बाबाजी बोले, "अगर भगवान हैं, तो भूत भी हैं" || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2023)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सवाल ये था कि भगवान और भूतों का फिर रिश्ता क्या है?
आचार्य: ये जो बाहर वाले तुम्हारे भगवान हैं, उनका क्या काम है? तुम्हारी कामनाओं की पूर्ति करना। तो उसको तुम बोलते हो पॉज़िटिव एनर्जी। (सकारात्मक ऊर्जा) ठीक है? जो तुम्हारी कामना पूर्ति करे उसको तुम बोलते हो पॉज़िटिव। हमारे लिए पॉज़िटिव शब्द का अर्थ ही यही होता है। मेरी पसन्द का, मेरी कामना का, मेरी इच्छा का काम हो उसको मैं बोलता हूँ पॉज़िटिव। यही तो है न? और जो आपकी इच्छा, आपकी पसन्द से अलग हो उसको आप निगेटिव (नकारात्मक) बोलते हो।
यही तो है न पॉज़िटिव-निगेटिव की परिभाषा? सोचकर देखना, यही परिभाषा है।
तो भगवान को आप फिर बोलते हो पॉज़िटिव एनर्जी। क्योंकि वो आपकी कामना पूरी करता है। पर आपकी कामनाऍं पूरी तो होती ही नहीं। तो आपको फिर इक्वेशन (समीकरण) ठीक करने के लिए निगेटिव एनर्जी तो लानी पड़ेगी न। भाई आपके पास है कामना, और भगवान बैठे हैं आपकी कामना पूरी करने को, लेकिन कामना तो है कि पूरी होने को आती ही नहीं, आदमी मर जाता है।
आदमी दो हज़ार साल जी ले तब भी उसकी कामना नहीं पूरी होती। तो फिर आदमी कहता है, कहीं कोई निगेटिव एनर्जी भी होगी ज़रूर। तो फिर भूत खड़ा करना पड़ता है।
इसीलिए जो लोग कहते हैं कि अगर भगवान है तो भूत भी होगा, वो ठीक ही कहते हैं। लेकिन ये बात लागू होती है बस बाहर वाले भगवान पर। हमने जो भगवान की मान्यता बनायी है अगर वो मान्यता बनाओगे तो तुम्हें भूत की भी मान्यता बनानी पड़ेगी मज़बूरी में।



