
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: अरे, मेरा पर्चा कहाँ है? नहीं, तो बात बराबरी की होनी चाहिए न। तुम पर्चा लाए हो, तो मैं भी कुछ।
प्रश्नकर्ता: हेलो सर। मेरा प्रश्न ब्लास्फ़ेमी या ईश-निंदा के ऊपर है। इसके प्रश्न के लिए मैं कुछ उदाहरण देना चाहूँगा, जो कि हर धर्म से हैं। जैसे, बौद्ध धर्म में श्रीलंका में एक महिला ने बुद्ध की मूर्ति के साथ फ़ोटो-शूट किया था कुछ, तो उसके बाद उसको जेल हो गई थी। इसी प्रकार से क्रिश्चियनिटी में भी एक इटली के दार्शनिक और गणितज्ञ थे, जिओर्दानो ब्रूनो। उनको भी चर्च के ख़िलाफ़ बोलने पर ज़िंदा जला दिया गया था।
इसी प्रकार मुस्लिम में भी यह काफ़ी होता है, एक आसिया बीबी करके पाकिस्तानी ईसाई महिला थीं, उनको जेल हो गई थी, फ़ाँसी की सज़ा दे दी गई थी उसके बाद। और सलमान रश्दी ने पुस्तक लिखी थी, उनके ऊपर भी फ़तवे जारी हुए, उनके ऊपर हमले हुए। चार्ली एब्दो, एक ने कार्टून बनाया था, उनके लिए भी। और फिर भारत में भी, हम जैसा देखते हैं, जैसे ओपेनहाइमर में भी कुछ ऐसे सीन थे जिसकी वजह से लोग थोड़ा गुस्सा हो गए थे।
तो ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं कि धर्म के नाम पर थोड़ा सा भी होने पर उनकी धार्मिक भावनाएँ आहत हो जाती हैं। उसमें सामाजिक हम देख सकते हैं कि दंगे भड़क जाते हैं, मॉब-लिन्चिंग हो सकती है। क़ानूनन जेल, या फिर फ़ाइन, या फिर फ़ाँसी की सज़ा भी हो जाती है। या फिर राजनीतिक रूप से पुस्तक या फिर कार्टून पर बैन लगा दिया जाता है। या फिर अन्तरराष्ट्रीय संबंधों में दिक़्क़त आती है।
तो आचार्य जी, मेरा प्रश्न यह था, कि दुनिया के जो सारे धर्म हैं, वो धर्म अपने आप को महान बताते हैं, शाश्वत बताते हैं। लेकिन छोटे से कार्टून, चुटकुले, मीम या ज़सोशल मीडिया पोस्टज़ से उनकी धार्मिक भावनाएँ आहत कैसे हो जाती हैं? यह मेरा पहला प्रश्न था।
दूसरा प्रश्न यह था, कि ईश-निंदा का सही अर्थ क्या होना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: आप कोई छोटी-सी चीज़ पकड़कर बैठ गए हो। आपने उसको बहुत बड़ा नाम दे दिया है। जो बड़ी चीज़ है, ये आपकी साज़िश है उसके ख़िलाफ़, है न? तुम अंगूर ले लो और उसको नाम दो तरबूज़, तो यह तुम तरबूज़ का अपमान कर रहे हो न, कि नहीं कर रहे हो? और फिर कोई आकर के बोले कि इस अंगूर में से तो चार ग्राम रस निकला बस; तो तुम कहो कि “यह तो तुमने धर्मद्रोह कर दिया, या ईश-निंदा कर दी।” उसने थोड़ी कर दी, तुमने करी है।
तुम एक ऐसी चीज़ को लेकर क्यों बैठे हो, जिसको आहत करा जा सकता है? सत्य तो अखण्ड होता है, अज्ञेय होता है, अनिर्वचनीय, अनिंद्य; जिसको जाना ही नहीं जा सकता; जिसकी कल्पना भी नहीं हो सकती; जो बोला ही नहीं जा सकता अकथ्य है, कोई उसकी निंदा करेगा कैस? बोलो।
सच पूछो तो ईश-निंदा असंभव है, अगर ईश का मतलब सत्य है। क्योंकि निंदा करने के लिए जानना तो पड़ेगा न। चलो, निर्गुण निराकार की निंदा करके दिखाओ। किसकी निंदा करोगे? कोई है ही नहीं; जो शब्दों में आ सके, जो वाणी की पकड़ में आ सके, ऐसा कोई है ही नहीं। तो निंदा कैसे कर लोगे? निंदा अगर हो पा रही है, तो इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यही है कि तुमने तरबूज़ ही नहीं, जो ब्रह्माण्ड जितना है या उससे भी आगे अनंत है, उसको बना दिया अंगूर।
अब कोई आकर अगर धोखे से भी अंगूर पर पाँव रख गया, तो तुम कहते हो, “हमें चोट लग गई!” चोट लगने का काम, चोट खाने का काम तो तुमने ख़ुद ही किया था, उसी दिन कर दिया था जिस दिन तुमने वह जो अनंत है उसको तुमने अंगूर बना दिया था। अगर तुमने सत्य को सत्य रहने दिया होता, तो सत्य की कोई निंदा कैसे कर लेता? अगर कोई सत्य को सत्य रहने दे, तो सत्य की निंदा हो सकती है क्या?
मैं यह नहीं कह रहा कि सत्य की प्रशंसा हो सकती है; न निंदा हो सकती है, न प्रशंसा हो सकती है। आप बस अवाक् रह सकते हो, आप मौन हो जाते हो वहाँ पर। यही समर्पण है, यही सम्मान है, यही श्रद्धा है, है न? पर आपने पूरी दुनिया में जितने हैं सबने धर्म को बना क्या दिया? कहानियाँ, मान्यता, बिलीफ़ सिस्टम, ऐसा है, वैसा है, नियम, आचरण, अनुशासन, कि बड़े-बड़े पुलिन्दे कहे, “यह है धर्म।”
अब ये अगर धर्म है, तो ये तो बड़ी फ़्रैजाइल चीज़ हो गया, बड़ी अशक्त चीज़, बड़ी कमज़ोर चीज़, नाज़ुक टूटने को तैयार, हैंडल विथ केयर हो गया। हो जाते हो न आप भी, कोई धार्मिक आदमी दिखता है आप भी ऐसे ही कहते हो, “हैंडल विथ केयर, भाई; यह कभी भी टूट सकता है, कभी भी ये भड़क सकता है।” ऐसा है कि नहीं? स्त्रियाँ जल्दी से पल्लू-वल्लू डाल देंगी और इधर-उधर देखेंगी, सब ठीक है? हाँ। कहीं गड़बड़ हो सकती है, इसका भरोसा नहीं; इनफ़्लेमेबल, एक्स्प्लोसिव, फ़्रैजाइल, डेलिकेट, सब लगा दो उस पर सब है वो, ब्रीटल।
सत्य अटूट है, अखण्ड है। और जो हमने धर्म बना रखा है, उसमें सब कुछ ऐसा है कि उसको जल्दी से चोट लग जाती है। आम आदमी को भले ही कम चोट लगती हो, आप धार्मिक आदमी को कहोगे, उसे खट से चोट लगती है। अभी यहाँ कोई बैठा हो बहुत धार्मिक आदमी, वह भीतर से छलनी हुआ जा रहा होगा, “क्या बोल रहे हैं! महापाप!”
तुमने अनंत को इतनी छोटी चीज़ क्यों बना दिया कि कोई उसको घाव दे सके, बताओ न। आकाश पर चोट लग सकती है? मारो गोली, आकाश को लगेगी चोट? थूको आकाश पर, आकाश गंदा हो जाएगा?
सत्य तो आकाश है, जिसमें घुला जा सकता है उसमें लीन हुआ जा सकता है।
हाथ जोड़कर उसकी प्रशंसा भी कर रहे हो तो मूर्खता है। और ऐसे उठाकर उस पर पत्थर फेंक रहे हो, तो वह भी मूर्खता है।
लेकिन जब भी आप धर्म को कोई छोटी चीज़ बना दोगे, उसके साथ रस्में, रिवायतें, क़िस्से, कहानियाँ, आचरण, अनुशासन, यह सब जोड़ दोगे, तो फिर धर्म का मतलब ही हो जाएगा असुरक्षा और फिर हिंसा। क्योंकि वह चीज़ तो छोटी है पर आपने उसको नाम किसका दिया है? उसके जो लोग होते हैं वो बड़े डरे-डरे, सहमे-सहमे रहते हैं; हर समय चौकन्ने रहते हैं। समझ में आ रही है न बात?
मैं बोल दूँ, मेरे जो यह हाथ में है, यह कोई बड़ी ज़बरदस्त राइफल है। तो अब पता मुझे भी है कि मैंने झूठ बोला है, और पता आपको भी है कि मैंने झूठ बोला है। लेकिन मैंने आपको ऐसा डरा के, दबा के रखा है कि आपकी हिम्मत नहीं होनी चाहिए कहने की कि “अगर यह राइफल है, तो एक-दो फायर करके दिखाओ।” और अगर किसी ने कह दिया, कि “अगर तुम इसको यह साधारण-सा माइक है, तुम इसको काहे को बोल रहे हो कि यह मशीन-गन है? और अगर यह मशीन-गन है, तो एक-दो राउंड तो चलाओ।” तो मैं क्या बोलूँगा? “यह अभी-अभी इसने राइफल-निंदा करी है, बुलेट-निंदा करी है।”
क्या निंदा करी है, उसने तुम्हारी पोल खोली है। उसने सत्य की पोल नहीं खोली है। यह सब जो सत्य के बंदे बनकर बैठे हैं, यह सब जो धर्म के दलाल बनकर बैठे हैं, इनकी पोल खोली है। कोई भी धार्मिक धारा हो यदि उसका उद्देश्य सत्य है, तो सत्य की कौन पोल खोल सकता है? लेकिन उस धार्मिक धारा में बहुत सारे बिचौलिये बैठ जाते हैं। क्यों बैठ जाते हैं? क्योंकि उनको उससे पावर मिलता है, बहुत ज़बरदस्त। बिना मेहनत की दौलत मिल जाती है, प्रसिद्धि मिलती है, कई तरह की ताक़त मिलती है। तो वो सब नीचे बनकर बैठ जाते हैं, कि “हम तो सत्य के प्रतिनिधि हैं, हम हैं, हम हैं। हम हैं, हम चंदा इकट्ठा करने आए हैं।” तू कौन है चंदा इकट्ठा करने वाला? तू है कौन? तुझे क्यों दूँ? तू पहले अपना बता, तुझ में कितनी धार्मिकता है? समझ में आ रही है बात?
तो बुरा सत्य को नहीं लगता, बुरा इनको लगता है जिन्होंने सत्य को बहुत छोटी चीज़ बना दिया, जिन्होंने किस्सा-कहानी बना दिया है।
आपको नीला रंग तो पसंद होगा ही तभी आपने नीले रंग की पहनी है शर्ट। इनको नीला रंग पसंद है, देखो धारण किए हुए हैं। आपको सफ़ेद रंग पसंद होगा, आपने सफ़ेद रंग धारण किया है। अपने अनुसार अब इन्होंने अपने धर्म का रंग बना दिया?
श्रोता: नीला।
आचार्य प्रशांत: और नीला इनके धर्म का ही रंग नहीं है, इनके हिसाब से इनका जो ईश्वर है, भगवान है, गॉड है, ख़ुदा है, अल्लाह है, जो भी है।
श्रोता: वो भी नीला है।
आचार्य प्रशांत: वो भी नीला है, क्योंकि नीला इनको पसंद है। इनको पसंद है तो इन्होंने उसको भी कोई रंग, कोई गुण, कोई कहानी दे दी। भले यह नहीं बोला कि उसका अपना चेहरा है, पर कुछ करके यह बता दिया कि “देखो, ऐसा कहीं पर लिखा हुआ है कि जो नीला पहनते हैं उनको कुछ ख़ास नियामत मिलती है।” तो इन्होंने नीले को बहुत ऊपर चढ़ा दिया। इन्होंने सफ़ेद को बहुत ऊपर चढ़ा दिया। अब नीला नीला है; सफ़ेद सफ़ेद है। तो इन दोनों में अब लड़ाई तो होगी न?
इनके हिसाब से सर्वश्रेष्ठ कौन है? नीला। इनके हिसाब से सेक्रेड कलर क्या है?
श्रोता: नीला।
आचार्य प्रशांत: उनके हिसाब से सेक्रेड क्या है? सफ़ेद। अब ये कैसे नहीं भिड़ेंगे? और उनकी ओर से कोई आया और इनको बोल गया है, “क्या नीला वीला, सफ़ेद पहनो सफ़ेद। असली चीज़ है सफ़ेद।” तो उसको बोलेंगे, “तू धर्मद्रोही है तेरा गला काटेंगे, तूने नीले का अपमान किया है।” इनकी ओर से उधर कोई पहुँच जाएगा, वो बोलेगा, “सफ़ेद सफ़ेद!” तो उसको कहेंगे, “तूने सफ़ेद का अपमान किया, शुभ, श्वेत, धवल रंग हमारा, पवित्रतम! तूने अपमान किया, मारो इसको गोली मारो रे, ब्लास्फ़ेमी करी इसने!”
ये है।
सत्य का कोई रंग होता है? कोई होता है? कोई चेहरा होता है? कोई कहानी होती है? कोई जन्म होता है? कोई मृत्यु होती है? कोई शब्द होते हैं? कोई भाषा होती है? कोई आवाज़ होती है? कोई किताब होती है? सत्य का तो कुछ भी नहीं होता, तो कोई सत्य की निंदा कर ही नहीं सकता।
व्हाट यू कॉल ऐज़ ब्लास्फेमी इज़ आक्चुअली एन इम्पॉसिबिलिटी। वैसा कुछ हो ही नहीं सकता। हाँ, मतान्तर हो सकता है, कि तुम किसी बात को मानते थे किसी और ने कोई और बात मान ली। तुम उसको धर्मद्रोह बोलकर उसको फ़ाँसी दे दो, तो वह तो तुम्हारी तानाशाही है। वही चल रहा है और यह चलता रहेगा जब तक हम धर्म का अर्थ किस्से-कहानियों से लेते रहेंगे। और एक समुदाय की किस्सा-कहानी दूसरे का चुटकुला बनेंगे ही बनेंगे। आप नहीं रोक सकते इस बात को। क्योंकि आप जिसको पवित्र मानते हो, उधर वाले नहीं मानते। और वो जिसको पवित्र मानते, उसको आप नहीं मानते। तो आपकी जो बहुत पवित्र कहानी है; कोई भी कहानी ऐसी है जिसका मज़ाक न बनाया जा सके, अगर आप उतर आओ मज़ाक बनाने पर? कोई भी कहानी है? बताओ।
आप ठान ही लो कि किसी कहानी का मज़ाक बनाना है, तो आप बना लोगे न, कैरिकेचर भी बना लोगे उसके पात्रों का। कैरिकेचर समझते हो? आप लोगे और वो जैसे हैं उसे विकृत करके कार्टून जैसा बना दोगे हास्यास्पद कुछ। है न कैरिकेचर? उसी तरह उन लोगों की जो कहानी है उसका आप बना दोगे, आपका वो बना देंगे। हो जाएगा न यह सब? हो जाएगा न? और फिर आपको बुरा लग जाएगा, उनको बुरा लग जाएगा, आपस में गला काटोगे एक-दूसरे का।
ये जो तुमने कहानियाँ बनाई हैं, ये तुमने सत्य से पूछ के बनाई हैं? ये सत्य की कहानियाँ हैं या तुम्हारी हैं? ऐसा कैसे है कि तुम्हारी कहानियों में जितने भी ये धार्मिक किरदार हैं, वो सब वही काम कर रहे होते हैं जो अभी तुम्हारी संस्कृति के सब काम हैं? यह ऐसा कैसे हो जाता है? बताओ, सोच के बताओ। मामला साफ़ है, बोलो न।
अगर ऐसी जगह है, उदाहरण के लिए, जहाँ माँस खाना आम बात है और जहाँ वाइन पीना भी आम बात है, तो वहाँ आपका धार्मिक महापुरुष भी माँस खाता है, वह भी वाइन पीता है, ऐसा है न? है न? अगर ऐसी जगह से हो जहाँ की संस्कृति में कुछ और चलता है अभी, तो आप दिखा देते हो कि “मेरे महापुरुष भी वही करता था जो मैं आज कर रहा हूँ।” और इसलिए जो कहानियाँ हैं सब वो लगातार बदलती रहती हैं, क्योंकि आप बदल रहे हो तो आप अपनी कहानियाँ ही बदल देते हो, अपनी सुविधा, अपनी कन्वीनियंस से। यही है न पूरा खेल? और फिर जो आपकी कहानियों को न माने, आप उसको गोली मारने को तैयार हो।
यूट्यूब पर वह वीडियो है, “आत्मा न शरीर में प्रवेश करती है, न शरीर छोड़ती है।” हमारा वीडियो है, अष्टावक्र गीता के श्लोक पर बात हुई थी, मुनि अष्टावक्र ने वह बात कही है। उस पर हमने दो घंटे बात करी थी। उस पर अभी कल ही था, पूरी बौछार थी, एक लिख रहा है “इसको जेल में डाल दो।” दूसरा लिख रहा है, “जेल में डालने से काम नहीं होगा, इसको फ़ाँसी दो।” मज़ाक की बात नहीं है, वो गंभीर हैं, आप खी! खी! खी! करते रहोगे।
आत्मा क्या है, ये इनको पता नहीं। तुमने आत्मा के बारे में जितनी ये कहानियाँ उड़ाई हैं, तुमने आत्मा से पूछा? तुम अपनी सुविधा, अपने स्वार्थ के हिसाब से कहानियाँ बनाते हो, फिर चाहते हो कि पूरी दुनिया उनको सच माने, और जो सच न माने तुम उसको मारने को तैयार हो। अहंकार का खेल है बस इसमें, धार्मिकता थोड़ी कहीं है। इसमें सत्य थोड़ी कहीं है? अहंकार का नंगा नाच है पूरा ये।
धर्म भावनाओं की बात नहीं होती; धर्म सत्य की बात होती है यथार्थ की बात होती है। यह जो आपने चला दिया है न कि धर्म माने फीलिंग, कि एक भावना है भावना, धर्म तो एक भाव होता है। तो फिर वहीं से ये आता है कि “किसी की भावना को ठेस भी मत पहुँचाओ। और अगर आप किसी के धार्मिक सेंटिमेंट को हर्ट कर रहे हैं तो फिर आपको जेल भी हो जाएगी।” क्योंकि आपने धर्म का मतलब ही बना दिया है भावना, जबकि धर्म का भावना से कोई लेना-देना नहीं।
जो कहते हैं “समझ के क्या करना है? बोध वग़ैरह की कोई बात ही नहीं, हृदय में भाव होना चाहिए।” इससे ज़्यादा अधार्मिक वक्तव्य नहीं हो सकता, इससे ज़्यादा अधार्मिक वक्तव्य नहीं हो सकता। ये जो बाबा जी लोग सब आपको शताब्दियों से मिठाई चटाते आए हैं कि “अरे, बहुत प्रश्न मत करो; जानने-वानने की कोई बात नहीं; बच्चा! भगवान तो भाव का भूखा है, हृदय में बस भाव होना चाहिए।” न ये भगवान को जानते, न हृदय को जानते, न भाव को जानते, कुछ नहीं जानते। ये बस चाहते हैं कि आप सवाल न करो; इसलिए कह रहे हैं कि “ज्ञान, जिज्ञासा, बोध बेकार की बातें हैं भगवान तो भाव का भूखा है।”
और आपको भी सुविधा पड़ती है, क्योंकि जानना श्रम का काम है। भाव तो, “हाँ-हाँ, मुझ में भी भाव है। और भाव तो ऐसी चीज़ है जो माहौल से भी पैदा हो जाता है। अभी कहिए, आप में क्या भाव, क्या संचार करना है? अभी यहाँ ऐसा माहौल बनाया जा सकता है कि आप में भाव उठ जाएगा। फिर इसी भावनात्मकता को आप जो तवज्जो देते हो, इसी सेंटिमेंटैलिटी को आप जो वेटेज देते हो, उसके कारण फिर बाक़ायदा नियम बन जाते हैं, लॉ बन जाता है कि “अगर किसी के रिलीजियस सेंटिमेंट को हर्ट करा, तो यह हो जाएगा, वो हो जाएगा, जेल हो जाएगी, आपकी किताब हटा दी जाएगी, आपकी फ़िल्म दबा दी जाएगी। सब कुछ हो जाएगा।”
रिलीजन का सेंटिमेंट से क्या लेना-देना? धर्म तो सत्य की खोज है न। आपकी भावुकता, आपके आँसू, आप बिल्कुल ऐसे हो गए हैं मधुर-मग्न; इसका धर्म से क्या लेना-देना? भाव तो आप सब जानते हो कहाँ से आते हैं भाव। पशुओं में भी होते हैं भाव। पर कोई आपको दिखे, बिल्कुल भावुक हो गया है ऐसे, आप कहोगे “यह है असली धार्मिक आदमी!” वो असली धार्मिक आदमी नहीं है, वो पूरा अधार्मिक है। जिसको अपनी हालत का पता भी नहीं कि वो क्या कर रहा है, कि हार्मोनल ऐक्टिविटी उसके शरीर पर छा रही है, कि किस्से-कहानियों को वो सच मान रहा है और इस कारण उसके आँसू ढुलक रहे हैं। जिसको यह पता भी नहीं, वो तो पूरा-पूरा अधार्मिक आदमी है। वह सच्चा नास्तिक है।
और आप बाक़ायदा नियम बनवा दोगे कि “नही-नही, देखो किसी का दिल मत दुखाना, रिलिजियस सेंटिमेंट्स हर्ट मत करना।” ये ऑक्सीमोरॉन है; देयर इज़ नथिंग कॉल्ड रिलीजनस सेंटिमेंट। रिलीजन इज़ दी इन्वेस्टिगेशन ऑफ़ सेंटिमेंट। अगर सेंटिमेंट है तो मैं उसको भी जानूँगा, परखूँगा, यह क्या चीज़ है, कैसे काम करती है प्रकृति में यह कौन-सा फ़िनोमिना चल रहा है सेंटिमेंट नाम का, यह है धर्म। धर्म स्वयं थोड़े ही कोई भाव होता है।
ये सन्नाटा समझदारी का नहीं होता ज़्यादातर, यह सन्नाटा ख़ौफ़ का होता है, “यह आदमी हमें कहाँ ले जा रहा है?” मैं तुम्हें तुम्हारे ऋषियों की ओर ले जा रहा हूँ, मैं तुम्हें तुम्हारे वास्तविक धर्म की ओर ले जा रहा हूँ। मैं तुम्हें सच्चा सनातनी बना रहा हूँ।
जिसको तुम आज तक आस्तिकता मानकर बैठे थे, वह घोर नास्तिकता थी; कल्पनाओं, क़िस्से-कहानियों, रूढ़ियों का धर्म, इससे बड़ी नास्तिकता क्या होगी!
अरे, कहाँ गए? (प्रश्नकर्ता को ढूँढते हुए)। तुम्हें ब्लर कर देंगे, चिंता मत करो कोई नहीं आएगा तुम्हारे घर पर।
प्रश्नकर्ता: आचार्य-जी, कभी-कभी जो लोग लड़ रहे होते हैं धर्म के नाम पर, तो थोड़ा बच्चों जैसे ही लगते हैं: “तुमने मुझे कैसे चिढ़ाया, तुमने मुझे कैसे चिढ़ा दिया।”
आचार्य प्रशांत: जिन बच्चों को ये सब बोलो न, बड़े हो के बहुत मारेंगे तुम्हें। कोई एकदम परम-मूर्खता का, बल्कि कुटिलता का काम कर रहा हो और उसको तुम बोलो “यह बच्चों जैसा है;” यह बच्चों का भी अपमान है न। हैं बच्चे यहाँ पर? मारना इनको बहुत। वो बच्चों जैसे नहीं हैं, बच्चे तो बेचारे नासमझ होते हैं। यह जो ये सब काम कर रहे हैं, ये सब समझते हैं। यह कुटिल हैं। यह ऐसा नहीं है कि यह नहीं जानते कि यह क्या कर रहे हैं, सब जानते हैं। जानते-बूझते ये झूठ बोलते हैं और मासूमों को फ़ँसाते हैं।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य-जी।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य-जी। इस पर ही एक फ़ॉलो-अप था, ट्रूथ विदआउट अपॉलजी के एक चैप्टर में इमोशन और क्लाइमेट क्राइसिस के बारे में जहाँ पर आपने बात करी है। उसमें एक लाइन लिखी हुई है कि “राइट सेंटर से इमोशंस भी प्यूरीफाई होते हैं।” तो वही मैं देख रहा था कि जो हमारा देश क्लेम करता है, इतना भावना से पूर्ण है काफ़ी देश और काफ़ी इमोशंस पर रन करता है। वो इमोशंस भी बहुत खोखले हैं। क्योंकि वो मतलब अगर हम बहुत सतही चीज़ की भी बात करें, अभी एक मैच हुआ था, भारत–पाकिस्तान का उसके पहले इमोशंस में इतना डूबा हुआ था देश कि “सेना, फ़ौज, फ़ौजी शहीद हुए हैं उस कॉन्फ्लिक्ट में, तो ऐसा होना चाहिए।” और फिर देखा जा रहा है कि जब वो मैच हो रहा है तो व्यूअरशिप भी बहुत ज़्यादा।
तो अगर हम बहुत सतही तौर पर भी देखें, तो उस पर भी नहीं टिकते। जिस चीज़ पर अपना इमोशन एक्सप्रेस करते हैं, वो भी शैलो ही है। वो भी कुछ टिकाऊ नहीं है।
आचार्य प्रशांत: आजकल ये फूड ब्लॉगरस बहुत हो गए हैं। तो इनका वो आता है कि ये कैसे-कैसे बना रहे हैं चीज़ें, रील्स आती हैं। कोई छोला-भटूरा बना रहा है, कोई कुछ बना रहा है, वो पूरा दिखाएँगे: “यह डाला, यह मिलाया, ऐसे-ऐसे किया।” तो अभी इनका आता था, अभी नवरात्रि चल रही है तो दिखाएँगे:
“हाँ-जी, क्या डाला?”
“ये मक्खन डाला, ऐसे ही होता है मक्खन डाला।”
“और फिर और?”
“नही-नही-नही, अभी तो नवरात्रि चल रही है, तो इसमें हम वो प्याज-लहसुन नहीं डालते।”
मुझे तो लग रहा था कि थोड़ी देर में मटन बनाना भी न दिखा दें, बिना प्याज-लहसुन का। आप सिर्फ़ अफ़सोस कर सकते हो और क्या बोलोगे इसमें? आदमी तय ही कर ले कि भीतर से पाखण्ड करना है, तो उसको कैसे रोकोगे?
प्रश्नकर्ता: मतलब अगर कोई चीज़ के लिए, सुपरफिशियल चीज़ का भी इमोशन टिकता नहीं है, वो भी ऐसे स्विच करता रहता है।
आचार्य प्रशांत: ये जितनी भावनाएँ हैं न, सब दिखावा है। कोई भावना है नहीं वास्तव में। भावना के नाम पर भी स्वार्थ होता है, अच्छे से समझ लो। कोई बहुत भावना अपनी दिखा रहा हो न, तो जान लेना वहाँ भी उसका स्वार्थ है।
दंगे हो जाते हैं भावनाओं के नाम पर। जब दंगे होते हैं तो मालूम है न क्या होता है? दुकानों लूटी जाती हैं। दंगे में भी आप उसी पर आक्रमण करते हो जिसको हटाकर के, मारपीट कर के, जो भी करके, फिर आप उसकी दुकान लूट सको। तो वहाँ भी भावनाओं का नहीं खेल है, इसी का खेल है। यह नहीं है कि उसकी धार्मिक भावनाएँ इतनी ज़बरदस्त थीं कि उसने दंगा किया, वहाँ भी उसका स्वार्थ ही काम कर रहा है। जो दंगे भड़का रहा है, उसका भी स्वार्थ है, और जो दंगा करने उतरा है सड़क पर, उसका भी स्वार्थ है। वहाँ भी कोई भावना का खेल नहीं है।
पर जब आदमी अपनी प्रक्रियाओं को नहीं जानता भीतरी, तो बाहर भी कोई भावना के नाम पर उसको कैसे लूट रहा है, ये नहीं समझ पाता। कोई आपके सामने आए और भावना दिखाए, जान लीजिएगा कुछ चाह रहा है। क्योंकि वही -डीफॉल्ट* है। आपके सारे इमोशन्स इगोसेन्ट्रिक होते हैं। पर यह बात हम नहीं समझते। हमको लगता है कि किसी ने आँसू गिरा दिए, तो बात पवित्र हो गई। कहे, “मैंने अपने सारे पापों का आँसुओं से धोधो के प्रायश्चित कर दिया, अब मैं पवित्र हो गया हूँ।” कोई भी भावना दिखा रहा है तो उसके पीछे स्वार्थ है, बिल्कुल पूरा-पूरा स्वार्थ है।
आँसू भी ऐसे नहीं गिरते हमारे, आँसू भी अहंकार से आज्ञा ले गिरते हैं। आँसू भी अहंकार का ही काम करने के लिए गिरते हैं। और आँसू भी इसलिए गिरते हैं, मैं आपसे साधारण कोई बात बोलूँ तो आपको लगे पता नहीं क्या है, बरगला रहा है, क्या कर रहा है। अभी मैं यहाँ खड़ा हो जाऊँ और रोने लग जाऊँ, तो बाक़ायदा उसका वीडियो बन जाए, एकदम वायरल हो जाएगा कि “देखो, देखो, क्या पवित्रता है भाव की! भाव देखो!” इसलिए आँसू गिरते हैं, क्योंकि आँसू गिराकर बहुत आसान हो जाता है बेवकूफ़ बनाना दूसरे को।
मुझे आपसे पैसे चाहिए। मैं आपसे आगे कहूँ, “यार, पैसे देना ज़रा ज़रूरत है 10,000 देना।” हो सकता है आप मना कर दो। मैं आपके आगे आ के रो दूँ, आप दे दोगे तुरंत। क्योंकि आपने आँसुओं को पवित्रता का, या सच्चाई का, या ईमानदारी का सूचक मान रखा है जबकि वो होते नहीं हैं, वो बिल्कुल नहीं होते। दुनिया में सबसे गंदे तरीके से वो लोग ठगे जाते हैं जो आँसुओं की सच्चाई नहीं जानते, उनको आँसुओं में ही घोल दिया जाता है पूरा। कोई तुम्हारा काम न कर रहा हो जाकर के भाव दिखा दो, भाव। वह भाव क्रोध का भी हो सकता है।
कोई तुमसे साधारण रूप से कुछ बोले, नहीं मान रहा (डराने का अभिनय करते हुए); वो मानेगा, क्योंकि आप भाव को बड़ी बात समझते हो। और भाव को आपको बड़ी बात समझना पड़ेगा अगर ज्ञान नहीं है तो। ज्ञान ही है जो आपको बताता है कि सारी भावना अहंकारजनित होती हैं। भावना में कोई सच्चाई नहीं होती। भले ही आपको लग रहा हो कि “मेरी बड़ी शुद्ध-शुद्ध भावना।” शुद्ध भावना जैसा कुछ नहीं होता, भाई। कुछ नहीं होता। जिसका केंद्र ही अशुद्ध है वहाँ शुद्ध भावना क्या होती है? शुद्ध भावना तो बस तब हो सकती है जब स्वयं भावना भी आत्मस्थ हो गई हो। पर उसके लिए तो ज्ञान चाहिए, उसके लिए तो ज्ञान चाहिए।
कितने लोग ठगे गये हैं ये सेंटिमेंट्स के खेल में ज़िंदगी में चाहे दूसरे का, चाहे अपने का। अरे उठा दो! (श्रोता हाथ उठाते हैं)। मैं तो रोज़ ही ठगा जाता हूँ। बाक़ायदा सूचियाँ आती हैं “आचार्य जी, ये 600 जनें हैं, इनको निकाल दें कम्युनिटी से। ये-ये इन्होंने हरकतें कर रखी हैं या नहीं कर रखा हैं।” मैं ही हूँ जो रोकता हूँ कि नहीं इतने नहीं, कुछ को निकाल दो, बाक़ियों को और मौका दो। और वही आन्तरिक व्यवस्था ऐसी है आप ठगे जाओगे।
संस्था के पहले, 2015 से लेकर 2021-22 तक सात साल में शायद, छह-सात साल में शायद कोई निकाला ही नहीं गया। कोई अपने आप छोड़ के गए होंगे तो गए होंगे, कोई निकाला ही नहीं गया। क्यों? क्योंकि जब छोटे थे तो सब लगभग मुझे ही रिपोर्टिंग करते थे। और उसका नतीजा यह हुआ कि जिनको होना ही नहीं चाहिए था, वो भी पड़े रह गए जिनको शुरू में ही निकाल देना चाहिए था।
और अभी बहुत अच्छी बात यह हुई है कि सब विभागों के अपने-अपने हेड्स हैं और उनको निर्देश है कि मुझे बताना मत, चुपचाप निकाल देना बस। मेरे सामने बात आनी भी नहीं चाहिए, क्योंकि मेरे सामने आ गयी तो शायद मैं रोक दूँगा। मैं कहूँगा “अभी और मौका दे दो, अभी उम्मीद है, थोड़ा और दो, थोड़ा और मौका दो, थोड़ा और मौका दो।” सब ठगे जाते हैं, भाव आ गया और भाव से बड़ा ठग दूसरा नहीं होता। आ रही है बात समझ में?
सारे भाव अच्छे से समझिएगा स्वार्थों की पूर्ति के लिए ही होते हैं। खोजिएगा, आपको मिल जाएगा। आपको किसी पर प्यार आ रहा है, कुछ और नहीं है आप अपने प्राकृतिक उद्देश्य पूरे करना चाहते हैं, कुछ और नहीं है। जितने भी आप भाव बोलते हैं ममत्व, माँ का बच्चे के लिए भाव, वो किस लिए होता है? कुछ भी नहीं, प्रकृति के कार्यक्रम को संचालित करने के लिए होता है।
भाव, यह भाव, वह भाव और आप लोगों में भी जब देखता हूँ न कि बोध से ज़्यादा भाव हो रहा है कई बार संस्था के लिए, कई बार मेरे लिए ही “आचार्य जी, आय लव यू, आय लव यू।” तो मुझे वहाँ भी ख़तरा दिखता है। प्रेम भावना नहीं होता और भावना प्रेम नहीं होती। आप जो प्रदर्शित कर रहे हो उसमें प्रेम कहाँ है और भावना कहाँ है, यह अभी जाँचना बाक़ी है। भावना तो बड़ी सस्ती चीज़ होती है। बोल तो रहा हूँ पशुओं में भी होती है।
भावना अंधी चीज़ होती है। आप अपनी कोई भावना बताओ जो पशु में नहीं होती, बताओ। एक भावना बता दो जो पशु में नहीं होती। इसका मतलब समझो चेतना का कोई संबंध ही नहीं है भावना से। आप बिल्कुल मूर्ख आदमी हो सकते हो फिर भी सब भावनाएँ होंगी जो पशुओं में होती हैं। आप बिल्कुल कुटिल आदमी हो सकते हो, फिर भी आप में वो सारी भावनाएँ होंगी जो पशुओं में होती हैं। लेकिन हमें इस बात से बड़ा नाज़ होता है!
“यू नो वी इंडियन्स, वी आर एक्स्ट्रीम्ली इमोशनल पीपल।” दैट्स नॉट समथिंग टू बी प्राउड ऑफ़।
हम यहाँ पर सप्रेशन ऑफ़ इमोशन की बात नहीं कर रहे हैं, हम यहाँ अन्डरस्टैंडिंग ऑफ़ इमोशन की बात कर रहे हैं। भावनाएँ प्राकृतिक हैं, ठीक है। न उनको फुलाना है, न उनको गिराना है, न उनको बुलाना है, न उनको भगाना है, भावनाओं का एक प्रवाह है वह चल रहा है। पर आपको पता तो हो कि यह क्या चल रहा है। आपको पता भी नहीं है क्या चल रहा है। आप नहीं जानते क्या चल रहा है।
आप नशा कर लेते हो भावनाएँ बदल जाती हैं कि नहीं बदल जाती हैं? बोलो। म्यूज़िक चल रहा है, आप कहीं जाते हो और विशेष तरह की लाइट्स, साइकेडेलिक वग़ैरह भावनाएँ बदल जाती हैं कि नहीं?
प्रश्नकर्ता: बिल्कुल।
आचार्य प्रशांत: कोई आपके बगल से निकला परफ़्यूम लगाकर, और वह सिडक्टिव परफ़्यूम है आपके नाक में पड़ी, भावनाएँ बदल जाती हैं कि नहीं? और यही निकला और एकदम मुर्दे जैसा गंधा रहा है तो भावना बदल जाती है कि नहीं?
तो देख नहीं रहे हो भावना क्या चीज़ होती है? और महिलाएँ तो जानती होंगी, पीरियड्स में तो भावना, ये मूड स्विंग ऐसे-ऐसे होता है, आप नहीं जानते हो क्या है? हार्मोनल है और क्या है? और आप उसमें क्या इतनी उसको इज़्ज़त दे रहे हो, इतना उसको महत्त्व दे रहे हो, कि भावना बड़ी बात है? कुछ भी नहीं है। 1 मिलीग्राम और सीक्रेशन हो गया भीतर से तो भावना इधर भागेगी, नहीं तो उधर भागेगी।
एक छोटे-से छोटा वो इंस्टाग्रामर होता है न, वो भी जानता है इमोशन्स मैनिप्युलेट कैसे किए जाते हैं। कुछ भी नहीं है थोड़ा बैकग्राउण्ड म्यूज़िक लगा दो, कुछ भी सड़ा-सा वीडियो होगा, उसमें लगा दो बैकग्राउण्ड म्यूज़िक, देखो वह धड़धड़ा के भागेगा।
हर व्यापारी जानता है भावनाएँ कैसे उत्तेजित की जाती हैं। आप जब छोटे रहे होंगे, वो चाट वाला आता था वह अपना तवा बजाता था, टन-टन-टन। और इतने पर भी नहीं हुए, तो वो क्या करता था? कि वह थोड़ा-सा जो भी घी-तेल था, उसको डाल देता था। जिन घरों के सामने पता होता था, यहाँ बच्चे रहते हैं, यही आएँगे बाहर टिक्की खाने। और जहाँ उसकी गंध नाक में पड़ी तहाँ पूरा भाव उबल पड़ता था कि खाना ही है। होता था कि नहीं होता था? यह होती है भावना। उसमें दम क्या है? परफ़्यूम, हेयरकट, मेकअप इससे बदल जाती है भावना।
थोड़ा-सा कोई शरीर दिखाने वाले कपड़े पहन ले। देखो, पुरुषों की भावनाएँ कैसे बदलती हैं। अभी आप आइए ऐसे ही सलवार-सूट पहन के “हाँ-हाँ, आओ बहन, यहाँ बैठो।” उसके बाद आ जाइए आप थोड़ा-सा कुछ और पहन करके “सो हाय!” यह है भावनाओं का यथार्थ। यह एहसान करेंगे अपने आप पर? इमोशन को इम्पॉर्टेंस देना कम करेंगे, कम करेंगे? आँसुओं में बहना बंद करेंगे? बल्कि कोई आँसू बहा रहा हो तो और अलर्ट हो जाइए, लोग मगरमच्छ हैं। कोई साधारण आपसे बात कर रहा हो, हो सकता है फिर भी वहाँ कुछ सच हो। पर अगर कोई आँसू बहा-बहा करके और भाव प्रदर्शित करके कुछ कर रहा है, वहाँ ज़्यादा संभावना है फ्रॉड की।
ख़ासकर इस बात पर नज़र रखिए, कि कोई व्यक्ति जान-बूझकर तो आपको इमोशनली एक्साइट नहीं कर रहा। पूछिए अपने आप से, “इसने जो कर रखा है, अभी मेरे सामने आया, जिस तरीके से इसने मेरे कंधे पर हाथ रखा, जिस तरीके से इसने अपना चेहरा बनाया; ये सब तो बिल्कुल सुनियोजित लग रहा है मुझे भावुक करने के लिए।” लग रहा है न? चाहे वह फ़िल्म की स्क्रीन पर हो, चाहे दोस्त-यार हों, चाहे परिवार हो, चाहे बाबा जी हों, चाहे आपके नेता जी हों पूछिए अपने आप से “यह जो काम कर रहे हैं, यह तो कर ही रहे हैं मुझे इमोशनली मैनिप्युलेट करने के लिए। यह तो काम करा ही बिल्कुल इस प्लानिंग के साथ जा रहा है, कि यह सब होगा तो मैं इमोशनल हो जाऊँगा हो जाऊँगी।”
महिलाएँ ज़्यादा जल्दी हो जाती हैं, तुरंत। और यह तो कैमरे का युग है। कैमरे के युग में पूछा करिए “यह जो इतना इमोशनली कुछ इन्होंने एक्साइटिंग या इंटिमेट दिखा दिया, यहाँ कैमरा कैसे पहुँचा?” वो भी एक नहीं अलग-अलग तरीके से दिखा रहे हो कि “बाबा जी ऐसे रोए, फिर ऐसे रोए, फिर ऐसे रोए।” आठ कैमरे लगा के रोए। यह हुआ कैसे?
और वह कौन बैठा है, जिसने बाबा जी के रोने पर पीछे से वह बिल्कुल मोहम्मद रफ़ी का दर्द भरा संगीत भी लगाया। बाबा जी ने पूरी एक टीम बैठाई है यही सब करने के लिए। पूछा करो, बह मत जाया करो जल्दी से। किसी भी जगह पर जाओ, चाहे वह कोई साधारण जगह हो या ऐसी हो कि पवित्र जगह हो, तो वहाँ पूछो कि “यहाँ मुझे इमोशनली एक्साइट करने के लिए क्या-क्या व्यवस्था की गई है?” पूछो अपने आप से।
और बहुत लोग होते हैं जिन्हें पता भी नहीं होता कि उन्हें इमोशनली मैनिप्युलेट किया गया है। वो कहीं पर जाते हैं, जहाँ पर माहौल बनाया ही इस तरह से गया है कि उनके भीतर किसी भाव का संचार हो। वो कहेंगे, “यहाँ वाइब्स बहुत प्योर हैं।” वाइब नहीं प्योर हैं, बहुत हिसाब लगा के, बहुत जुगाड़ लगा के, बड़े प्रिसीशन के साथ वहाँ ऐसा माहौल बनाया गया है कि तुम वहाँ जाओगे और तुमको ख़ास क़िस्म की अनुभूति होने लगेगी। यह किसी शातिर दिमाग की योजना है, तुम्हें दिख नहीं रहा।
यह वाइब्स-वग़ैरह की बात नहीं है, एनर्जीज़ की बात नहीं है। “यू नो, यू हैव गॉन टू दैट प्लेस, आई मीन, यू हैव टू एक्सपीरियंस दोस एनर्जीज़, मीन वॉव। दैट प्लेस इज़ अ डिफ़रेंट लेवल ऑफ़ एनर्जी, आई टेल यू!” अरे मूर्ख, वह सब पूरी प्लानिंग से होता है। तुम भी कर सकते हो और करते भी हो, बर्थडे सरप्राइज़ किसी को देते हो, तो तुम्हें पता होता है न कैसे-कैसे सेटिंग करनी है, लाइट बंदर करके रखनी है, फिर उसको कैसे बुलाना है, फिर क्या करना है। तुम्हें पता है कि कैसे, क्या करोगे तो वो इमोशनली हैप्पी हो जाएगा।
उसी तरीके से हर व्यापारी, हर विज्ञापनदाता और हर धर्मगुरु जानता है कि तुम्हारे इमोशंस को कैसे एक्साइट करना है। उनके कपड़ों से लेकर, उनके संगीत से लेकर, उनके खाने-पीने से लेकर, सब कुछ वो होता है जो तुम्हारे भाव पर कब्ज़ा करेगा। इतनी जल्दी बहने-बहकने को तैयार मत रहा करो। “रियली!” हाँ, ऐसा ही है। पूरी दुनिया में यही होता है, पॉलिटिक्स से लेकर रिलिजन तक, यह समझना है न, तो किसी अच्छे स्टोर में चले जाओ और वहाँ का जो शॉप-फ़्लोर मैनेजमेंट है, वो देखो कैसे होता है। देखो कि कस्टमर को बाँधे रखने के लिए कैसी-कैसी कोशिशें की जाती हैं। तब समझ में आएगा कि पॉलिटिक्स और रिलिजन दोनों कैसे चलते हैं, कैसे एक वोटर को बाँध के रखता है और कैसे एक डिवोटी को बाँधकर रखता है।