प्रश्नकर्ता: “अहिंसा परमो धर्म:।” श्लोक के इस अंश में एक तरफ़ तो भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, “अहिंसा परमो धर्म:” और दूसरी तरफ़ वो गीता का ही इस्तेमाल कर रहे हैं, अर्जुन से हिंसा करवाने के लिए। तो ये बात तो सरासर गलत है। कृष्ण हिंसा करवा रहे हैं और कृष्ण अपनी ही सीख के विरुद्ध जा रहे हैं।
आचार्य प्रशांत: तो वरुण पहली बात तो ये कि “अहिंसा परमो धर्म:” गीता में कहीं नहीं आता। महाभारत में आता है। महाभारत में अनेक जगहों पर आता है। गीता में कहीं नहीं आता। ये हमारी बड़ी त्रासदी है कि हम जो हमारे ही ऊँचे-से-ऊँचे ग्रन्थ हैं, उनको कभी पढ़ते नहीं। जो चीज़ हमारे सबसे निकट होनी चाहिए थी, उस तक भी हम सुनी-सुनाई बातों के जरिए से जाते हैं। इतना लम्बा मुझे प्रश्न आपने लिखकर भेजा वरुण, उससे पहले एक बार देख तो लेते हैं कि गीता में ऐसा कोई श्लोक आता भी है या नहीं आता। खैर चलिए।
आपने जो सवाल उठाया है उसको लेते हैं कि कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित किया तो क्या ये हिंसा नहीं है?
नहीं, बिलकुल नहीं है। वजह समझिए। हम चूँकि बड़ी भौतिक ज़िन्दगियाँ जीते हैं, इसलिए हमारे शब्दकोश में हर चीज़ का भौतिक ही अर्थ होता है। ठीक है? समझ रहे हैं? अब हमारे लिए हर चीज़ शारीरिक है। हम मटेरियल(पदार्थ) में यकीन करने वाले लोग हैं न। हमें तो बस पदार्थ से मतलब होता है। तो हमारे लिए हिंसा का अर्थ भी वही हो गया है- किसी को थप्पड़ मार दिया, किसी को गाली दे दी। सामने कोई व्यक्ति खड़ा है। है ना? किसी व्यक्ति का किसी स्थूल देह का हमने कुछ नुकसान कर दिया। जो सामने देही खड़ा है, तो हम उसको हिंसा कह देते हैं। नहीं, हिंसा ये नहीं है। हिंसा का ये बड़ा सतही और बड़ा स्थूल, बड़ा ग्रॉस अर्थ है।
हिंसा का अर्थ होता है, सच्चाई के खिलाफ़ खड़े हो जाना। तुम्हारी जो उच्चतम सम्भावना है उस पर घात करना। सच्चाई का विरोध करना हिंसा है। तुम्हारी जो उच्चतम सम्भावना है, जिसे तुम सत्य कह सकते हो, आत्मा कह सकते हो, उस पर घात करना, उस पर हमला करना, उसे नष्ट करने की कोशिश करना- ये हिंसा है।







