई न दे, तो क्या तुम हो?
श्रोता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: तुम ज़ोर से बोलो और दूसरे तो क्या, तुम्हें भी सुनाई न दे, तो क्या तुम हो?
श्रोता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: तो हम ख़ुद भी तो अपने ऑब्जेक्ट ही हैं न। “मैं हूँ” ये भी कोई सत्य नहीं है। “मैं हूँ” ये भी कोई फ़ाउंडेशनल बात नहीं है। मेरा होना भी कौन प्रमाणित कर रहा है? इंद्रियाँ। तो मैं हूँ, तो माइक की तरह ही हूँ मैं। जब तक मैं दिखाई दे रहा हूँ, सुनाई दे रहा हूँ, तो मैं हूँ। तो मैं भी और माइक ही हूँ। जिस दिन मैं दिखाई-सुनाई देना बंद हो गया, तो कोई कहेगा कि मैं हूँ? ऐसे तो इनकी अटेंडेंस लग जाएगी क्लास में। ये जाकर कहेंगे, “न मैं दिखाई दे रहा था, न मैं सुनाई दे रहा था, न मुझे कोई छू सकता था, पर मैं था।”
तुम भी तभी तक हो न, जब तक तुम्हारी इंद्रियाँ गवाही दे रही हैं कि तुम हो। तो तुम्हारी हस्ती की भी जज कौन है? ये सेंसेज़। और इन सेंसेज़ का मालिक कौन है? ईगो। तो “मैं हूँ” ये कोई फ़ाउंडेशनल ट्रुथ नहीं है, ये भी एक इगोइस्टिक स्टेटमेंट है। सीरियस फ़िलॉसफ़ी यहाँ से नहीं शुरू करती कि मैं हूँ, तो किसी ने मुझे बनाया होगा। ये सीरियस फ़िलॉसफ़ी नहीं है, ये बहुत शैलो बातें हैं। बहुत शैलो बात है, बहुत ये उथली बात है कि “मैं हूँ, तो मुझे किसी ने बनाया होगा।”
गंभीर दर्शन कहता है, हमें कैसे पता तुम हो? प्रमाण क्या है कि तुम हो? पता चलता है, इंद्रियाँ ही प्रमाण हैं। तो कहते हो, फिर तो इंद्रियाँ हो गईं सबसे बड़ी चीज़। और इंद्रियों का संचालक कौन है? अहंकार। फिर तो अहंकार सबसे बड़ी चीज़ हो गया।
तो ये मत कहो कि मैं हूँ, तो मुझे कोई बनाने वाला होगा; न। तुम स्वयं अपने ऑब्जेक्ट हो। तुम स्वयं अपने ऑब्जेक्ट हो। बात आ रही है समझ में? ट्रुथ। ट्रुथ जो है, वो सब्जेक्ट-ऑब्जेक्ट डुअलिटी का नाम नहीं होता। ट्रुथ वो आधार है, जिस पर ये सब्जेक्ट-ऑब्जेक्ट का खेल खेला जाता है।
इसलिए आपको बार-बार मैं कहा करता हूँ कि “गॉड इज़ ट्रुथ” मत बोला करिए, “ट्रुथ इज़ गॉड” बोला करिए। “गॉड इज़ ट्रुथ” बोलते ही आपने अपने ऑब्जेक्ट को क्या डिक्लेअर कर दिया? ट्रुथ। कि मेरा एक ऑब्जेक्ट है, गॉड, जिसको डेफ़िनेशन भी मैं देता हूँ, जिसको सलाम भी मैं ठोकता हूँ, जिसके बारे में कहानियाँ भी मैंने रची हैं। और उस अपने ऑब्जेक्ट को मैं ट्रुथ बोल रहा हूँ। नहीं, उल्टा चलिए, कहिए सत्य है, वही सत्य मेरा ईश्वर है, भगवान है।
सत्य ही मेरा ईश्वर है, सत्य ही मेरा भगवान है। ट्रुथ इज़ गॉड।
अब ठीक है, अब ईमानदारी की बात हुई। समझ में आ रही है बात ये?