धर्म की बुनियाद धर्मग्रंथ होते हैं। वे बताते हैं कि कैसे जीना है और जीव की सच्चाई क्या है। जिसे तुम हिंदू कहते हो, उसका अपने धर्म की केंद्रीय किताबों से कोई संबंध ही नहीं रह गया है। सनातन धर्म को अन्य धर्मों से नहीं, बल्कि इस वक्त सबसे बड़ा खतरा झूठे धर्मगुरुओं से है, जो भीतर-भीतर सनातन धर्म की नींव खोद रहे हैं। सनातन धर्म में हिंदुओं को किसी दूसरे धर्म से बाद में खतरा होगा; पहला खतरा उन्हें हिंदुओं से ही है, क्योंकि जिसे तुम हिंदू कहते हो, वह केवल परंपरा और अंधविश्वास को मानने वाला हिंदू है।
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प्रश्नकर्ता: सनातन धर्म जिसे हम हिंदू धर्म भी कह देते हैं, उसके सामने सबसे बड़ा खतरा क्या है?
आचार्य प्रशांत: देखो, व्यावहारिक रूप से, धर्म की बुनियाद होते हैं धर्मग्रंथ। आदर्श रूप से पूछोगे तो धर्म की बुनियाद होती है आत्मा। धर्म का मतलब होता है आत्मा के अनुसार चलना और आत्मा की ही तरफ चलना। आत्मा की पुकार पर चलना, आत्मा के कहे पर चलना और आत्मा की तरफ को ही चलना। पर वो आदर्शवाद है, आदर्शवाद क्यों है? क्योंकि मन को अगर आत्मा का पता ही होता तो उसे धर्म की फिर ज़रूरत क्यों पड़ती?
मन बहका हुआ है, मन आत्मा से दूर है तभी तो उसे धर्म चाहिए ना ताकि वो आत्मा—आत्मा माने सत्य, आत्मा माने शांति—ताकि वो आत्मा की तरफ जा सके। इसीलिए तो मन को धर्म की जरूरत है। इसीलिए धर्म के केंद्र पर होते हैं धर्म के जो सर्वोच्च ग्रंथ हैं वो। वो बताते हैं कि कैसे जीना है, जीवन किसका है, जीव की सच्चाई क्या है, मन किसको कहते है, विचार क्या है, भावनाएँ क्या हैं, संबंध क्या हैं। ये बताना काम है धर्मग्रंथों का और धर्म के केंद्र पर धर्मग्रंथ बैठे हैं, ठीक है?




