काँवड़ियों की गलती बताने से पहले...

Acharya Prashant

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काँवड़ियों की गलती बताने से पहले...
सोमवारी और काँवड़ यात्रा का बाहरी आयोजन तभी सार्थक है जब उसका संबंध शिवत्व और सत्य से हो। केवल भीड़, दिखावे, मांसाहार छोड़ने की औपचारिकता या पुत्र की कामना को धर्म मान लेना वास्तविक धर्म नहीं है। काँवड़ियों को दोष देने के बजाय उस सामूहिक मानसिकता को देखना चाहिए जो ऐसे कर्मों को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य लोकधर्म की रूढ़ियों को बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेक और समझ के द्वारा उनसे मुक्त करना है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्न कर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं बिहार से आई हूँ। आचार्य जी, मुझे प्रश्न पूछना है कि अभी सोमवारी शुरू होने वाली है और मेरे शहर में एक बड़ा-सा मंदिर है, जिसमें मैं हमेशा से देखती आ रही हूँ कि जब भी सोमवारी आने वाली होती है, तो उससे पहले ही मतलब पूरे सड़कों को, जो मंदिर के आसपास की सड़क है, उसको पूरा बैरिकेड कर दिया जाता है तीर्थ जो काँवड़िया हैं, उनके लिए, जिससे जाम भी ज़्यादा लगने लगता है उस पूरे सड़क, मतलब शहर-शहर में भीड़ बढ़ जाती है और जाम की समस्या आ जाती है। और मैं यह भी देख रही हूँ कि अभी घर में भी, चाहे आसपास लोग मांसाहार तेज़ कर दिए हैं कि “जल्दी-जल्दी खाओ सोमवारी आने वाली है। सावन आने वाला है, तो अभी एक महीना तो नहीं खाना है।” तो वो भी तेज़ हो गया।

फिर देखते ये भी देखे कि सोमवारी में जो भी काँवड़िया लोग आते हैं, तो वो काँवड़ में जल भर के दौड़ते हुए आ रहे हैं और कोई लेटते हुए, मतलब दंड देते हुए आ रहा है। कोई चलते हुए आ रहा है, तो ये सब उसके लिए मतलब उन लोगों की सुविधा के लिए पूरा व्यवस्था किया जाता है। अलग-अलग संगठन जो है, वो वोट के दाम में, मतलब लोगों को प्रभावित करने के लिए, ये मतलब वो व्यवस्था करते हैं जिसमें जल के छिड़काव की व्यवस्था रहती है। खाने की व्यवस्था रहती है जिसमें, उसके बाद बैंडेज, जो जिनका ज़ख्म हो जाता है, उनके लिए बैंडेज ये रहता है। तो ये सब भी रहती है।

तो ये सब को देख के मुझे बहुत अह, प्रभावित हो जाती थी और मुझे लगता था कि ये कुछ ख़ास होने वाला है।और अब ये सब देख के मुझे लगता है कि…और मैं, मुझे ये सब अजीब लगता है। और मैं यह भी याद है मुझे कि मैंने एक बार देखा था कि एक काँवड़िया से सेल्फी लेते हुए और सिगरेट पीते हुए जा रहा था। तो मतलब मुझे अजीब लगा। फिर मैंने सोचा कि ऐसे ही कुछ ये है। लेकिन इस तरीके से वो कुछ देखने को मिलता है।

तो मैं, आचार्य जी, मैं आपसे यह समझना चाहती हूँ कि सोमवारी का वास्तविक अर्थ क्या है? और जो यह चल रहा है, वो क्या है?

आचार्य प्रशांत: वास्तविक अर्थ तो शिवत्व ही है। तो शिव कौन है? इस पर खूब बोला है, खूब चर्चा करी है। और जब हम भगवद्गीता के साथ होते हैं, उपनिषदों के साथ होते हैं। वहाँ भी शिव का नाम आए न आए; यदि बात सत्य की है, तो बात शिव की है। ठीक है? तो रही सोमवारी तो शिव। ठीक है?

अब आपने जो काँवड़ियों की बात करी, जिसमें आपने ऐसे दिखाया जैसे काँवड़िए दोषी हैं। मैं पूछना चाहता हूँ कि अगर यह सब, मान लीजिए आप जाएँ, आपको बुरा लग रहा है। आप गईं आपने कहा, मुझे रोकना है। तो विरोध क्या सिर्फ़ काँवड़ियों से आएगा या पूरे समाज से आएगा?

प्रश्नकर्ता: समाज से।

आचार्य प्रशांत: बस यही जवाब है। काँवड़ियों की निंदा क्यों करनी है? एक माहौल है समाज में। उसी माहौल के अनुसार कुछ जवान लोग खड़े हो जाते हैं, तैयार हो जाते हैं और वो सब बातें जो आप बता रही हैं, उन्होंने शायद करी होंगी कि कोई सिगरेट भी पी रहा है, कोई कुछ कर रहा है। ये सब करा होगा। पर यह कौन है काँवड़िया? ज़्यादातर जवान लड़के होते हैं। कई बार पंद्रह साल से लेकर तीस-पैंतीस साल तक के युवक ही होते हैं। ज़्यादातर आपके यहाँ भी ऐसा ही होता होगा।

एक माहौल है, एक समाज है। उसने अपने बच्चे को मान्यताएँ पिलाई हैं। बच्चा अब बड़ा होता है। वो ठीक है, वो कर रहा है ये सब कुछ। और आप यह सब अगर रोकना चाहोगे, तो ऐसा नहीं है कि कोई काँवड़िया आ के ही विरोध करेगा। यह भी हो सकता है कि काँवड़िए कम विरोध करें ज़्यादा विरोध जो है, वह ब्रॉडर सोसायटी से आए, पूरे समाज से ही विरोध आ जाए। तो बताओ आप किसकी निंदा करना चाहते हो? अब क्या करें?

इतनी आसानी से एक इंसान को दोष मत दे दिया करो, जब उसके पीछे जो कारण है, वो ज़्यादा व्यापक है। द कलेक्टिव डार्कनेस।

नहीं तो आप एक को दोषी ठहरा करके बाकी सबको और बाकी सब के साथ-साथ ख़ुद को भी क्लीन चिट दे देते हो। “हम तो ठीक हैं, गलती न सारी उन काँवड़ियों की है।” अच्छा जी, सचमुच?

एक ही उत्तर है: सत्यम् शिवम् सुंदरम्। काँवड़ियों की बात मत करिए, शिव की बात करिए। ठीक है? जीवन में शिवत्व आएगा, यह सारी बातें अपने आप निरर्थक हो जाएँगी। और शिव को जीवन में लाना किसी मौसम, किसी माह का मोहताज नहीं होता। समझ रहे हो? और उसको आप किसी माह से और बरसात से और सावन से जोड़कर देखोगे, तो वही सब होगा कि जल्दी-जल्दी मांस खा लो, महीने भर मांस नहीं मिलेगा। यह सब धर्म के घोर विकार हैं, और इसमें सबसे ज़्यादा हानि स्वयं धर्म की ही होती है।

जब फ़िज़ूल बातों को धर्म का नाम मिल जाता है, तो बदनाम जो होता है, वह है वास्तविक धर्म। धर्म की बहुत कम हानि करी है उन लोगों ने जो बोलते हैं, हमें धर्म से कोई लेना-देना नहीं। धर्म की सारी हानि वह करते हैं जो धर्म के नाम पर लोकधर्म चला रहे हैं। वह धर्म के दुश्मन हैं असली। धर्म का असली दुश्मन नास्तिक वग़ैरह कोई नहीं है। उसने तो साफ़ बता ही दिया कि मुझे धर्म से साहब कोई सरोकार नहीं। वह तो अलग हो गया है। धर्म के दुश्मन हैं वह जो धर्म के नाम पर लोकधर्म चलाते हैं। लोकधर्म धर्म का सिर्फ़ विकृत रूप नहीं है, लोकधर्म धर्म का दुश्मन है।

कई लोगों को ये लगता है कि देखो शुरुआत लोकधर्म से होती है, फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ के धर्म आ जाता है। नहीं, ऐसा नहीं है। लोकधर्म धर्म की सीढ़ी का कोई पायदान नहीं है। कई लोग अपने आप को सांत्वना देना चाहते हैं, यही बोल करके कि सब लोकधर्मी होते हैं और फिर लोकधर्मी से धीरे-धीरे धर्मी। नहीं, नहीं, नहीं, ऐसा नहीं है। शत्रु है धर्म का लोकधर्म। लोग धर्म पर चलते-चलते धार्मिक नहीं हो जाते, लोकधर्म को त्यागा जाता है, तब धार्मिक होते हैं।

कोई कहे धर्म ख़तरे में है और धर्म का शत्रु वहाँ है। नहीं, अगर धर्म ख़तरे में है, तो धर्म का शत्रु धर्म के भीतर है। उसका नाम है लोकधर्म।

प्रश्नकर्ता: मैं इसमें कुछ ऐड करूँ? ये जैसे मेरी मम्मी, मैं आठ भाई-बहन हूँ।

आचार्य प्रशांत: मैं? मैंने सुना ही नहीं। अरे, मैंने सुना ही नहीं।

प्रश्नकर्ता: मैं सातवें नंबर पर हूँ। तो मेरी मम्मी, जैसे उनको मतलब बच्चों से कुछ ज़्यादा ही ये है। तो आचार्य जी, मैं ये कहना चाहती हूँ कि न मेरी दीदी को; वहाँ मेरे गाँव में ये भी चलता है कि लोग पुत्र उनको ये करने के लिए कि मेरे घर में बेटा आ जाए इस कारण ये मतलब काँवड़ लेकर के मानते हैं कि अगर हो जाएगा, तो जाएँगे पाँच बार जाएँगे या फिर जितना बार जाएँगे, तो मेरी भी दीदी को ये बेटा नहीं हो रहा था, तो मेरी मम्मी ने भी पाँच बार जाकर के काँवड़ लेकर के पैदल गई थी।

आचार्य प्रशांत: आठ बच्चों के बाद?

प्रश्नकर्ता: जी।

आचार्य प्रशांत: मुझे बता के क्या होगा? मैं इसमें कुछ नहीं।

प्रश्नकर्ता: नहीं, मैं यह कह रही हूँ कि अभी उसके बाद मेरे घर पर ज़्यादातर लड़का का ही जन्म हो रहा है। तो कह रही है कि वह जो हम गए थे न, इसी कारण हो रहा है।

आचार्य प्रशांत: लड़के का जन्म कैसे होता है, इसके लिए अविद्या चाहिए। और लड़के के ही जन्म की कामना न हो, इसके लिए विद्या चाहिए। हमारे पास न विद्या है, न अविद्या, तो हमें यह भी नहीं पता कि गर्भ के शिशु का लिंग कैसे निर्धारित होता है। हम नहीं जानते, हम सोचते हैं आसमान से निर्धारित होता है, हमें कुछ नहीं पता। थोड़ी पढ़ाई करी हो तो पता चल जाएगा कि लड़का-लड़की कैसे तय होता है। और उस प्रक्रिया में कोई दखल नहीं कर सकता बाबा, वो प्रकृति की बनाई व्यवस्था है जिसमें लगभग एक और एक के अनुपात में ही लड़का-लड़की दोनों पैदा होंगे। लेकिन कौन से शिशु का लिंग क्या होगा, यह किसी का बाप पहले से तय नहीं कर सकता।

हाँ, आप पहले जेनेटिक इंजीनियरिंग में घुस जाएँ, यूजेनिक्स में घुस जाएँ, तो अलग बात है। पर जो प्राकृतिक प्रक्रिया है, वो रैंडम है, उसमें नहीं तय करा जा सकता। कोई दैवीय हस्तक्षेप गर्भ में पुत्र को स्थापित नहीं कर पाएगा। और इसके लिए पढ़ाई चाहिए, यह बात आपको गीता भी नहीं सिखा पाएगी। इसके लिए तो स्कूल-कॉलेज में जाकर के अटेंडेंस लगानी पड़ेगी और वहाँ लाइब्रेरी में किताबें खोल के पढ़नी पड़ेंगी।

हाँ, गीता यह कर देगी कि गीता आपको इस चाह से ही मुक्त कर देगी कि और बच्चे हो या लड़का हो। इस तरह की मूर्खतापूर्ण कामनाओं से आपको अध्यात्म मुक्त कर देगा। वो भी नहीं है हमारे पास। तो फिर क्या है हमारे पास?

पर आप ये सब पूछ क्यों रही थी? मैं क्या करूँ इसमें? सवाल पूछने के बहाने घरेलू भड़ास मत निकाला करो।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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