सोमवारी और काँवड़ यात्रा का बाहरी आयोजन तभी सार्थक है जब उसका संबंध शिवत्व और सत्य से हो। केवल भीड़, दिखावे, मांसाहार छोड़ने की औपचारिकता या पुत्र की कामना को धर्म मान लेना वास्तविक धर्म नहीं है। काँवड़ियों को दोष देने के बजाय उस सामूहिक मानसिकता को देखना चाहिए जो ऐसे कर्मों को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य लोकधर्म की रूढ़ियों को बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेक और समझ के द्वारा उनसे मुक्त करना है।
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प्रश्न कर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं बिहार से आई हूँ। आचार्य जी, मुझे प्रश्न पूछना है कि अभी सोमवारी शुरू होने वाली है और मेरे शहर में एक बड़ा-सा मंदिर है, जिसमें मैं हमेशा से देखती आ रही हूँ कि जब भी सोमवारी आने वाली होती है, तो उससे पहले ही मतलब पूरे सड़कों को, जो मंदिर के आसपास की सड़क है, उसको पूरा बैरिकेड कर दिया जाता है तीर्थ जो काँवड़िया हैं, उनके लिए, जिससे जाम भी ज़्यादा लगने लगता है उस पूरे सड़क, मतलब शहर-शहर में भीड़ बढ़ जाती है और जाम की समस्या आ जाती है। और मैं यह भी देख रही हूँ कि अभी घर में भी, चाहे आसपास लोग मांसाहार तेज़ कर दिए हैं कि “जल्दी-जल्दी खाओ सोमवारी आने वाली है। सावन आने वाला है, तो अभी एक महीना तो नहीं खाना है।” तो वो भी तेज़ हो गया।
फिर देखते ये भी देखे कि सोमवारी में जो भी काँवड़िया लोग आते हैं, तो वो काँवड़ में जल भर के दौड़ते हुए आ रहे हैं और कोई लेटते हुए, मतलब दंड देते हुए आ रहा है। कोई चलते हुए आ रहा है, तो ये सब उसके लिए मतलब उन लोगों की सुविधा के लिए पूरा व्यवस्था किया जाता है। अलग-अलग संगठन जो है, वो वोट के दाम में, मतलब लोगों को प्रभावित करने के लिए, ये मतलब वो व्यवस्था करते हैं जिसमें जल के छिड़काव की व्यवस्था रहती है। खाने की व्यवस्था रहती है जिसमें, उसके बाद बैंडेज, जो जिनका ज़ख्म हो जाता है, उनके लिए बैंडेज ये रहता है। तो ये सब भी रहती है।




