सनातन धर्म: एक कविता व आखिरी परिभाषा (बड़ा कौन- संविधान,विज्ञान या अध्यात्म?) ||आचार्य प्रशांत(2023)

आचार्य प्रशांत: अद्वैत वेदान्त झूठ नहीं बोल सकता इसलिए बहुत प्रसिद्ध नहीं हो पाया। सम्मानित बहुत हुआ, प्रचलित नहीं हो पाया। झूठ बोलना नहीं जानता। बाक़ी इंसान का ऐसा है कि वो दर्शन के नाम पर भी झूठ ही चलाता है। अद्वैत अकेला होता है जो झूठ बोलने वाले की गर्दन पकड़ लेता है। वो बोलता है, ‘यही तो है’, वो बोलता है, ‘जब तक कोई बोलने वाला है, तब तक सच बोला नहीं गया।‘ तो सच सिर्फ़ तब बोला जाएगा जब ये जो बोल रहा है, इसकी गर्दन ही मरोड़ दो। तो अब झूठ कहाँ से आएगा? जब न सच आ सकता हो न झूठ आ सकता हो सिर्फ़ तब सच आया। वरना तो जब आपने झूठ बोला तो झूठ बोला ही, जब आपने सच बोला तब भी झूठ बोला।
सच सिर्फ़ एक दशा में सम्भव है: कुछ नहीं बोला। कैसे नहीं बोला? क्योंकि भाई! कर्ता ही कर्म है तो वक्ता ही वाक्य है। वाक्य अगर हटाना है तो ये वक्ता ही हटाओ। तो अद्वैत वेदान्त अकेला है जिसमें झूठ हो नहीं सकता क्योंकि उसमें झूठ बोलने वाला रह ही नहीं जाता। कहता है अगर अभी कुछ भी बचा हुआ है, भले ही कितना भी सच बोल रहा हो, मामला गड़बड़ है।
बाक़ी सब दर्शन किसी न किसी सच पर जाकर रुक जाते हैं। अद्वैत वेदान्त मौन पर जाकर रुकता है। और जो आपका सच होगा, इस बात को लाओत्सु ने बड़े प्यारे तरीक़े से कहा है न, “जो आपका सच होगा, उससे बड़ा कोई झूठ हुआ है आज तक?” जब आप बोलो, ”इट इज़ माय ट्रुथ (ये मेरा सच है)”, उससे बड़ा कोई झूठ होता है? ’माय ट्रुथ’ माने आपके अनुभव का सत्य और अनुभव का सत्य माने अनुभोक्ता आश्रित सत्य, उससे बड़ा क्या झूठ होगा! अनुभव का सत्य माने अहंकार का सत्य, उससे बड़ा क्या झूठ होगा!
अद्वैत वेदान्त तो आपका पूरा समूल नाश करता है। क्या हुआ प्रश्नकर्ता का? उसका उन्मूलन हो गया — मूल से उखाड़ दिया गया; यही हुआ, कुछ नहीं बचा — न सच बचा न झूठ बचा।
क्या करने आये? झूठ हटाने आये हो, झूठ हटाने का काम तो अच्छा लगता है तो सब करते हैं। इंसान वो चाहिए जो सारे सच हटा दे। अधर्म हटाने का काम तो अच्छा लगता है, वो तो सब करते हैं। दर्शन वो चाहिए जो धर्म को ही हटा दे, तब आती है बात। जो ग़लत है उसको तो हटाना बड़ा आकर्षक लगता है। सब खड़े हो जाते हैं नैतिक लोग, ग़लत है हटा दो। सूरमा वो है जो उसको हटाये जो अच्छा भी लगता है।



