गीता की ब्रांडिंग एक लोकधार्मिक बुक के रूप में हो गई है। तो ये जो जेन-ज़ी है, जब लोकधर्म को ठुकराती है, तो लोकधर्म के साथ-साथ गीता को भी ठुकरा देती है। थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथ-वॉटर। तो उनके लिए गीता, पुराण सब एक है। और जो चलती है, रावण संहिता उनके लिए वो सब एक है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। ये जो सवाल है, या जो ये बात है, बहुत क्रूड लगेगी, बट ये मैं रोज़ या हर पल आई कैन से, फ़ेस करती हूँ। आई एम अ लेक्चरर। आई टीच सीए, सीएमए, सीएस स्टूडेंट्स, लॉ एंड मैनेजमेंट।
अभी आज की जो पीढ़ी है, आज का जो युवा है, वो ना ही लोकधर्म को मानना चाहता है और ना ही गीता को मानना चाहता है। इट्स नॉट अबाउट इग्नोरिंग, इट्स नॉट अबाउट इट्स अबाउट नॉट एकनॉलेजिंग ओनली। उसे ऊपर या नीचे रखने की बात ही नहीं है, उसे टोटली एकनॉलेज ही नहीं करना चाहता। उनका भी जो एटिट्यूड है, पैसा। जिनके पास पैसा।
आचार्य प्रशांत: आपने गलत डायग्नोस किया है। गीता की ब्रांडिंग एक लोकधार्मिक बुक के रूप में हो गई है। तो ये जो जेन-ज़ी है, जब लोकधर्म को ठुकराती है, तो लोकधर्म के साथ-साथ गीता को भी ठुकरा देती है। थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथ-वॉटर। तो उनके लिए गीता, पुराण सब एक है। और जो चलती है, रावण संहिता उनके लिए वो सब एक है।




