
सभी देवता वास्तव में आपकी आंतरिक शक्तियों के प्रतीक हैं, क्योंकि स्थूल जगत में कोई देवता नहीं होते; वे आपके भीतर ही हैं। दानव तुम्हारा वही हिस्सा है जो बार-बार चोट खाकर भी हठी की तरह खड़ा हो जाता है, अपनी पुरानी गलतियाँ दोहराने के लिए। यदि तुम्हें अपने भीतर के दानव को परास्त करना है, तो अपने काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ और भय — इन 6 गुणों को सत्य और ऊँचाई की सेवा में माने देवी को समर्पित करना होगा।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रसंग में बताया गया है कि देवताओं ने बहुत लंबे समय तक सुख से राज्य किया, फिर उनके ऊपर दु:ख आया, तब जाकर उन्होंने देवी की स्तुति की। फिर आपने यह भी बताया कि धूल को लगातार साफ़ करते रहना होता है। हमारे साथ भी ऐसा ही

आचार्य प्रशांत: दूसरे चरित्र का जो अंतिम अध्याय है, चतुर्थ अध्याय, उसे मैं पढ़े देता हूँ। पहले सुन लें, फिर उस पर चर्चा करेंगे।

आचार्य प्रशांत: अब हम तृतीय अध्याय में प्रवेश करते हैं। जहाँ पर दूसरे अध्याय का समापन है, तृतीय अध्याय वहीं से आगे बढ़ता है। तो युद्ध चल रहा है विकराल, और एक के बाद एक दैत्य सेनापति आ करके देवी से संघर्ष कर रहे हैं।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जिस तरह से दैत्यों की सेना के बारे में बताया है कि बहुत शक्तिशाली हैं, बहुत सारे सैनिक हैं, तो ये क्या जो हमारी वृत्तियाँ हैं, उनकी शक्तियों के बारे में बताया जा रहा है?
आचार्य प्रशांत: बिल्कुल वही है, बिल्कुल वही बात है।

आचार्य प्रशांत: फिर देवी का और दैत्यों का संग्राम होता है और वो संग्राम बड़े विस्तार के साथ वर्णित है पूरे मध्यम चरित्र में। कि दैत्यों के इस सेनापति ने हमला किया तो देवी ने फिर कैसे उसको परास्त किया, वो किन-किन अस्त्रों का प्रयोग करके देवी पर आघात कर


प्रश्नकर्ता: जैसे वृत्तियाँ होती हैं। वृत्ति होती है, फिर विचार का तल आता है। तो विचारों में कई बार फिर भी होता है कि विचार मन में घूम रहे होते हैं तो आप फिर भी उसे कई बार पकड़ पाते हो कि हाँ, अच्छा ऐसा कुछ चल रहा है और

प्रश्नकर्ता:

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी जो दुर्गासप्तशती में कहानी बताई, इसमें असुरों का जन्म भी भगवती महामाया से हुआ और उनका संहार भी भगवती महामाया के द्वारा हुआ अर्थात वृत्तियाँ भी प्रकृति ने पैदा की और वृत्तियों का नाश भी वृत्ति ही कर रही है।

प्रश्नकर्ता: क्या बुद्धि और प्रकृति एक ही तल पर हैं?


आचार्य प्रशांत: विष्णु भगवान सो रहे हैं। तो इनके कानों के मैल से दो असुर पैदा हो गए, मधु और कैटभ। इन्होंने बड़ा उत्पात मचाया। और ये ब्रह्मा को मारने को तत्पर हो गए, बोले कि मारेंगे ब्रह्मा को। और लगे हैं पीछे ब्रह्मा के, ब्रह्मा वहाँ से भागे कि



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। उपनिषद् या जितने भी प्रमुख ग्रंथ हैं, वहाँ पर, जितना मुझे पता है,

आचार्य प्रशांत: बारहवाँ अध्याय।
देवी बोलीं – “देवताओं! जो एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन इन स्तुतियों से मेरा सत्वन करेगा, उसकी सारी बाधा मैं निश्चय ही दूर कर दूँगी।”
“जो मधुकैटभ का नाश, महिषासुर का वध तथा शुम्भ-निशुम्भ के संहार के प्रसंग का पाठ करेंगे तथा अष्टमी, चतुर्दशी और नवमी को भी…
"अत्यंत पराक्रमी दुरात्मा महिषासुर तथा उसकी दैत्य सेना के देवी के हाथ से मारे जाने पर इंद्र आदि देवता प्रणाम के लिए गर्दन तथा कंधे झुकाकर…
चिक्षुर नाम का असुर आता…
तो क्या होता…
आचार्य प्रशांत: आप अगर निद्राग्रस्त हो, कौन सी निद्रा? चेतना की निद्रा, तो आपके शरीर का मैल ही असुर है। जब आप माया…
आचार्य प्रशांत: नहीं, वृत्ति कुछ नहीं…
प्र: और अभी मनुष्यों में भी प्रकृति जो है बुद्धि के माध्यम से ही अभिव्यक्ति पा रही है।
आचार्य: प्राकृतिक ही है बुद्धि। देखो न, इतने जीवो को देखो, सबकी बुद्धि…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वृत्ति को या उस शक्ति को जो हमें समझने नहीं देती या देखने नहीं देती या जिस कारण से फँसे हुए हैं, उसको जनरल (सामान्य), न्यूट्रल (उदासीन) भी रखा जा सकता था, जैसे ब्रह्म कहते हैं तो जनरल न्यूट्रल होता है। इंसान रूप में जो स्त्री है…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी तक जो विवरण रहा, उसमे ऐसा लग रहा है कि जैसे देवी जी कोई व्यक्तित्व हों और हमसे बाहर का कुछ हों, तो इसको मन के तल पर कैसे समझा जा सकता है?
आचार्य: देखो, आत्मा सत्य है, आत्मा का ही दूसरा नाम ब्रह्म है। आत्मा…
आचार्य प्रशांत: तो ऋषि मारकंडेय हैं मार्कंडेय पुराण में और वे अपने शिष्यों को दीक्षा दे रहे हैं, सुना रहे हैं, समझा रहे हैं। और शिष्यों में कौन हैं? पक्षी हैं। तो ऐसा ही है, भाई। पुरुष प्रकृति को कुछ कह रहा है तो प्रकृति पक्षी का रूप लेकर भी…
पीरियड्स से महिलाएं कमजोर नहीं होतीं, फिर भी यह मान्यता सदियों से चली आ रही है। आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हर ऐसी मान्यता के पीछे किसी का डर या स्वार्थ छुपा होता है। सिर्फ तर्क या जानकारी से बदलाव नहीं आता, जब तक हम खुद अपने भीतर के इस डर या स्वार्थ को पहचानकर उससे मुक्त होने का चुनाव न करें। असली आज़ादी वहीं से शुरू होती है जहां हम मूर्खता की बातों को पीछे छोड़ना सीखते हैं और सोच-समझकर संगति का चुनाव करते हैं।

स्त्री-पुरुष के रिश्तों में समस्या केवल आकर्षण या कामना की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जिसमें दोनों एक-दूसरे को अपनी इच्छाओं का साधन बना लेते हैं। पुरुष स्त्री को शरीर और स्त्री पुरुष को धन, सुरक्षा या सुविधा के माध्यम के रूप में देखने लगती है। इससे निर्भरता, कुंठा और संघर्ष पैदा होते हैं। स्वस्थ संबंध के लिए आत्मज्ञान, स्पष्टता, समानता, स्वतंत्रता और अपनी इच्छाओं की विवेकपूर्ण जाँच ज़रूरी है। साथ ही, रिश्तों के बने-बनाए सामाजिक मॉडलों पर पुनर्विचार करना और किसी भी व्यक्ति को अपनी मुक्ति का साधन न बनाना आवश्यक है।

सोमवारी और काँवड़ यात्रा का बाहरी आयोजन तभी सार्थक है जब उसका संबंध शिवत्व और सत्य से हो। केवल भीड़, दिखावे, मांसाहार छोड़ने की औपचारिकता या पुत्र की कामना को धर्म मान लेना वास्तविक धर्म नहीं है। काँवड़ियों को दोष देने के बजाय उस सामूहिक मानसिकता को देखना चाहिए जो ऐसे कर्मों को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य लोकधर्म की रूढ़ियों को बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेक और समझ के द्वारा उनसे मुक्त करना है।

धर्म का अर्थ अंधविश्वास या मान्यताओं को मान लेना नहीं, बल्कि निर्भीक जिज्ञासा और सत्य की खोज है। बच्चों पर धार्मिक नियम थोपने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। भय, शर्म और अपराधबोध पर आधारित धार्मिक संस्कार व्यक्ति को सत्य से दूर और देह-केंद्रित बना देते हैं। सच्चा धर्म हर मान्यता की निष्पक्ष जाँच, तथ्य के प्रति ईमानदारी और आंतरिक स्वतंत्रता का नाम है। प्रश्नचिह्न ही धार्मिकता का सबसे बड़ा प्रतीक है।

श्रीकृष्ण, श्रीराम और अन्य अवतारों को केवल उनके मानवीय जीवन से समझना भ्रम पैदा करता है। साकार रूप सीमित होता है, जबकि उसका उद्देश्य मनुष्य को निराकार सत्य की ओर ले जाना है। देह, परिवार या घटनाओं में कमियाँ खोजने के बजाय उनके संदेश का सार समझना आवश्यक है। विवेक, कृतज्ञता और सही दृष्टि ही आध्यात्मिक समझ का आधार हैं, जबकि हर बात में दोष ढूँढ़ना केवल अहंकार को पोषित करता है।

लोग अपनी राय की रक्षा इसलिए नहीं करते कि वह सत्य है, बल्कि इसलिए क्योंकि भीतर से उन्हें उसकी कमजोरी का पता होता है। झूठ सबसे जल्दी आहत होता है और सच से डरता है। इसलिए सत्य बोलने पर यदि कोई टूटता है, तो उसके झूठ के लिए स्वयं को दोषी नहीं मानना चाहिए। जहाँ वास्तव में गलती हो, वहाँ विनम्र बनें; लेकिन सत्य के पक्ष में खड़े होने के लिए अपराधबोध या दूसरों की नाराज़गी का बोझ उठाना आवश्यक नहीं है।

आत्मज्ञान के बिना समाज, पर्यावरण या किसी भी बाहरी समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं, क्योंकि हर संकट की जड़ मनुष्य की चेतना में है। बाहरी सुधार, नीतियाँ या अभियानों की अपनी भूमिका है, लेकिन वे मूल कारण को नहीं बदलते। इसलिए सबसे आवश्यक कार्य है स्वयं को बदलना और सत्य के प्रति गंभीर होना। जो व्यक्ति सत्य के प्रति उदासीन है, उससे स्वीकृति या मान्यता की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है।

लड़कियों को बचपन से निर्भर बनाना उनकी क्षमता नहीं, उनकी स्वतंत्रता छीनता है। आर्थिक, बौद्धिक और व्यावहारिक आत्मनिर्भरता ही वास्तविक सम्मान और सुरक्षा का आधार है। समाज अक्सर उन्हें रूप, भावनाओं और दूसरों पर आश्रित रहने तक सीमित कर देता है, जबकि उनकी सबसे बड़ी आवश्यकता आज़ादी है। जो भी शिक्षा, कौशल या संघर्ष स्वतंत्रता की ओर ले जाए, उसी पर पूरी ऊर्जा लगानी चाहिए; बाकी सब उसके बाद है।

स्वतंत्रता केवल बाहरी प्रतिबंधों से मुक्त होने का नाम नहीं है, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और मानसिक निर्भरता से ऊपर उठने का साहस भी है। दूसरों की राय, सुरक्षा के नाम पर लगाए गए बंधन और सामाजिक भय तभी प्रभावी होते हैं जब व्यक्ति उन पर निर्भर हो। गरिमा और आत्मनिर्भरता व्यक्ति को अपने निर्णय लेने की शक्ति देती हैं। शांति, सम्मान और स्वतंत्र जीवन के लिए कभी-कभी सुविधा, सुरक्षा और सामाजिक स्वीकृति की कीमत भी चुकानी पड़ती है।

आर्थिक निर्भरता, भावनात्मक आघात और घरेलू हिंसा के बीच व्यक्ति अक्सर अपनी वास्तविक समस्या को पहचान नहीं पाता। रिश्ते कई बार प्रेम से अधिक मजबूरी और निर्भरता पर टिके होते हैं। आत्मनिर्भरता व्यक्ति को भय और विवशता से मुक्त कर सही निर्णय लेने की शक्ति देती है। दूसरों की सहायता करने से पहले स्वयं को सुरक्षित, स्वतंत्र और सशक्त बनाना आवश्यक है, क्योंकि स्वतंत्रता के बिना न संबंध स्वस्थ हो सकते हैं और न जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय।

अध्यात्म कोई अलग विषय या पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि स्वयं को जानने की सतत जागरूकता है। विज्ञान, चिकित्सा या एआई जैसे सभी क्षेत्र बाहरी ज्ञान से जुड़े हैं, जबकि अध्यात्म उस व्यक्ति को समझने की प्रक्रिया है जो इनका उपयोग करता है। यदि इंसान स्वयं को नहीं समझता, तो उसका ज्ञान दिशाहीन हो सकता है। सही समझ ही तकनीक और शक्ति को मानव कल्याण की दिशा देती है।

आप आस्था खोज रहे हैं, पर क्या आस्था कभी ज़बरदस्ती पैदा होती है? आस्था फूल है, जो सही बीज, सही मिट्टी और सही संगति मिलने पर अपने आप खिलती है। शुरुआत श्रद्धा से नहीं, जिज्ञासा से होती है। सम्मान से नहीं, संदेह से होती है। परखिए, पूछिए, प्रयोग करिए। जहाँ वास्तविक लाभ होगा, वहाँ आस्था अपने आप जन्म लेगी, बनावटी नहीं।

आप ‘अद्वैत’ को कोई सिद्धांत समझते हैं? जब तक ‘मैं’ है, तब तक दुनिया और दूसरा भी है, यही द्वैत है। अद्वैत तब होता है जब ‘मैं’ ही अपने मिथ्यात्व को देख ले। तब न कहने वाला बचता है, न कहने को कुछ। अद्वैत कोई विचार नहीं, अस्तित्व का अनुभव है। यह अहंकार के समाप्त होने का नाम है, जहाँ सिर्फ़ बोध शेष रह जाता है।

आप सोचते हैं कि संसद में 33% महिलाएँ आ जाएँगी तो सशक्तिकरण हो जाएगा, लेकिन जब ज़मीन पर ही लड़कियों को स्वतंत्र होने नहीं दिया जाता, तो संसद तक पहुँचेंगी कौन? वही महिलाएँ जो पहले से सत्ता के सहारे हैं। असली बदलाव आरक्षण से नहीं, घर और समाज में महिला की स्वतंत्रता, शिक्षा और आत्मनिर्भरता से आएगा। वरना यह सिर्फ़ एक सजावटी परिवर्तन रह जाएगा।

आस्था और ज़िम्मेदारी अलग नहीं हैं; सच्ची आस्था खुद ज़िम्मेदारी बन जाती है। धर्म के नाम पर प्रकृति का नुकसान और अंधविश्वास, धर्म नहीं बल्कि अज्ञान है। वास्तविक धर्म समझ और सत्य पर आधारित है, न कि परंपराओं की अंधी नकल पर। अंधविश्वास पर प्रश्न उठाना धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उसे बचाने का काम है।

आचार्य प्रशांत कलिंग में युवाओं से संवाद करते हैं। वे कहते हैं कि दर्शन सत्य की खोज है, जो आत्म-अनुसंधान से शुरू होती है। परंपरा सदा से चली आ रही है, बस रूप बदल गया है। विकृत धर्म बाजार बन गया है। युवाओं को अपनी बीमारी पहचानी चाहिए। सोशल मीडिया एल्गोरिदम मन को नियंत्रित कर रहा है। सच्चा शिक्षक वह है जो आपकी झूठी धारणाओं को चुनौती दे।

अहंकार मनुष्य की मूल समस्या है। हम ज्ञान समझते हैं पर उस पर चल नहीं पाते क्योंकि अहंकार को अपनी पहचान के लिए दूसरों की आवश्यकता है। परिवार, समाज, विचारधारा से हम सौदा करते हैं - अपनी स्वतंत्रता बेचते हैं। सच्चा प्रेम स्वयं को और दूसरों को मुक्त करना है, न कि बंधन में रखना। ईमानदारी से अपने झूठ को देखना ही सत्य है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…

अहंकार साधना भी करेगा तो इसलिए नहीं करेगा कि वो विसर्जित हो जाए, विगलित हो जाए, मिट जाए। वो साधना भी करेगा, श्रम भी करेगा तो इसीलिए करेगा कि वो बचा रहे बल्कि अमर हो जाए।

महिला का सबसे ज़्यादा अपमान तो खुद महिला करती है। नाम है ‘शक्ति’ और जीवन है पूरा ‘अशक्त’। अगर लड़की इतनी ही बुरी चीज़ है, तो आप क्यों लड़की हो? आप खुद जिस लिंग की हो, आप उस लिंग के प्रति भी अपमान से भरी हुई हो। पाँच करोड़ महिलाएँ भारत की आबादी से गायब हैं। इनकी हत्या करी गयी है। इससे बड़ा नरसंहार कोई होगा। ये सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए देश में, बहस में, मीडिया में। लेकिन इसकी कोई बात नहीं करना चाहता। क्योंकि ये नारीसंहार है, इसीलिए इसे नरसंहार भी नहीं माना जाता।

समसामयिक हिन्दू धर्म पुराणों, स्मृति ग्रंथ और स्थानीय क़िस्म की परंपराओं पर चल रहा है। वो हिन्दू धर्म है ही नहीं। हिन्दू धर्म से अगर हमारा आशय है वेदों के दर्शन पर आधारित धर्म, तो हिन्दू धर्म न अगड़ा है, न पिछड़ा है; हिन्दू धर्म एकमात्र धर्म है। धर्म तो एक ही है, ये जो दुख में बैठा हुआ है, इसका दुख दूर करना। बाक़ी सब कुछ किसी धर्म, पंथ, मज़हब में हो रहा हो, वो सब अंधविश्वास है। हिन्दू धर्म कहता है, “वो है कौन जो दुःखी है? प्रश्न करो, और प्रश्न का जवाब परंपरा नहीं, प्रयोग देगा।”

अब लोकधर्म में क्या हो गया है कि ईश्वरवादिता को ही आस्तिकता मान लिया गया है। पर ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है, आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है। सही बात तो ये है कि ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। क्योंकि सत्य को समर्पित नहीं हैं वो। आस्तिक वो है, जो सत्य को समर्पित हो।

गीता की ब्रांडिंग एक लोकधार्मिक बुक के रूप में हो गई है। तो ये जो जेन-ज़ी है, जब लोकधर्म को ठुकराती है, तो लोकधर्म के साथ-साथ गीता को भी ठुकरा देती है। थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथ-वॉटर। तो उनके लिए गीता, पुराण सब एक है। और जो चलती है, रावण संहिता उनके लिए वो सब एक है।

आदमी बेरोज़गार हो जाए तो दुनिया लानतें भेजती है। औरत बेरोज़गार घर में पड़ी है, उसे तो कोई कुछ कहता भी नहीं। घर में घुसे-घुसे वो दुनिया से ऐसी कट जाती है कि उसे कोई ख़बर नहीं रहती। उसका व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है। ये ख़तरनाक बात है। स्त्रियों के लिए विशेषतया ज़रूरी है कि वो ज़िंदगी के किसी भी मुक़ाम पर आर्थिक रूप से परनिर्भर न हो जाए। हर चीज़ से समझौता कर लेना, कमाने से मत करना। कम कमाओ, लेकिन इतना तो ज़रूर कमाओ कि रोटी अपनी खाओ। बात तुलना की नहीं है, बात आत्मनिर्भरता की है।

आदमी बेरोज़गार हो जाए तो दुनिया लानतें भेजती है। औरत बेरोज़गार घर में पड़ी है, उसे तो कोई कुछ कहता भी नहीं। घर में घुसे-घुसे वो दुनिया से ऐसी कट जाती है कि उसे कोई ख़बर नहीं रहती। उसका व्यक्तित्व कुंठित हो जाता है। ये ख़तरनाक बात है। स्त्री के लिए तो बहुत-बहुत ज़रूरी है कि वो ज़िंदगी के किसी भी मुक़ाम पर आर्थिक रूप से परनिर्भर न हो जाए। हर चीज़ से समझौता कर लेना, कमाने से मत करना। कम कमाओ, लेकिन इतना तो ज़रूर कमाओ कि रोटी अपनी खाओ। बात तुलना की नहीं है, बात आत्मनिर्भरता की है।

ये जो तुम आसमानों में ईश्वर बैठा देते हो, ये बस तुम्हारा एक बहुत बचकाना प्रयास है, सत्य को भी ऑब्जेक्टिफ़ाई करने का। किन्हीं आसमानों में तुमसे दूर कोई नहीं बैठा हुआ है। बाहर कोई नहीं ताक़त है जो तुम्हारी ज़िंदगी चला रही है। “तत्त्वमसि,” वो तुम हो, वो तुम्हारा ऑब्जेक्ट नहीं है। इसीलिए उस “तत्” को और “आत्म” को अभिन्न भी कहा गया। तुम्हारी सच्चाई और परम सत्य एक है।

मैं हूँ और यह दुनिया है, तो सबको यह सवाल उठेगा कि, “डज़ गॉड एग्ज़िस्ट?” अब इसमें तुमने सवाल लगाया है ‘गॉड’ पर। यह छोड़ो कि गॉड माने क्या, पहले बताओ ‘एग्ज़िस्टेन्स’ माने क्या? इसलिए फ़िलॉसफ़ी ज़रूरी है। उसके बिना ये सारी जो बहसें हैं, ये बस ऐसे ही हैं, बेकार की बात, दोनों तरफ़ से। आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है, ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है। आस्तिक होने का अर्थ है, सत्य को समर्पण। मेरी निष्ठा सत्य के प्रति है। तुम अगर गॉड, गॉड करोगे भी, तो मैं कहूँगा, सत्य ही गॉड है।

वो सब बातें, कि “माँ से ऊँची जगह तो भगवान की भी नहीं होती,” वग़ैरह-वग़ैरह। सुना है न खूब? न पढ़ी-लिखी हो, न उसमें कोई गुण हो, न संसार को जानती हो, न अध्यात्म को जानती हो; ऐसा इंसान अगर गर्भधारण कर ले, तो क्या वो भगवान के बराबर हो जाएगा? अगर पुरुष का पहला धर्म बाप बनना नहीं है, तो स्त्री के लिए मातृत्व पहली चीज़ कैसे हो गई? आप एक मनुष्य हैं, महिला बाद में हैं। आपका भी अपने प्रति वही कर्तव्य है, जो एक पुरुष का होता है: चेतना को उसकी ऊँचाइयों तक पहुँचाना।

आम आदमी को भले ही कम चोट लगती हो, आप धार्मिक आदमी को कहोगे, उसे खट से चोट लगती है। अभी यहाँ कोई बैठा हो बहुत धार्मिक आदमी, वह भीतर से छलनी हुआ जा रहा होगा, “क्या बोल रहे हैं! महापाप!” तुमने अनंत को इतनी छोटी चीज़ क्यों बना दिया कि कोई उसको घाव दे सके, बताओ न। आकाश पर चोट लग सकती है? मारो गोली, आकाश को लगेगी चोट? थूको आकाश पर, आकाश गंदा हो जाएगा? सत्य तो आकाश है, जिसमें घुला जा सकता है उसमें लीन हुआ जा सकता है।

आज जाओ किसी रेस्तरां में खाना खाने के लिए, तो बिना बुकिंग के घुसने को नहीं पाओगे। दुनिया है, दुनिया उत्सव मना रही है। ये जो हमारे भीतर मनोरंजन और उत्सव मनाने की ख़्वाहिश रहती है, वो रहती इसीलिए है कि हम सब भीतर से बड़े सूने और उदास हैं। मनोरंजन से उदासी ख़त्म नहीं होती, सिर्फ़ कुछ समय के लिए छुपती है। पता होना चाहिए कि आपका ‘कर्तव्य’ क्या है, और जब कर्तव्य आपकी अपनी समझ से निकलता है, तो उसका नाम ‘धर्म’ हो जाता है।

आपका न्यू ईयर झूठा है। इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि बाकी सब कुछ तो ओल्ड है, ईयर न्यू कैसे हो गया? कैलेंडर के पन्ने फाड़ने से न्यू ईयर कहाँ से आ गया? जब न्यू आएगा, तो सब कुछ न्यू के ही रंग में नहाएगा। ईयर भी न्यू हो जाएगा, स्माइल भी न्यू हो जाएगी, आई भी न्यू हो जाएगी; जब आप ही न्यू नहीं हुए, तो ईयर कैसे न्यू हो गया? हम नहीं बदल रहे, तो हमारी ज़िंदगी में कुछ नया बदलाव कैसे आ जाएगा? अपने पुरानेपन को त्यागना होता है, यही नए का उत्सव है।

‘मुझे किसी की फीलिंग्स नहीं हर्ट करनी है। मुझसे मम्मी-पापा के आँसू नहीं देखे जाते। मैं गिल्टी फील करने लगती हूँ।’ गिल्टी फील करना अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है लेकिन सही वजह से गिल्टी फील करो न। असली गलती यह है कि आप अपना जीवन व्यर्थ कर रही हैं। न ज्ञान है, न कला है, न कौशल है, न अनुभव है, कुछ नहीं है, दुनिया देखी नहीं है। महिला वग़ैरह आप बहुत बाद में हैं, सबसे पहले आप इंसान हैं और इंसान होने का मतलब ही होता है कि चेतना होना।

डॉक्टर अंबेडकर मृत्यु की रात को भी क्या कर रहे थे? वह धर्म पर ही किताब लिख रहे थे, और उन्हें बड़ी हड़बड़ी थी कि इसको पूरा कर दें। तबीयत बहुत ख़राब थी, दिख रहा था कि जाने वाले हैं। उनकी मृत्यु के बाद वह किताब प्रकाशित हुई, ‘The Buddha and His Dhamma.’ वह कोई पॉलिटिकल या इकोनॉमिक्स की किताब नहीं लिख रहे थे। वह धर्म पर लिख रहे थे। जो भारतीय दर्शन रहा है, उसकी सारी खूबियाँ बौद्ध धर्म में ज़बरदस्त तरीके से मौजूद हैं। बौद्ध धर्म तो पूरा ही जिज्ञासा का धर्म है, रूढ़ियों के लिए वहाँ एकदम ही कोई जगह नहीं है।