हिंदुओं का इतना धर्म-परिवर्तन क्यों? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं आपका स्पष्टीकरण चाहूँगा कि इतिहास में ये भी देखा गया है कि धर्म परिवर्तन भी सबसे ज़्यादा भारतीयों का या स्पसिफिक्ली (विशेष रूप से) कहूँ तो हिन्दुओं का ही ज़्यादा हुआ है; तो उस पर भी मैं आपसे कुछ स्पष्टीकरण चाहूँगा कि इतनी आसानी से क्यों धर्म परिवर्तन हो जाता है हिन्दुओं का?
आचार्य प्रशांत: देखो, एक भूल हो गई है। जो पूरा सनातन धर्म है, वो एक की उपासना को ले करके है। सत्यनिष्ठ है सनातन धर्म; और सत्य के अतिरिक्त किसी पर निष्ठा नहीं होनी चाहिए। सत्य एक है। लेकिन सत्य के प्रति एकनिष्ठा के साथ-साथ हिन्दू धर्म में अनेकेश्वरवाद (बहुदेववाद) भी चला है। जिसमें तमाम तरह के दो छोटे-मोटे देवी देवता, ये-वो, सबकी पूजा कहा गया।
अब उसका एक प्रयोजन था, जो प्रकृति की पूजा की गई, जो इतने सारे देवी-देवता रचे गए कि ये पूज्य हैं; उसका प्रयोजन था, उसका प्रयोजन ये था कि मनुष्य को जीना तो संसार में ही है, तो संसार के प्रति एक अनुग्रह का भाव होना चाहिए। संसार में जो कुछ भी हो उसके प्रति एक मैत्री का, अपनेपन का भाव होना चाहिए। तो, इसलिए संसार मे जो कुछ भी है उसको भी पूजनीय मानो। लेकिन हुआ क्या कि इस चक्कर में हिन्दुओं ने संसार को ही पूजना शुरू कर दिया। वो जो एक ब्रह्म है, उसको बिलकुल भूल गए। ये जो बाकी सब तत्व थे, जिनकी सनातन धारा में आराधना होती थी; वो तत्व इसलिए थे ताकि वो आपको ब्रह्म की ओर, माने मुक्ति की ओर ले जा सकें। पर मुक्ति को हम बिलकुल भूल गए। हमने अपने सामने जो मूर्ति रख ली, हमने उस मूर्ति को ही भगवान समझ लिया। मूर्ति के सामने मुक्ति को हमने भुला दिया।
जब आपकी निष्ठा बँट जाती है न, तो उसमें दम नहीं रह जाता। ये अच्छे से समझिएगा―ये सूत्र है―जब आपकी निष्ठा चालीस जगह बँट जाती है तो उसमें बहुत दम नहीं रह जाता। आप एक आम हिन्दू का पूजा घर देखें, उसमें चालीस मूर्तियाँ, पोस्टर, छोटा-बड़ा पता नहीं क्या-क्या सब रखा होता है। होता है कि नहीं? निष्ठा बँट गयी। इस बँटी हुई निष्ठा में अब बल नहीं रह जाता। वहाँ से फिर ये प्रश्न आ रहा है कि दुनिया में सबसे ज़्यादा धर्मांतरण हिन्दुओं का ही क्यों हुआ? और आज भी हो रहा है।






