नयी पीढ़ी धर्म से दूर क्यों?

Acharya Prashant

16 min
75 reads
नयी पीढ़ी धर्म से दूर क्यों?
गीता की ब्रांडिंग एक लोकधार्मिक बुक के रूप में हो गई है। तो ये जो जेन-ज़ी है, जब लोकधर्म को ठुकराती है, तो लोकधर्म के साथ-साथ गीता को भी ठुकरा देती है। थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथ-वॉटर। तो उनके लिए गीता, पुराण सब एक है। और जो चलती है, रावण संहिता उनके लिए वो सब एक है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। ये जो सवाल है, या जो ये बात है, बहुत क्रूड लगेगी, बट ये मैं रोज़ या हर पल आई कैन से, फ़ेस करती हूँ। आई एम अ लेक्चरर। आई टीच सीए, सीएमए, सीएस स्टूडेंट्स, लॉ एंड मैनेजमेंट।

अभी आज की जो पीढ़ी है, आज का जो युवा है, वो ना ही लोकधर्म को मानना चाहता है और ना ही गीता को मानना चाहता है। इट्स नॉट अबाउट इग्नोरिंग, इट्स नॉट अबाउट इट्स अबाउट नॉट एकनॉलेजिंग ओनली। उसे ऊपर या नीचे रखने की बात ही नहीं है, उसे टोटली एकनॉलेज ही नहीं करना चाहता। उनका भी जो एटिट्यूड है, पैसा। जिनके पास पैसा।

आचार्य प्रशांत: आपने गलत डायग्नोस किया है। गीता की ब्रांडिंग एक लोकधार्मिक बुक के रूप में हो गई है। तो ये जो जेन-ज़ी है, जब लोकधर्म को ठुकराती है, तो लोकधर्म के साथ-साथ गीता को भी ठुकरा देती है। थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथ-वॉटर। तो उनके लिए गीता, पुराण सब एक है। और जो चलती है, रावण संहिता उनके लिए वो सब एक है।

वो कहते हैं, जो कुछ भी संस्कृत में लिखा है, वो सब एक ही बात है। जो कुछ भी संस्कृत में लिखा है, वो सब बिल्कुल एक ही बात है। चाहे वो केन उपनिषद् हो या मनुस्मृति, दोनों एक हैं, क्योंकि दोनों पुरानी बातें हैं और दोनों संस्कृत में लिखी हुई हैं। तो अगर हम ठुकराएँ, तो सबको ठुकरा देंगे।

प्रश्नकर्ता: राइट, आचार्य जी। तो अभी उनका जो एटिट्यूड है, वो चार्वाक फ़िलॉसफ़ी थी न, हेडोनिज़्म।

आचार्य प्रशांत: उन्होंने पढ़ी है?

प्रश्नकर्ता: नहीं फ़िलॉसफ़ी, तो वही एक्चुअली जीते हैं।

आचार्य प्रशांत: नहीं जीते भाई। चार्वाक कोई जेन-ज़ी थोड़ी थे।

प्रश्नकर्ता: लेकिन उनका जो एटिट्यूड है आज की लाइफ़ का, वो यही है कि पैसा कमाएँ। सीए की पढ़ाई में मज़ा नहीं आता।

आचार्य प्रशांत: वो एटिट्यूड हर उस व्यक्ति का होगा, जिसकी ज़िंदगी का कोई दार्शनिक आधार नहीं होगा। वो डिफ़ॉल्ट एटिट्यूड है। वो जेन-ज़ी का नहीं है, वो इंसान का सदा से रहा है। हम पैदा ही ऐसे होते हैं, जेन-ज़ी को काहे को दोष दे रहे हैं?

प्रश्नकर्ता: नहीं, मतलब मैं जिनसे मिलती हूँ, युवा पीढ़ी से बातचीत करती हूँ।

आचार्य प्रशांत: सब ऐसे ही थे।

प्रश्नकर्ता: हम सब ऐसे ही हैं, बराबर। तो एक सवाल जो है, आपने कहा, हम मतलब हम जान गए हैं अभी कि आत्मा नहीं होती और पुनर्जन्म नहीं होता है। तो वो एक सवाल करते हैं, तो फिर हम एंजॉय क्यों न करें लाइफ़?

आचार्य प्रशांत: इस तरीके से आप बोलोगे न, आत्मा नहीं होती, पुनर्जन्म नहीं होता।

प्रश्नकर्ता: नहीं, नहीं, हम जब डिस्कस।

आचार्य प्रशांत: तो यही हो गई न गड़बड़। मैंने कहा है, पुनर्जन्म नहीं होता? मैंने बोला? बोलो। घंटा भर समझाया है कि होता है।

प्रश्नकर्ता: प्रकृति है, और प्रकृति रूप बदलती है और आती है।

आचार्य प्रशांत: आपने ऐसे समझाया? प्रकृति है, समष्टि है, लहरें हैं। समझाया?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो क्वेश्चन मुझे पूछते हैं न, वो ये पूछते हैं कि आज ग्लोबल वॉर हो रहे हैं। आज क्लाइमेट चेंज में जो तबाही मचा रहे हैं, उनका क्या होगा? वो तो एंजॉय कर रहे हैं। मतलब जो सफर कर रहा है, वो तो ग़रीब है।

आचार्य प्रशांत: आप ये बताइए न, ये सवाल आपसे पूछा जाता है। ये सवाल तो मुझसे भी पूछा गया। मुझसे भी पूछा गया, मैं उसका वही जवाब देता हूँ जो आप देते हो? या मैं सवाल को पकड़ करके पहले उसके मूल तक लेकर आता हूँ? अभी पिछले ही सत्र में समझा रहा था कि आप हमेशा हारोगे, जब आप क्वेश्चनर का पैराडाइम एक्सेप्ट कर लोगे। जब आप उससे उसी के अखाड़े में लड़ने जाओगे और हमेशा हारोगे।

जब आप कहोगे कि मुझे तेरा फ़्रेमवर्क स्वीकार है, मुझे तेरे क्वेश्चन की फ़ाउंडेशनल अज़म्प्शन स्वीकार है, और अब मैं जवाब दूँगा, तो आप हमेशा हारोगे। स्वीकार नहीं करना होता है। वो जो बोल रहा है, उसके पीछे जो धारणा है, जिस केंद्र से प्रश्न उठ रहा है, पहले उसको उखाड़ना होता है। तब जाकर आप कुछ समझा पाओगे। नहीं तो कुछ नहीं समझा सकते।

मैंने कितने तो उदाहरण दिए थे, याद है पिछले सत्र में? आप वो करते नहीं हो। आप फँस जाते हो। क्यों? क्योंकि आप अभी भीतर-भीतर, भले ही आप गीता में हो पर भीतर-भीतर आप अभी भी उसके पैराडाइम को, उसके चौखटे को, उसके फ़्रेमवर्क को स्वीकार करते हो। तो जब वो वहाँ से आकर आपसे कुछ बोलता है, तो फिर आप निरुत्तर हो जाते हो कि आप क्या जवाब दें, तो फँस गए, फँस गए, फँस गए।

ये बहुत होता है हमारे यहाँ। आप अपने घर में होते हो, समाज में होते हो, दफ़्तर में होते हो, और वहाँ आप पहुँच जाते हो गीता-ज्ञान बताने के लिए। कई लोग तो सोशल मीडिया पर भी ये कर चुके हैं। कहते हैं, हम जा रहे हैं वहाँ पर गीता-ज्ञान बताएँगे, बहस करेंगे, डिबेट करेंगे, यूट्यूब पर, फ़ेसबुक पर, कहीं जाकर। और वहाँ चीथड़े उड़ गए।

क्यों उड़ गए?

क्योंकि तुम क्वेश्चनर के पैराडाइम को स्वीकार करके फिर जवाब देने की कोशिश कर रहे हो। तुम उसके प्रश्न की बुनियाद में जो भूल है, उसको ही पॉइंट-आउट नहीं कर पा रहे हो। मैंने आज कहा कि मूर्खता होगी कहना, आत्मा क्या है? है न? आत्मा क्या है? मैंने बताया था। क्यों? क्योंकि पूछ सकते हो, कि टोपा क्या है? हेडफ़ोन क्या है? मूँछ क्या है? नाक क्या है? बाल क्या है? जूता क्या है? पूछ सकते हो, क्योंकि ये क्या हैं? ऑब्जेक्ट्स हैं।

टोपा है, कह सकता हूँ, क्योंकि क्या है? उतार दो। टोपा ऑब्जेक्ट है इसीलिए कह पाया कि ‘है।’ और ऑब्जेक्ट है, इसीलिए कह पाया कि?

श्रोता: उतार दो।

आचार्य प्रशांत: अरे नहीं यार, नहीं है। आप (टोपी पहने श्रोता की ओर इंगित करते हुए) खड़े हो जाओ। है, (टोपी को इंगित करते हुए।) क्यों कह पाया? क्योंकि?

श्रोता: नहीं है।

आचार्य प्रशांत: अरे यार, क्यों कह पाया कि है?

श्रोता: ऑब्जेक्ट है।

आचार्य प्रशांत: (श्रोता को टोपी उतारने का इशारा देते हुए) नहीं है। क्यों कह पाया कि नहीं है?

श्रोता: ऑब्जेक्ट है।

आचार्य प्रशांत: क्योंकि ऑब्जेक्ट है। और दीदी, आप जाकर बोलते हो आत्मा नहीं है। तो आपने भी आत्मा को क्या बना दिया?

श्रोता: ऑब्जेक्ट।

आचार्य प्रशांत: इसलिए आप अपने छात्रों को कुछ नहीं समझा सकते, क्योंकि अभी आपको बात समझ में ही नहीं आई है।

जितनी बड़ी गलती वो कर रहा है जो कहता है कि आत्मा है, उतनी ही बड़ी गलती वो कर रहा है जो कह रहा है कि आत्मा नहीं है। क्योंकि दोनों ही उसे ऑब्जेक्टिफ़ाई कर रहे हैं। और अध्यात्म सब्जेक्ट के बारे में है। क्योंकि दुःख सब्जेक्ट को है, तड़प मैं रहा हूँ, मैं आत्मा को ऑब्जेक्ट काहे को बना रहा हूँ, यार। ऑब्जेक्ट से क्या लेना-देना? बात सारी सब्जेक्ट की है, क्योंकि सफरिंग सब्जेक्ट की है।

आप जाकर के इधर-उधर, बिना मुझे समझे, मेरी बात को दूसरों के सामने ले आते हो, बहस करते हो। तो फिर वहाँ कपड़े फट जाते हैं। बदनामी मेरी कराते हो। समझा मुझे है नहीं। नाम वहाँ मेरा बड़ा-बड़ा लगा दिया, जैसे मैंने आपको अधिकृत करा हो, रिप्रेज़ेन्टेटिव बनाया हो अपना कि जाओ और। आ रही है बात समझ में?

पूरा सोशल मीडिया भरा हुआ है। आत्मा नहीं है कहना भी उतना ही गलत है, जितना गलत है कहना कि आत्मा है। पुनर्जन्म नहीं है, ये कहना भी उतना ही गलत है, जितना कहना कि पुनर्जन्म है। गलती कहाँ है? गलती इस मान्यता में है कि कोई है, जिसका पुनर्जन्म या तो होता है या नहीं होता है।

जब आप कहते हो पुनर्जन्म होता है, तो भी आप किसको मान रहे हो? अहंकार को, यार। और किसको मान रहे हो? थोड़ा शार्प तेज़ी से चलो। आप कहते हो पुनर्जन्म होता है तो भी आपने किसको मान लिया? अहंकार को, कि अहंकार है और वो दूसरे शरीर में चला गया।

जब आप कहते हो पुनर्जन्म नहीं होता है, तो भी आपने किसको मान लिया? कि अहंकार है, पर वो दूसरे में नहीं जाता। तो ये दोनों ही बातें बराबर की गलत हैं। पर आप जनता के सामने आकर ऐसे बोलते हो, जैसे आचार्य जी बोलते हैं कि पुनर्जन्म नहीं होता। अब पटके जाओगे, और नाम किसका ख़राब कर रहे हो? मेरा। और मेरा हो तो हो और किसका ख़राब कर दिया? वेदान्त का नाम ख़राब कर रहे हो।

बहसें होती हैं गॉड है कि गॉड नहीं है, थीस्ट वर्सेस एथीस्ट। दोनों ही पगले हैं, क्योंकि दोनों ही ये नहीं पूछ रहे कि किस फ़ाउंडेशन पर तुम क्या बात कर रहे हो। गॉड माने क्या? एपिस्टेमिक इन्क्वायरी है ही नहीं, और बहस चल गई दो घंटे। भागे जा रहे हैं, भागे जा रहे हैं बिना ये देखे कि पाँव के नीचे ज़मीन है कि नहीं।

जैसे कार्टून में होता था कई बार, कि वो यहाँ से दौड़ता हुआ आएगा और आगे भागता जा रहा है, हवा में ही। और फिर नीचे देखेगा ज़मीन नहीं, तब गिर जाएगा। लंबी-चौड़ी बहस चल रही है, बिना ये देखे कि तुम्हारी बहस का कोई फ़िलॉसॉफ़िकल बेसिस ही नहीं है।

सत्य नहीं हारता, सत्यमेव जयते। सत्य के पक्ष में या सत्य के प्रतिनिधि बनकर अगर आप खड़े हो और आपको हारना पड़ रहा है, तो इसका मतलब आप सत्य से बहुत दूर हो। सत्य के साथ होते तो हारना नहीं पड़ता।

प्रश्नकर्ता: सर, मेरा नाम माधुरी है। मैं बचपन से स्वाध्याय परिवार से जुड़ी हूँ जो गीता से जुड़ा है। तो उसमें एक बात सिखाई थी हमें, कि गीता इज़ नॉट ओनली द स्क्रिप्चर ऑफ़ हिन्दूइज़्म। गीता इज़ अ स्क्रिप्चर ऑफ़ ह्यूमैनिटी।

तो सर, बचपन से मतलब मुझे सच्चाई के साथ रहने की आदत है। तो जब भी हम लोगों के साथ इस चीज़ को; आपने बोला, ‘तो?’ सवाल करो। तो मुझे आदत ही है। कोई कुछ बोले, तो, ‘तो?’ जब हम ऐसा बोलते हैं सच, तो लोगों को चुभता है। आपने अभी ईगो की बात की, आत्मा-अवलोकन। वो तो ठीक है, ख़ुद के बारे में। जब हम सच बोलते हैं, तो लोग बोलते हैं कि “अरे, इसमें तो ईगो है। इसका ईगो हर्ट होता है, इसलिए इतना एक्सप्लेनेशन करती है।”

या फिर मतलब वो पूरा झुंड बना देते हैं, तो पूरा अकेले-अकेला मतलब ये करते हैं। तो ऐसे लोगों के साथ कैसा बिहेव करें? मैं क्या करूँ?

आचार्य प्रशांत: ‘तो?’ उन्हें चुभता है, ‘तो?’ न, न ये मुहावरेबाज़ी नहीं हो रही, हँसी-मज़ाक नहीं हो रहा। ‘तो’ का संबंध उनसे नहीं तुम्हारे स्वार्थ से है। तुम्हारी समस्या ये नहीं कि उन्हें चुभता है। तुम्हारी समस्या ये है कि उन्हें अगर चुभेगा, तो वो तुम्हारा नुकसान कर देंगे, इसलिए डरते हो। ये जो ‘तो’ है न, ये उनसे नहीं पूछा जाता, ख़ुद से पूछा जाता है। “हाँ, मैं सच बोल रहा हूँ, उसको चुभ रहा है, ‘तो?’ मुझे मुक्त होना चाहिए इस आशा से कि तुम मेरा नुकसान न करो। तुम्हें चुभता है तो चुभे। मैं जानता हूँ मैं कौन हूँ। मेरा तुम नुकसान कर नहीं सकते।”

ये सब बात, कि “मैं लोगों को सच बताती हूँ, पर लोगों को बुरा लग जाता है तो क्या करें?” अरे यार, सच नहीं बुरा लगता। सच के आगे झूठ मिटता है। ऐसी सी बात है कि रोशनी से अँधेरे को बुरा लग जाता है, तो क्या करें? कुछ हो सकता है इस बात का? इसका स्वभाव है प्रकाशित करना। उसकी प्रकृति है, अँधेरापन। इसमें कुछ पूछ-पूछने से क्या होगा?

प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। जैसा कि हम जानते हैं कि यहाँ पर अभी बात चल रही थी कि हम जो भी क्वेश्चन-एंड-आंसर्स की बात चल रही थी, कि जो भी अब स्टूडेंट्स हैं, वो क्वेश्चन करते हैं। मेरा हमेशा से यही आता है कि अगर कोई ऐसे कुछ भी अंट-शंट आंसर-क्वेश्चन बात करता है कोई, तो उसका रिप्लाई क्यों ही देना है?

न प्रेम है, न ईगो, ईगो वाली बात नहीं रही कि मतलब मेरे को जीतना है इससे। और न ही उस बंदे से इतना कुछ लगाव सा है, तो क्यों ही आंसर देना किसी को?

आचार्य प्रशांत: अगर जो कह रहे हो, वो सब नहीं है तो उत्तर मत दो। पर कुछ लोगों को प्रेम होता है, इस नाते उत्तर देना चाहते हैं। जो तुम कह रहे हो, वो मैं भी कह सकता हूँ, कि इनके जवाब क्यों दूँ? फँस गए।

प्रश्नकर्ता: सर, जो तर्क में हम हार जाते हैं। यूज़ुअली एक टाइम आता है कि वो सब कन्विन्स हो जाते हैं। और एक उसके बाद फिर उनको लगता है, कि उसके बाद फिर संख्या-बल का एक स्तर आता है, कि उनकी संख्या ज़्यादा रहती है। अगर मैं तर्क में जीत भी जाऊँ। और दूसरी जगह जहाँ हम जीत नहीं पाते हैं। तो मतलब ये पैराडाइम शिफ़्ट मतलब एक तो बेसिक्स क्लियर होना। ये सिंपली बोल सकते हैं?

या फिर मतलब एक बेसिक्स जैसे इन द लाइट ऑफ़ वेदान्त, जैसे गीता समझी जाए इन द लाइट ऑफ़ वेदान्त। तो बेसिक्स अगर हमारे क्लियर हों, जैसे आपने बोला, तो ये मतलब हमसे क्यों नहीं हो पा रहा है? तर्क क्यों नहीं? पैराडाइम शिफ़्ट क्यों नहीं हो रहा है?

आचार्य प्रशांत: आपने शुरुआत करी थी कि अगर पैराडाइम शिफ़्ट हो जाए तो ऐसा-ऐसा होता है। फिर आप कह रहे हो, पैराडाइम शिफ़्ट क्यों नहीं हो पा रहा है? हो पा रहा है कि नहीं हो पा रहा है?

प्रश्नकर्ता: नहीं समझ में आ रहा है, सर।

आचार्य प्रशांत: पैराडाइम शिफ़्ट नहीं करना होता, पैराडाइम समझना होता है। जब कोई प्रश्न कर रहा हो, तो उसके प्रश्न के केंद्र में, हर क्वेश्चन के पीछे कुछ फ़ॉल्सनेस होगी। क्योंकि सत्य तो सवाल पूछता नहीं न। सवाल के लिए कंट्राडिक्शन चाहिए। इतना समझ में आ रहा है? वरना सवाल क्यों उठेगा? और स्पष्टता के बाद सवाल तो बचता नहीं है। तो हर सवाल के पीछे एक झूठ होता है, उस झूठ को उघाड़ना होता है।

पर सवाल बन के ऐसे खड़ा होता है जैसे, मैं?

श्रोता: सच हूँ।

आचार्य प्रशांत: भाई, सवाल को जवाब नहीं चाहिए होता। सवाल को डिसोल्यूशन चाहिए होता है। सवाल को उत्तर नहीं, आईना चाहिए होता है ताकि सवाल मिट जाए। क्योंकि हर सवाल झूठा है। सवाल की डेफ़िनिशन ही यही है, दैट वीच इज़ असेर्टिंग अ कंट्राडिक्शन एंड सेइंग, नाउ आंसर। द आंसर लाइज़ इन एक्सपोज़िंग द कंट्राडिक्शन, नॉट आंसरिंग इट। बिकॉज़ इन आंसरिंग इट, यू आर एक्सेप्टिंग इट। उस कंट्राडिक्शन को एक्सेप्ट कर लिया तो क्या तुमने आंसर दिया। देन नाउ द क्वेश्चन हैज़ बीन एक्सटेंडेड, नॉट आंसर्ड।

प्रश्नकर्ता: तो सर, इसमें ये बिलीफ़ सिस्टम हमारे, मतलब दिमाग पर इतनी छाई है, डीप कंडीशन्ड हो गई है कि हम ये ऑलरेडी मान चुके होते हैं कि हम गलत हैं। और उसका पैराडाइम करेक्ट है। और उस हिसाब से हम बहते चले जाते हैं उसमें।

आचार्य प्रशांत: ये बात हुई न, हाँ। आपके भीतर हीन-भावना बैठी है। आप कहीं-न-कहीं पहले माने बैठे हो कि बात तो उसकी सही ही है। लेकिन फिर भी आचार्य जी कुछ बोलते हैं, वो इम्प्रेसिव लगता है। तो मैं उससे बहस कर लेता हूँ। अब पिटोगे नहीं तो क्या होगा? तुम पिटोगे नहीं तो क्या होगा? बोलो।

आप ये नहीं देख पा रहे कि वो जहाँ खड़ा है, उसकी फ़ाउंडेशन में क्या गलती है। क्यों? क्योंकि उसकी फ़ाउंडेशन पर तो आप भी खड़े हो, आप अलग हुए ही नहीं अभी तक। भीतर से आप उसी के जैसे हो। और भीतर से उसी के जैसे रहते हुए आप उससे हारोगे ही।

प्रश्नकर्ता: कल का एक सिंपल इंसिडेंट है, सर। दो मिनट में बताना चाहता हूँ। क्रॉसवर्ड में जो बुक-साइनिंग का इवेंट था, वहाँ पर मैंने मेरी सोसाइटी में जो रहते हैं, वो एक क्लोज़ फ़्रेंड हैं। पर वो एक तर्क के बेसिस पर मुझसे सिमिलर विचार रखते हैं। पर वो अभी तक आपसे जुड़ नहीं पाए। तो उनको मैंने इनवाइट किया था, और वो आए थे। अभी वहाँ पे एक आत्मावलोकन जैसा हुआ क़िस्सा।

आचार्य प्रशांत: क़िस्सा नहीं, वक़्त नहीं है। मैं सुना देता हूँ क़िस्सा। आप हैं, आप यहाँ बैठे हैं, आधी रात हो गई। आप घर जाते हैं। घर में कोई पिता, माता, पत्नी, आपसे कहती हैं कि “कौन तुम्हारे ज़्यादा क़रीब का है? मैं कि आचार्य?” आप हारोगे? क्यों हारोगे? बताओ। क्योंकि निकटता की वही परिभाषा जो वो लेकर आए हैं, आपने भी स्वीकार कर रखी है। अब आप हार गए, आपका मुँह बंद हो जाएगा।

अभी आप यहाँ से जाओगे इतना गीता वग़ैरह पढ़ के, घर में अभी बीवी खड़े हो के बोलेगी, “बताओ, तुम्हारा ज़्यादा सगा कौन है, मैं कि आचार्य?” आप ऐसे (चुपचाप खड़े होकर देखना)। क्योंकि सगेपन की आप उनकी ही परिभाषा पहले स्वीकार कर चुके हो। पहले उनकी पैराडाइम, जो उनकी मान्यता है उसको चुनौती दो कि सगा माने?

श्रोता: क्या?

आचार्य प्रशांत: अब होगी बात। नहीं तो बस अपना-सा मुँह लेकर आ जाना, कि नहीं है तो वही अपने न, अपने तो अपने होते हैं।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories