लोकधर्म हमेशा मान्यताओं पर चलता है। एक आतंकवादी अपनी मान्यता के लिए किसी को मार रहा है, क्योंकि जो उसकी मान्यता, उसकी कहानी में विश्वास नहीं करेगा, वो गंदा आदमी है। बहुत सारे बुद्धिजीवी यही कहते हैं कि रिलीजन इज़ वन ऑफ़ द फॉरमोस्ट सोर्सेज ऑफ़ स्ट्राइफ़ एंड कॉन्फ्लिक्ट। धर्म एकता का स्रोत सिर्फ़ तब हो सकता है, जब वो व्यक्ति को सब विभाजनों से दूर कर दे। वेदांत ही शायद एक अकेला है जो ‘ग्रेट यूनिफ़ायर’ है, बाक़ी तो सब तोड़-फोड़ के अड्डे हैं।
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प्रश्नकर्ता: सर, मेरा प्रश्न यह था कि जैसे गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को सिखाते हैं कि भले ही तुम्हें अपने भाई और गुरुओं को मारना पड़े पर धर्मयुद्ध में सब उचित है। तो मैं इसे तार्किक बुद्धि से समझने का प्रयास कर रहा था कि जैसे आतंकवादियों को भी तो यही सिखाते हैं कि जो तुम कर रहे हो वो अपने धर्म की रक्षा के लिए कर रहे हो और जो तुम्हारे धर्म का नहीं है वो अधर्मी है, उसे ख़त्म कर दो।
आचार्य प्रशांत: अरे! अपना धर्म थोड़े ही होता है। धर्म क्या होता है? अपना धर्म थोड़े ही कुछ होता है कि ये एक धर्म है, ये पाँच धर्म हैं, ये आठ धर्म हैं। बिलीफ़(विश्वास) और धर्म में कोई अन्तर होता है कि नहीं होता है? आपने आज का सत्र बहुत ध्यान से नहीं सुना है, है न? बार-बार श्रीकृष्ण बोल रहे थे, क्या? "अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।” अहंकार मान्यताओं में जीता है।
मान्यताओं को धर्म थोड़े ही बोलते हैं। धर्म आता है जिज्ञासा से।




